Tuesday, 5 July 2016

ਪਾਰਟੀ ਸਾਥੀਆਂ ਦੇ ਨਾਂਅ : ਕਾਮਰੇਡ ਜਗਮਤੀ ਸਾਂਗਵਾਨ ਦਾ ਖੁੱਲ੍ਹਾ ਪੱਤਰ

ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ.(ਐਮ) ਦੀ ਕੇਂਦਰੀ ਕਮੇਟੀ ਦੀ ਮੀਟਿੰਗ ਵਿਚ ਲੀਡਰਸ਼ਿਪ ਵਲੋਂ ਲਈਆਂ ਗਈਆਂ ਕਈ ਗੈਰ ਸਿਧਾਂਤਕ ਰਾਜਨੀਤਕ-ਜਥੇਬੰਦਕ ਪੁਜੀਸ਼ਨਾਂ ਦੇ ਵਿਰੋਧ ਵਿਚ ਕੇਂਦਰੀ ਕਮੇਟੀ ਦੀ ਮੈਂਬਰ ਕਾਮਰੇਡ ਜਗਮਤੀ ਸਾਂਗਵਾਨ ਨੇ 20 ਜੂਨ ਨੂੰ ਉਸ ਪਾਰਟੀ ਦੀ ਮੁਢਲੀ ਮੈਂਬਰਸ਼ਿਪ ਤੋਂ ਅਸਤੀਫਾ ਦੇਣ ਦਾ ਦਲੇਰੀ ਭਰਪੂਰ ਕਦਮ ਚੁੱਕਿਆ ਹੈ। ਇਹ ਘਟਨਾ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਸਮੁੱਚੀ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਲਹਿਰ ਵਿਚ ਅੱਜ ਭੱਖਵੀਂ ਚਰਚਾ ਦਾ ਵਿਸ਼ਾ ਬਣੀ ਹੋਈ ਹੈ। ਇਸ ਸੰਦਰਭ ਵਿਚ ਅਸੀਂ ਸੋਸ਼ਲ ਮੀਡੀਏ ਰਾਹੀਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋਇਆ ਉਹਨਾਂ ਦਾ 21 ਜੂਨ ਨੂੰ ਲਿਖਿਆ ਗਿਆ ਇਹ ਪੱਤਰ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਦੇ ਪਾਠਕਾਂ ਨਾਲ ਸਾਂਝਾ ਕਰ ਰਹੇ ਹਾਂ।  - ਸੰਪਾਦਕੀ ਮੰਡਲ
प्रिय साथियो,
मैं 1986 से सीपीआई (एम) की सदस्या थी और जीवन में कोई भी व्यक्ति अपने राजनीतिक सिद्धान्तों और मूल्यों के लिए जितना संघर्ष कर सकता है या जो कीमत दे सकता है वो मैंने ईमानदारी से करने की कोशिश की। लेकिन आज जब मैं एडवा (आल इंडिया डैमोक्रेटिक वुमैंस फैडरेशन)  की सचिव थी व केन्द्रीय कमेटी की सदस्या थी, तब पार्टी से इस्तीफा देने की क्या नौबत आ गई, वह मैं अपने साथियों, मित्रों व शुभचिन्तकों के साथ साझा करना चाहती हूं। ऐसा इसलिए क्योंकि मेरे साथी परेशान हैं व वो जानना चाहते हैं कि मैंने अंदरूनी संघर्ष का रास्ता ही क्यों नहीं अपनाया। परेशान मैं भी अत्याधिक हूं। और हर कोशिश की कि पूरे मसले को पार्टी के अन्दर उपलब्ध तौर तरीकों से ही डील किया जाए। वरना हकीकत में बोलते हुए जिस दिन से सीपीएम ने बंगाल में कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने का फैसला किया उसी दिन से आत्मा परेशान थी। क्योंकि हम शुरू से अपने नेताओं से सुनते आए हैं कि बंगाल में; इसमें व्यक्तियों की बात नहीं है। वर्ग संघर्ष की राजनीति का इतिहास रहा है, कि वहां कांग्रेस के हाथ हमारे गरीब प्रतिबद्ध साथियों के खून से रंगे हुए हैं। वर्गीय राजनीति को छोड़ दें तो कांग्रेस में भी कई नेक लोग हो सकते हैं, पर सवाल व्यक्तियों का नहीं है।
आज आप उसी वर्ग विरोधी राजनीति से हाथ मिला रहे हैं। वो भी भाजपा के खिलाफ  नहीं जो वर्ग विरोधी और साम्प्रदायिक दोनों ही है, बल्कि कांग्रेस से टूट कर अलग हुए एक हिस्से तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ। केन्द्रीय कमेटी की विशेष बैठक बुलाई गई इस पूरे सवाल पर विमर्श के लिए। पीबी में महासचिव तथा बंगाल के 4 साथियों के अलावा इस लाईन को किसी का भी समर्थन नहीं था। केन्द्रीय कमेटी ने भी दो-तिहाई से भी ज्यादा के बहुमत से उस प्रस्ताव को ठुकराया। लेकिन बंगाल की पार्टी ने फिर भी वही किया। उस वक्त जब हम सवाल उठा रहे थे तो हमें कहा गया कि चुनाव के बाद बोलना बीच में डिस्टर्ब मत करो। हमने ठीक वैसा ही किया। और एक बात और यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि अगर मेरी ईमानदारी के कोई मायने हैं तो मैंने यह सोचा था कि अगर पार्टी जीत भी जाती है तो भी मैं गलत को गलत कहने में सब कुछ दाव पर लगा दूंगी। दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य से बंगाल की जनता ने भी इस अवसरवादिता को नकार दिया।
फिर 18-20 जून को केन्द्रीय कमेटी की बैठक हुई। उसमें पोलिट ब्यूरो का बहुमत का नोट रखा गया जिसमें इस फैसले को राजनीतिक-कार्यनीतिक लाईन का उल्लंघन बताया गया। मीटिंग में उसे सुनकर बहुत राहत मिली कि आखिर पार्टी सही जगह पर आई। परन्तु उसके साथ-साथ पार्टी महासचिव ने अपना अलग नोट रखा जिसमें उन्होंने कहा कि बंगाल कमेटी द्वारा कांग्रेस के साथ जाने की सारी कवायदें पार्टी की लाईन से मेल भर नहीं खाती तथा यह इसका उल्लंघन नहीं है। बंगाल के दो मुख्य नेता यहां तक बोल गए कि अगर पीबी का नोट माना गया तो वे इस्तिफा दे देंगे। इसके बावजूद केन्द्रीय कमेटी के दो-तिहाई सदस्यों ने इसे पार्टी कार्यक्रम, राजनीतिक-कार्यनीतिक लाईन व केन्द्रीय कमेटी के फैसले का उल्लंघन बताया तथा साथ में उन्होंने इस समझौतावादी रूख से उनके अपने राज्यों में हुए नुक्सान को भी बयां किया। इसके बावजूद बहस को सुनकर पीबी ने जो प्रस्ताव अंत में रखा उसमें बहुमत की भावना के बजाय अल्पमत की भावना को दर्ज करते हुए ‘उल्लंघन’ को हटाकर ‘मेल नहीं खाता है’ कर दिया। मतलब राजनीतिक-कार्यनीतिक लाईन से समझौते के लिए किसी की भी जवाबदेही तय नहीं की जाएगी। इस पर कुछ साथियों ने सवाल उठाए व इसे पास नहीं किया जिनमें मैं भी शामिल थी। साथी जब बोलने की कोशिश कर रहे थे तो उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा था। इसके बाद मुझे अंदरूनी संघर्ष की जगह खत्म लगी। अत: मैंने प्रोटैस्ट करते हुए कहा कि मैं इस व्यवहार के खिलाफ  व इस प्रस्ताव के खिलाफ  केन्द्रीय कमेटी व पार्टी सदस्यता से इस्तिफा देती हूं।
हमने पार्टी में आते ही यही सीखा था कि हमारी पार्टी लाईन व जनवादी केन्द्रीयतावाद पार्टी की जीवन रेखा है तथा इनसे समझौता व छेड़ छाड़ सबसे बड़ा अपराध है। सबसे बड़ा अपराध की जवाबदेही तक अगर तय न हो तो इसे हजम कैसे किया जा सकता है? आज पार्टी में अपने ही राजनीतिक सिद्धान्तों से समझौता करने की प्रवृत्तियों से पार्टी व उसकि राजनीति को बचाने की जरूरत है। और मैंने वही किया है सभी उपयुक्त नॉर्म और फोरम का प्रयोग करते हुए। पार्टी कार्यक्रम, पार्टी लाईन व केन्द्रीय कमेटी के फैसले को यूं तोडऩे की गलती को कोई गलती न माने और उसे हजम करने के रास्ते पर चलने का काम करे तो ये उनका अपना फैसला हो सकता है। लेकिन मैं ये नहीं कर पाई व न ही करूंगी। ये कोई भावुकता या गुस्से का सवाल नहीं है।
मैं पार्टी कार्यक्रम से मतभेद नहीं रखती । पर यहाँ उस पार्टी लाईन की ही उपेक्षा हुई जिसे हमारे पुरोधाओं ने अपने खून पसीने से सींचकर आगे बढ़ाया व आज भी हमारे हज़ारों प्रतिबद्ध साथी वही काम कर रहे हैं। मैं उनके उस जज्बे को उसी जज्बे के साथ सलामी देना चाहती हूं चाहे कितनी भी बड़ी कीमत देनी पड़े।
- जगमती सांगवान (21 जून, 2016)

देश अथवा आवाम की बेहतरी के लिये जनवादी सोच होना जरूरी

(आम जनता को विषमुक्त भोजन कपड़ा, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, शुद्ध जल उपलब्धता के लिये  लोकसभा सासंद श्री शांता कुमार जी के 19/03/2016 के पंजाब-केसरी समाचार-पत्र में प्रकाशित लेख ‘‘देश के लिये राष्ट्रवादी सोच होना जरूरी’’ के प्रत्युतर में कुछ शब्द।)
 
- सुदर्शन कन्दरोड़ी 
साम्यवादी चिन्तन पर बहस न तो पांच राज्यों के चुनावों से, न ही भारतीय जनता के ‘अच्छे दिनों के सपने दिखा कर’ सत्तासीन होने, न ही दक्षिणपंथीयों द्धारा जेएनयु में संशोधित सीडीज बना कर रचे षडयंत्रों के चलते सुर्खियों में आये तथाकथित देशद्रोह के आरोपी कन्हैया कुमार की आड़ में तेज हुई, बल्कि, समानता मूलक समाज की समाप्ति के बाद, धूर्त राजाओं व चालाक भूपतियों द्वारा सब प्रकार के प्राकृतिक संसाधनों पर अधिपत्य स्थापित करने के काल से अलग-अलग रूपों में सदियों से जारी है। इसी अन्यायपूर्ण व्यवस्था को देख कर किसी भक्त कवि ने शिकायत करते हुये कहा है : ‘‘हे भगवान! तूने यह कैसी दुनिया बनाई है, यहां एक आदमी के पास इतना नमक है, जितना एक आदमी के पास आटा, बहुत सारों के पास नमक जितना आटा भी नहीं।’’ यहां पर कवि प्राकृतिक संसाधनों पर कुछेक परिवारों के कब्जे को इंगित कर जनव्यथा कह रहा है। इसलिये यह बहस तब तक जारी रहेगी जब तक एक मानव के हाथों अनेकों आदमियों का शोषण करने वाली व्यवस्था जारी रहेगी। जिसमें चालाक आदमी जनता को बेवकूफ बना कर धर्म, जाति, रंग, लिंग तथा इलाके की भावना को इस्तेमाल कर अपना उल्लू सीधा रख धन-धान्य पर कब्जा कर बड़े-बड़े होटलों, महलों व तथाकथित जनहित में अस्पतालों का निर्माण करके सर्व हित को ठेंगा दिखाकर निज हित में प्रयोग करता रहेगा। जब इन महल, होटल, अस्पतालों, विश्वविद्यालयों, कालेजों, उद्योगों, खेती का इस्तेमाल ‘‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’’ के वैदिक उद्घोष को सार्थक करेगा, तब यह बहस स्वत: रूप में समाप्त हो जायेगी। 
1917 से पहले, जार शाही रूस के आस-पास के इलाके कई देशों (राष्ट्रों) में बंटे थे। अलग-अलग अच्छे बुरे कारणों के चलते वो सारे राष्ट्र, एक राष्ट्र सोवियत रूस (.स्.स्.क्र.-यूनियन आफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक) में शामिल हुये। कालान्तर 25 साल के अरसे में पहले विश्वयुद्ध में बर्बाद हुआ रूस इस योग्य हो गया कि उसने एडोल्फ हिटलर शासित जर्मन के हमले को रोकने में सफलता पाई, परिणामस्वरूप हिटलर आत्महत्या करने को मजबूर हुआ। बेशक आज के भारत में भी हिटलर के पैरोकार हैं। उसी तथाकथित राष्ट्रवादी जर्मन के हिटलर की सेना ने उस से पहले ताकतवर इंग्लैंड, फ्रांस-पोंलैड सहित कई राष्ट्रों, तकरीबन पूरे योरप को तबाह-बर्बाद कर दिया था। तब बहु-राष्ट्रों को संविधानिक मान्यता देने वाले सोवियत रूस द्वारा युद्ध में दिखाई राष्ट्रभक्ति पूर्ण वीरता से फासीवादी जर्मन द्वारा तबाह हुये योरप के राष्ट्र फिर सांस लेने लगे तथा उन का राष्ट्रवाद पुनर्जीवित हो गया। इसी प्रकार वियतनाम दो राष्ट्रों में बंट कर फिर से एक रूप में हम सब के सामने है। उसी बहुराष्ट्रीय सोवियत रूस ने 1971 में भारत-पाक युद्ध में साम्राज्यवादी अमेरिका के जल-युद्धपोत सातवें बेड़े को हिन्दमहासागर में न आने की चेतावनी देकर न केवल भारतीय सीमाओं में अमेरिका साम्राज्यवाद को घुसने से सफलता पूर्वक रोका, बल्कि बंगला देश की आजादी सुनिश्चित करने में भी अपना योगदान दिया। उसी सोवियत रूस का नाम लेने मात्र से ही हमारे राष्ट्रभक्तों की भक्ति खंडित हो जाती है।
1947 से पहले भारत, बंगला देश तथा पकिस्तान एक राष्ट्र थे लेकिन तथाकथित धार्मिक जुनूनियों, इन्हीं राष्ट्रवादियों के तथाकथित धर्म व राष्ट्र प्रेम के चलते आज तीन राष्ट्र बने खड़े हैं। जिस प्रकार का व्यवहार इन तीनों उपराष्ट्रों में राष्ट्रभक्त कर रहे हैं, उससे निकलने वाले सम्भावित नतीजों के बारे में सोच कर तन-मन सिहर जाता है। पिछले चार-पांच दशकों से धर्मान्धता, इलाकावाद, जातिवाद आधारित विदेशी ताकतों की शह पर चले अंादोलनों को एकबारगी भुला भी दिया जाये तो भी हाल ही में निरन्तर घट रही घटनायें जैसे, दादरी में क्या खा रहे हो, जे.एन.यु. में देशद्रोह बनाम देशभक्ति की बहस को चला कर तथा हरियाणा व राजस्थान में एक-एक जाति को आरक्षण हेतु भडक़ा कर, जिस प्रकार की आराजकता फैलाई गई उससे उपजी असुरक्षा व मानवता विरोधी भावनाओं को, साम्राज्यवाद अपनी मन्डी के विस्तार के हित में अलगाव की भावनाओं में परिवर्तित कर देगा। पहले भी खालिस्तान, द्राविड़ राज तथा सात बहनों के आजाद देश-राष्ट्र (उत्तर पूर्वी राज्य) की स्थापना के संकल्प का दंश हमने झेला है। हमने 25000 से ज्यादा प्राणों की आहुति अकेले पंजाब में दी है, जिसमें कन्हैया कुमार की समानता मूलक शोषण मुक्त समाज की स्थापना की विचारधारा वाले बड़ी गिनती में शहीद हुये थे, इन शहादत को पाने वाले  बहनों-युवाओं व बजुर्गों सब ने तथाकथित खालिस्तानी राष्ट्रवादियों की ए.के.-47 तथा मार्टरों से निकली गोलियों का सामना अपनी छातियों से किया था।
आज दुनिया के समस्त राष्ट्रों से ताकतवर अमेरिका अपनी टैक्स कुलैकशन का बड़ा हिस्सा दूसरे राष्ट्रों को तबाह करने वाले हथियारों पर खर्च करता है तथा कमाता भी ज्यादातर, मानवता को नष्ट कर देने वाले हथियारों को बेच कर ही है। हम राष्ट्रभक्त भारतीय भी अपने बजट का बड़ा हिस्सा तकरीबन 45 फीसदी रूस, फ्रांस, इग्लैंड, अमेरिका आदि से युद्ध सामग्री की खरीद पर दशकों से भेंट कर रहे हैं। कमोबेश यही हाल पाकिस्तान का है। राष्ट्रभक्त सरकारों की नीतियों के चलते करोड़ों-करोड़, उच्च शिक्षा प्राप्त युवक-युवतियां बेरोजगार रह कर नशे में गर्क होकर असमय मृत्यु का ग्रास बन रहे हैं अथवा अपराध में शामिल हो रहे हैं। राष्ट्रभक्त खेती नीति की वजह से गत दो दशकों में  भारत में 3 लाख से ज्यादा कृषक आत्म हत्या कर अकाल मौत को प्राप्त हो चुके हैं।
क्या सारे 200 से ज्यादा राष्ट्रों के राष्ट्रभक्त अपने-अपने देशों में इस युद्ध उन्माद को रोक कर अपने राष्ट्रों की गरीब जनता को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, साफ  हवा, पानी देने का सफल प्रयास कभी करेगें?    
केवल भारत का ही नहीं, पूरी दुनिया का इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि सब लोगों की आजादी, समानता व खुशहाली की चाहत रखने वाले-सब धर्मों को बराबर एक समान मानने वाले जन हितैषी राष्ट्रभक्त हुये हैं, आप उन्हें साम्यवादी कहें या जनवादी! दूसरी ओर  अपने अपने धर्म, जाति, रंग, वर्ण, क्षेत्र को श्रेष्ठ तथा अन्य को हेय मानने वालों ने दूसरों तथा अंतत: स्वयं को तबाह किया है। पुरातन काल में गौर वर्ण के महान महाराजा द्वारा तब के कलिंगा, आज के उड़ीसा के लोगों के कत्लेआम की कहानी सब पढ़ते सुनते हैं, तब भी उसी कातिल को महान कह कर तथाकथित गौर वर्णिय गौरव का अनुभव करते हैं। अफरीका के अश्वेत लोगों को किस प्रकार गोरों ने लूटा आज भी विस्तृत खोज का विषय है अमेरिका के अश्वेत नागरिकों को आज भी अमेरिका पर काबिज योरपियन गोरे ब्लैकी कह कर प्रताडि़त करते हैं। जबकि अमेरिका की धरती के मूल मालिक अश्वेत ही हैं। इस तरह यह स्थापित निर्विवाद सत्य है कि सब का भला, बराबरी चाहने वाला साम्यवादी ही हो सकता है साम्य का अर्थ समान है। इसीलिये ‘सर्वे सुखन्तु’ की भावना हमारा आदर्श है।   
‘‘देश के लिये राष्ट्रवादी सोच का होना जरूरी’’ लेख लिखने वाले विद्वान लेखक लिखते हैं कि 1924 में कानपुर षडयंत्र केस में कुछ साम्यवादी भी पकड़े गए थे। यह अर्ध सत्य है,  दरअसल हकीकत यह है कि 1924 के कानपुर षडय़ंत्र केस में जो  पकड़े गये उन में ज्यादातर साम्यवादी ही थे क्यों कि वे अंग्रेजों से अपने देश भारत को आजाद करवा कर अम्बानी अडानी जैसे इजारेदार घरानों टाटा, बिरला, डालमिया तथा गौर परिवार के हवाले न करके किसानों मजदूरों की बहुसंख्या का राज्य स्थापित करना चाहते थे। चुनाव में जुमलेबाजी से जनता को भरमा कर वोट की ठगी मारना अगर आप को राष्ट्रभक्ति लगता है तो आप को यह सोच मुबारक। वे बहु-राष्ट्रीय विदेशी देवकद कम्पनियों को भारत की सस्ती मजदूरी, सस्ती उपजाऊ जमीन तथा बहूमुल्य प्राकृतिक संसाधनों को लूटने की इजाजत देने के खिलाफ थे, वे साम्यवादी अपने स्वदेशी उद्योग, स्वदेशी कृषि तथा स्वदेशी भाषाओं में शिक्षा प्रणाली लागू करना चाहते थे, जब कि आजादी के बाद वाले आज के कथित देशभक्त इस साम्यवादी विचार के खिलाफ  काम कर रहे हैं। 1980 में अपना नया अवतार लेते समय तथाकथित राष्ट्रभक्तों नेे गान्धीवादी समाजवाद स्थापित करने का वचन देश की जनता को दिया था किन्तु आज यह राष्ट्रभक्त सब से ज्यादा समाजवाद शब्द पर ही क्रोधित होते हैं।
साम्यवादी सिर्फ 1924 के कानपुर साजिश केस में ही अग्रेजों ने आरोपी नहीं बनाये, बल्कि उन्होंने, भारतीय जनता की आजादी-समानता तथा सब धर्मों को अपनी-अपनी धार्मिक मर्यादाओं के अनुसार जीने की चाहत को मूर्त रूप देने की खातिर चले अन्दोलनों में भारी योगदान दिया है। सरदार अजीत सिंह जी की पगडी संभाल लहर, गदर पार्टी, बबर अकाली लहर, शहीद भगत सिंह, बुट्केश्वरदत्त, चंद्रशेखर आजाद, भगवती चरण, जतिन दास व अशफाकुल्ला खां, पंडित किशोरी लाल, शिव वर्मा, अजय घोष, सुखदेव, राजगुरू की हिन्दोस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में   शामिल रहे ज्यादातर कार्यकर्ता, बाद में, साम्यवादी अंादोलन के पुरोधा रहे तथा समाजवाद, मानवतावाद, अन्तरराष्ट्रीयवाद तथा अपने-अपने धर्मों को मानने की आजादी के लिये संघर्षरत रहे। वहीं कथित राष्ट्रभक्त वीर सावरकर जी किस प्रकार गदर पार्टी वाले, देशभक्तों को, जो अन्डेमान-निकोबार काले-पानी की जेल में बन्द थे, को माफी मांग कर रिहाई लेने के लिये उत्साहित करते थे। इस का वर्णन प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, गदर पार्टी के प्रधान बाबा सोहन सिह भकना जी ने अपनी संक्षिप्त जीवन गाथा में किया है। इसी पुस्तक में पुणे की यरवदा जेल में, गदरी सिक्ख कैदियों की पगड़ी तथा कछहरा (कच्छा) उतारने के खिलाफ  चली एक महीना लम्बी भूख-हड़ताल में पंडित परमानन्द झांसी तथा श्री हृदय राम मन्डी का शामिल होना उन गदरियों का सब धर्मों को समान मानने का ज्वलन्त उदाहरण है। सरकारपरस्तों ने इन दोनों हिन्दू स्वन्त्रतता सेनानियों को समझाने का भरसक प्रयास किया कि पगडी व कछहरा सिक्खों का मामला है। लेकिन यह धरती के सपूत अपने उसूलों पर अडिग रहे। बाबा सोहन सिंह भकना साम्यवादी पार्टी के सदस्य थे। इसी प्रकार बाबा सन्तोख सिंह, बाबा ज्वाला सिंह, बाबा रतन सिंह समेत सैंकड़ों गदर पार्टी के बलिदानी योद्धे बाद में साम्यवादी पार्टी के कार्यकर्ता बने। भगत सिंह के साथी पंडित किशोरी लाल, शिव वर्मा, अजय घोष सहित कई साम्यवादी पार्टी में आखरी सांसों तक काम करते रहे। भारत आजाद होने के बाद भी इन्हें जेल में डाला गया। यह करती हैं कथित राष्ट्रभक्तों की सरकारें अपने स्वन्त्रंता सेनानियों के साथ।  एमरजैंसी के दौर में महज जेलों में रहे अपने हितैषियों को सम्मानों से सुशोभित करने का आज प्रयास किया जा रहा है। पदमश्री तथा भारत रत्न जैसे सरकारी सम्मानों को लेने के लिये जुगतें लगाई जा रही हैं, जबकि पंडित किशोरी लाल जी को पहली बार पैंशन की किश्त तब मिली जब वो योद्धा आखिरी सांस ले चुका था। इन सब वास्तविक देश भक्तों की सुस्मृतियों को जालन्धर में स्वत्रंत्ता सेनानियों के वारिसों ने देश भगत यादगार भवन में बिना किसी जाति, धर्म, रंग, लिंग, इलाके के भेद के सँजो कर रखने का सार्थक प्रयास किया है। हर साल आम जन के हित में समारोह आयोजित किया जाता है। इसके अतिरिक्त सब प्रकार के मेहनतकश लोग इस भवन में अपनी समस्याओं पर विचार हेतु एकत्र होते रहते हैं। क्या नागपुर अथवा झंडेवालान में ऐसा कुछ होने का है कोई साक्ष्य, न है, न होगा।
क्या तथाकथित राष्ट्रवादी सोच के पैरोकार सारे इतिहास पर निष्पक्ष शोध करवाने का साहस रखते हैं?
राष्ट्रवादी सोच के विद्वानों के अनुसार हिटलर की बढ़ती ताकत ने इग्लैंड तथा रूस को आपस में समझौता करने के लिये विवश कर दिया तो साम्राज्यवादी विश्व युद्ध एक ही रात में जन-युद्ध बन गया। बेशक बन गया। क्या तथाकथित राष्ट्रवादी सोच के विद्वान आज भी फासीवादी हिटलर की जीत होने की कामना नहीं कर रहे हैं।
सोवियत रूस के तत्कालीन नेता जोसफ  स्टालिन की पार्टी ने इसे बहुत पहले साम्राज्यवादी युद्ध कह कर इस में न पडऩे का ऐलान किया था। साम्राज्यवादी ताकतें यह चाहती थीं कि अभी किशोर अवस्था का सोवियत रूस इस साम्राज्यवादी युद्ध में अपने को बरबाद होने देता। स्टालिन ने उस समय हिटलर की तुलना पागल कुत्ते से की थी जो उस समय पूरे आवेग में था तथा अपने देशवासियों को इस कुत्ते को रोकने के लिये एक-एक इंच पर लडऩे मरने की प्रेरणा दी थी व वह खुद भी मोर्चे पर था। उसका लडक़ा, जो मोर्चे से वापिस आ गया था स्टालिन ने उसे जिंदगी भर मुंह नहीं लगाया। क्या आज के राष्ट्रवाद के पुरोधा पुत्रमोह से निर्लिप्त हैं? सत्य यह है कि सातवीं पीढ़ी तक की चिन्ता से ग्रस्त भ्रद्रजन भ्रष्ट आचरण से जनता का शोषण करके अपनी तिजौरियां भरने में लगे हैं।
 सोवियत रूस निश्चिय ही भारत का मुसीबतों में अजमाया हुआ दोस्त था, एक सच्चे दोस्त की तरह भारत समेत तीसरी दुनिया के तमाम प्रगतिशील राष्ट्रों को दी गई सहायता का कोई मोल आज के स्वयंभु राष्ट्रभक्त कहाँ लगा सकते हैं। यह महानुभव भूल जाते हैं कि 1971 के भारत-पाक युद्ध में आज के इनके सबसे प्यारे दोस्त बाराक ओबामा के देश अमेरिका ने भारत को अपने सातवें युद्धपोत से भयभीत करने की नापाक कोशिश की थी, जबकि सोवियत रूस अपने आठवें युद्धपोत के साथ हिन्द महासागर में अमेरिका की धमकियों का मुंह तोड़ जबाब देने के लिये आ हाजिर हुआ था।
कृत्घनता की कोई हद नहीं होती शायद !    
सोवियत रूस ने हमारे देश की लोहे की बुनियादी आवश्यकता की पूर्ति के लिये लोहे का कारखाना, भिलाई स्टील प्लांट सार्वजनिक क्षेत्र में दिया, जिसे भारत के नवरत्नों में से एक कहा गया। आज इन्हीं नवरत्नों को निजी व भ्रष्ट उद्योगपतियों को बेचने की साजिशें विनिवेश के नाम पर जारी हैं। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने में उस समय कांग्रेस में काम कर रहे समाजवादियों व साम्यवादियों का समर्थन हासिल था। कांग्रेस छोडऩे के बाद नेता जी ने फार्बर्ड ब्लाक की स्थापना की। नेता जी और साम्यवादियों का आपसी सहयोग इस बात से प्रगट होता है कि नेता जी को भारत से निकाल कर अफगानिस्तान के रास्ते रूस तक जाने के लिये उन्होंने साम्यवादियों पर भरोसा किया। नेता जी की महिला ब्रिगेड की लक्ष्मी सहगल साम्यवादी पार्टी की कर्मठ कार्यकर्ता थीं। नेता जी के साथ-साथ रहने वाले नम्बियार को नेता जी स्वयं माक्र्सवादी पुकारते थे। नेता जी के साथ रहे (आई.ऐन.ऐ) के कृष्ण कुमार पल्टा (चंडीगढ़) जो हिमाचल प्रदेश के ही रहने वाले थे भी साम्यवादी विचारक थे। कैप्टन लक्षमी सहगल के पति के बारे में तो पूरा देश नारे लगाता था ‘‘लाल किले से आई आवाज, सहगल, ढिल्लों, शहनवाज।’’ वही कै. लक्षमी सहगल जब राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार थी तो इन्हीं तमाम राष्ट्रभक्तों ने उन के खिलाफ  मतदान किया। क्योंकि इन राष्ट्रभक्तों का राष्ट्रप्रेम का रंग अलग है।                                            
साम्यवादियों द्वारा देश की आजादी तथा देश की गरीब तथा दलित शोषित जनता की मुक्ति के हित में निभाये किरदार को आप भले आदमी बार-बार मिथ्या-भाष्य से कमतर नही कर पायेंगे। साम्यवादी मेजर जयपाल तथा उनके साथियों द्वारा अंग्रेज को भगाने तथा भारतीय शोषक लम्पट जगीरदारों से भूमिहीन किसानों की मुक्ति खातिर चलाये गये तेलंगाना अन्दोलन के बारे में राष्ट्रवादी क्या राय रखते हैं। अरूणा आसिफ अली क्या राष्ट्रवादी नहीं थीं? साम्यवादियों द्वारा नेता जी को दगा देने बारे में आप का बखान नया नहीं, क्योंकि आपके गुरूजनो का यह विश्वास था कि एक झूठ को सौ बार बोलने से वह सच बन जाता है। यह स्वत: असत्य के बारे में आप भद्रजनों का संकल्प हो सकता है। लेकिन सत्य-सत्य ही रहता है सत्य को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। आप के असत्य का पर्दाचाक करने के लिये उसी समय की तीन  टिप्णियों को उदघृत करना काफी है।  
1939 में वाम की ललकार थी-त्रिपुरी को युद्ध का नगाड़ा जरूर पीटना चाहिये। सुभाष को वोट-संघर्ष को वोट। तमाम सोशलिस्टो, कांग्रेस-सोशलिस्ट पार्टी के अन्दर आओ! कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी जिंदाबाद।
इसीलिये सुभाष जी की अध्यक्ष पद पर जीत तथा महात्मा जी के उम्मीदवार सीता रमैया जी की हार के बाद गांधी जी को सुनना आवश्यक है, ‘‘मौलाना साहब ने जब खड़ा होने से इन्कार कर दिया तो डा. पटटाभि को उम्मीदवारी से अपना नाम वापस लेने को न कहकर मैं (गांधी) उन्हें उकसाने का साधन बन गया, इसलिये यह उनसे अधिक मेरी हार है। मैं निश्चित उसुलों व नीति का प्रतिनिधित्व करता हंू, इनकी अनुपस्थिति में मेरा कोई अस्तित्व नहीं। इसलिये मेरे सामने यह स्पष्ट है कि प्रतिनिधि लोग उन उसुलों व नीतियों की तसदीक नहीं करते जिनका मैं प्रतिनिधि हूं।’’ गांधी जी ने सुभाष समर्थक प्रतिनिधियों को एक तरह से धमकाते हुये कहा कि सुभाष को वोट देकर आपने मेरे विरूद्ध वोट किया है। गांधी जी ने आगे सुभाष जी को आशीर्वाद देते हुये कहा ‘‘अगर तुमने पूर्ण बहुमत द्वारा निर्धारित संसदीय कार्यक्रम में परिवर्तन किया तो मंत्रिमंडल इस्तीफा भी दे सकता है।’’
अब सुभाष जी की एकता की अपील पढ़े :
‘‘तर्क के वास्ते यह मान लेने से कि चुनाव परिणाम वाम की विजय का प्रतीक है, हम वामपंथ के कार्यक्रम पर गौर करना बंद कर देगें, वामपंथी लोग निकट भविष्य में कांग्रेस की एकता और संघ योजना का अथक विरोध चाहते हैं। इसके अतिरिक्त वे जनवादी उसुलों के पक्ष में हैं। वामपंथी लोग कांग्रेस में फूट की जबाबदेही स्वीकार नहीं करेंगें। (जोर हमारा) अगर फूट पड़ी तो यह उनके कारण नहीं उनके बगैर पड़ेगी’’, (टाइम्स आफ  इंडिया 4.02.1939) यह कुछेक इतिहास की बातें जो पहले भी सामने थीं फिर से उजागर करने का एक लघु प्रयास करने का प्रयत्न किया है।
‘‘देश के लिये राष्ट्रवादी सोच का होना जरूरी’’ के माननीय लेखक जे.एन.यू. को साम्यवाद की गिरती ताकत का प्रतीक बताने का प्रयास करते हैं। श्रीमान! सिर्फ जे.एन.यू. ही नहीं हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला भी गिरती साख का ही प्रतीक है। हैदराबाद, मद्रास, जादवपुर भी गिरती साख के ही निशान हैं। और उत्तर प्रदेश के एक गांव मे एक अल्पसंख्यक के घर में देशभक्तों की भीड़ द्वारा जबरदस्ती घुस कर उस निस्सहाय को ईंट डंडों से पीट-पीट कर मार देना बढ़ती ताकत का शंखनाद। हरियाणा में आम जन के घरों दुकानों को जला कर कमजोरों को मारना पीटना राष्ट्रभक्ति की मजबूत होती भावना को स्पष्ट कर रहा है। अभी हाल ही में श्रीमान जी के देशभक्त सहयोगियों द्वारा माननीय सर्वोच्च अदालत के आदेशों को धता बता कर नहर को पाटने का जो कार्य किया गया, उसे आप राष्ट्रभक्ति के कौन से स्थान में रखेंगे? तब भी वहां पर सत्ता का लुत्फ  उठाने में किचिंत  हया का अनुभव नहीं होता है। क्या  महामानव जी निश्चिय ही गिरती साख वाले विश्वविद्यालयों से मानवतावादी सोच के प्रहरी आगे आयेंगें, तथा आम जन को आजादी व समानता प्राप्त करने के लिये प्रेरित करेंगे? जिसके लिये यह विश्वविद्यालय पहले से प्रमाणित हैं, क्योंकि वहां के विद्यार्थी, शोधार्थी सोचते हैं। क्योंकि आप भी शायद सोचते हैं तथा आप राष्ट्रवादी सोच के सांसद होने के साथ आपकी एक राजनीतिक हस्ती है, के कारण क्या यह अपेक्षा रखें कि आप अपने प्रांत में शहीद भगत सिंह, जो आप के अनुसार राष्ट्रवादी थे, हमारे लिये भगत सिंह मानवतावादी, अन्तरराष्ट्रीयवादी, समाजवादी जो साम्यवादी होने की प्रक्रिया में थे, के नाम पर एक  विश्वविद्यालय बनवा दें, जिसमें शहीद भगत सिंह तथा उन की पार्टी की विचारधारा पर सही में खोज-शोध कार्य हो सके, भले ही आज हर कोई आप समेत अपने स्वार्थ के लिये भगत सिंह जी का प्रयोग कर रहा है। हिन्दोस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के कार्यकत्र्ताओं ने असहनीय कष्टों को सहा तथा फांसियों, उम्र कैद समेत लम्बी जेल-यातनाएं सहीं ताकि समतामूलक समाज स्थापित किया जा सके।        
श्रीमान,  जहां तक आर्थिक भ्रष्टाचार की बात है, राष्ट्रवादी पार्टी का चुना हुआ आम विधायक जो चुनाव से पहले साधारण जीवन जीता है, पांच साल में ही अपनी गरीबी के सारे धोने धो लेता है।  राष्ट्रवादी सांसदों की घोषित-अघोषित सम्पतियों में कई-कई गुणा वृद्धि के अज्ञात स्त्रोतों का पता लगाना आमजन के लिये सच में ही दुष्कर कार्य है। आप सब स्वयंभु घोषित राष्ट्रवादी मंत्रियों मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल के दौरान अर्जित संपत्ति की निष्पक्ष जांच करवायें तो आम जन का चौंक कर भौचक्का रह जाना तय है। मुख्यमंत्री बनने से पहले कंधे पर खादी का थैला लटका कर घूमने वाला कैसे करोड़ों की चल-अचल सम्पति बना लेता है? क्या आप बताएंगे? वहीं दूसरी और वैचारिक मतभेदों के होते हुए विरोधी भी वाम नेताओं के त्याग को नम्न करते हंै।        
बजुर्गवार! यह नियम आम प्रचलित है कि सोये हुये को जगाया जा सकता है लेकिन सोने का नाटक करने वाले को जगाना असम्भव है। लेकिन हर नियम का अपवाद होता है। इसलिये हमने यह लिखने का प्रयास किया है। शायद अपवाद वाली बात सच हो। वैसे भी वानप्रस्थ के समय आदमी दुनियावी मोह-माया से निर्लिप्त होने का दिखावा करने का प्रयत्न कहीं अधिक करता है।

ਹਿਮਾਚਲ 'ਚ ਟਰਾਂਸਪੋਰਟ ਕਾਮਿਆਂ ਨਾਲ ਹੋ ਰਿਹਾ ਅਨਿਆਂ

ਸਾਡੇ ਗੁਆਂਢੀ ਸੂਬੇ ਹਿਮਾਚਲ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਦੇ ਜਨਤਕ ਟਰਾਂਸਪੋਰਟ ਅਦਾਰੇ, ਹਿਮਾਚਲ ਰੋਡ ਟਰਾਂਸਪੋਰਟ ਕਾਰਪੋਰੇਸ਼ਨ (ਐਚ.ਆਰ.ਟੀ.ਸੀ.) ਦੇ ਕਾਮੇ ਇਸ ਵੇਲੇ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਦਮਨਚੱਕਰ ਦਾ ਬੜੀ ਦਲੇਰੀ ਨਾਲ ਟਾਕਰਾ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਇਸ ਅਦਾਰੇ ਵਿਚ ਕੰਮ ਕਰਦੀਆਂ ਲਗਭਗ ਸਾਰੀਆਂ ਯੂਨੀਅਨਾਂ 'ਤੇ ਅਧਾਰਤ ਜੁਆਇੰਟ ਕੋ-ਆਰਡੀਨੇਸ਼ਨ ਕਮੇਟੀ (ਜੇ.ਸੀ.ਸੀ.) ਦੇ 30 ਆਗੂਆਂ ਨੂੰ 16 ਜੂਨ ਨੂੰ ਕਾਰਪੋਰੇਸ਼ਨ ਦੇ ਪ੍ਰਬੰਧਕਾਂ ਨੇ ਮੁਅੱਤਲ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਇਸ ਅਦਾਰੇ ਉਤੇ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸੇਵਾਵਾਂ ਵਿਚ ਵਿਘਨ ਨਾ ਪੈਣ ਦੇਣ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਕਾਨੂੰਨ 'ਐਸਮਾ' ਲਗਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਆਪਣੀਆਂ ਮੰਗਾਂ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਲਈ ਕਾਰਪੋਰੇਸ਼ਨ ਦੇ ਕਾਮਿਆਂ ਨੇ 14-15 ਜੂਨ ਨੂੰ ਹਿਮਾਚਲ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਵਲੋਂ ਹੜਤਾਲ 'ਤੇ ਰੋਕ ਲਾਉਣ ਤੋਂ ਬਾਵਜੂਦ ਬਹੁਤ ਹੀ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਹੜਤਾਲ ਕੀਤੀ ਸੀ।
ਐਚ.ਆਰ.ਟੀ.ਸੀ. ਦੇ ਕਾਮੇ ਪਿਛਲੇ ਲੰਮੇ ਸਮੇਂ ਤੋਂ ਆਪਣੀਆਂ ਨਿਆਂਪੂਰਨ ਤੇ ਜਾਇਜ ਮੰਗਾਂ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਲਈ ਜੁਆਇੰਟ ਕੋਆਰਡੀਨੇਸ਼ਨ ਕਮੇਟੀ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿਚ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਮੰਗਾਂ ਵਿਚ ਮੁੱਖ ਮੰਗ ਇਸ ਅਦਾਰੇ ਨੂੰ ਕਾਰਪੋਰੇਸ਼ਨ ਤੋਂ ਰੋਡਵੇਜ਼ ਵਿਚ ਤਬਦੀਲ ਕਰਨ ਦੀ ਹੈ। ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਗੁਆਂਢੀ ਸੂਬਿਆਂ ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਹਰਿਆਣੇ ਵਿਚ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਇਸ ਨਾਲ ਇਹ ਅਦਾਰਾ ਸਰਕਾਰੀ ਵਿਭਾਗ ਬਣ ਜਾਵੇਗਾ ਅਤੇ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਬਜਟ ਵਿਚ ਸਿੱਧੇ ਰੂਪ ਵਿਚ ਇਸਦੇ ਫੰਡਾਂ ਦੀ ਵਿਵਸਥਾ ਹੋਵੇਗੀ। ਸੇਵਾਮੁਕਤ ਹੋ ਚੁੱਕੇ ਕਾਮਿਆਂ ਦੇ ਪੈਨਸ਼ਨਾਂ ਦੇ ਲੰਮੇ ਸਮੇਂ ਤੋਂ ਪਏ ਬਕਾਏ ਅਤੇ ਹੋਰ ਲਾਭਾਂ ਦੇ ਬਕਾਇਆਂ ਦੇ ਫੌਰੀ ਭੁਗਤਾਨ ਦੀ ਮੰਗ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਇਕ ਹੋਰ ਬਹੁਤ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਮੰਗ ਠੇਕੇ 'ਤੇ ਰੱਖੇ ਗਏ ਕਾਮਿਆਂ ਨੂੰ ਪੱਕਾ ਕਰਨ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਤਨਖਾਹਾਂ ਵਿਚ ਥੋੜ੍ਹਾ ਜਿਹਾ ਵਾਧਾ ਕਰਨ ਦੀ ਹੈ। ਇੱਥੇ ਇਹ ਵਰਣਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਆਮ ਤੌਰ 'ਤੇ ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ ਦੀ ਮੰਗ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਕੱਚੇ ਕਾਮਿਆਂ ਦੀਆਂ ਤਨਖਾਹਾਂ ਸੂਬੇ ਦੇ ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ ਦੇ ਗ੍ਰੇਡਾਂ-ਸਕੇਲਾਂ ਮੁਤਾਬਕ ਕੀਤੀਆਂ ਜਾਣ। ਪਰ ਇੱਥੇ ਤਾਂ ਠੇਕੇ 'ਤੇ ਰੱਖਿਆ ਡਰਾਈਵਰ ਜਿਸਨੂੰ 6000 ਰੁਪਏ ਮਹੀਨਾ ਤਨਖਾਹ ਦਿੱਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਦੀ ਤਨਖਾਹ 8,310 ਰੁਪਏ ਕਰਨ ਅਤੇ ਕੰਡਕਟਰ ਜਿਸਨੂੰ 4000 ਰੁਪਏ ਮਿਲਦੇ ਨੂੰ 7810 ਰੁਪਏ ਕਰਨ ਦੀ ਹੀ ਐਚ.ਆਰ.ਟੀ.ਸੀ. ਤੋਂ ਮੰਗ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ। ਸੂਬੇ ਦੇ ਹਾਕਮ ਇਸਨੂੰ ਵੀ ਮੰਨਣ ਤੋਂ ਆਕੀ ਹਨ। ਜਦੋਂ ਕਿ ਥੋੜੇ ਦਿਨ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਸੂਬਾ ਅਸੈਂਬਲੀ ਦੇ ਮੈਂਬਰਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀਆਂ ਤਨਖਾਹਾਂ ਤੇ ਭੱਤਿਆਂ ਵਿਚ 100 ਫੀਸਦੀ ਦਾ ਵਾਧਾ ਕੀਤਾ ਹੈ।
ਇੱਥੇ ਇਹ ਵੀ ਸਮਝ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਦੀ ਗੱਲ ਹੈ ਕਿ ਸੂਬੇ ਦੇ ਮਾਣਯੋਗ ਹਾਈਕੋਰਟ ਨੇ ਕਈ ਸਾਲਾਂ ਤੋਂ ਆਪਣੀਆਂ ਜਾਇਜ ਮੰਗਾਂ ਲਈ ਲੜ ਰਹੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਕਾਮਿਆਂ ਦੀ ਕਦੇ ਸਾਰ ਨਹੀਂ ਲਈ ਪਰ ਜਦੋਂ ਆਪਣੀਆਂ ਜਾਇਜ਼ ਮੰਗਾਂ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਲਈ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਲੰਮੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨ ਨੇ ਨਿਆਂ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਮਜ਼ਬੂਰ ਹੋ ਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਹੜਤਾਲ ਕੀਤੀ ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਹੁਕਮ ਜਾਰੀ ਕਰਨ ਵਿਚ ਕੋਈ ਦੇਰ ਨਹੀਂ ਲਾਈ। ਇਹ ਵਰਣਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਠੇਕੇ 'ਤੇ ਲੱਗੇ ਡਰਾਇਵਰ ਨੂੰ 6000 ਰੁਪਏ ਅਤੇ ਕੰਡਕਟਰ ਨੂੰ ਸਿਰਫ 4000 ਰੁਪਏ ਪ੍ਰਤੀ ਮਹੀਨਾ ਤਨਖਾਹ ਮਿਲਦੀ ਹੈ। ਜਿਹੜੀ ਕਿ ਸੂਬਾ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਨੋਟੀਫਾਈ ਕੀਤੀ ਗਈ ਘਟੋ-ਘੱਟ ਤਨਖਾਹ ਤੋਂ ਘੱਟ ਹੈ, ਮਾਣਯੋਗ ਹਾਈਕੋਰਟ ਨੇ ਇਸ ਤੱਥ ਨੂੰ ਵੀ ਹੁਕਮ ਕਰਦੇ ਸਮੇਂ ਨੋਟ ਕਰਨ ਦੀ ਜ਼ਹਿਮਤ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ। ਜਦੋਂਕਿ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਸਰਵਉਚ ਅਦਾਲਤ ਦੇ ਚੀਫ ਜਸਟਿਸ ਰਹੇ ਮਰਹੂਮ ਜਸਟਿਸ ਵੀ.ਕੇ. ਕ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਆਇਅਰ ਨੇ ਆਪਣੇ ਇਕ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ  ਫੈਸਲੇ ਵਿਚ ਕਿਹਾ ਸੀ ਕਿ ਜਿਸ ਕਾਮੇ ਨੂੰ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਨਿਰਧਾਰਤ ਘੱਟੋ ਘੱਟ ਤਨਖਾਹ ਤੋਂ ਵੀ ਘੱਟ ਤਨਖਾਹ ਮਿਲਦੀ ਹੈ, ਉਹ ਬੰਧੂਆ ਮਜ਼ਦੂਰ ਹੈ। ਭਾਰਤ ਦੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਮਾਤ ਮਾਣਯੋਗ ਹਾਈਕੋਰਟ ਤੋਂ ਇਹ ਆਸ ਕਰਨ ਦੀ ਤਾਂ ਵਾਜਿਬ ਰੂਪ ਵਿਚ ਹੱਕਦਾਰ ਹੈ ਹੀ ਕਿ ਸੂਬਾ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਬੰਧੂਆਂ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀ ਪੱਧਰ 'ਤੇ ਰੱਖੇ ਜਾ ਰਹੇ ਕਾਮਿਆਂ ਨੂੰ ਨਿਆਂ ਮਿਲੇ । ਹੁਣ ਤਾਂ ਮਾਣਯੋਗ ਹਾਈਕੋਰਟ ਨੇ ਇਸ ਹੜਤਾਲ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਆਗੂਆਂ 'ਤੇ ਹੁਕਮ ਅਦੂਲੀ ਕਰਨ (Contempt of court) ਦੇ ਵੀ ਕੇਸ ਦਰਜ ਕਰ ਦਿੱਤੇ ਹਨ।
ਹਿਮਾਚਲ ਸੂਬੇ ਹੀ ਨਹੀਂ ਬਲਕਿ ਸਮੁੱਚੀ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਮਾਤ ਨੂੰ ਇਕਜੁਟ ਹੋ ਕੇ ਐਚ.ਆਰ.ਟੀ.ਸੀ. ਦੇ ਕਾਮਿਆਂ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਆਵਾਜ਼ ਬੁਲੰਦ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ।          
- ਰ.ਕੰ.

ਭੱਠਾ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀਆਂ ਕੰਮ ਹਾਲਤਾਂ ਅਤੇ ਸੰਘਰਸ਼

ਭੱਠਾ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦਾ ਜੀਵਨ ਕਿੰਨਾ ਮੁਸ਼ਕਲਾਂ ਭਰਿਆ ਹੈ, ਇਹ ਤਾਂ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਕੰਮ ਕਰਦੇ ਸਮੇਂ ਮੌਕੇ ਉਪਰ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਨੇੜੇ ਜਾ ਕੇ ਹੀ ਦੇਖਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਗਰਮੀ ਦੇ ਸੀਜ਼ਨ ਵਿਚ ਅੱਤ ਦੀ ਗਰਮੀ 45-50 ਡਿਗਰੀ ਤਾਪਮਾਨ ਅਤੇ ਸਰਦੀ ਦੇ ਸੀਜ਼ਨ ਸਮੇਂ ਕੜਾਕੇ ਦੀ ਠੰਡ 5-6 ਡਿਗਰੀ ਤਾਪਮਾਨ ਵਿਚ ਨੰਗੇ ਪੈਰੀਂ ਅਤੇ ਨੰਗੇ ਪਿੰਡੇ ਕੰਮ ਕਰਨਾ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਸਮਾਜਿਕ ਸੁਰੱਖਿਆ ਦੀ ਘਾਟ ਕਾਰਨ ਭੱਠਾ ਮਜ਼ਦੂਰ, ਪਰਵਾਰਾਂ ਦੇ ਬੱਚਿਆਂ ਦਾ ਬਚਪਨ ਅਤੇ ਬਜ਼ੁਰਗਾਂ ਦਾ ਬੁਢਾਪਾ ਮਿੱਟੀ ਵਿਚ ਰੁਲ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਕੱਚੀਆਂ ਇੱਟਾਂ ਪੱਥਣ ਵਾਲੇ ਮਜ਼ਦੂਰ-ਪਰਿਵਾਰਾਂ ਸਮੇਤ ਸਵੇਰੇ ਚਾਰ ਵਜੇ ਦੇ ਕਰੀਬ ਪਿੜਾਂ ਵਿਚ ਜਾ ਕੇ ਪਥੇਰ ਦਾ ਕੰਮ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਦੁਪਹਿਰੇ ਮੁਸ਼ਕਲ ਨਾਲ ਇਕ ਅੱਧੇ ਘੰਟੇ ਦੇ ਅਰਾਮ, ਜਿਸ ਵਿਚ ਰੋਟੀ ਖਾਣਾ ਵੀ ਸ਼ਾਮਲ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਫਿਰ ਬਿਨਾਂ ਰੁਕੇ ਲਗਾਤਾਰ ਰਾਤ ਅੱਠ ਵਜੇ ਤੱਕ ਕੰਮ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਬਾਕੀ ਕੈਟੇਗਰੀਆਂ ਦੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦਾ ਕੰਮ ਇਕ ਦੂਜੇ ਨਾਲ ਜੁੜਿਆਂ ਹੋਣ ਕਰਕੇ, ਜਦੋਂ ਭਰਾਈ ਵਾਲੇ ਕਾਮੇ ਪਿੜਾਂ 'ਚੋਂ ਜੋ ਕੱਚੀਆਂ ਇੱਟਾਂ ਭੱਠੇ ਵੱਲ ਲਿਜਾਂਦੇ ਹਨ ਤਾਂ ਉਸ ਵੇਲੇ ਬੇਲਦਾਰ/ਚਿਨਾਈ ਵਾਲੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੂੰ ਵੀ ਕੰਮ ਤੇ ਲੱਗਣਾ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਨਾਲ ਹੀ ਪੱਕੀਆਂ ਇੱਟਾਂ ਦੀ ਨਿਕਾਸੀ ਵਾਲੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੂੰ ਵੀ ਅਗਲੇ ਦਿਨ ਦੀ ਭਰਾਈ ਵਾਸਤੇ ਪੱਕੀਆਂ ਇੱਟਾਂ ਦੀ ਨਿਕਾਸੀ ਕਰਨ, ਫਰਸ਼ ਨੂੰ ਖਾਲੀ ਕਰਨਾ ਅਤੇ ਸਾਫ ਕਰਨਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਕੋਲੇ ਵਾਲੇ ਜਲਾਈ ਵਾਲੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੂੰ ਲਾਜ਼ਮੀ ਚੌਵੀ ਘੰਟਿਆਂ ਵਿਚ ਦੋ ਵਾਰ ਘੱਟੋ ਘੱਟ 6-6 ਘੰਟੇ ਦੀ ਡਿਊਟੀ ਦੇਣੀ ਪੈਂਦੀ ਹੈ।
ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜੇਕਰ ਮੋਟੇ ਤੌਰ 'ਤੇ ਨਜ਼ਰ ਮਾਰੀ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਭੱਠਿਆਂ 'ਤੇ ਕੰਮ ਕਰਦੇ ਸਾਰੀਆਂ ਕੈਟੇਗਰੀਆਂ ਦੇ ਕਾਮਿਆਂ ਨੂੰ ਘੱਟੋ ਘੱਟ 12-14 ਘੰਟੇ ਹਰ ਹਾਲਤ ਵਿਚ ਕੰਮ ਕਰਨਾ ਹੀ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਇਕ ਦਿਹਾੜੀਦਾਰ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਦੋਂ ਕੰਮ ਤੇ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਉਸਨੂੰ ਅੱਠ ਘੰਟੇ ਕੰਮ ਦਿਹਾੜੀ ਵਿਚ ਇਕ ਘੰਟੇ ਦੀ ਰੈਸਟ ਵੀ ਮਿਲਦੀ ਹੈ। ਪਰ ਭੱਠਾ ਮਜ਼ਦੂਰ ਨੂੰ ਚੌਵੀ ਘੰਟਿਆਂ ਵਿਚ ਹੀ ਦੋ ਦਿਹਾੜੀਆਂ ਦਾ ਸਮਾਂ  ਲਾਉਂਣਾ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਇਤਨੀ ਸਖਤ ਮਿਹਨਤ ਬਦਲੇ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਬਹੁਤ ਨਿਗੂਣੀ ਮਿਲਦੀ ਹੈ, ਜਿਸ ਕਾਰਨ ਮਜ਼ਦੂਰ ਹਮੇਸ਼ਾ ਆਰਥਿਕ ਤੌਰ 'ਤੇ ਟੁੱਟੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ।
ਭੱਠਿਆਂ ਉਪਰ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀਆਂ ਜੀਵਨ ਹਾਲਤਾਂ ਬਹੁਤ ਹੀ ਤਰਸਯੋਗ ਹਨ। ਭੱਠਾ ਮਾਲਕਾਂ ਨੇ ਕੱਚੀਆਂ ਇੱਟਾਂ ਨੂੰ ਬਾਰਸ਼ ਤੋਂ ਬਚਾਉਣ ਲਈ ਲੱਖਾਂ ਰੁਪਏ ਲਗਾਕੇ ਸ਼ੈਡਾਂ ਬਣਾਈਆਂ ਹੋਈਆਂ ਹਨ, ਸਾਰੇ ਸਾਰੇ ਭੱਠੇ ਵੀ ਛੱਤੇ ਹੋਏ ਹਨ। ਹੁਣ ਤਾਂ ਭੱਠਿਆਂ ਉਪਰ ਕੰਮ ਦੀ ਨਿਗਰਾਨੀ ਲਈ ਸੀਸੀਟੀਵੀ ਕੈਮਰੇ ਵੀ ਲੱਖਾਂ ਰੁਪਏ ਖਰਚ ਕਰਕੇ ਲਾਉਣੇ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤੇ ਹਨ, ਪਰ ਮਜਦੂਰਾਂ ਲਈ ਚਾਰ-ਸਾਢੇ ਚਾਰ ਫੁੱਟ ਦੀਆਂ ਝੁੱਗੀਆਂ ਹੀ ਹਨ ਜਿਹਨਾਂ ਅੰਦਰ ਬੰਦਾ ਸਿੱਧਾ ਖੜਾ ਵੀ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦਾ। ਬਿਜਲੀ ਪਾਣੀ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਨਾ ਮਾਤਰ। ਪਖਾਨਿਆਂ ਦਾ ਬਿਲਕੁਲ ਕੋਈ ਪ੍ਰਬੰਧ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਭੱਠਾ ਮਾਲਕਾਂ ਦਾ ਇਸ ਪ੍ਰਤੀ ਵਤੀਰਾ ਬਹੁਤ ਹੀ ਗੈਰ ਮਨੁੱਖੀ ਹੈ।
ਭੱਠਿਆਂ ਉਪਰ ਰਿਹਾਇਸ਼ੀ ਪ੍ਰਬੰਧ ਨੂੰ ਸੁਚਾਰੂ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ ਇਸਦੀ ਦੇਖ-ਰੇਖ ਲਈ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਪੱਧਰੀ ਨਿਯੁਕਤ ਡਿਪਟੀ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਫੈਕਟਰੀਜ਼ ਨੇ ਅੱਜ ਤੱਕ ਕਿਸੇ ਭੱਠੇ ਉਪਰ ਚੈਕਿੰਗ ਕਰਨ ਦਾ ਆਪਣਾ ਫਰਜ਼ ਹੀ ਨਹੀਂ ਨਿਭਾਇਆ। ਜਿਸ ਕਾਰਨ ਭੱਠਾ ਮਾਲਕਾਂ, ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀ ਬੇਹਤਰੀ ਲਈ ਇਕ ਪੈਸਾ ਵੀ ਖਰਚਣ ਲਈ ਤਿਆਰ ਨਹੀਂ। ਇਹੋ ਹਾਲ ਲੇਬਰ ਵਿਭਾਗ ਦੇ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਵੀ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਭੱਠਿਆਂ ਤੋਂ ਮਹੀਨਾਵਾਰੀ ਹਿੱਸਾ ਪੱਤੀ ਤਾਂ ਲੈਣ ਜਾਂਦੇ ਹਨ, ਏਸੇ ਕਰਕੇ ਭੱਠਾ ਮਾਲਕਾਂ ਵਲੋਂ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਆਰਥਿਕ ਲੁੱਟ ਨੂੰ ਰੋਕਣ ਲਈ ਭੱਠਾ ਮਾਲਕਾਂ ਖਿਲਾਫ ਕੋਈ ਕਾਰਵਾਈ ਕਰਨ ਨੂੰ ਤਿਆਰ ਨਹੀਂ ਜਦੋਂਕਿ ਭੱਠਿਆਂ ਉਪਰ ਕੰਮ ਕਰਦੇ ਮੁਨਸ਼ੀ, ਡਰਾਇਵਰ, ਪਾਣੀ ਵਾਲਾ ਅਤੇ ਹੋਰ ਤਨਖਾਹਦਾਰ ਕਾਮਿਆਂ ਨੂੰ ਸਮੇਤ ਪੀਸ ਰੇਟ 'ਤੇ ਕੰਮ ਕਰਦੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੇ ਵੱਡੇ ਹਿੱਸੇ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਜਾਰੀ ਨਿਗੂਣੀ ਮਿਨੀਮਮ ਵੇਜ ਵੀ ਨਹੀਂ ਮਿਲ ਰਹੀ। ਲੇਬਰ ਵਿਭਾਗ ਦੇ ਤਹਿਸੀਲ ਪੱਧਰ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਲੇਬਰ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਦੇ ਦਫਤਰ ਤੱਕ ਸਭ ਅਧਿਕਾਰੀ ਭੱਠਾ ਮਾਲਕਾਂ ਨਾਲ ਮਿਲ ਕੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦਾ ਰੱਜ ਕੇ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਹਾਕਮ ਧਿਰ ਦੇ ਰਾਜਨੀਤੀਵਾਨ ਵੀ ਇਹਨਾਂ ਦੀ ਪਿੱਠ 'ਤੇ ਹਨ।
ਇਸ ਵੇਲੇ ਪੰਜਾਬ ਅੰਦਰ ਲਗਭਗ ਇਕ ਦਰਜਨ ਦੇ ਕਰੀਬ ਭੱਠਾ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਜਿਲ੍ਹਿਆਂ ਵਿਚ ਭੱਠਾ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀ ਆਰਥਿਕ ਹਾਲਤ ਨੂੰ ਠੀਕ ਕਰਨ ਲਈ ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਦੇ ਰੇਟ ਵਿਚ ਵਾਧਾ ਕਰਾਉਣ ਅਤੇ ਉਹਨਾਂ ਦੀਆਂ ਜੀਵਨ ਹਾਲਤਾਂ ਨੂੰ ਬੇਹਤਰ ਬਨਾਉਣ ਲਈ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਰਨ ਦਾ ਦਾਅਵਾ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ, ਪਰ ਬਹੁਤਿਆਂ ਦੀ ਕਹਿਣੀ ਅਤੇ ਕਰਨੀ ਵਿਚ ਜ਼ਮੀਨ ਅਸਮਾਨ ਦਾ ਅੰਤਰ ਹੈ। ਜਮੀਨੀ ਹਕੀਕਤਾਂ ਕੁਝ ਹੋਰ ਹਨ। ਸਾਰੇ ਪੰਜਾਬ ਅੰਦਰ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਜ਼ਿਲ੍ਹਿਆਂ ਵਿਚ ਭੱਠਾ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੂੰ ਇਕ ਸਮਾਨ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਨਹੀਂ ਮਿਲ ਰਹੀ। ਜੇਕਰ ਸਾਰੇ ਜ਼ਿਲਿਆਂ ਅੰਦਰ ਭੱਠਿਆਂ ਉਪਰ ਕੰਮ ਕਰਦੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਕੈਟੇਗਰੀਆਂ ਦੇ ਰੇਟਾਂ ਦਾ ਵਰਣਨ ਕਰਨ ਲੱਗ ਪਈਏ ਤਾਂ ਵਿਸ਼ਾ ਲੰਮਾ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ। ਇਸ ਲਈ ਉਦਾਹਰਣ ਦੇ ਤੌਰ 'ਤੇ ਇਕ ਕੈਟੇਗਰੀ ਕੱਚੀਆਂ ਇੱਟਾਂ ਪੱਥਣ ਵਾਲੇ ਕਿਰਤੀਆਂ ਨੂੰ ਇਸ ਨਾਲ ਮਿਲਣ ਵਾਲੀ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਮਾਝੇ ਵਿਚ 695 ਰੁਪਏ ਤੋਂ 712 ਰੁਪਏ, ਦੁਆਬੇ ਵਿਚ 620 ਰੁਪਏ ਤੋਂ 655 ਰੁਪਏ ਅਤੇ ਮਾਲਵੇ  ਵਿਚ ਸਭ ਤੋਂ ਘੱਟ 583 ਰੁਪਏ ਤੋਂ 612 ਰੁਪਏ ਤੱਕ ਪ੍ਰਤੀ ਹਜਾਰ ਮਿਲਦੀ ਹੈ। ਏਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਬਾਕੀ ਕੈਟੇਗਰੀਆਂ ਦੀ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਦਾ ਵੀ ਅੰਤਰ ਹੈ। ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਤੌਰ 'ਤੇ ਸਾਡੀ ਮੰਗ ਹੈ ਕਿ ਸਾਰੇ ਪੰਜਾਬ ਅੰਦਰ ਸਾਰੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੂੰ 712 ਰੁਪਏ ਤੋਂ ਵੀ ਵੱਧ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਮਿਲੇ ਤਾਂ ਕਿ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੂੰ ਇਕ ਸਮਾਨ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਮਿਲੇ।
ਭੱਠਾ ਮਾਲਕਾਂ ਦਾ ਆਪਣਾ ਨਿੱਜੀ ਹਿੱਤ ਨਜ਼ਰੀਂ ਆਉਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਸਰਮਾਏਦਾਰ ਹਮੇਸ਼ਾ ਇਹੀ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਕੋਲੋਂ ਵੱਧ ਤੋਂ ਵੱਧ ਕੰਮ ਲਿਆ ਜਾਵੇ ਅਤੇ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਘੱਟ ਤੋਂ ਘੱਟ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇ। ਬੁਰਜ਼ੁਆ ਹਕੂਮਤਾਂ ਹੇਠ ਅਫਸਰਸ਼ਾਹੀ ਵੀ ਪੂੰਜੀਪਤੀਆਂ ਦਾ ਪੱਖ ਹੀ ਪੂਰਦੀ ਹੈ। ਏਸੇ ਕਰਕੇ ਲੇਬਰ ਵਿਭਾਗ ਦੇ ਅਧਿਕਾਰੀ ਅਤੇ ਸਮੁੱਚਾ ਪ੍ਰਬੰਧਕੀ ਢਾਂਚਾ ਭੱਠਾ ਮਾਲਕਾਂ ਦੀ ਹਾਜ਼ਰੀ ਵਿਚ ਅਤੇ ਮਾਲਕਾਂ ਦੀ ਗੈਰ ਹਾਜ਼ਰੀ ਵਿਚ ਵੀ ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਵਕਾਲਤ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਚੋਣਾਂ ਵਿਚ ਕਰੋੜਾਂ ਰੁਪਏ ਖਰਚ ਕਰਕੇ ਸੱਤਾ ਵਿਚ ਆਏ ਵਿਧਾਇਕ, ਮੈਂਬਰ ਪਾਰਲੀਮੈਂਟ ਅਤੇ ਮੰਤਰੀ ਵੀ ਨਿਗੂਣੀਆਂ ਮੰਗਾਂ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਦਰ ਦਰ ਦੀਆਂ ਠੋਕਰਾਂ ਖਾਂਦੇ ਸੜਕਾਂ ਤੇ ਰੁਲਦੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੂੰ ਦੇਖ ਕੇ ਵੀ ਅਣਦੇਖਿਆ ਅਤੇ ਸੁਣ ਕੇ ਵੀ ਅਣਸੁਣਿਆ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਜਿਵੇਂ ਅੱਖਾਂ ਤੋਂ ਅੰਨ੍ਹੇ ਅਤੇ ਕੰਨਾਂ ਤੋਂ ਬੋਲੇ ਹੋਣ।
ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਸਾਰੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਿਆਂ ਅੰਦਰ ਭੱਠਾ ਮਜ਼ਦੂਰ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਹੇਠ ਆਪਣੀਆਂ ਬਹੁਤ ਹੀ ਜਾਇਜ਼ ਅਤੇ ਹੱਕੀ ਮੰਗਾਂ ਜਿਵੇਂ ਵਧੀ ਹੋਈ ਮਹਿੰਗਾਈ ਅਨੁਸਾਰ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਰੇਟਾਂ ਵਿਚ ਵਾਧਾ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ, ਕਿਰਤ ਕਾਨੂੰਨ ਸਖਤੀ ਨਾਲ ਲਾਗੂ ਕੀਤੇ ਜਾਣ, ਮਹਿੰਗਾਈ ਤੋਂ ਰਾਹਤ ਦਿਵਾਉਣ ਲਈ ਭੱਠਾ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੇ ਰਾਸ਼ਨ ਕਾਰਡ ਬਣਾਏ ਜਾਣ ਤੇ ਸਰਕਾਰੀ ਰਾਸ਼ਨ ਡੀਪੂਆਂ ਰਾਹੀਂ ਘਰੇਲੂ ਵਰਤੋਂ ਦੀਆਂ ਜ਼ਰੂਰੀ ਵਸਤਾਂ ਦਾ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀ ਖਰੀਦ ਸ਼ਕਤੀ ਅਨੁਸਾਰ ਵਾਜ਼ਬ ਕੀਮਤ ਦੇ ਮਿਲਣਾ ਯਕੀਨੀ ਬਣਾਇਆ ਜਾਵੇ। ਘੱਟੋ ਘੱਟ ਤਨਖਾਹ 15000 ਰੁਪਏ ਪ੍ਰਤੀ ਮਹੀਨਾ ਅਤੇ ਦਿਹਾੜੀ 500 ਰੁਪਏ ਪ੍ਰਤੀ ਦਿਨ ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇ, ਬਿਜਲੀ, ਪਾਣੀ ਅਤੇ ਪਖਾਨਿਆਂ ਸਮੇਤ ਰਿਹਾਇਸ਼ ਲਈ ਪੱਕੇ ਮਕਾਨ ਬਣਾਏ ਜਾਣ, ਚਾਰ ਪੰਜ ਭੱਠਿਆਂ ਦੇ ਝੁੰਡ ਕਲੱਸਟਰ ਬਣਾਕੇ ਆਂਗਣਵਾੜੀ ਸੈਂਟਰ ਅਤੇ ਘੱਟੋ ਘੱਟ ਸਰਕਾਰੀ ਪ੍ਰਾਇਮਰੀ ਸਕੂਲ ਖੋਲੇ ਜਾਣ ਤਾਂ ਕਿ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਸਿੱਖਿਆ ਮਿਲ ਸਕੇ, ਮੁਢਲੀ ਮੈਡੀਕਲ ਸਹੂਲਤ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਹੋਵੇ ਅਤੇ ''ਉਸਾਰੀ ਕਾਨੂੰਨ 1996'' ਤਹਿਤ ਸਾਰੇ ਭੱਠਾ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀ ਭੱਠਿਆਂ ਉਪਰ ਕੈਂਪ ਲਗਾਕੇ ਰਜਿਸਟਰੇਸ਼ਨ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇ ਤੇ ਇਸ ਕਾਨੂੰਨ ਅਨੁਸਾਰ ਮਿਲਣ ਵਾਲੇ ਲਾਭ ਯਕੀਨੀ ਬਣਾਏ ਜਾਣ ਅਤੇ ਹੋਰ ਮੰਗਾਂ ਨੂੰ ਮਨਵਾਉਣ ਅਤੇ ਲਾਗੂ ਕਰਾਉਣ ਲਈ ਸੰਘਰਸ਼ ਦੇ ਮੈਦਾਨ ਵਿਚ ਹਨ।
ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਝਾ ਅਤੇ ਦੋਆਬਾ ਜੋਨ ਵਿਚ ਮਜ਼ਦੂਰ ਲਾਲ ਝੰਡਾ ਪੰਜਾਬ ਭੱਠਾ ਲੇਬਰ ਯੂਨੀਅਨ (ਸਬੰਧਤ ਸੀ.ਟੀ.ਯੂ. ਪੰਜਾਬ) ਅਤੇ ਕੁਝ ਹੋਰ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਹੇਠ ਪਿਛਲੇ ਮਿਲਦੇ ਰੇਟਾਂ ਵਿਚ ਵਾਧਾ ਕਰਾਉਣ ਵਿਚ ਸਫਲ ਰਹੇ ਹਨ। ਮਾਲਵੇ ਦੇ ਮਜ਼ਦੂਰ ਇਸ ਵਾਰ ਵਾਧਾ ਕਰਾਉਣ ਤੋਂ ਵਾਂਝੇ ਹੀ ਨਹੀਂ ਰਹੇ, ਸਗੋਂ ਦੁੱਖ ਦੀ ਗੱਲ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਇਕ ਮਾਲਕ ਪੱਖੀ ਜਥੇਬੰਦੀ ਦੇ ਮੱਕਾਰ ਆਗੂ ਨੇ ਮਾੜੀ ਕਰਗੁਜਾਰੀ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਭੱਠਾ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੂੰ ਪਿੱਠ ਦਿਖਾਉਂਦੇ ਹੋਏ, ਭੱਠਾ ਮਾਲਕਾਂ ਨਾਲ ਮਿਲੀ ਭੁਗਤ ਕਰਕੇ ਉਹਨਾਂ ਕੋਲੋਂ ਪੈਸੇ ਲੈ ਕੇ ਕੁਝ ਜਿਲਿਆਂ ਵਿਚ ਧਰੋਹ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਪਿਛਲੇ ਮਿਲਦੇ ਰੇਟ ਤੋਂ ਵੀ 16 ਰੁਪਏ ਤੋਂ 31 ਰੁਪਏ ਤੱਕ ਹੋਰ ਰੇਟ ਘੱਟ ਕਰਕੇ ਭੱਠਾ ਮਾਲਕਾਂ ਨਾਲ ਸਮਝੌਤਾ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਇੰਜ ਇਸ ਨਾਮ ਨਿਹਾਦ ਮਜ਼ਦੂਰ ਆਗੂ ਨੇ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਦੋ ਵਕਤ ਦੀ ਰੋਟੀ ਤੋਂ ਮੁਥਾਜ ਭੱਠਾ ਮਜਦੂਰਾਂ ਦਾ ਲੱਕ ਤੋੜ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਇਸ ਕੀਤੇ ਕੁਕਰਮ ਦਾ ਖਮਿਆਜ਼ਾ ਆਉਣ ਵਾਲੇ ਸਮੇਂ ਵਿਚ ਸਬੰਧਤ ਆਗੂਆਂ ਨੂੰ ਭੁਗਤਣਾ ਪਵੇਗਾ। ਸਮਾਂ ਕਦੀ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਮੁਆਫ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ।
ਦੇਸ਼ ਦੀ ਆਜ਼ਾਦੀ ਲਈ ਲੜੇ ਘੋਲ ਵਿਚ ਅਤੇ ਆਜ਼ਾਦੀ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਲੋਕ ਹਿਤਾਂ ਲਈ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਰਦੇ ਮਹਾਨ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਘਰ-ਘਾਟ ਵਿਕ ਗਏ, ਅਨੇਕਾਂ ਤੰਗੀਆਂ ਵਿਚੋਂ ਗੁਜ਼ਰਨਾ ਪਿਆ। ਇਹ ਗੌਰਵਮਈ ਮਾਣਮੱਤਾ ਇਤਿਹਾਸ ਸਾਡੇ ਕੋਲ ਹੈ। ਅੱਜ ਵੀ ਕੁਝ ਲੋਕ ਭਾਵੇਂ ਟਾਂਵੇ-ਟਾਵੇਂ ਹੀ ਸਹੀ ਦਿਸਦੇ ਹਨ ਜਿਹੜੇ ਇਮਾਨਦਾਰੀ ਨਾਲ ਹੱਕ ਸੱਚ ਇੰਨਸਾਫ ਲਈ ਸੰਘਰਸ਼ ਦੇ ਰਾਹ 'ਤੇ ਤੁਰ ਰਹੇ ਹਨ, ਪਰ ਕੋਲ ਸਿਰ ਢੱਕਣ ਲਈ ਪੂਰੀ ਛੱਤ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਕੁਝ ਅਖੌਤੀ ਲੀਡਰ ਇਹ ਕਹਿੰਦੇ ਥੱਕਦੇ ਨਹੀਂ ਕਿ ਅਸੀਂ ਲੋਕ ਸੇਵਾ ਕਰ ਰਹੇ ਹਾਂ। ਇਹ ਲੋਕ ਕੋਈ ਕਾਰੋਬਾਰ ਤਾਂ ਕਰਦੇ ਨਹੀਂ, ਤਾਂ ਫਿਰ ਲੱਖਾਂ ਕਰੋੜਾਂ ਰੁਪਏ ਦੀ ਜਾਇਦਾਦ ਦੇ ਮਾਲਕ ਕਿਵੇਂ ਬਣ ਗਏ। ਇਸ ਸਵਾਲ ਦਾ ਜਵਾਬ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਸਮਾਂ ਆਉਣ 'ਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਦੇਣਾ ਪਵੇਗਾ?
ਆਖਰ ਵਿਚ ਅਸੀਂ ਇਹੀ ਕਹਿਣਾ ਚਾਹਾਂਗੇ ਕਿ ਜਦੋਂ ਸਾਰੇ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਭੱਠਾ ਮਾਲਕ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਦੇ ਰੇਟਾਂ ਵਿਚ ਵਾਧਾ ਰੋਕਣ ਅਤੇ ਕਿਰਤ ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਅਨੁਸਾਰ ਬਣਦੀਆਂ ਹੋਰ ਸਹੂਲਤਾਂ ਦੇਣ ਤੋਂ ਇਨਕਾਰੀ ਹਨ ਸਾਰੇ ਮਾਲਕ ਅਨੇਕਾਂ ਅੰਦਰੂਨੀ ਮੱਤਭੇਦਾਂ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਇਕੱਠੇ ਹੋ ਰਹੇ ਹਨ। ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਦੀ ਉਹਨਾਂ ਨਾਲ ਮਿਲੀਭੁਗਤ ਹੈ। ਕੇਂਦਰ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਨਗੂਣੇ ਜਿਹੇ ਮਜ਼ਦੂਰ ਪੱਖੀ ਕਿਰਤ ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਵਿਚ ਸੋਧ ਕਰਕੇ, ਸੰਘਰਸ਼ਸ਼ੀਲ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦਾ ਰਾਹ ਰੋਕਣ ਲਈ ਤਰ੍ਹਾਂ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੇ ਕਾਲੇ ਕਾਨੂੰਨ ਬਣਾਕੇ ਅਤੇ ਡੰਡੇ ਦੇ ਜ਼ੋਰ ਪੂੰਜੀਪਤੀਆਂ ਤੇ ਕਾਰਪੋਰੇਟ ਘਰਾਨਿਆਂ ਦਾ ਪੱਖ ਪੂਰ ਰਹੀਆਂ ਹਨ। ਇਸ ਸਾਰੇ ਮਜਦੂਰ ਵਿਰੋਧੀ ਕਾਰੇ ਨੂੰ ਰੋਕਣ ਲਈ ਮਜ਼ਦੂਰ ਲਹਿਰ ਨੂੰ ਵਿਸ਼ਾਲ ਕਰਨ ਹਿੱਤ ਸਮਰਪੱਤ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਅਤੇ ਉਹਨਾ ਅੰਦਰ ਕੰਮ ਕਰਦੇ ਇਮਾਨਦਾਰ ਕਾਰਕੁੰਨਾਂ ਨੂੰ ਲਾਲ ਝੰਡਾ ਪੰਜਾਬ ਭੱਠਾ ਲੇਬਰ ਯੂਨੀਅਨ ਵਲੋਂ ਇਹੀ ਅਪੀਲ ਹੈ ਕਿ ਆਓ ਇਕੱਠੇ ਹੋ ਕੇ ਇਕ ਵਿਸ਼ਾਲ ਸਾਂਝਾ ਮੰਚ ਬਣਾ ਕੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਨੂੰ ਹੋਰ ਤਿੱਖਾ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ। ਏਕੇ ਨਾਲ ਮੰਗਾਂ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਲਾਜ਼ਮੀ ਹੋਵੇਗੀ।
- ਸ਼ਿਵ ਕੁਮਾਰ ਪਠਾਨਕੋਟ
ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ, ਲਾਲ ਝੰਡਾ ਪੰਜਾਬ ਭੱਠਾ ਲੇਬਰ ਯੂਨੀਅਨ

ਕੌਮਾਂਤਰੀ ਪਿੜ (ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ-ਜੁਲਾਈ 2016)

ਰਵੀ ਕੰਵਰ 
ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਵਿਚ ਹੋਈ ਰਾਏਸ਼ੁਮਾਰੀ 'ਚ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਨੂੰ 'ਛੱਡਣ' ਵਾਲਿਆਂ ਦੀ ਜਿੱਤ 
ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ (ਈ.ਯੂ.) ਦੇ ਮੈਂਬਰ ਦੇਸ਼ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਵਿਚ 23 ਜੂਨ ਨੂੰ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਵਿਚ 'ਰਹਿਣ' ਜਾਂ 'ਛੱਡਣ' ਦੇ ਮੁੱਦੇ ਉਤੇ ਰਾਏਸ਼ੁਮਾਰੀ ਹੋਈ ਹੈ। 'ਛੱਡਣ' ਦੇ ਪੱਖ ਵਿਚ 51.9% ਵੋਟਾਂ ਪਈਆਂ ਹਨ। ਜਦੋਂਕਿ 'ਰਹਿਣ' ਦੇ ਪੱਖ ਵਿਚ 48.1% ਵੋਟਾਂ ਪਈਆਂ ਹਨ। ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕੁੱਲ 72% ਪੋਲ ਹੋਈਆਂ ਵੋਟਾਂ ਵਿਚੋਂ ਸਿਰਫ 3.8% ਦੇ ਅੰਤਰ ਨਾਲ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਚਲਿਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਦੇਸ਼ ਦੇ ਚਾਰ ਖੇਤਰਾਂ ਵਿਚੋਂ ਦੋ ਇੰਗਲੈਡ ਤੇ ਵੇਲਜ ਵਿਚ 'ਛੱਡਣ' ਨੂੰ ਬਹੁਮਤ ਮਿਲਿਆ ਹੈ ਜਦੋਂਕਿ ਉਤਰੀ ਆਇਰਲੈਂਡ ਤੇ ਸਕਾਟਲੈਂਡ ਵਿਚ 'ਰਹਿਣ' ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਬਹੁਤੇ ਵੋਟ ਪਏ ਹਨ।
ਕੰਜਰਵੇਟਿਵ ਪਾਰਟੀ ਨੇ ਇਸ ਮੁੱਦੇ 'ਤੇ ਰਾਏਸ਼ੁਮਾਰੀ ਕਰਵਾਉਣ ਦਾ ਵਾਅਦਾ ਪਿਛਲੇ ਸਾਲ ਹੋਈਆਂ ਸੰਸਦੀ ਚੋਣਾਂ ਦੌਰਾਨ ਕੀਤਾ ਸੀ ਅਤੇ ਸੱਤਾ ਵਿਚ ਆਉਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਕੈਮਰੂਨ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਇਸ ਬਾਰੇ ਸੰਸਦ ਵਿਚ ਬਾਕਾਇਦਾ ਕਾਨੂੰਨ ਪਾਸ ਕਰਵਾਇਆ ਸੀ, ਉਸ ਕਾਨੂੰਨ ਦੇ ਅਧੀਨ ਹੀ ਇਹ ਰਾਏਸ਼ੁਮਾਰੀ ਹੋਈ ਹੈ। 'ਰਹਿਣ' ਅਤੇ 'ਛੱਡਣ' ਵਾਲੀਆਂ ਦੋਵਾਂ ਧਿਰਾਂ ਵਲੋਂ ਬਹੁਤ ਹੀ ਗਹਿਗੱਚ ਢੰਗ ਨਾਲ ਆਪਣੀ ਮੁਹਿੰਮ ਚਲਾਈ ਗਈ ਹੈ। ਇਸ ਮੁਹਿੰਮ ਦੌਰਾਨ ਹੀ ਇਕ ਦੁਖਦਾਈ ਘਟਨਾ ਦੌਰਾਨ ਸੰਸਦ ਵਿਚ ਮੁੱਖ ਵਿਰੋਧੀ ਧਿਰ ਲੇਬਰ ਪਾਰਟੀ ਦੀ 41 ਸਾਲਾ ਨੌਜਵਾਨ ਐਮ.ਪੀ. ਜੋ ਕੋਕਸ ਦੀ ਇਕ ਅੰਧ-ਰਾਸ਼ਟਰਵਾਦੀ ਥਾਮਸ ਮੈਰ ਵਲੋਂ ਗੋਲੀ ਮਾਰਕੇ ਹੱਤਿਆ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਗਈ। ਇਕ ਕੁਲਵਕਤੀ ਸਮਾਜ ਕਲਿਆਣ ਕਾਰਕੁੰਨ ਤੋਂ ਰਾਜਨੀਤੀ ਵਿਚ ਆਈ ਇਹ ਐਮ.ਪੀ. ਹੱਤਿਆ ਸਮੇਂ ਉਤਰੀ ਇੰਗਲੈਂਡ ਵਿਚ ਸਥਿਤ ਆਪਣੇ ਸੰਸਦੀ ਹਲਕੇ ਬੈਟਲੀ ਤੇ ਸਪੇਨ ਵਿਚ ਲੋਕਾਂ ਦਰਮਿਆਨ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਵਿਚ ਬਣੇ ਰਹਿਣ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕਰ ਰਹੀ ਸੀ। ਉਸਦਾ ਹਤਿਆਰਾ ਥਾਮਸ ਮੈਰ, ਇਕ ਨਾਜ਼ੀਵਾਦੀ ਸੰਗਠਨ ''ਫਰਸਟ ਬ੍ਰਿਟੇਨ'' ਦਾ ਮੈਂਬਰ ਹੈ, ਜਿਹੜਾ ਕਿ ਅੰਨ੍ਹੇ ਕੌਮਪ੍ਰਸਤ ਨਾਜ਼ੀਵਾਦੀ ਪੈਂਤੜੇ ਤੋਂ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਨੂੰ ਛੱਡਣ ਦਾ ਸਮਰਥਕ ਹੈ। ਦੇਸ਼ ਦੀਆਂ ਲਗਭਗ ਸਮੁੱਚੀਆਂ ਹੀ ਧਿਰਾਂ ਨੇ ਇਸ ਕਤਲ ਦੀ ਸਖਤ ਨਿੰਦਾ ਕੀਤੀ ਹੈ ਅਤੇ ਜੋ ਕੋਕਸ ਦੇ ਸਨਮਾਨ ਵਜੋਂ ਦੋ ਦਿਨਾਂ ਲਈ ਇਸ ਰਾਏਸ਼ੁਮਾਰੀ ਬਾਰੇ ਪ੍ਰਚਾਰ ਮੁਹਿੰਮ ਨੂੰ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਬੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ।
ਦੂਜੀ ਸੰਸਾਰ ਜੰਗ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਯੂਰਪ ਦੀਆਂ ਹਾਕਮ ਜਮਾਤਾਂ ਸਾਹਮਣੇ ਰੂਸ ਵਿਚ ਸਮਾਜਵਾਦੀ ਇਨਕਲਾਬ ਹੋਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇਸ਼ਾਂ ਦੀ ਜਨਤਾ ਵਿਚ ਉਸ ਪ੍ਰਤੀ ਖਿੱਚ ਹੋਣ ਦਾ ਜਿੱਥੇ ਖਤਰਾ ਸੀ, ਉਸਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਅਮਰੀਕਾ ਨਾਲ ਵਪਾਰਕ ਖੇਤਰ ਵਿਚ ਮੁਕਾਬਲਾ ਨਾ ਕਰ ਸਕਣ ਦਾ ਖਤਰਾ ਉਸਦੇ ਸਿਰ 'ਤੇ ਖੜ੍ਹਾ ਸੀ। ਇਕ ਹੋਰ ਡਰ ਜਿਹੜਾ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਨੀਂਦ ਹਰਾਮ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ, ਉਹ ਸੀ ਕਿ ਕਿਤੇ ਫਰਾਂਸ ਤੇ ਜਰਮਨੀ ਦੀ ਆਰਥਕ ਮੁਕਾਬਲੇਬਾਜ਼ੀ ਫੌਜੀ ਮੁਕਾਬਲੇ ਦਾ ਰੂਪ ਨਾ ਧਾਰਣ ਕਰ ਲਵੇ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਖਤਰਿਆਂ ਦੇ ਮੱਦੇਨਜ਼ਰ ਹੀ 1953 ਵਿਚ ਮੰਡੀ ਨੂੰ ਸਾਂਝੀ ਕਰਨ ਲਈ ''ਯੂਰਪੀ ਕੋਲ ਤੇ ਸਟੀਲ ਭਾਈਚਾਰੇ'' ਦਾ ਗਠਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ। 1957 ਵਿਚ ਹੋਰ ਅੱਗੇ ਵੱਧਦਿਆਂ ਯੂਰਪ ਦੇ 6 ਦੇਸ਼ਾਂ ਬੈਲਜੀਅਮ, ਫਰਾਂਸ, ਇਟਲੀ, ਲਗਜ਼ਮਬਰਗ, ਨੀਦਰਲੈਂਡ ਤੇ ਪੱਛਮੀ ਜਰਮਨੀ ਨੇ ''ਯੂਰਪੀ ਆਰਥਕ ਭਾਈਚਾਰੇ'' ਦਾ ਗਠਨ ਕੀਤਾ। ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਇਸਦਾ ਮੈਂਬਰ ਨਹੀਂ ਸੀ। 1961 ਅਤੇ 1967 ਵਿਚ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਨੇ ਇਸਦਾ ਮੈਂਬਰ ਬਣਨ ਦਾ ਯਤਨ ਕੀਤਾ ਸੀ, ਜਿਸਨੂੰ ਫਰਾਂਸ ਨੇ ਵੀਟੋ ਕਰ ਕੇ ਰੋਕ ਦਿੱਤਾ ਸੀ।
1973 ਵਿਚ ਕੰਜਰਵੇਟਿਵ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਐਡਵਰਡ ਹੀਥ ਦੇ ਕਾਰਜਕਾਲ ਵਿਚ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਯੂਰਪੀ ਆਰਥਕ ਭਾਈਚਾਰੇ ਦਾ ਮੈਂਬਰ ਬਣਨ ਵਿਚ ਸਫਲ ਰਿਹਾ ਸੀ। 1974 ਵਿਚ ਲੇਬਰ ਪਾਰਟੀ ਸੱਤਾ ਵਿਚ ਆਈ, ਉਸਦੀ ਵਜਾਰਤ ਵਿਚ ਇਸ ਮੁੱਦੇ 'ਤੇ ਫੁੱਟ ਪੈਦਾ ਹੋ ਗਈ। ਇਸਦੇ ਮੱਦੇਨਜ਼ਰ 1975 ਵਿਚ ਯੂਰਪੀ ਆਰਥਕ ਭਾਈਚਾਰੇ ਵਿਚ ਰਹਿਣ ਜਾਂ ਛੱਡਣ ਦੇ ਮੁੱਦੇ 'ਤੇ ਰਾਏਸ਼ੁਮਾਰੀ ਹੋਈ ਸੀ, ਜਿਹੜੀ ਕਿ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਵਿਚ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਪਹਿਲੀ ਰਾਏਸ਼ੁਮਾਰੀ ਸੀ।  67% ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਇਸ ਵਿਚ ਰਹਿਣ ਲਈ ਵੋਟ ਦਿੱਤੀ ਸੀ। ਪਰ ਫੇਰ ਵੀ ਰਹਿਣ ਦੇ ਲੇਬਰ ਪਾਰਟੀ ਵਿਚਲੇ ਵਿਰੋਧੀਆਂ ਨੇ 1980 ਵਿਚ ਰੋਏ ਜੈਨਕਿਨਸ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿਚ ਪਾਰਟੀ ਛੱਡਕੇ ਸੋਸ਼ਲ ਡੈਮੋਕ੍ਰੇਟਿਕ ਪਾਰਟੀ ਦਾ ਗਠਨ ਕਰ ਲਿਆ ਸੀ। ਬ੍ਰਿਟੇਨ 1973 ਤੋਂ ਨਿਰੰਤਰ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਮੁਢਲੇ ਰੂਪਾਂ ਦਾ ਮੈਂਬਰ ਬਣਿਆ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਪਿਛਲੇ ਸਦੀ ਦੇ 90ਵੇਂ ਦਹਾਕੇ ਵਿਚ ਇਸਦੇ ਵਧਕੇ 15 ਮੈਂਬਰ ਹੋ ਗਏ ਸਨ ਅਤੇ ਇਸਦਾ ਨਾਂਅ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ। ਪੂਰਬੀ ਯੂਰਪ ਵਿਚ ਸਮਾਜਵਾਦੀ ਦੇਸ਼ਾਂ ਦੇ ਢਹਿਢੇਰੀ ਹੋਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਇਸਦੇ ਮੈਂਬਰਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਵੱਧਕੇ 28 ਹੋ ਗਈ ਹੈ। ਯੂਰਪ ਦੇ ਕੁੱਝ ਮੁੱਖ ਦੇਸ਼ ਜਿਵੇਂ ਸਵਿਟਜਰਲੈਂਡ, ਨੌਰਵੇ ਤੇ ਰੂਸ ਇਸਦੇ ਮੈਂਬਰ ਨਹੀਂ ਹਨ। ਇਸਦਾ ਹੈਡਕੁਆਰਟਰ ਬੈਲਜੀਅਮ ਦੀ ਰਾਜਧਾਨੀ ਬਰੁਸਲਜ ਵਿਖੇ ਸਥਿਤ ਹੈ।
23 ਜੂਨ ਨੂੰ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਰਾਏਸ਼ੁਮਾਰੀ ਦੇ ਮੁੱਦੇ 'ਤੇ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਸੱਤਾਧਾਰੀ ਕੰਜਰਵੇਟਿਵ ਪਾਰਟੀ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਵੰਡੀ ਗਈ ਸੀ। ਵਜਾਰਤ ਦੇ 23 ਮੰਤਰੀ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਡੇਵਿਡ ਕੈਮਰੂਨ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ, ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਵਿਚ ਰਹਿਣ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਸਨ ਅਤੇ 7 ਮੰਤਰੀ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਇਆਨ ਡੰਕਨ ਸਮਿਥ ਤੇ ਮਾਈਕਲ ਗੋਵ ਕਰਦੇ ਹਨ ਇਸਨੂੰ ਛੱਡਣ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਸਨ। ਛੱਡਣ ਵਾਲਿਆਂ ਵਿਚ ਭਾਰਤੀ ਮੂਲ ਦੀ ਮੰਤਰੀ ਪ੍ਰੀਤੀ ਪਟੇਲ ਵੀ ਸ਼ਾਮਲ ਹੈ। ਇਸ ਪਾਰਟੀ ਦੇ 172 ਸੰਸਦ ਮੈਂਬਰ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਵਿਚ ਰਹਿਣ ਦੇ ਮੁੱਦਈ ਸਨ ਜਦੋਂਕਿ 132 ਛੱਡਣ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਸਨ। ਲੇਬਰ ਪਾਰਟੀ ਕਮੋ-ਬੇਸ਼ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਵਿਚ ਰਹਿਣ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਸੀ। ਇਸਦੇ ਸਿਰਫ 10 ਸੰਸਦ ਮੈਂਬਰ ਛੱਡਣ ਦੇ ਮੁੱਦਈ ਸਨ ਜਦੋਂਕਿ 218 ਇਸ ਵਿਚ ਰਹਿਣ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਸਨ। ਅੰਧ ਰਾਸ਼ਟਰਵਾਦੀ ਨਸਲਵਾਦੀ ਪਾਰਟੀ ਯੂਕਿਪ (ਯੁਨਾਇਟਿਡ ਕਿੰਗਡਮ ਇੰਡੀਪੈਂਡੇਟ ਪਾਰਟੀ) ਜਿਸਦੀ ਅਗਵਾਈ ਨਿਗੇਲ ਫਰਾਗ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਵਿਚ ਰਹਿਣ ਦੀ ਅੰਨ੍ਹੀ ਵਿਰੋਧੀ ਸੀ। ਉਸਦੀ ਵਿਰੋਧ ਕਰਨ ਦੀ ਮੁੱਖ ਦਲੀਲ ਹੈ ਕਿ ਇਸ ਵਿਚ ਰਹਿਣ ਨਾਲ ਪ੍ਰਵਾਸੀ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਵਿਚ ਦਾਖਲ ਹੋਣਗੇ ਅਤੇ ਉਹ ਬ੍ਰਿਟਿਸ਼ ਨਸਲ ਲਈ ਖਤਰਾ ਹੋਣ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਨੌਕਰੀਆਂ ਉਤੇ ਵੀ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰਨਗੇ। ਇਹੋ ਸਥਿਤੀ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਛੋਟੇ ਛੋਟੇ ਨਾਜੀਵਾਦੀ ਗੁੱਟਾਂ ਦੀ ਹੈ।
ਦੇਸ਼ ਦੀਆਂ ਬਹੁਤੀਆਂ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਪਾਰਟੀਆਂ, ਖੱਬੇ ਪੱਖੀ ਗਰੁੱਪ ਤੇ ਸੋਸ਼ਲਿਸਟ ਵਰਕਰਸ ਪਾਰਟੀਆਂ ਵੀ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਵਿਚ ਬਣੇ ਰਹਿਣ ਦੀਆਂ ਵਿਰੋਧੀ ਹਨ ਅਤੇ ਇਸਨੂੰ ਛੱਡਣ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਸਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਪੈਂਤੜਾ ਯੂਕਿਪ ਤੋਂ ਬਿਲਕੁਲ ਵੱਖਰਾ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਮੁਤਾਬਿਕ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਨਵਉਦਾਰਵਾਦੀ ਨੀਤੀਆਂ ਦੀ ਪੈਰੋਕਾਰ ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਮੈਂਬਰ ਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿਚ ਧੱਕੇ ਨਾਲ ਲਾਗੂ ਕਰਵਾਉਂਦੀ ਹੈ। ਇਹ ਸਾਮਰਾਜੀ ਅਮਰੀਕਾ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿਚ ਚੱਲਦੀ ਹੋਈ ਯੁੱਧ ਦੇ ਪਸਾਰ ਵਿਚ ਸਰਗਰਮ ਭੂਮਿਕਾ ਨਿਭਾਉਂਦੀ ਹੈ। ਇਸ ਵਿਚ ਰਹਿਣ ਵਾਲਿਆਂ ਦੀ ਦਲੀਲ ਕਿ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਦੇ ਇਸਦੇ ਮੈਂਬਰ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਕਾਮਿਆਂ ਨੂੰ ਯੂਰਪੀ ਸਮਾਜਕ ਤੇ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਦੇ ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਕਾਫੀ ਲਾਭ ਮਿਲ ਰਹੇ ਹਨ, ਦਾ ਜੁਆਬ ਦਿੰਦੇ ਹੋਏ ਉਹ ਗਰੀਸ ਦੀ ਉਦਾਹਰਣ ਦਿੰਦੇ ਹਨ ਜਿੱਥੇ ਕਾਮਿਆਂ ਦੇ ਕਿਰਤ ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਤੇ ਪੈਨਸ਼ਨ ਲਾਭਾਂ ਦਾ ਬੁਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਘਾਣ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਇਹ ਹਾਲਤ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਵਲੋਂ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਅਖੌਤੀ ਰਾਹਤ ਪੈਕਜਾਂ ਨਾਲ ਥੋਪੀਆਂ ਗਈਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਦੇ ਲਾਗੂ ਹੋਣ ਨਾਲ ਹੋਈ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ ਕਿ ਪ੍ਰਾਪਤੀਆਂ ਜਿਹੜੀਆਂ ਵੀ ਥੋੜੀਆਂ ਜਾਂ ਬਹੁਤੀਆਂ ਹਨ, ਉਹ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਜਾਂ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਸਰਕਾਰ ਜਾਂ ਪੂੰਜੀਪਤੀਆਂ ਦੀ ਦਿਆਲਤਾ ਦਾ ਸਿੱਟਾ ਨਹੀਂ ਹਨ ਬਲਕਿ ਉਹ ਤਾਂ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਦੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਮਾਤ ਵਲੋਂ ਨਿਰੰਤਰ ਚਲਾਏ ਜਾ ਰਹੇ ਜਮਾਤੀ ਸੰਘਰਸ਼ ਦਾ ਸਿੱਟਾ ਹਨ। ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਪਾਰਟੀ ਆਫ ਗਰੇਟ ਬ੍ਰਿਟੇਨ (ਪ੍ਰੋਵੀਜਨਲ ਕੇਂਦਰੀ ਕਮੇਟੀ) ਇਸ ਰਾਏਸ਼ੁਮਾਰੀ ਵਿਚ ਦੋਹਾਂ ਹੀ ਧਿਰਾਂ ਨੂੰ ਵੋਟ ਨਾ ਦੇਣ ਦੀ ਮੁਦੱਈ ਸੀ। ਉਸਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ ਕਿ 23 ਜੂਨ ਨੂੰ ਮਿਲਣ ਵਾਲੇ ਬੈਲਟ ਉਤੇ 'ਹਾਂ' ਜਾਂ 'ਨਾ' 'ਤੇ ਨਿਸ਼ਾਨ ਲਾਉਣ ਦੀ ਬਜਾਏ ਉਸ ਉਤੇ ''ਅਸੀਂ ਇਕ ਸਮਾਜਵਾਦੀ ਯੂਰਪ ਦੇ ਮੁਦੱਈ ਹਾਂ'' ਲਿਖਕੇ ਬੈਲਟ ਰੱਦੀ ਕਰ ਦੇਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਇੱਥੇ ਇਹ ਵੀ ਵਰਣਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਖੱਬੇ ਪੱਖੀਆਂ ਦੇ ਕਾਡਰ ਵਿਚ ਇਸ ਗੱਲ ਦੀ ਵੀ ਚਿੰਤਾ ਹੈ ਕਿ 'ਛੱਡਣ' ਦੇ ਪੱਖ ਵਿਚ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਅਸੀਂ ਕਿਤੇ ਧੁਰ ਕੌਮਪ੍ਰਸਤ ਨਸਲਵਾਦੀਆਂ ਦੇ ਪਾਲੇ ਵਿਚ ਨਾ ਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਨਜ਼ਰਾਂ ਵਿਚ ਗਿਣੇ ਜਾਈਏ।
ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ (ਈ.ਯੂ.) ਨੂੰ 'ਛੱਡਣ' ਤੇ ਇਸ ਵਿਚ 'ਰਹਿਣ' ਲਈ ਦੇਸ਼ ਭਰ ਵਿਚ ਗਰਮਾ ਗਰਮ ਬਹਿਸ ਵਿਚ ਉਭਰੇ ਕੁੱਝ ਮੁੱਖ ਮੁੱਦਿਆਂ 'ਤੇ ਦੋਹਾਂ ਧਿਰਾਂ ਦੀਆਂ ਪਹੁੰਚਾਂ ਮੋਟੇ ਰੂਪ ਵਿਚ ਹੇਠ ਅਨੁਸਾਰ ਸਨ :
ਖਪਤਕਾਰ ਮਾਮਲੇ : ਇਸ ਵਿਚ ਵਸਤਾਂ ਦੀਆਂ ਕੀਮਤਾਂ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਸਬੰਧੀ ਟੈਸਟ ਅਤੇ ਖਪਤਕਾਰਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਉਚਿਤ ਵਿਹਾਰ ਸ਼ਾਮਲ ਹੈ।
'ਛੱਡਣ' ਵਾਲੀ ਧਿਰ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ ਕਿ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਦੀ ਲਾਲ ਫੀਤਾਸ਼ਾਹੀ ਵਸਤਾਂ ਤੇ ਸੇਵਾਵਾਂ ਨੂੰ ਮਹਿੰਗਾ ਬਣਾ ਦਿੰਦੀ ਹੈ। ਹਾਲੀਆ 'ਟੈਮਪੋਨ ਟੈਕਸ' ਵਿਵਾਦ ਨੇ ਦਰਸਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ਕਿ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਕੋਲ ਬੇਅਥਾਹ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਹਨ। ਈ.ਯੂ. ਛੱਡਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਆਪਣੀ ਮਰਜ਼ੀ ਨਾਲ ਵੈਟ ਦੇ ਰੇਟ ਤਹਿ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਧਿਰ ਦਾ ਦਾਅਵਾ ਹੈ ਕਿ ਈ.ਯੂ. ਛੱਡਣ ਨਾਲ ਵਸਤਾਂ ਦੀਆਂ ਕੀਮਤਾਂ ਵਿਚ 8% ਦੀ ਕਮੀ ਆਵੇਗੀ ਅਤੇ ਜੀ.ਡੀ.ਪੀ. 4% ਵੱਧ ਜਾਵੇਗੀ। ਖਪਤਕਾਰ ਸੁਰੱਖਿਆ ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਵਿਚ ਛੱਡਣ ਨਾਲ ਕੋਈ ਤਬਦੀਲੀ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗੀ।
'ਰਹਿਣ' ਦੇ ਮੁੱਦਈਆਂ ਮੁਤਾਬਕ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਔਸਤਨ ਪ੍ਰਤੀ ਵਿਅਕਤੀ 450 ਪਾਊਂਡ ਦੀ ਹਰ ਸਾਲ ਬਚਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਮੈਂਬਰ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਕੀਮਤਾਂ ਘੱਟ ਹਨ। ਹਵਾਈ ਜਹਾਜਾਂ ਦੇ ਕਿਰਾਏ ਦੇ ਮੋਬਾਇਲ ਫੋਨ ਸੇਵਾਵਾਂ ਸਸਤੀਆਂ ਹਨ। ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਗਰੰਟੀ ਕਰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਦਰਾਮਦ ਵਸਤਾਂ ਦੀ ਗੁਣਵੱਤਾ ਯੂਰਪੀ ਮਾਨਦੰਡਾਂ ਮੁਤਾਬਕ ਹੋਵੇ।
ਸਿੱਖਿਆ ਤੇ ਖੋਜ : ਸਿੱਖਿਆ ਤੇ ਵਿਗਿਆਨਕ, ਤਕਨੀਕੀ ਤੇ ਮੈਡੀਕਲ ਖੋਜ ਕਿਵੇਂ ਮੈਂਬਰਸ਼ਿਪ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਹਨ। ਸਿੱਖਿਆ ਆਪਣੇ-ਆਪਣੇ ਦੇਸ਼ ਦੀਆਂ ਸਰਕਾਰਾਂ ਦੀ ਜਿੰਮੇਵਾਰੀ ਹੈ ਪਰ ਈ.ਯੂ. ਮੈਂਬਰ ਦੇਸ਼ਾਂ ਦਰਮਿਆਨ ਸਹਿਯੋਗ ਨੂੰ ਯਕੀਨੀ ਬਣਾਉਂਦੀ ਹੈ। 2014-20 ਦਰਮਿਆਨ ਖੋਜ ਖੇਤਰ ਵਿਚ ਈ.ਯੂ. ਦੀ 80 ਬਿਲੀਅਨ ਯੂਰੋ ਖਰਚ ਕਰਨ ਦੀ ਯੋਜਨਾ ਹੈ।
'ਛੱਡਣ' ਵਾਲੀ ਧਿਰ ਮੁਤਾਬਕ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਵਿਚ ਖੋਜ ਤੇ ਵਿਕਾਸ ਉਤੇ ਈ.ਯੂ. ਸਿਰਫ 3% ਹੀ ਖਰਚ ਕਰਦੀ ਹੈ। ਛੱਡਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਈ.ਯੂ. ਮੈਂਬਰਸ਼ਿਪ ਵਜੋਂ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣ ਵਾਲੀ ਰਕਮ ਦੇ ਬਚ ਜਾਣ ਨਾਲ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਹੋਰ ਵਧੇਰੇ ਖਰਚ ਇਸ ਮੱਦ 'ਤੇ ਕਰ ਸਕੇਗਾ। ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਆਪਣੀ ਪ੍ਰਵਾਸ ਨੀਤੀ ਖੁਦ ਤਹਿ ਕਰਕੇ ਹੋਰ ਵਧੇਰੇ ਵਿਗਿਆਨੀਆਂ ਤੇ ਖੋਜਾਰਥੀਆਂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਲਿਆ ਸਕੇਗਾ।
'ਰਹਿਣ' ਦੇ ਮੁਦੱਈਆਂ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ ਕਿ ਦੇਸ਼ ਦੀਆਂ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀਆਂ ਨੂੰ ਲੱਖਾਂ ਯੂਰੋ ਖੋਜ ਕਾਰਜਾਂ ਲਈ ਈ.ਯੂ. ਤੋਂ ਮਿਲਦੇ ਹਨ। ਕਈ ਉਘੇ ਬ੍ਰਿਟਿਸ਼ ਵਿਗਿਆਨੀ ਯੂਰਪ ਦੇ ਹੋਰ ਦੇਸ਼ਾਂ ਤੋਂ ਈ.ਯੂ. ਗਰਾਂਟ ਦੀ ਮਦਦ ਨਾਲ ਇੱਥੇ ਆਏ ਹਨ। ਈ.ਯੂ. ਦੇ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮਾਂ ਅਧੀਨ ਬ੍ਰਿਟਿਸ਼ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਦੂਜੇ ਯੂਰਪੀ ਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿਚ ਜਾ ਕੇ ਸਿੱਖਿਆ ਹਾਸਲ ਕਰਦੇ ਹਨ।
ਖੇਤੀ ਤੇ ਮੱਛੀ ਪਾਲਣ : ਸਾਂਝੀ ਖੇਤੀ ਨੀਤੀ ਤੇ ਮੱਛੀ ਪਾਲਣ ਨੀਤੀ ਕਿਵੇਂ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਨੂੰ ਪ੍ਰਭਾਵਤ ਕਰਦੀ ਹੈ। ਸਾਂਝੀ ਖੇਤੀ ਨੀਤੀ ਅਜਿਹਾ ਖੇਤਰ ਹੈ, ਜਿਸ ਉਤੇ ਈ.ਯੂ. ਸਭ ਤੋਂ ਵਧੇਰੇ ਖਰਚ ਕਰਦੀ ਹੈ, ਭਾਵੇਂ ਕਿ ਇਹ ਘਟਦਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਦੇਸ਼ ਦੀ ਖੇਤੀ ਆਮਦਣ ਵਿਚ ਈ.ਯੂ. ਸਬਸੀਡੀਆਂ ਦਾ 50% ਦਾ ਯੋਗਦਾਨ ਹੈ।
'ਛੱਡਣ' ਵਾਲੀ ਧਿਰ ਮੁਤਾਬਕ ਬ੍ਰਿਟੇਨ 'ਸਾਂਝੀ ਖੇਤੀ ਨੀਤੀਆਂ ਅਧੀਨ ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਣ ਵਾਲੀ ਰਕਮ ਨਾਲੋਂ ਕਿਤੇ ਵੱਧ ਰਕਮ ਈ.ਯੂ. ਨੂੰ ਇਸ ਮਦ ਅਧੀਨ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਈ.ਯੂ. ਛੱਡਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਉਸ ਕੋਲ ਆਪਣੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਨੂੰ ਦੇਣ ਲਈ ਵਧੇਰੇ ਰਕਮ ਉਪਲੱਬਧ ਹੋਵੇਗੀ। ਇਸ ਨੀਤੀ ਅਧੀਨ ਅਫਸਰਸ਼ਾਹੀ 'ਤੇ ਕਾਫੀ ਖਰਚ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਜਿਹੜਾ ਫਜੂਲ ਹੈ। ਸਾਂਝੀ ਮੱਛੀ ਪਾਲਣ ਨੀਤੀ ਨੇ ਬ੍ਰਿਟਿਸ਼ ਮੱਛੀ ਪਾਲਣ ਸਨਅਤ ਨੂੰ ਤਬਾਹ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ।
'ਰਹਿਣ' ਵਾਲਿਆਂ ਦੀ ਦਲੀਲ ਹੈ ਕਿ ਸਾਂਝੀ ਖੇਤੀ ਨੀਤੀ ਦੀ ਮਦਦ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਕਿਸਾਨ ਇਸ ਕਿੱਤੇ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਹੋ ਜਾਣਗੇ। ਦੇਸ਼ ਦੀਆਂ 73% ਖੇਤੀ ਵਸਤਾਂ ਦੀ ਬਰਾਮਦ ਈ.ਯੂ. ਨੂੰ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਈ.ਯੂ. ਨੇ ਹੀ ਫਰਾਂਸ ਤੇ ਜਰਮਨੀ ਨੂੰ ਬ੍ਰਿਟਿਸ਼ ਬੀਫ 'ਤੇ ਰੋਕ ਹਟਾਉਣ ਲਈ ਮਜ਼ਬੂਰ ਕੀਤਾ ਸੀ।
ਪ੍ਰਵਾਸ : ਪ੍ਰਵਾਸ ਅਤੇ ਯੂਰਪ ਅੰਦਰ ਆਵਾਜਾਈ ਨਾਲ ਸਬੰਧੀ ਇਸ ਸਾਲ 3 ਲੱਖ ਤੋਂ ਵੱਧ ਪ੍ਰਵਾਸੀ ਦੇਸ਼ ਵਿਚ  ਆਏ ਹਨ, ਜਦੋਂਕਿ ਸਰਕਾਰ ਦਾ ਇਸਨੂੰ 1 ਲੱਖ ਕਰਨ ਦਾ ਟੀਚਾ ਸੀ। ਇਸ ਵਿਚ 1 ਲੱਖ 84 ਹਜ਼ਾਰ ਈ.ਯੂ. ਦੇਸ਼ਾਂ ਤੋਂ ਤੇ 1 ਲੱਖ 88 ਹਜ਼ਾਰ ਗੈਰ ਈ.ਯੂ. ਦੇਸ਼ਾਂ ਤੋਂ ਹਨ। ਈ.ਯੂ. ਦੇਸ਼ਾਂ ਦੇ ਨਾਗਰਿਕਾਂ ਨੂੰ ਮੈਂਬਰ ਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿਚ ਰਹਿਣ ਤੇ ਕੰਮ ਕਰਨ ਦਾ ਅਧਿਕਾਰ ਹਾਸਲ ਹੈ। ਇੱਥੇ ਇਹ ਵੀ ਨੋਟ ਕਰਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਈ.ਯੂ. ਦੇ ਉਸ ਜ਼ੋਨ ਵਿਚ ਸ਼ਾਮਲ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਜਿੱਥੇ ਈ.ਯੂ. ਨਾਗਰਿਕ ਬਿਨਾਂ ਕਿਸੇ ਰੋਕ ਟੋਕ ਦੇ ਆ ਜਾ ਸਕਦੇ ਹਨ।
'ਛੱਡਣ' ਦੀ ਮੁੱਦਈ ਧਿਰ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ ਕਿ ਈ.ਯੂ. ਦੇ ਮੈਂਬਰ ਰਹਿੰਦੇ ਹੋਏ ਪ੍ਰਵਾਸ 'ਤੇ ਕੰਟਰੋਲ ਹੋ ਸਕਣਾ ਮੁਸ਼ਕਲ ਹੈ। ਪ੍ਰਵਾਸੀਆਂ ਦੇ ਵੱਧਦੇ ਜਾਣ ਨਾਲ ਜਨਤਕ ਸੇਵਾਵਾਂ 'ਤੇ ਭਾਰ ਵਧਦਾ ਹੈ। ਵੱਡੀ ਪੱਧਰ 'ਤੇ ਪ੍ਰਵਾਸੀਆਂ ਦੇ ਆਉਣ ਨਾਲ ਬ੍ਰਿਟਿਸ਼ ਕਾਮਿਆਂ ਦੀਆਂ ਤਨਖਾਹਾਂ ਘੱਟਦੀਆਂ ਹਨ।
'ਰਹਿਣ' ਵਾਲੀ ਧਿਰ ਮੁਤਾਬਕ ਪ੍ਰਵਾਸੀ ਖਾਸਕਰ ਈ.ਯੂ. ਦੇਸ਼ਾਂ ਦੇ, ਆਪਣੇ ਉਤੇ ਖਰਚ ਨਾਲੋਂ ਵਧੇਰੇ ਟੈਕਸ ਦਿੰਦੇ ਹਨ। ਕੈਮਰੂਨ ਵਲੋਂ ਕੀਤੀ ਹਾਲੀਆ ਸੌਦੇਬਾਜ਼ੀ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਨਵੇਂ ਆਉਣ ਵਾਲੇ ਪ੍ਰਵਾਸੀ ਕਾਮਿਆਂ ਨੂੰ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਦੇ ਮਾਮਲੇ 'ਚ ਪਹਿਲੇ 4 ਸਾਲਾਂ ਲਈ ਸੀਮਤ ਲਾਭ ਮਿਲਣਗੇ। ਪ੍ਰਵਾਸ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਅਰਥਚਾਰੇ ਲਈ ਲਾਹੇਵੰਦਾ ਹੈ।
ਮੈਂਬਰਸ਼ਿਪ ਦੀ ਲਾਗਤ : ਇਹ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਮੈਂਬਰਸ਼ਿਪ ਲਈ ਕਿੰਨਾ ਭੁਗਤਾਨ ਕਰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਬਦਲੇ ਵਿਚ ਉਸਨੂੰ ਕੀ ਮਿਲਦਾ ਹੈ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਹੈ। 2015 ਵਿਚ ਦੇਸ਼ ਨੇ 17.8 ਬਿਲੀਅਨ ਪਾਊਂਡ ਦਾ ਯੋਗਦਾਨ ਪਾਇਆ ਸੀ ਜਦੋਂਕਿ ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਣ ਵਾਲੇ ਲਾਭ ਸਿਰਫ 4.9 ਬਿਲੀਅਨ ਪਾਊਂਡ ਬਰਾਬਰ ਹੀ ਸੀ। ਹੋਰ 4.4 ਬਿਲੀਅਨ ਪਾਊਂਡ ਉਸਨੂੰ ਖੇਤੀ ਸਬਸਿਡੀਆਂ ਵਜੋਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋਏ ਹਨ।
'ਛੱਡਣ' ਵਾਲਿਆਂ ਦੀ ਦਲੀਲ ਹੈ ਕਿ ਮੈਂਬਰਸ਼ਿਪ ਦੀ ਕੁੱਲ ਲਾਗਤ 350 ਮਿਲੀਅਨ ਪ੍ਰਤੀ ਹਫਤਾ ਬਣਦੀ ਹੈ। ਜੇਕਰ ਦੇਸ਼ ਈ.ਯੂ. ਛੱਡਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਉਸ ਕੋਲ ਲੱਖਾਂ ਪਾਊਂਡ ਆਪਣੀਆਂ ਤਰਜੀਹਾਂ ਮੁਤਾਬਕ ਖਰਚਣ ਲਈ ਉਪਲੱਬਧ ਹੋਣਗੇ। ਦੇਸ਼ ਆਪਣੀ ਮਰਜ਼ੀ ਨਾਲ ਪੈਸਾ ਖਰਚ ਕਰਨ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਲੈ ਸਕੇਗਾ।
'ਰਹਿਣ' ਵਾਲਿਆਂ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ ਈ.ਯੂ. ਮੈਂਬਰਸ਼ਿਪ ਲਾਗਤ ਨਾਲੋਂ ਉਸ ਤੋਂ ਮਿਲਣ ਵਾਲੇ ਲਾਭ ਕਿਤੇ ਵਧੇਰੇ ਹਨ। ਹੋਰ ਮੈਂਬਰ ਦੇਸ਼ ਪ੍ਰਤੀ ਵਿਅਕਤੀ ਯੋਗਦਾਨ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਨਾਲੋਂ ਵਧੇਰੇ ਪਾਉਂਦੇ ਹਨ। ਈ.ਯੂ. ਛੱਡਣ ਤੋਂ ਬਾਵਜੂਦ ਵੀ ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਸਾਂਝੀ ਮੰਡੀ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚ ਰੱਖਣ ਲਈ ਈ.ਯੂ. ਬਜਟ ਵਿਚ ਯੋਗਦਾਨ ਪਾਉਣਾ ਹੀ ਪਵੇਗਾ।
ਕੰਮ ਅਤੇ ਤਨਖਾਹਾਂ : ਕੰਮ ਹਾਲਤਾਂ ਤੇ ਤਨਖਾਹਾਂ ਦੀਆਂ ਦਰਾਂ ਕਿਸ ਤਰ੍ਹਾਂ, ਈ.ਯੂ. ਮੈਂਬਰਸ਼ਿਪ ਨੂੰ ਪ੍ਰਭਾਵਤ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ। ਈ.ਯੂ. ਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿਚ ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰੀ ਦਰ 10% ਹੈ ਜਦੋਂਕਿ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਵਿਚ ਇਹ ਅੱਧੀ ਹੈ। ਕੁੱਝ ਕਿਰਤ ਅਧਿਕਾਰਾਂ ਦੀ ਈ.ਯੂ. ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਅਧੀਨ ਗਰੰਟੀ ਹੈ, ਪਰ ਟੈਕਸ ਦਰਾਂ ਲਾਭ ਅਤੇ ਘੱਟੋ ਘੱਟ ਤਨਖਾਹਾਂ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਫੈਸਲਿਆਂ 'ਤੇ ਨਿਰਭਰ ਹਨ।
'ਛੱਡਣ' ਵਾਲੀ ਧਿਰ ਦੀ ਦਲੀਲ ਹੈ ਕਿ ਕੰਮ ਥਾਵਾਂ ਉਤੇ ਘੱਟ ਨਿਯਮ ਲਾਗੂ ਹੋਣ ਨਾਲ ਵਧੇਰੇ ਨੌਕਰੀਆਂ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ। ਉਨ੍ਹਾ ਦਾ ਦਾਅਵਾ ਹੈ ਕਿ ਤੇਜੀ ਨਾਲ ਵਿਕਸਿਤ ਹੋ ਰਹੇ ਅਰਥਚਾਰਿਆਂ ਨਾਲ ਵਾਪਰਨ ਵਾਲੇ ਸਹਿਯੋਗ ਕਰਕੇ 3 ਲੱਖ ਤੋਂ ਵੱਧ ਨੌਕਰੀਆਂ ਪੈਦਾ ਕੀਤੀਆਂ ਜਾ ਸਕਦੀਆਂ ਹਨ। ਈ.ਯੂ. ਵਿਚ ਰਹਿੰਦਿਆਂ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਇਹ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦਾ। ਪ੍ਰਸੂਤਾ ਛੁੱਟੀ ਤੇ ਛੁੱਟੀਆਂ ਲਈ ਤਨਖਾਹ ਨੂੰ ਤਾਂ ਹੀ ਬੰਦ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਜੇਕਰ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਚਾਹੇ। ਦੇਸ਼ ਈ.ਯੂ. ਛੱਡਣ ਨਾਲ ਗੈਰ ਈ.ਯੂ. ਦੇਸ਼ਾਂ ਤੋਂ ਵਧੇਰੇ ਨਿਵੇਸ਼ ਹਾਸਲ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੇ। ਘੱਟ ਪ੍ਰਵਾਸ ਹੋਣ ਨਾਲ ਤਨਖਾਹਾਂ ਵਧਣਗੀਆਂ।
ਜਦੋਂ ਕਿ 'ਰਹਿਣ' ਵਾਲੀ ਧਿਰ ਦੀ ਦਲੀਲ ਹੈ ਕਿ 3 ਲੱਖ ਨੌਕਰੀਆਂ ਈ.ਯੂ. ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਵਪਾਰ ਨਾਲ ਜੁੜੀਆਂ ਹਨ। ਈ.ਯੂ. ਦੇ ਕਾਨੂੰਨ ਛੁੱਟੀਆਂ ਦੀ ਤਨਖਾਹ, ਪ੍ਰਸੂਤਾ ਛੁੱਟੀ ਤੇ ਕਾਰਜ ਥਾਵਾਂ 'ਤੇ ਵਧੇਰੇ ਸੁਰਖਿਆਂ ਦੀ ਗਰੰਟੀ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਪ੍ਰਤੀ ਦਿਨ 66 ਮਿਲੀਅਨ ਪਾਊਂਡ ਦਾ ਨਿਵੇਸ਼ ਈ.ਯੂ. ਤੋਂ ਮਿਲਦਾ ਹੈ।
ਰਾਏਸ਼ੁਮਾਰੀ ਮੁਤਾਬਕ 'ਛੱਡਣ' ਵਾਲੀ ਧਿਰ ਜਿੱਤਣ ਨਾਲ ਫੌਰੀ ਤੌਰ ਉਤੇ ਆਰਥਕ ਪ੍ਰਭਾਵ ਇਹ ਪਿਆ ਹੈ ਕਿ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਮੁਦਰਾ ਪਾਊਂਡ ਦੀ ਕੀਮਤ ਕਾਫੀ ਘੱਟ ਗਈ ਹੈ, ਇਸ ਵਿਚ ਐਨਾ 1985 ਵਿਚ ਹੀ ਹੋਇਆ ਸੀ। ਛੱਡਣ ਦੀ ਪੂਰੀ ਸਮੁੱਚੀ ਪ੍ਰਕਿਰਿਆ ਮੁਕੰਮਲ ਹੋਣ ਵਿਚ ਕਈ ਸਾਲ ਲੱਗ ਜਾਣਗੇ। ਹਾਂ ਐਨਾ ਜ਼ਰੂਰ ਹੈ ਕਿ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਸੱਤਾਧਾਰੀ ਪਾਰਟੀ, ਕੰਜਰਵੇਟਿਵ ਪਾਰਟੀ, ਜਿਹੜੀ ਕਿ ਇਸ ਮੁੱਦੇ 'ਤੇ ਉਪਰ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਹੇਠਾਂ ਤੱਕ ਵੰਡੀ ਹੋਈ ਹੈ, ਜ਼ਰੂਰ ਦੋਫਾੜ ਹੋ ਸਕਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਡੇਵਿਡ ਕੈਮਰੂਨ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਕੁਰਸੀ ਛੱਡਣੀ ਪੈ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਇਹ ਵੰਡ ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਸੰਸਦੀ ਉਪ ਚੋਣਾਂ ਦਾ ਵੀ ਸਬੱਬ ਬਣ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਇਸ ਨਾਲ ਮਿਹਨਤਕਸ਼ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਕੋਈ ਸਿੱਧਾ ਤੇ ਫੌਰੀ ਲਾਭ ਮਿਲਣ ਦੀ ਸੰਭਾਵਨਾ ਘੱਟ ਹੈ। ਉਸਨੂੰ ਤਾਂ ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ ਰਾਹੀਂ ਹੀ ਕੁੱਝ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਸਕੇਗਾ।
ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਵਿਚ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਨੂੰ ਛੱਡਣ ਵਾਲਿਆਂ ਦੀ ਹੋਈ ਜਿੱਤ, ਇਸਦੇ ਪਤਨ ਦਾ ਆਗਾਜ਼ ਵੀ ਬਣ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਕਿਉਂਕਿ ਯੂਰਪ ਦੇ ਬਾਕੀ ਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿਚ ਵੀ ਇਸਨੂੰ 'ਛੱਡਣ' ਦੇ ਮੁੱਦਈਆਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਪਹਿਲਾਂ ਨਾਲੋਂ ਨਿਰੰਤਰ ਵੱਧ ਰਹੀ ਹੈ, ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਵਲੋਂ ਇਸਨੂੰ ਛੱਡਣ ਨਾਲ ਇਸ ਰੁਝਾਨ ਨੂੰ ਹੋਰ ਬਲ ਮਿਲੇਗਾ।
ਇਸੇ ਦੌਰਾਨ ਮਿਲੀਆਂ ਖ਼ਬਰਾਂ ਮੁਤਾਬਕ ਕੰਜਰਵੇਟਿਵ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਡੇਵਿਡ ਕੈਮਰੂਨ, ਜਿਹੜੇ ਕਿ ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਯੂਰਪੀਅਨ ਯੂਨੀਅਨ ਵਿਚ ਰੱਖਣ ਦੇ ਮੁੜ੍ਹੈਲੀ ਸਨ, ਨੇ ਅਸਤੀਫਾ ਦੇਣ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਮੁਤਾਬਕ ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਨਵੇਂ ਆਗੂ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ। ਲੇਬਰ ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਆਗੂ ਜੇਰਮੀ ਕੋਰਬੀਨ ਵਿਰੁੱਧ ਵੀ ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਦੋ ਸਾਸਦਾਂ ਨੇ ਇਸੇ ਮੁੱਦੇ 'ਤੇ ਅਵਿਸ਼ਵਾਸ ਮਤਾ ਪੇਸ਼ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਸੂਬੇ ਸਕਾਟਲੈਂਡ ਦੀ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਨਿਕੋਲਾ ਸਟਰਜਿਊਨ ਨੇ ਕਿਹਾ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਆਪਣੇ ਸੂਬੇ ਨੂੰ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਵਿਚ ਹਰ ਹਾਲਤ ਵਿਚ ਰੱਖਣ ਲਈ ਦ੍ਰਿੜ੍ਹ ਹੈ। ਇਸ ਮੁੱਦੇ 'ਤੇ ਉਹ ਸਕਾਟਲੈਂਡ ਵਿਚ ਮੁੜ ਰਾਏਸ਼ੁਮਾਰੀ ਕਰਵਾਏਗੀ। ਇੱਥੇ ਵਰਣਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਸਕਾਟਲੈਂਡ ਨੇ 38% ਦੇ ਮੁਕਾਬਲੇ 62% ਨਾਲ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਵਿਚ ਰਹਿਣ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਫਤਵਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਅਜੇ ਪਿਛਲੇ ਸਾਲ ਹੀ ਇਸ ਸੂਬੇ ਨੂੰ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਤੋਂ ਆਜ਼ਾਦ ਕਰਨ ਦੇ ਮੁੱਦੇ 'ਤੇ ਰਾਏਸ਼ੁਮਾਰੀ ਹੋਈ ਸੀ, ਜਿਸ ਵਿਚ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਇਸਨੂੰ ਬ੍ਰਿਟੇਨ ਵਿਚ ਹੀ ਰੱਖਣ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਫਤਵਾ ਦਿੱਤਾ ਸੀ।                    (25.6.2016)




ਗਿਲਗਿਤ-ਬਾਲਟਿਸਤਾਨ ਦੇ ਖੱਬੇ ਪੱਖੀ ਆਗੂ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਨੂੰ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਸਜਾ ਵਿਰੁੱਧ ਸੰਘਰਸ਼  
ਮਕਬੂਜਾ ਕਸ਼ਮੀਰ ਦੇ ਗਿਲਗਿਤ-ਬਾਲਟਿਸਤਾਨ ਖੇਤਰ ਦੇ ਖੱਬੇ ਪੱਖੀ ਆਗੂ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਅਤੇ 11 ਹੋਰ ਕਾਰਕੁੰਨਾਂ ਨੂੰ 9 ਜੂਨ ਨੂੰ ਇਸ ਸੂਬੇ ਦੀ ਸੁਪਰੀਮ ਅਪੀਲ ਕੋਰਟ ਵਲੋਂ 40 ਸਾਲਾਂ ਦੀ ਸਜਾ ਦੇ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਹੈ। ਇਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ 25 ਮਈ ਨੂੰ ਇਸੇ ਕੋਰਟ ਨੇ 28 ਮਈ ਨੂੰ ਹੋਣ ਵਾਲੇ ਹੁੰਝਾ-6 ਅਸੈਂਬਲੀ ਹਲਕੇ ਦੀ ਚੋਣ ਮੁਲਤਵੀ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਸੀ ਜਿੱਥੋਂ ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਉਮੀਦਵਾਰ ਸਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਇਹ ਸਜਾ ਅੱਤਵਾਦੀ ਹੋਣ, ਹਮਲਾ ਕਰਨ ਅਤੇ ਅਮਨ ਭੰਗ ਕਰਨ ਦੇ ਅਖੌਤੀ ਦੋਸ਼ਾਂ ਅਧੀਨ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਹੈ। ਅਵਾਮੀ ਵਰਕਰਜ਼ ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਉਮੀਦਵਾਰ ਵਜੋਂ ਚੋਣ ਲੜ ਰਹੇ ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਦੀ ਖੇਤਰ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਵਿਚ ਹਰਮਨ ਪਿਆਰਤਾ ਦੇ ਮੱਦੇਨਜ਼ਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ 28 ਮਈ ਦੀ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਉਪ ਚੋਣ ਵਿਚ ਜਿੱਤ ਜਾਣ ਦੀ ਸੰਭਾਵਨਾ ਨੂੰ ਦੇਖਦੇ ਹੋਏ, ਇਹ ਸਜਾ ਹਾਕਮ ਧਿਰਾਂ ਦੇ ਇਸ਼ਾਰੇ 'ਤੇ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਹੈ।
2010 ਵਿਚ ਮੌਸਮ ਦੇ ਬਦਲਾਅ ਕਰਕੇ ਆਈ ਇਕ ਕੁਦਰਤੀ ਆਫਤ ਕਰਕੇ ਇਸ ਇਲਾਕੇ ਦੇ ਅਲੀ ਆਬਾਦ ਖੇਤਰ ਵਿਚ ਵੱਡੀ ਪੱਧਰ 'ਤੇ ਚੱਟਾਨਾਂ ਤੇ ਪਹਾੜ ਖਿਸਕ ਗਏ ਸਨ ਅਤੇ ਇਕ ਵੱਡੀ ਗੈਰ-ਕੁਦਰਤੀ ਝੀਲ ਬਣ ਗਈ ਸੀ, ਜਿਸ ਨਾਲ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਪਰਿਵਾਰ ਬੇਘਰੇ ਹੋ ਗਏ ਸਨ। ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿਚ ਇਹ ਬੇਘਰੇ ਲੋਕ ਇਸ ਕੁਦਰਤੀ ਤ੍ਰਾਸਦੀ ਤੋਂ ਹੋਣ ਵਾਲੇ ਨੁਕਸਾਨ ਦੇ ਮੁਆਵਜ਼ੇ ਅਤੇ  ਮੁੜ ਵਸੇਵੇ ਦੀ ਮੰਗ ਲਈ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ। ਇਸ ਲਈ ਦਰਜਨਾਂ ਮੁਜ਼ਾਹਰੇ ਕੀਤੇ ਗਏ। ਇਕ ਮੁਜਾਹਰੇ ਦੇ ਦੌਰਾਨ ਪੁਲਸ ਵਲੋਂ ਗੋਲੀ ਚਲਾ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਸੀ, ਜਿਸ ਵਿਚ ਦੋ ਸਥਾਨਕ ਵਾਸੀ, ਸ਼ੇਰਖਾਨ ਅਤੇ ਉਸਦਾ ਪਿਤਾ ਮਾਰੇ ਗਏ ਸਨ। ਇਸ ਮਾਮਲੇ ਵਿਚ ਪੁਲਸ ਵਿਰੁੱਧ ਕਾਰਵਾਈ ਕਰਨ ਦੀ ਥਾਂ ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਅਤੇ ਹੋਰ ਮੁਜ਼ਾਹਰਾਕਾਰੀਆਂ 'ਤੇ ਅੱਤਵਾਦੀ ਹੋਣ, ਹਮਲਾ ਕਰਨ ਅਤੇ ਅਮਨ-ਸ਼ਾਂਤੀ ਭੰਗ ਕਰਨ ਦੀਆਂ ਧਾਰਾਵਾਂ ਲਾ ਕੇ ਕੇਸ ਦਰਜ ਕਰ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਸਨ। ਅੱਤਵਾਦ ਵਿਰੋਧੀ ਕੋਰਟ ਵਿਚ ਚੱਲੇ ਕੇਸ ਵਿਚ ਸਿਤੰਬਰ 2014 ਵਿਚ ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਤੇ ਹੋਰਾਂ ਨੂੰ ਸਜਾ ਦੇ  ਕੇ ਜੇਲ੍ਹ ਭੇਜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਸੀ। ਇਸ ਫੈਸਲੇ ਵਿਰੁੱਧ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਲੋਂ ਚੀਫ ਕੋਰਟ ਵਿਚ ਅਪੀਲ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸੀ, ਜਿਸਨੇ ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਅਤੇ ਹੋਰਾਂ ਨੂੰ ਬਰੀ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ। ਗਿਲਗਿਤ-ਬਾਲਟਿਸਤਾਨ ਸੂਬੇ ਦੀ ਅਸੈਂਬਲੀ ਲਈ 28 ਮਈ ਨੂੰ ਹੁੰਝਾ-6 ਅਸੰਬਲੀ ਹਲਕੇ ਲਈ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਉਪ ਚੋਣ ਵਿਚ ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਨੇ ਜਦੋਂ ਆਪਣੇ ਕਾਗਜ ਦਾਖਲ ਕੀਤੇ ਸਨ, ਉਸ ਸਮੇਂ ਵੀ ਹਾਕਮ ਧਿਰ ਦੀ ਪਾਰਟੀ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਮੁਸਲਮ ਲੀਗ (ਨਵਾਜ ਸ਼ਰੀਫ) ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਕਾਗਜਾਂ ਨੂੰ ਰੱਦ ਕਰਨ ਲਈ ਚੋਣ ਟ੍ਰਿਬਿਊਨਲ ਕੋਲ ਪਹੁੰਚ ਕੀਤੀ ਸੀ। ਪ੍ਰੰਤੂ ਚੋਣ ਟ੍ਰਿਬਿਊਨਲ ਨੇ ਚੀਫ ਕੋਰਟ ਦੇ ਫੈਸਲੇ ਦੇ ਮੱਦੇਨਜ਼ਰ, ਇਹ ਕਹਿੰਦੇ ਹੋਏ ਕਿ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਨੂੰ ਸਜਾਯਾਫਤਾ ਨਹੀਂ ਮੰਨਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ, ਉਸਨੂੰ ਜੇਲ੍ਹ ਤੋਂ ਹੀ ਚੋਣ ਲੜਨ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਦੇ ਦਿੱਤੀ ਸੀ ਅਤੇ ਉਸਦੇ ਕਾਗਜ਼ ਪ੍ਰਵਾਨ ਕਰ ਲਏ ਸਨ।
ਅਵਾਮੀ ਵਰਕਰਜ਼ ਪਾਰਟੀ ਵਲੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਧੂੰਆਧਾਰ-ਮੁਹਿੰਮ ਚਲਾਈ ਜਾ ਰਹੀ ਸੀ, ਜਿਸਨੂੰ ਖੇਤਰ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਵਿਚ ਕਾਫੀ ਸਮਰਥਨ ਮਿਲ ਰਿਹਾ ਸੀ। 25 ਮਈ ਨੂੰ ਇਕ ਵਿਸ਼ਾਲ ਰੈਲੀ ਕੀਤੀ ਗਈ, ਜਿਸ ਵਿਚ ਵੱਡੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿਚ ਔਰਤਾਂ ਅਤੇ ਨੌਜਵਾਨ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋਏ। ਇਸੇ ਦਿਨ ਹਾਕਮ ਧਿਰ ਦੀ ਦੂਜੀ ਪਾਰਟੀ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਪੀਪਲਜ਼ ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਆਗੂ ਜਫਰ ਇਕਬਾਲ, ਜਿਹੜੇ ਕਿ ਆਪਣੀ ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਕਾਰਜਕਾਲ ਵਿਚ ਇਸ ਸੂਬੇ ਦੇ ਗਵਰਨਰ ਰਹੇ ਸਨ, ਨੇ ਸੁਪਰੀਮ ਅਪੀਲ ਕੋਰਟ ਵਿਚ ਪਟੀਸ਼ਨ ਦਾਖਲ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਦੇ ਚੋਣ ਲੜਨ 'ਤੇ ਰੋਕ ਲਾਉਣ ਦੀ ਮੰਗ ਕਰ ਦਿੱਤੀ। ਸੁਪਰੀਮ ਕੋਰਟ ਨੇ ਫੌਰੀ ਰੂਪ ਵਿਚ ਇਸ ਉਤੇ ਫੈਸਲਾ ਲੈਂਦੇ ਹੋਏ ਇਹ ਕਹਿੰਦੇ ਹੋਏ ਇਸ ਚੋਣ ਨੂੰ ਮੁਲਤਵੀ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਕਿ ਇਸ ਕੇਸ ਬਾਰੇ ਲੁਕਵੇਂ ਤੱਥ ਜਦੋਂ ਤੱਕ ਵਿਚਾਰ ਨਹੀਂ ਲਏ ਜਾਂਦੇ ਉਦੋਂ ਤੱਕ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਦੇ ਕਾਗਜਾਂ ਬਾਰੇ ਕੋਈ ਅੰਤਮ ਫੈਸਲਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ।
ਸੁਪਰੀਮ ਅਪੀਲ ਕੋਰਟ ਦਾ 9 ਜੂਨ ਵਾਲਾ ਫੈਸਲਾ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਸ਼ੱਕ ਦੇ ਘੇਰੇ ਵਿਚ ਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਦੇ ਮੁੱਖ ਵਿਰੋਧੀ ਉਮੀਦਵਾਰ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਦੀ ਮੌਜੂਦਾ ਹਾਕਮ ਪਾਰਟੀ ਪੀ.ਐਮ.ਐਲ. (ਨਵਾਜ) ਦੇ ਆਗੂ ਅਤੇ ਮੌਜੂਦਾ ਗਵਰਨਰ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਹਨ। ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਦੀ ਹਰਮਨ ਪਿਆਰਤਾ ਦੇ ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਜਿੱਤਣ ਦੀ ਪੂਰੀ ਪੂਰੀ ਸੰਭਾਵਨਾ ਤੋਂ ਦੋਵੇਂ ਹੀ ਹਾਕਮ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੇ ਆਗੂ, ਜਿਹੜੇ ਕਿ ਸਥਾਨਕ ਧਨਾਢ ਪਰਿਵਾਰਾਂ ਦੇ ਮੈਂਬਰ ਹਨ, ਆਪਣੀ ਰਾਜਨੀਤਕ ਹੋਂਦ ਨੂੰ ਖਤਰਾ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ। ਇੱਥੇ ਇਹ ਵਰਣਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਜੂਨ 2015 ਵਿਚ ਹੋਈਆਂ ਆਮ ਚੋਣਾਂ ਵਿਚ ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਨੂੰ ਇਸ ਖੇਤਰ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਲਾਮਿਸਾਲ ਸਮਰਥਨ ਮਿਲਿਆ ਸੀ ਅਤੇ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਦੀ ਕੇਂਦਰ ਵਿਚ ਰਾਜ ਕਰਦੀ ਹਾਕਮ ਪਾਰਟੀ ਅਤੇ ਸਥਾਨਕ ਧਨਾਢਾਂ ਵਲੋਂ ਹਰ ਹਰਬਾ ਵਰਤਣ ਤੋਂ ਬਾਵਜੂਦ ਹਾਕਮ ਪਾਰਟੀ ਪੀ.ਐਮ.ਐਲ.(ਨਵਾਜ) ਦਾ ਉਮੀਦਵਾਰ ਬੜੀ ਮੁਸ਼ਕਲ ਨਾਲ ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਤੋਂ ਜਿੱਤ ਸਕਿਆ ਸੀ। ਉਹ ਦੂਜੇ ਨੰਬਰ 'ਤੇ ਆਏ ਸਨ ਅਤੇ ਪੀ.ਪੀ.ਪੀ. ਸਮੇਤ ਹੋਰ ਹਾਕਮ ਧਿਰਾਂ ਦੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੇ ਉਮੀਦਵਾਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਤੋਂ ਪਿੱਛੇ ਰਹਿ ਗਏ ਸਨ।
ਇਹ ਵੀ ਵਰਣਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ 1947 ਵਿਚ ਭਾਰਤ ਅਤੇ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਨੂੰ ਆਜ਼ਾਦੀ ਮਿਲਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਜਦੋਂ ਕਸ਼ਮੀਰ ਭਾਰਤ ਦਾ ਹਿੱਸਾ ਬਣ ਗਿਆ ਸੀ, ਉਸ ਸਮੇਂ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਦੇ ਹਾਕਮਾਂ ਨੇ ਕਬਾਇਲੀਆਂ ਦੀ ਮਦਦ ਨਾਲ ਹਮਲਾ ਕਰਕੇ ਕਸ਼ਮੀਰ ਦੇ ਕੁੱਝ ਹਿੱਸੇ ਉਤੇ ਨਜਾਇਜ਼ ਰੂਪ ਨਾਲ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰ ਲਿਆ ਸੀ। ਗਿਲਗਿਤ-ਬਾਲਟਿਸਤਾਨ ਵਾਦੀ ਉਸੇ ਕਬਜਾਏ ਗਏ ਖੇਤਰ ਦਾ ਭਾਗ ਹੈ। ਅਸਲ ਵਿਚ ਇਹ ਭਾਰਤੀ ਕਸ਼ਮੀਰ ਦਾ ਹਿੱਸਾ ਹੈ।
ਇਹ ਇਲਾਕਾ ਚੀਨ ਦੀ ਸਰਹੱਦ ਦੇ ਨਾਲ ਲੱਗਦਾ ਹੈ। ਕਹਿਣ ਨੂੰ ਤਾਂ ਸੰਵਿਧਾਨਕ ਤੌਰ 'ਤੇ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਇਸਨੂੰ ਆਪਣੇ ਦੇਸ਼ ਦਾ ਭਾਗ ਨਹੀਂ ਮੰਨਦਾ ਅਤੇ ਇਸਨੂੰ ਆਜ਼ਾਦ ਕਸ਼ਮੀਰ ਦਾ ਨਾਂਅ ਦਿੱਤਾ ਹੋਇਆ ਹੈ। ਪ੍ਰੰਤੂ ਅਮਲ ਵਿਚ ਇੱਥੇ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਦੇ ਹਾਕਮਾਂ ਦੀ ਮਰਜ਼ੀ ਨਾਲ ਹੀ ਸਭ ਕੁੱਝ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। 2009 ਵਿਚ ਗਿਲਗਿਤ-ਬਾਲਟਿਸਤਾਨ ਨੂੰ ਇਕ ਸੂਬੇ ਦਾ ਦਰਜਾ ਸੀਮਤ ਸਵੈ-ਸ਼ਾਸਨ ਦੇ ਅਧਿਕਾਰਾਂ ਨਾਲ ਮਿਲਿਆ ਸੀ। ਇੱਥੇ 34 ਮੈਂਬਰੀ ਅਸੈਂਬਲੀ ਹੈ, ਪ੍ਰੰਤੂ ਇਸ ਕੋਲ ਨਾਂਅ ਮਾਤਰ ਹੀ ਫੈਸਲਾਕੁੰਨ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਹਨ।
ਇਸ ਇਲਾਕੇ ਦੀ ਭੂਗੋਲਕ ਸਥਿਤੀ ਕਰਕੇ ਵੀ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਦੀਆਂ ਹਾਕਮ ਜਮਾਤਾਂ ਨਹੀਂ ਚਾਹੁੰਦੀਆਂ ਕਿ ਇਸ ਸੂਬੇ ਦੀ ਅਸੈਂਬਲੀ ਵਿਚ ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਵਰਗੀ ਲੋਕ ਪੱਖੀ ਆਵਾਜ਼ ਪਹੁੰਚੇ। ਇਹ ਹਲਕਾ ਅਜਿਹੀ ਸਰਹੱਦੀ ਜਗ੍ਹਾ ਵਿਚ ਸਥਿਤ ਹੈ, ਜਿਹੜਾ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਤੇ ਚੀਨ ਦਰਮਿਆਨ ਇਕ ਮੁੱਖ ਲਾਂਘਾ ਹੈ। ਪਿਛਲੇ ਸਮੇਂ ਵਿਚ 46 ਬਿਲੀਅਨ ਡਾਲਰ ਦੇ ਪਾਕਿਸਤਾਨ-ਚੀਨ ਆਰਥਕ ਕੋਰੀਡੋਰ ਪ੍ਰਾਜੈਕਟ ਦੇ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਣ ਨਾਲ ਇਸਦੀ ਮਹੱਤਤਾ ਹੋਰ ਵੱਧ ਗਈ ਹੈ। ਇਸ ਸੜਕ ਲਾਂਘੇ ਦੇ ਬਣਨ ਨਾਲ ਦੋਵਾਂ ਦੇਸ਼ਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਨਾਲ ਇਹ ਨਿੱਜੀ ਵਪਾਰੀਆਂ ਲਈ ਵੀ ਬਹੁਤ  ਲਾਹੇਵੰਦਾ ਸਿੱਧ ਹੋਵੇਗਾ ਹੈ। ਪ੍ਰੰਤੂ, ਸਥਾਨਕ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਇਸਦਾ ਬਹੁਤ ਘੱਟ ਲਾਭ ਮਿਲ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਇਸ ਤੋਂ ਉਲਟ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਉਜਾੜੇ ਦਾ ਸਾਹਮਣਾ ਕਰਨਾ ਪੈ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਅਜਿਹੀ ਸਥਿਤੀ ਵਿਚ ਖੱਬੇ ਪੱਖੀ ਪਾਰਟੀ, ਅਵਾਮੀ ਵਰਕਰਜ਼ ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਆਗੂ ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਵਰਗੀ ਲੋਕ ਪੱਖੀ ਸ਼ਖਸ਼ੀਅਤ ਜੇਕਰ ਅਸੈਂਬਲੀ ਵਿਚ ਪਹੁੰਚਦੀ ਹੈ ਤਾਂ ਸਥਾਨਕ ਆਮ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਹੱਕਾਂ-ਹਿੱਤਾਂ ਦੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਨੂੰ ਬਲ ਤਾਂ ਮਿਲੇਗਾ ਹੀ ਨਾਲ ਹੀ ਸਥਾਨਕ ਧਨਾਢਾਂ ਤੇ ਰਾਜਨੀਤੀਵਾਨਾਂ ਵਲੋਂ ਇਸ ਪ੍ਰਾਜੈਕਟ ਨੂੰ ਉਸਾਰਨ ਵਿਚ ਕੀਤੇ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ਭਰਿਸ਼ਟਾਚਾਰ ਉਤੇ ਵੀ ਕਾਫੀ ਹੱਦ ਤੱਕ ਰੋਕ ਲੱਗੇਗੀ।
ਗਿਲਗਿਤ-ਬਾਲਟਿਸਤਾਨ ਦੇ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸ਼ਨ ਵਲੋਂ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਦੇ ਹਾਕਮਾਂ ਦੇ ਇਸ਼ਾਰੇ 'ਤੇ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਇਹ ਹਮਲਾ ਸਾਥੀ ਬਾਬਾ ਜਾਨ 'ਤੇ ਉਸਦੇ ਸਾਥੀਆਂ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਨੂੰ ਦਬਾਅ ਨਹੀਂ ਸਕੇਗਾ। ਅਵਾਮੀ ਵਰਕਰਜ਼ ਪਾਰਟੀ ਦੀ ਸਥਾਨਕ ਇਕਾਈ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿਚ ਹੁੰਝਾ ਵਾਦੀ ਵਿਚ ਰੋਜ਼ਾਨਾ ਹੀ ਰੋਸ ਮੁਜ਼ਾਹਰੇ ਤੇ ਧਰਨੇ ਇਸ ਵਿਰੁੱਧ ਕੀਤੇ ਜਾ ਰਹੇ ਹਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚ ''ਤੇਰੀ ਜਾਨ, ਮੇਰੀ ਜਾਨ, ਬਾਬਾ ਜਾਨ-ਬਾਬਾ ਜਾਨ'' ਦਾ ਨਾਅਰਾ ਗੂੰਜ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਅਵਾਮੀ ਵਰਕਰਜ਼ ਪਾਰਟੀ ਸਮੁੱਚੇ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਵਿਚ ਇਸ ਮੁੱਦੇ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਮੁਹਿੰਮ ਚਲਾ ਰਹੀ ਹੈ। ਇਸ ਮੁਹਿੰਮ ਦੀਆਂ ਮੁੱਖ ਮੰਗਾਂ ਹਨ, ਬਾਬਾ ਜਾਨ ਅਤੇ ਉਸਦੇ ਸਾਥੀਆਂ ਨੂੰ ਫੌਰੀ ਰਿਹਾ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ, ਝੂਠੇ ਦੋਸ਼ਾਂ ਦੇ ਆਧਾਰ ਉਤੇ ਬਣਾਏ ਗਏ ਕੇਸ ਨੂੰ ਰੱਦ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ, 2010 ਦੇ ਮੁਜ਼ਾਹਰੇ ਉਤੇ ਗੋਲੀਬਾਰੀ, ਜਿਸ ਦੇ ਆਧਾਰ ਉਤੇ ਇਹ ਕੇਸ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ ਹੈ, ਬਾਰੇ ਜੁਡੀਸ਼ੀਅਲ ਕਮੀਸ਼ਨ ਦੀ ਰਿਪੋਰਟ ਨੂੰ ਜਨਤਕ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ ਅਤੇ ਗੋਲੀਬਾਰੀ ਕਰਕੇ ਬੇਦੋਸ਼ੇ 2 ਮੁਜ਼ਾਹਰਾਕਾਰੀਆਂ ਦੇ ਕਤਲ ਲਈ ਜਿੰਮੇਵਾਰ ਪੁਲਸ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਸਜ਼ਾਵਾਂ ਦਿੱਤੀਆਂ ਜਾਣ। ਇੱਥੇ ਇਹ ਵਰਣਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ 2010 ਵਿਚ ਹੀ ਜਨਤਕ ਦਬਾਅ ਥੱਲੇ ਇਸ ਗੋਲੀਬਾਰੀ ਲਈ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਤੈਅ ਕਰਨ ਲਈ ਇਕ ਜੁਡੀਸ਼ੀਅਲ ਕਮੀਸ਼ਨ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ ਸੀ, ਜਿਸਦੀ ਰਿਪੋਰਟ ਅਜੇ ਤੱਕ ਵੀ ਜਨਤਕ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਗਈ ਹੈ।

Saturday, 2 July 2016

ਸਾਹਿਤ ਤੇ ਸੱਭਿਆਚਾਰ (ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ-ਜੁਲਾਈ 2016)

ਏਕੇ ਦੀ ਮੌਤ
- ਗੁਲਜਾਰ ਸਿੰਘ ਸੰਧੂ

ਘਰ ਕੋਈ ਵੀ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਮੈਂ ਸਵੇਰ ਤੋਂ ਇਕਲਾ ਹੀ ਸਾਂ। ਮੇਰੀ ਨਿੱਕੀ ਭੈਣ ਆਪਣੀ ਸਹੇਲੀ ਦੇ ਘਰ ਗਈ ਹੋਈ ਸੀ। ਉਸ ਨੇ ਰਾਤ ਦੀ ਰੋਟੀ ਬਨਾਉਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਆਉਣਾ ਸੀ, ਇਸ ਲਈ ਉਸ ਦੇ ਆਉਣ ਵਿਚ ਵੀ ਦੇਰ ਸੀ। ਮੈਨੂੰ ਇਕੱਲਤਾ ਮਹਿਸੂਸ ਹੋ ਰਹੀ ਸੀ।
ਭੈਣ ਮੁੜ ਕਿਉਂ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦੀ। ਮੈਂ ਆਪ ਹੀ ਕਿਸੇ ਦੇ ਕਿਉਂ ਨਾ ਹੋ ਆਵਾਂ? ਮੈਨੂੰ ਇਕੱਲਾਪਨ ਓਪਰਾ-ਓਪਰਾ ਲਗ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਕਦੀ ਕਦੀ ਮੇਰੇ ਮਿੱਤਰ ਦੇ ਬੱਚੇ ਖੇਡਣ ਆ ਜਾਂਦੇ ਸਨ ਅੱਜ ਉਹ ਵੀ ਨਹੀਂ ਸਨ ਆਏ। ਮੇਰਾ ਚਾਹ ਪੀਣ ਨੂੰ ਜੀਅ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਪਰ ਇਕੱਲੇ ਨੂੰ ਚਾਹ ਦਾ ਕੀ ਸਵਾਦ। ਕੋਈ ਆ ਜਾਂਦਾ ਤਾਂ ਚਾਹ ਹੀ ਬਣਾ ਕੇ ਪੀਂਦੇ।
ਮੈਂ ਕਿਸੇ ਦੇ ਆਉਣ ਦੀ ਆਸ ਦੇ ਤਣਾਓ ਬਾਰੇ ਸੋਚ ਹੀ ਰਿਹਾ ਸੀ ਕਿ ਪੌੜੀਆਂ ਵਿਚ ਕਿਸੇ ਦੇ ਆਉਣ ਦੀ ਬਿੜਕ ਆਈ। ਮੈਂ ਵੇਖਿਆ ਦੀਪੀ ਤੇ ਸਵੀਰਾ ਸਨ। ਛਿਨ ਭਰ ਮੈਨੂੰ ਯਕੀਨ ਨਾ ਆਇਆ ਕਿ ਕੋਈ ਆਇਆ ਹੈ।
ਸੁਦੀਪ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਮੈਂ ਦੀਪੀ ਕਹਿ ਕੇ ਬੁਲਾਉਂਦਾ ਹਾਂ, ਅੱਗੇ ਅੱਗੇ ਸੀ ਤੇ ਸਵੀਰਾ ਉਸ ਦੇ ਨਾਲ ਨਾਲ ਜ਼ਰਾ ਪਿੱਛੇ। ਮੈਨੂੰ ਵੇਖ ਕੇ ਉਹ ਮੁਸਕਰਾਈਆਂ ਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਵੇਖ ਕੇ ਮੈਂ।
ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਪਾਪਾ ਨੇ ਕੋਈ ਸੁਨੇਹਾ ਭੇਜਿਆ ਹੋਵੇਗਾ ਤੇ ਜੋ ਕੁਝ ਕਹਿਣਾ ਸੀ ਕਹਿ ਕੇ ਤੁਰ ਜਾਣਗੀਆਂ। ਮੈਂ ਡਰ ਜਿਹਾ ਗਿਆ। ਮੈਂ ਮੁੜ ਇਕੱਲਾ ਨਹੀਂ ਸੀ ਹੋਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ।
ਇਕੱਲੇ ਟੁੱਟਣ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਆਉਣ ਦੀ ਇਕ ਹੋਰ ਵੀ ਖੁਸ਼ੀ ਸੀ। ਦੋਵੇਂ ਆਮ ਬੱਚਿਆਂ ਨਾਲੋਂ ਚੁਸਤ ਤੇ ਸੁਚੇਤ ਸਨ। ਦੀਪੀ ਘੋਖੀ ਤੇ ਸੂਝਵਾਨ ਸੀ, ਸਵੀਰਾ ਚੇਤੰਨ ਤੇ ਸ਼ਰਾਰਤੀ। ਆਪਣੇ ਮਾਪਿਆਂ ਨਾਲ ਉਹ ਕਈ ਵਾਰੀ ਮੇਰੇ ਘਰ ਆਈਆਂ ਸਨ ਤੇ ਮੈਨੂੰ ਕੋਈ ਵੀ ਅਜਿਹਾ ਪਲ ਚੇਤੇ ਨਹੀਂ ਸੀ ਜਿਸ ਨੂੰ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਾਰਤਾਂ ਨੇ ਬੇਸੁਆਦ ਕੀਤਾ ਹੋਵੇ। ਆਮ ਬੱਚਿਆਂ ਵਾਂਗ ਦਗੜ-ਦਗੜ ਪੌੜੀਆਂ ਚੜ੍ਹਦੇ-ਉਤਰਦੇ ਰਹਿਣਾ, ਘਰ ਦੇ ਬਾਹਰਲੇ ਦਰਵਾਜ਼ੇ ਨਾਲ ਝੂਟਣਾ, ਰਾਹ ਜਾਂਦੇ ਰਾਹੀ ਤੇ ਪਾਣੀ ਡੋਲ੍ਹ ਦੇਣਾ, ਜੇ ਹੋਰ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਕੋਠੇ ਚੜ੍ਹ ਕੇ ਛੱਤ ਉਤੇ ਹੀ ਠੋਕਾ ਠਾਕੀ ਕਰਦੇ ਰਹਿਣਾ, ਦੀਪੀ ਦੇ ਸਵੀਰਾ ਦਾ ਸੁਭਾਅ ਨਹੀਂ ਸੀ ਜਾਂ ਇਉਂ ਕਹਿ ਲਵੋ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਏਸ ਗਲ ਦਾ ਗਿਆਨ ਨਹੀਂ ਸੀ ਕਿ ਓਪਰੇ ਘਰ ਕਿਵੇਂ ਬੈਠੀਦਾ ਹੈ।
''ਆਪਾਂ ਚਾਹ ਬਣਾ ਕੇ ਪੀਆਂਗੇ, ਜਾਇਓ ਨਾ'' ਮੈਂ ਏਨਾ ਕਹਿ ਕੇ ਆਪਦੇ ਲੈਟਰ ਬਕਸ ਵਿਚ ਡਾਕ ਦੇਖਣ ਉਤਰ ਗਿਆ।
ਡਾਕ ਲੈਣ ਗਿਆਂ ਮੈਨੂੰ ਇਕ ਪੁਰਾਣੀ ਘਟਨਾ ਚੇਤੇ ਆ ਗਈ। ਇਕ ਦਿਨ ਸਵੇਰੇ ਮੈਂ ਤੇ ਮੇਰਾ ਮਿੱਤਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਘਰ ਸੋਫ਼ੇ ਉਤੇ ਬੈਠੇ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਮਿੱਤਰ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਕਰ ਕੇ ਹੱਸ ਰਹੇ ਸਾਂ ਕਿ ਘਰ ਦੇ ਸ਼ਾਂਤ ਵਾਯੂ ਮੰਡਲ ਵਿਚ ਵਾਵਰੋਲੇ ਦੇ ਆਉਣ ਵਾਂਗ ਦਰਵਾਜ਼ੇ ਖਿੜਕੀਆਂ ਖੜਕਣੇ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋ ਗਏ।
ਦੀਪੀ ਤੇ ਸਵੀਰਾ ਲੜ ਪਈਆਂ ਸਨ। ਦੀਪੀ ਨੇ ਸਵੀਰਾ ਦੇ ਥੱਪੜ ਮਾਰ ਕੇ ਸਾਡੇ ਕਮਰੇ ਵਿਚ ਆ ਕੇ ਏਧਰੋਂ ਕੁੰਡੀ ਮਾਰ ਲਈ ਸੀ। ਸਵੀਰਾ ਨੇ ਹੱਥ ਵਿਚ ਲੋਹੇ ਦਾ ਗਿਲਾਸ ਚੁੱਕਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ ਤੇ ਉਹ ਦਰਵਾਜ਼ੇ ਦੇ ਸ਼ੀਸ਼ੇ ਪਿੱਛੇ ਖੜੀ ਕੁੰਡੀ ਖੋਲ੍ਹਣ ਲਈ ਕਹਿ ਰਹੀ ਸੀ। ਉਸ ਦੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਵਿਚੋਂ ਪਰਲ ਪਰਲ ਹੰਝੂ ਵਗ ਰਹੇ ਸਨ ਤੇ ਇੰਜ ਜਾਪਦਾ ਸੀ ਕਿ ਜੇ ਕੁੰਡੀ ਇਕ ਅੱਧ ਮਿੰਟ ਹੋਰ ਨਾ ਖੁੱਲ੍ਹੀ ਤਾਂ ਉਹ ਲੋਹੇ ਦੇ ਗਲਾਸ ਨਾਲ ਦਰਵਾਜ਼ੇ ਦਾ ਸ਼ੀਸ਼ਾ ਭੰਨ ਸੁੱਟੇਗੀ। ਮੈਂ ਸ਼ੀਸ਼ਾ ਟੁੱਟਣ ਤੋਂ ਏਦਾਂ ਡਰ ਰਿਹਾ ਸਾਂ ਜਿਵੇਂ ਕੋਈ ਲਾਮ ਲੱਗਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਦੀ ਅਵਸਥਾ ਤੋਂ ਡਰਦਾ ਹੈ। ਮੇਰਾ ਮਿੱਤਰ ਸਾਡੇ ਸਾਂਝੇ ਮਿੱਤਰ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਕਰਕੇ ਉਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕਹਿਕਹੇ ਮਾਰ ਕੇ ਹੱਸ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਉਸ ਦੇ ਚਿੱਤ-ਚੇਤੇ ਵੀ ਨਹੀਂ ਸੀ ਕਿ ਘਰ ਵਿਚ ਤਣਾਓ ਵੱਧ ਗਿਆ ਹੈ। ਮੈਂ ਦੀਪੀ ਨੂੰ ਕਿਹਾ ਕਿ ਦਰਵਾਜ਼ਾ ਖੋਲ੍ਹ ਦੇ ਪਰ ਮੇਰੇ ਮਿੱਤਰ ਨੇ ਕਿਹਾ ਸਭ ਆਪੇ ਹੀ ਠੀਕ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ।
ਉਮਰ ਵਿਚ ਭਾਵੇਂ ਦੀਪੀ ਵੱਡੀ ਸੀ, ਪਰ ਵੇਖਣ ਨੂੰ ਦੋਵੇਂ ਇਕੋ ਜਿੱਡੀਆਂ ਹੀ ਸਨ। ਕੁਝ ਏਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜਿਵੇਂ ਜੌੜੀਆਂ ਹੋਣ। ਹਾਣੀ ਬੱਚਿਆਂ ਵਾਂਗ ਉਹ ਆਪੋ ਵਿਚ ਲੜੇ ਬਿਨਾਂ ਵੀ ਨਹੀਂ ਸੀ ਰਹਿ ਸਕਦੀਆਂ।
ਮੇਰੇ ਮਿੱਤਰ ਨੇ ਮੈਨੂੰ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਪਿਛਲੇ ਦਸਾਂ ਮਿੰਟਾਂ ਤੋਂ ਦੋਵੇਂ ਕੁੜੀਆਂ ਇਕ ਦੂਜੀ ਦੀਆਂ ਸਾਂਗਾਂ ਲਾ ਰਹੀਆਂ ਸਨ। ਹੁਣੇ ਹੁਣੇ ਠੁੱਠ ਵਖਾ ਕੇ ਦੀਪੀ ਨੇ ਸਵੀਰਾ ਨੂੰ ਵੰਗਾਰਿਆ ਸੀ। ਛਿੰਨ ਭਰ ਚੁੱਪ ਰਹਿ ਕੇ ਸਵੀਰਾ ਨੇ ਸਰ੍ਹਾਣੇ ਪਈ ਫਾਈਲ ਵਿਚੋਂ ਇਕ ਸੱਜ ਵਿਆਹੀ ਬਹੂ ਦੀ ਤਸਵੀਰ ਦੀਪੀ ਨੂੰ ਵਿਖਾ ਕੇ ਪਾੜ ਦਿੱਤੀ ਸੀ। ਦੀਪੀ ਨੂੰ ਤਸਵੀਰਾਂ ਇਕੱਠੀਆਂ ਕਰਨ ਦਾ ਸ਼ੌਕ ਸੀ ਅਤੇ ਇਹ ਉਸ ਦੀ ਤਸਵੀਰਾਂ ਦੀ ਸੱਜਰੀ ਫਾਈਲ ਸੀ।
ਸਜ ਵਿਆਹੀ ਬਹੂ ਦੀ ਤਸਵੀਰ ਦੀਪੀ ਨੂੰ ਖਾਸ ਪਿਆਰੀ ਸੀ। ਇਹ ਉਸ ਨੇ ਇਸਤਰੀਆਂ ਦੇ ਕਿਸੇ ਪੁਰਾਣੇ ਰਸਾਲੇ ਵਿਚੋਂ ਲੱਭ ਕੇ ਲਿਆਂਦੀ ਸੀ।
ਮੇਰੇ ਮਿੱਤਰ ਦਾ ਖ਼ਿਆਲ ਸੀ ਕਿ ਸਵੀਰਾ ਨੂੰ ਤਸਵੀਰ ਨਹੀਂ ਸੀ ਫਾੜਨੀ ਚਾਹੀਦੀ। ਇਸ ਲਈ ਜੇ ਦੀਪੀ ਨੇ ਸਵੀਰਾ ਨੂੰ ਮਾਰ ਕੇ ਦਰਵਾਜ਼ੇ ਦੀ ਕੁੰਡੀ ਲਾ ਦਿੱਤੀ ਸੀ ਤਾਂ ਠੀਕ ਹੀ ਕੀਤਾ ਸੀ। ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਗੱਲਾਂ ਕਰਦਾ ਉਹ ਸਾਰੀ ਲੀਲ੍ਹਾ ਦੇਖਦਾ ਰਿਹਾ ਸੀ ਜਿਸ ਤੋਂ ਮੈਂ ਉੱਕਾ ਹੀ ਅਚੇਤ ਸਾਂ।
ਧੀਆਂ ਦੇ ਸੁਭਾਅ ਤੋਂ ਜਾਣੂ ਮੇਰੇ ਮਿੱਤਰ ਨੂੰ ਇਹ ਡਰ ਵੀ ਨਹੀਂ ਸੀ ਸ਼ੀਸ਼ਾ ਟੁੱਟ ਜਾਵੇਗਾ ਤੇ ਇਸ ਦਾ ਕੱਚ ਕਿਸੇ ਬੱਚੇ ਦੇ ਚੁੱਭ ਕੇ ਕਮਰੇ ਨੂੰ ਲਹੂ ਲੁਹਾਨ ਕਰ ਦੇਵੇਗਾ।
ਸਵੀਰਾ ਦਾ ਤਸਵੀਰ ਪਾੜਨਾ ਭਾਵੇਂ ਠੀਕ ਨਹੀਂ ਸੀ ਪਰ ਦੀਪੀ ਨੂੰ ਖਿਝਾਉਣ ਦਾ ਇਹ ਤਰੀਕਾ ਨਵੇਕਲਾ ਜ਼ਰੂਰ ਸੀ। ਇਹ ਸਵੀਰਾ ਦੀ ਸ਼ਰਾਰਤੀ ਸੂਝ ਦਾ ਸਬੂਤ ਸੀ। ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਮਿੱਤਰ ਕੋਲ ਉਸ ਦੀ ਮੌਲਿਕ ਸੂਝ ਦੀ ਸ਼ਲਾਘਾ ਕੀਤੀ।
ਆਪਣੀ ਸੂਝ ਦੀ ਸਿਫਤ ਸੁਣ ਕੇ ਸਵੀਰਾ ਦਾ ਗੁੱਸਾ ਢਲ ਗਿਆ ਤੇ ਉਸ ਨੇ ਗਲਾਸ ਇਕ ਪਾਸੇ ਸੁੱਟ ਕੇ ਅੱਖਾਂ ਪੂੰਝ ਲਈਆਂ। ਦੀਪੀ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਸੰਤੁਸ਼ਟ ਸੀ ਕਿ ਉਸ ਨੇ ਥੱਪੜ ਮਾਰ ਕੇ ਬਦਲਾ ਲੈ ਹੀ ਲਿਆ ਸੀ। ਮੇਰੇ ਬੈਠਿਆਂ ਬੈਠਿਆਂ ਉਹ ਮੁੜ ਆਪੋ ਆਪਣੀ ਪੁਸਤਕ ਪੜ੍ਹਨ ਲੱਗ ਪਈਆਂ।
ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਡਾਕ ਲੈ ਕੇ ਵਾਪਸ ਆਇਆ ਤਾਂ ਚਾਹ ਵਾਲੀ ਕੇਤਲੀ ਵਿਚ ਪਾਣੀ ਉਬਲ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਦੀਪੀ ਰਸੋਈ ਵਿਚੋਂ ਚਾਹ ਪੱਤੀ ਵਾਲਾ ਡੱਬਾ ਲੱਭ ਰਹੀ ਸੀ ਤੇ ਸਵੀਰਾ ਚੀਨੀ। ਮੈਥੋਂ ਹੇਠਾਂ ਜਾਂਦੇ ਦੇ ਮੂੰਹੋ ਨਿਕਲ ਗਿਆ ਸੀ ਕਿ ਚਾਹ ਬਣਾ ਕੇ ਪੀਆਂਗੇ, ਜਾਣਾ ਨਾ। ਮੇਰਾ ਸਮਾਂ ਤੇ ਘਾਲਣਾ ਬਚਾਉਣ ਦੇ ਭਾਵ ਨਾਲ ਉਹ ਕਿਵੇਂ ਇਕ ਜਾਨ ਹੋ ਕੇ ਕੰਮ ਕਰ ਰਹੀਆਂ ਸਨ। ਮੈਂ ਹੈਰਾਨ ਰਹਿ ਗਿਆ।
''ਵਾਹ ਬਈ ਵਾਹ'', ਮੈਂ ਖੁਸ਼ੀ  ਵਿਚ ਚੌਗੁਣਾ ਹੋ ਕੇ ਕਿਹਾ।
''ਚਾਹ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਕਿੱਥੇ ਹੈ?'' ਦੀਪੀ ਬੋਲੀ ਤੇ ''ਚੀਨੀ ਕਿੱਥੇ ਹੈ?'' ਸਵੀਰਾ ਨੇ ਪੁੱਛਿਆ।
ਜਿਵੇਂ ਇਕ ਜਾਨ ਤੇ ਆਤਮਾ ਹੋ ਕੇ ਉਹ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਚਾਹ ਬਣਵਾ ਰਹੀਆਂ ਸਨ, ਉਸ ਤੋਂ ਮੇਰੇ ਮਨ ਵਿਚ ਕਈ ਸ਼ੰਕੇ ਪੈਦਾ ਹੋਏ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਮੰਮੀ ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕੁੱਟ ਕੇ ਘਰੋਂ ਕੱਢ ਦਿੱਤਾ ਏ ਤੇ ਜਾਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਕੀ ਮੰਮੀ ਤੇ ਪਾਪਾ ਦੀ ਆਪੋ ਵਿਚ ਕੋਈ ਇਹੋ ਜਿਹੀ ਗੱਲ ਹੋ  ਗਈ ਏ ਜਿਸ ਲਈ ਮੇਰੀ ਹਾਜ਼ਰੀ ਜ਼ਰੂਰੀ ਏ, ਪਰ ਕਿਸੇ ਕਾਰਨ ਉਹ ਕੁੱਝ ਦਸਦੀਆਂ ਨਹੀਂ ਸਨ। ਕੁੜੀਆਂ ਹਨ ਸੋਚ ਸਮਝ ਕੇ ਗੱਲ ਕਰਨੀ ਚਾਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ, ਮੈਂ ਸੋਚਿਆ।
''ਤੁਹਾਡੇ ਪਾਪਾ ਕੀ ਕਰ ਰਹੇ ਨੇ?'' ਮੈਂ ਘੋਖਵਾਂ ਪ੍ਰਸ਼ਨ ਕੀਤਾ।
''ਪਤਾ ਨਹੀਂ।'' ਉਨ੍ਹਾਂ ਇਕੋ ਸਾਹ ਉਤਰ ਦਿੱਤਾ।
''ਉਹ ਘਰ ਹੀ ਨੇ?'' ਮੈਂ ਅਗਲਾ ਸਵਾਲ ਕੀਤਾ।
''ਘਰ ਹੀ ਹੋਣੇ ਨੇ'' ਦੀਪੀ ਨੇ ਕਿਹਾ ਤੇ ''ਸਾਨੂੰ ਕੀ ਪਤੈ?'' ਸਵੀਰਾ ਬੋਲੀ।
''ਤੁਸੀਂ ਘਰੋਂ ਨਹੀਂ ਆਈਆਂ ਉਂ''
''ਨਹੀਂ ਤਾਂ।''
''ਸਿਨਮੇ ਗਈਆਂ ਸੀ?''
''ਨਹੀਂ।''
''ਘਰ ਵਿਚ ਸੁਖ ਹੈ?'' ਮੈਂ ਹੱਸ ਕੇ ਕਿਹਾ।
''ਕਿਉਂ? ਸੁਖ ਹੀ ਹੋਣੀ ਏ?''
ਮੈਂ ਜਿਹੜਾ ਵੀ ਪ੍ਰਸ਼ਨ ਕਰਦਾ ਸੀ ਉਹ ਦੋਵੇਂ ਉਸ ਦਾ ਇਕੋ ਉਤਰ ਦਿੰਦੀਆਂ ਸਨ।
''ਤੁਸੀਂ ਘਰੋਂ ਨਹੀਂ ਆਈਆਂ-ਜਾਪਦੀਆਂ। ਕਿੱਥੇ ਗਈਆਂ ਸੀ?'' ਮੈਂ ਚਾਹ ਪਾਉਂਦੇ ਨੇ ਪੁੱਛਿਆ।
''ਕਰੋਲ ਬਾਗ'' ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸਾਂਝਾ ਉਤਰ ਦਿੱਤਾ। ਤੇ ਖਿੜਖਿੜਾ ਕੇ ਹੱਸ ਪਈਆਂ।
ਮੈਂ ਚਾਹ ਪਾਉਂਦੇ ਨੇ ਪੁੱਛਿਆ। ''ਕਰੋਲ ਬਾਗ ਕੀ ਸੀ?''
''ਕੁੱਝ ਵੀ ਨਹੀਂ।''
''ਕੁੱਝ ਤਾਂ ਹੋਵੇਗਾ।''
ਹੁਣ ਉਹ ਇਕ ਦੂਜੇ ਦੇ ਮੂੰਹ ਵੱਲ ਵੇਖਣ ਲੱਗ ਪਈਆਂ ਜਿਵੇਂ ਬਿਆਨ ਬਦਲ ਜਾਣ ਤੋਂ ਡਰ ਰਹੀਆਂ ਹੋਣ।
ਫੇਰ ਥੋੜ੍ਹਾ ਜਿਹਾ ਝੱਕ ਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੱਸ ਹੀ ਦਿੱਤਾ।
ਉਹ ਸਵੇਰ ਦੀਆਂ ਘਰੋਂ ਤੁਰੀਆਂ ਹੋਈਆਂ ਸਨ। ਮੇਰੇ ਮਿੱਤਰ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜੇਬ ਖਰਚ ਦੇ ਕੇ ਘੁੰਮਣ ਦੀ ਛੁੱਟੀ ਦੇ ਦਿੱਤੀ ਸੀ। ਮਾਪਿਆਂ ਤੋਂ ਦੂਰ ਆਪਣੇ ਆਪ ਜਿਧਰ ਜੀਅ ਆਏ ਘੁੰਮਦੇ ਰਹਿਣ ਨਾਲ ਬੱਚੇ ਦਾ ਸਵੈ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਵਧਦਾ ਹੈ, ਮੇਰੇ ਮਿੱਤਰ ਦਾ ਵਿਚਾਰ ਸੀ।
ਫੇਰ ਕੀ ਸੀ। ਉਹ ਬਸ ਚੜ੍ਹ ਕੇ ਇੰਡੀਆ ਗੇਟ ਚਲੀਆਂ ਗਈਆਂ। ਸਭ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਈਸ ਕਰੀਮ ਖਾਧੀ। ਫੇਰ ਇੰਡੀਆ ਗੇਟ ਪਾਣੀ ਦੀਆਂ ਨਹਿਰਾਂ ਦੇ ਕੰਢੇ ਖੇਡਦੀਆਂ ਰਹੀਆਂ ਤੇ ਫੇਰ ਬੱਚਿਆਂ ਦੇ ਪਾਰਕ ਵਿਚ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਭੁੱਖ ਲੱਗ ਆਈ। ਪਰ ਖਾਣ ਲਈ ਲਿਆਂਦੇ ਪੈਸਿਆਂ ਦੀ ਉਹ ਆਈਸਕਰੀਮ ਖਾ ਬੈਠੀਆਂ ਸਨ। ਇਕ ਇਕ ਚਾਕ ਬਾਰ ਤੇ ਇਕ ਇਕ ਆਰੈਂਜ। ਹੁਣ ਉਨ੍ਹਾਂ ਕੋਲ ਬਸ ਦਾ ਕਿਰਾਇਆ ਹੀ ਰਹਿ ਗਿਆ ਸੀ। ਭੁੱਖ ਤਾਂ ਦੀਪੀ ਨੂੰ ਵੀ ਲੱਗੀ ਹੋਈ ਸੀ। ਪਰ ਉਹ ਵੱਡੀ ਹੋਣ ਦੇ ਨਾਤੇ ਬਸ ਦੇ ਕਿਰਾਏ ਨੂੰ ਬਚਾ ਕੇ ਰੱਖਣਾ ਆਪਣੀ ਜਿੰਮੇਵਾਰੀ ਸਮਝਦੀ ਸੀ। ਸਵੀਰਾ ਦੇ ਮੂੰਹੋਂ ਸੁਝਾਅ ਨਿਕਲਣ ਦੀ ਦੇਰ ਸੀ ਕਿ ਦੀਪੀ ਨੇ ਦੋ ਦੋ ਆਨੇ 'ਚਨਾ ਜ਼ੋਰ ਗਰਮ' ਦੇ ਲੇਖੇ ਲਾ ਦਿੱਤੇ। ਮਸਾਲੇਦਾਰ ਛੋਲੇ ਖਾ ਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਹੋਰ  ਛੋਲੇ ਖਾਣ ਨੂੰ ਜੀਅ ਕਰ ਆਇਆ ਤੇ ਫੇਰ ਹੋਰ ਖਾਣ ਨੂੰ। ਸਭ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ  ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਬਾਰਾਂ ਆਨੇ ਬਚਾ ਕੇ ਰੱਖੇ ਸਨ ਤੇ ਫੇਰ ਅੱਠ ਆਨੇ। ਇਹ ਸੋਚ ਕੇ ਕਿ ਚਾਰ ਚਾਰ ਆਨੇ ਵਿਚ ਜਿੱਥੋਂ ਤੱਕ ਬੱਸ ਲੈ ਆਵੇਗੀ ਠੀਕ ਹੈ ਬਾਕੀ ਤੁਰ ਕੇ ਚਲੇ ਜਾਣਗੀਆਂ। ਉਂਝ  ਇੰਡੀਆ ਗੇਟ ਕੋਲੋਂ ਰਾਜਿੰਦਰ ਨਗਰ ਦੇ ਚਾਰ ਚਾਰ ਆਨੇ ਲੱਗਦੇ ਸਨ। ਜਦੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਹੋਰ ਖਾਣ ਨੂੰ ਜੀਅ ਕੀਤਾ ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕੇਵਲ ਚੁਆਨੀ ਦਾ ਸਫਰ ਬੱਸ ਰਾਹੀਂ ਤੇ ਬਾਕੀ ਪੈਦਲ ਕਰਨ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕਰਕੇ ਇਕ ਚੁਆਨੀ ਹੋਰ ਖਰਚ ਲਈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸੋਚਿਆ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਪਾਪਾ ਕਈ ਵਾਰੀ ਦਫਤਰੋਂ ਬੱਸ ਲਏ ਬਿਨਾਂ ਹੀ ਤੁਰ ਕੇ ਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਤੇ ਪਾਪਾ ਦਾ ਦਫਤਰ ਇੰਡੀਆ ਗੇਟ ਤੋਂ ਅੱਧਾ ਪੌਣਾ ਮੀਲ ਹੀ ਸੀ। ਦੋਹਾਂ ਨੇ ਪਾਪਾ ਵਾਂਗ ਤੁਰ ਕੇ ਜਾਣ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕਰਕੇ ਰਹਿੰਦੇ ਪੈਸੇ ਵੀ ਖਰਚ ਲਏ।
ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਇਸ ਫੁਰਨੇ ਦਾ ਬੜਾ ਚਾਅ ਸੀ। ਇਸ ਘੜੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਬੁੱਧੀ ਤੇ ਏਕਾ ਸਿਖਰ ਉਤੇ ਸੀ। ਉਹ ਇਕ ਦੂਜੇ ਦੇ ਸਾਹ ਵਿਚ ਸਾਹ ਲੈਂਦੀਆਂ ਸਨ। ਦੀਪੀ ਦਾ ਕਿਹਾ ਸਵੀਰਾ ਮੰਨ ਲੈਂਦੀ ਤੇ ਸਵੀਰਾ ਦਾ ਕਿਹਾ ਦੀਪੀ। ਜਿਸ ਚਾਅ ਤੇ ਖੁਸ਼ੀ ਨਾਲ ਉਹ ਬਿਰਤਾਂਤ ਸੁਣਾ ਰਹੀਆਂ ਸਨ ਉਸ ਤੋਂ ਇਹ ਕੁੱਝ ਪ੍ਰਤੱਖ ਸੀ। ਦੋ ਮੂੰਹਾਂ ਦਾ ਬੋਲਿਆ ਇਕੋ ਮੂੰਹ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਜਾਪਦਾ ਸੀ। ਮੈਂ ਗਲਾਂ ਸੁਣ ਸੁਣ ਕੇ ਹੈਰਾਨ ਵੀ ਹੋ ਰਿਹਾ ਸੀ ਤੇ ਖੁਸ਼ ਵੀ।
ਮੇਰੇ ਮਿੱਤਰ ਦੇ ਦਫਤਰੋਂ ਉਸ ਦਾ ਘਰ ਸ਼ੰਕਰ ਰੋਡ ਰਾਹੀਂ ਢਾਈ ਮੀਲ ਸੀ। ਪਰ ਰਸਤੇ ਵਿਚ ਉਜਾੜ ਪਈ ਸੀ। ਦੂਜਾ ਮੋੜਾ ਘੋੜਾਂ ਵਾਲਾ ਰਾਹ ਪੰਜ ਛੇ ਮੀਲ ਪੈਂਦਾ ਸੀ। ਦੱਸਣ ਵਾਲੇ ਵੀ ਇਕੋ ਵਾਰੀ ਰਸਤਾ ਨਹੀਂ ਸੀ ਸਮਝਾ ਸਕਦੇ। ਬੱਚਿਆਂ ਦਾ ਵੀ ਬਹੁਤਾ ਪੁੱਛਿਆ ਸਵੈਮਾਨ ਘਟਦਾ ਸੀ। ਉਹ ਰਾਜਿੰਦਰ ਨਗਰ ਨੂੰ ਆਉਣ ਵਾਲੀਆਂ ਬੱਸਾਂ ਦਾ ਨੰਬਰ ਚੇਤੇ ਕਰਕੇ ਪਿੱਛੇ-ਪਿੱਛੇ ਤੁਰਦੀਆਂ ਚਲੀਆਂ ਆਈਆਂ ਸਨ। ਇਕ ਬੱਸ ਜਾਂਦੀ ਦੂਜੀ ਆ ਜਾਂਦੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕਿਧਰੇ ਰੁਕਣਾ ਨਹੀਂ ਸੀ ਪਿਆ। ਮੇਰੇ ਘਰ ਦੇ ਨੇੜੇ ਪਹੁੰਚ ਕੇ ਹੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਇੰਜ ਲੱਗਿਆ ਸੀ ਕਿ ਉਹ ਮੰਜ਼ਿਲ 'ਤੇ ਅੱਪੜ ਗਈਆਂ ਹਨ। ਮੇਰੇ ਮਿੱਤਰ ਦਾ ਘਰ ਮੇਰੇ ਘਰ ਦੇ ਬਹੁਤ ਨੇੜੇ ਸੀ।
ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਚਿਹਰੇ ਉਤੇ ਥਕਾਵਟ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਕੁਝ ਗਰਮੀ, ਕੁਝ ਚਾਅ ਤੇ ਕੁਝ ਮੰਤਵ ਦੀ ਪੂਰਤੀ ਦੇ ਨਸ਼ੇ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਗੱਲ੍ਹਾਂ ਲਾਲ ਹੋਈਆਂ ਪਈਆਂ ਸਨ। ਸਵੀਰਾ ਗੱਲ ਕਰਦੀ ਸੀ ਤਾਂ ਉਸ ਦੇ ਚਿਹਰੇ ਦੀਆਂ ਰਗਾਂ ਉਭਰ ਆਉਂਦੀਆਂ ਸਨ। ਦੀਪੀ ਦੀ ਗੱਲ ਤਾਂ ਮੂੰਹ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਸਾਹ ਰਗ ਦੀ ਫਰਕਣ ਤੋਂ ਸਾਫ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਸੀ। ਉਹ ਥੱਕੀਆਂ ਹੋਈਆਂ ਤਾਂ ਜਾਪਦੀਆਂ ਸਨ, ਪਰ ਹਾਰੀਆਂ ਹੋਈਆਂ ਨਹੀਂ। ਜਿੱਤ ਦੇ ਅਹਿਸਾਸ ਵਿਚ ਖੀਵੀਆਂ ਹੋਈਆਂ ਉਹ ਹਸੂੰ-ਹਸੂੰ ਚਿਹਰੇ ਲੈ ਕੇ ਘਰ ਨੂੰ ਚਲੀਆਂ ਗਈਆਂ।
ਮੇਰੀ ਇੱਕਲ ਟੁੱਟ ਚੁੱਕੀ ਸੀ। ਮੈਂ ਰੱਜਿਆ ਅਨੁਭਵ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸਾਂ। ਘਰ ਵਿਚ ਇਕ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੀ ਮਹਿਕ ਫੈਲ ਗਈ ਸੀ।
ਨਹਾ ਧੋ ਕੇ ਕੱਪੜੇ ਪਹਿਨ ਕੇ, ਜਦੋਂ ਸ਼ਾਮ ਦੀ ਸੈਰ ਲਈ ਨਿਕਲਿਆ ਤਾਂ ਮੈਨੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਮੰਮੀ ਮਿਲ ਪਈ।
''ਬੱਚਿਆਂ ਦਾ ਕੀ ਹਾਲ ਹੈ,'' ਮੈਂ ਪੁੱਛਿਆ, ''ਪਹੁੰਚ ਗਈਆਂ?''
''ਹਾਂ ਪਹੁੰਚ ਗਈਆਂ। ਮੇਰਾ ਤਾਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨਿਆਣਿਆਂ ਨੇ ਲਹੂ ਪੀ ਲਿਐ?'' ਉਹ ਬੋਲੀ।
ਮੈਨੂੰ ਉਸ ਦੀ ਗੱਲ ਕੁਝ ਸਮਝ ਨਾ ਆਈ ਤੇ ਮੈਂ ਉਹਦੇ ਮੂੰਹ ਵੱਲ ਤੱਕਣ ਲੱਗ ਪਿਆ।
''ਅਹਿ ਦੋ ਨਿਆਣੇ ਤਾਂ ਘਰੋਂ ਬਾਹਰ ਹੀ ਰਹਿਣ ਤਾਂ ਸੁਖ ਦਾ ਸਾਹ ਆਉਂਦੈ। ਹੁਣ ਬਾਹਰੋਂ ਆਈਐਂ ਤੇ ਹੁਣੇ ਮਾਰ-ਕੁਟਾਈ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋ ਗਈ ਐ।''
''ਅਜੇ ਹੁਣੇ ਤਾਂ ਮੇਰੇ ਕੋਲੋਂ ਗਈਆਂ ਨੇ ਚੰਗੀਆਂ ਭਲੀਆਂ''
''ਘਰ ਜਾ ਕੇ ਵੇਖ ਲੈ ਕਾਟ ਕਟੀਲਾ ਹੋਈਆਂ ਪਈਐਂ।''
ਮੇਰੇ ਮਿੱਤਰ ਦੀ ਵਹੁਟੀ ਏਨੀ ਕਹਿ ਕੇ ਚੁੱਪ ਹੋ ਗਈ।
ਘਰ ਪਹੁੰਚਦਿਆਂ ਹੀ ਕੁੜੀਆਂ ਦੇ ਮਨ ਵਿਚ ਬਾਹਰ ਦੇ ਡਰ ਤੋਂ ਪੈਦਾ ਹੋਏ ਏਕੇ ਦੀ ਮੌਤ ਹੋ ਚੁੱਕੀ ਸੀ।

 

ਕਵਿਤਾ
ਮੰਗਤ ਰਾਮ ਪਾਸਲਾ
 

ਜੀਅ ਤਾਂ ਮੇਰਾ ਵੀ ਕਰਦਾ ਸੀ,
ਸੰਗੀਆਂ ਸੰਗ ਯਾਤਰਾ 'ਤੇ ਜਾਵਾਂ।
ਮੁੰਜ ਵੱਟਣ ਤੇ ਨਾਲੇ ਦੇਵੀ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨਾਂ ਵਾਲੀ ਗਲ ਆ।
ਰਾਜੇ ਦੀ ਕ੍ਰਿਪਾ
ਗੱਡੀਆਂ ਭਰ ਭਰ ਜਾਂਦੀਆਂ ਨੇ ਗੁਰੂ ਦਰਸ਼ਨਾਂ ਲਈ।
ਪਰ ਸੁਣਿਆ ਹੈ
ਗੁਰੂ ਤਾਂ ਉਥੋਂ ਚਲੇ ਗਏ ਹਨ
ਵਿਹਲੇ ਵਹਿਣਾ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਕੰਮ ਨਹੀਂ।
ਕਿੱਧਰੇ ਲਾਲੋ ਤੇ ਭਾਗੋ ਦਾ ਪੰਗਾ,
ਕਿਤੇ ਹਿੰਦੂ ਮੁਸਲਿਮ ਦੰਗਾ।
ਰੋਕ ਰਿਹਾ ਹੋਣਾ ਗੁਰੂ ਸਾਡਾ।
ਜੇਲ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਚੱਕੀਆਂ ਵਿਚ
''ਸੱਜਣਾ'' ਦੀਆਂ ਠੱਗੀਆਂ ਨਾਲ ਲੋਹਾ ਲੈਂਦਾ,
ਬੰਦੇ ਬਹਾਦਰ ਨੂੰ ਹੌਂਸਲਾ ਦੇ ਰਿਹਾ ਹੋਵੇਗਾ।
ਬਸ ਕਿਤੇ ਸੱਚ ਦੀ ਬਾਣੀ
ਉਚਰਦਾ ਹੋਵੇਗਾ ਗੁਰੂ ਸਾਡਾ।
    ਇਹ ਯਾਤਰਾ ਕਿਸੇ ਬੁੱਢੇ ਦੀ ਪੈਨਸ਼ਨ ਦੀ ਕਟੌਤੀ ਜਾਂ
    ਮਰ ਰਹੇ ਬੱਚੇ ਦੀ ਦਵਾ ਦੇ ਘਪਲੇ 'ਚੋਂ ਨਿਕਲੀ ਜਾਪਦੀ ਹੈ
    ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚ ਕਿਸਾਨ ਸਿਰ ਚੜ੍ਹੇ ਕਰਜ਼ ਦੀਆਂ ਕਿਸ਼ਤਾਂ
    ਨਜ਼ਰ ਆਉਂਦੀਆਂ ਹਨ।
    ਡਾਂਗਾਂ ਖਾਂਦੀ ਡਿੱਗੀ ਮੁੱਟਿਆਰ ਦੇ ਪਰਸ 'ਚੋਂ
    ਡਿੱਗੇ ਨੋਟ ਦੀ ਚੋਰੀ
    ਹਾਕਮਾਂ ਨੂੰ ਹੀ ਭਾਉਂਦੀ ਹੈ।
    ਮੈਂ ਚੋਰਾਂ ਦਾ ਮਾਲ, ਡਾਂਗਾਂ ਦੇ ਭਾਅ ਕਿਉਂ ਲਵਾਂ!
    ਸੰਗਤ ਦਰਸ਼ਨ ਕਾਹਦੈ
    ਸੰਗਤਾਂ ਤਾਂ ਚੁਰਾਹੇ 'ਚ ਲਿਟੀਆਂ ਹੋਈਆਂ ਨੇ,
    ਜੀਉਂਦੀਆਂ ਪਰ ਅਧਮੋਈਆਂ ਨੇ।
    ਨੌਕਰੀ ਮੰਗਣ, ਇੱਜ਼ਤ ਦੀ ਰਾਖੀ ਲਈ ਅਰਜ਼ੀ ਦੇਣ,
    ਚਿੱਟਾ ਪੀਂਦੇ ਵੀਰੇ ਦੇ
    ਲੰਮੇ ਜੀਵਨ ਲਈ ਸੁੱਖ ਮੰਗਣ ਗਈਆਂ ਸਨ ਪਰ,
    ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਚੁਟਕਲੇ ਸੁਣਕੇ ਜਰਾ ਸ਼ਰਮਾ ਗਈਆਂ ਨੇ।
ਮੈਂ  ਯਾਤਰਾ ਤੇ ਕੀ ਜਾਣਾ,
ਸੰਗਤਾਂ ਸੰਗ ਬਹਿਕੇ
ਬਸ ਏਥੇ ਹੀ ਗੁਰੂ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਕਰ ਲਵਾਂਗਾ।
ਘਟ ਘਟ 'ਚ ਵਸਣ ਵਾਲਾ
ਸਾਥੋਂ ਕਿਤੇ ਅਲੋਪ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ?



ਗ਼ਜ਼ਲ
- ਮੱਖਣ ਕੁਹਾੜ

 ਉਹ ਲੋਕੀਂ ਜੋ ਕੱਲਿਆਂ ਕਰਕੇ, ਨਿੱਕੀ ਗੱਲ ਤੋਂ ਡਰ ਜਾਂਦੇ ਨੇ।
ਸਾਥ ਮਿਲੇ ਤਾਂ ਉਹ ਹੀ ਲੋਕੀਂ, ਹਰ ਬਿਪਤਾ ਸਰ ਕਰ ਜਾਂਦੇ  ਨੇ।
ਬਹੁਤੇ ਬੱਦਲ ਕਾਲ਼ੀ ਘਟ ਬਣ, ਸਾਗਰ 'ਤੇ ਹੀ ਵਰ੍ਹ ਜਾਂਦੇ ਨੇ।
ਛੋਟੇ ਹੁੰਦਿਆਂ ਵੀ ਕੁੱਝ ਬੱਦਲ, ਮਾਰੂਥਲ ਤਰ ਕਰ ਜਾਂਦੇ ਨੇ।
ਸੱਭ ਤੋਂ ਪੱਕੇ ਸਭ ਤੋਂ ਗਹਿਰੇ, ਸੱਚੇ-ਸੁੱਚੇ, ਪੀੜ ਦੇ ਰਿਸ਼ਤੇ,
ਇਹ ਰਿਸ਼ਤੇ ਜਦ ਜੁੜ ਜਾਂਦੇ ਨੇ, ਸਾਰੇ ਦਰਦ ਹੀ ਹਰ ਜਾਂਦੇ ਨੇ।
ਦਰਦ, ਗਮਾਂ ਦੇ ਹੰਝੂ ਹਾਉਕੇ, ਸਭ ਕੁਝ ਨਾਲੇ ਹੀ ਨੇ ਰੱਖਦੇ ,
ਕਹਿਣ ਨੂੰ ਲੋਕੀਂ ਖੁਸ਼ੀਆਂ ਵੰਡਣ, ਇਕ ਦੂਜੇ ਦੇ ਘਰ ਜਾਂਦੇ ਨੇ।
ਅਗਰ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ ਉਚੇੜੇ, ਮੁੜ ਮੁੜ ਨਾ ਉਸ ਥਾਂ ਤੋਂ ਛੇੜੇ,
ਕਿੰਨੇ ਗਹਿਰੇ ਹੋਣ ਜ਼ਖਮ ਫਿਰ, ਸਹਿਜੇ ਸਹਿਜੇ ਭਰ ਜਾਂਦੇ ਨੇ।
ਓਸ ਬਗੀਚੀ ਦੀ ਹਾਲਤ ਦਾ, ਮਾਲੀ ਹੀ ਤਾਂ ਦੋਸ਼ੀ ਹੁੰਦੈ।
ਜੋਬਨ ਰੁੱਤੇ ਜਿਸਦੇ ਪੱਤੇ ਪੀਲੇ ਪੈ ਕੇ ਝੜ ਜਾਂਦੇ ਨੇ।
ਪੰਛੀ ਜਿਹੜੇ ਉਡਣਾ ਲੋਚਣ, ਪਲ-ਪਲ ਅੰਬਰ ਦੇ ਵੱਲ ਝਾਕਣ,
ਉਡਣ ਤੋਂ ਜੋ ਡਰ ਜਾਂਦੇ ਨੇ, ਆਹਲਣਿਆਂ ਵਿਚ ਮਰ ਜਾਂਦੇ ਨੇ।
ਅੰਨ੍ਹੇ ਰਾਹ-ਦਸੇਰੇ, ਥਾਂ-ਥਾਂ, ਲਾਈ ਬੈਠੇ ਡੇਰੇ, ਥਾਂ-ਥਾਂ,
ਅੰਨ੍ਹੇ ਰਾਹੀ, ਅੰਨ੍ਹੇ ਰਾਹ ਤੁਰ, ਸਭ ਅੰਨ੍ਹੇ ਖੂਹ ਭਰ ਜਾਂਦੇ ਨੇ।
ਤੇਰਾ ਕੰਮ 'ਕੁਹਾੜ' ਹੈ ਲੜਨਾ, ਹਾਰਾਂ ਦੇ ਕੋਲੋਂ ਨਾ ਡਰਨਾ,
ਹਾਰਾਂ ਤੋਂ ਜੋ ਡਰ ਜਾਂਦੇ ਨੇ, ਹਰ ਹਾਲਤ ਉਹ ਹਰ ਜਾਂਦੇ ਨੇ।

ਜਨਤਕ ਲਾਮਬੰਦੀ (ਸੰਗਾਰਮੀ ਲਹਿਰ-ਜੁਲਾਈ 2016)

ਮਜ਼ਦੂਰ ਆਗੂ 'ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰਨ ਵਾਲਿਆਂ ਦਾ ਹੰਕਾਰ ਤੋੜਨ ਲਈ ਵਿਸ਼ਾਲ 'ਹੰਕਾਰ ਤੋੜ ਰੈਲੀ' 
ਲੰਘੀ 2 ਜੂਨ ਨੂੰ ਪਿੰਡ ਬੋੜਾਵਾਲ, ਤਹਿਸੀਲ ਬੁਢਲਾਡਾ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਮਾਨਸਾ ਵਿਖੇ ਪਿੰਡ ਦੇ ਸ਼੍ਰੋਮਣੀ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਦੇ ਸਰਪਚ ਦੇ ਹੰਕਾਰੇ ਮੁੰਡੇ ਅਤੇ ਉਸਦੇ ਜੋਟੀਦਾਰਾਂ ਨੇ ਮਨਰੇਗਾ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀ ਮੀਟਿੰਗ ਕਰਾਉਣ ਗਏ ਮਜ਼ਦੂਰ ਮੁਕਤੀ ਮੋਰਚਾ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਅਤੇ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ.(ਐਮ.ਐਲ) ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ ਦੇ ਸੂਬਾਈ ਆਗੂ ਸਾਥੀ ਭਗਵੰਤ ਸਿੰਘ ਸਮਾਓਂ 'ਤੇ ਜਾਨਲੇਵਾ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ। ਜੇ ਸਥਾਨਕ ਮਜ਼ਦੂਰ ਔਰਤਾਂ ਭਗਵੰਤ ਦੀ ਢਾਲ ਨਾ ਬਣਦੀਆਂ ਤਾਂ ਹਮਲਾਵਰਾਂ ਵਲੋਂ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਵਾਰ ਸਾਥੀ ਭਗਵੰਤ ਲਈ ਜਾਨਲੇਵਾ ਵੀ ਸਾਬਤ ਹੋ ਸਕਦਾ ਸੀ। ਇਹ ਹੰਕਾਰਗ੍ਰਸਤ ਮੁੰਡਾ ਪਹਿਲਾਂ ਵੀ ਪਿੰਡ ਦੇ ਕਈ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਕੁਟਮਾਰ ਅਤੇ ਬੇਇੱਜ਼ਤੀ ਕਰ ਚੁੱਕਾ ਹੈ। ਹਰ ਵੇਰ ਇਸ ਦੇ ਆਧੁਨਿਕ ਧ੍ਰਿਤਰਾਸ਼ਟਰ ਬਾਪ ਦੇ ਕਹੇ ਅਨੁਸਾਰ ਜ਼ਿਲ੍ਹੇ ਦੇ ਅਕਾਲੀ ਆਗੂਆਂ ਦੀਆਂ ਹਿਦਾਇਤਾਂ 'ਤੇ ਚਲਦਿਆਂ ਪੁਲਸ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨ ਇਸ ਵਿਰੁੱਧ  ਢੁੱਕਵੀਂ ਕਾਰਵਾਈ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ ਰਿਹਾ ਜਿਸ ਸਦਕਾ ਇਹ ਮੁੰਡਾ ਵੱਧ ਤੋਂ ਵਧੇਰੇ ਭੂਤਰਦਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਹਾਲੀਆ ਮਾਮਲੇ ਵਿਚ ਵੀ ਪਹਿਲਾਂ ਪੁਲਸ ਨੇ ਕੋਈ ਵੀ ਕਾਰਵਾਈ ਕਰਨ ਤੋਂ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕੰਨੀ ਕਤਰਾਈ। ਪਿਛੋਂ ਜਨਤਕ ਦਬਾਅ ਦੇ ਚਲਦਿਆਂ ਅਤੇ ਬਦਨਾਮੀ ਤੋਂ ਡਰਦਿਆਂ ਭਾਵੇਂ ਦੋਸ਼ੀ ਗ੍ਰਿਫਤਾਰ ਕਰ ਲਏ ਗਏ ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਜ਼ੁਰਮ ਅਨੁਸਾਰ ਬਣਦੀਆਂ ਧਾਰਾਵਾਂ ਖਾਸ ਕਰ ਧਾਰਾ 307 ਨਹੀਂ ਲਾਈ ਗਈ। ਨਾ ਤਾਂ ਇਹ ਪਹਿਲਾ ਹਮਲਾ ਹੈ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਪੁਲਸ ਦੀ ਪੱਖਪਾਤੀ ਪਹੁੰਚ ਕੋਈ ਨਵੀਂ ਗੱਲ ਹੈ। ਸੂਬਾ ਹਕੂਮਤ, ਪੁਲਸ ਦੀ ਦੋਸ਼ੀ ਬਚਾਊ ਕਾਰਗੁਜਾਰੀ ਅਤੇ ਧੜਵੈਲ ਅਕਾਲੀ ਆਗੂਆਂ ਵਲੋਂ ਜਾਬਰ ਗੁੰਡਾ ਹੱਲੇ ਨੂੰ ਮਜ਼ਦੂਰ-ਕਿਸਾਨ ਟਕਰਾਅ ਦਾ ਰੂਪ ਦੇਣ ਦੇ ਕੋਝੇ ਉਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਸ਼ਾਨਾਮੱਤੀ ਮੁਜਾਰਾ ਕਿਸਾਨ ਲਹਿਰ ਦਾ ਕੇਂਦਰ ਰਹੀ ਬੁਢਲਾਡਾ ਮੰਡੀ ਵਿਖੇ ਮਜ਼ਦੂਰ ਮੁਕਤੀ ਮੋਰਚਾ ਅਤੇ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ.(ਐਮ. ਐਲ.ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ) ਵਲੋਂ 10 ਜੂਨ ਨੂੰ ''ਹੰਕਾਰ ਤੋੜੋ ਰੈਲੀ'' ਕਰਨ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਅਤੇ ਇਹ ਰੈਲੀ ਨਾ ਕੇਵਲ ਹਾਜਰੀ ਪੱਖੋਂ ਸਫਲ ਰਹੀ ਬਲਕਿ ਭਵਿੱਖ 'ਚ ਇਸ ਦੇ ਖੱਬੀ ਜਮਹੂਰੀ ਲਹਿਰ ਦੇ ਵਾਧੇ ਲਈ ਅਨੇਕਾਂ ਹਾਂ ਪੱਖੀ ਪ੍ਰਭਾਵ ਵੀ ਵਿਚਾਰਨਯੋਗ ਹਨ।
ਸ਼੍ਰੋਮਣੀ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਨੇ ਨਾ ਕੇਵਲ ਇਸ ਰੈਲੀ ਦੇ ਸਮਾਨਅੰਤਰ ਰੈਲੀ ਕਰਨ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕਰ ਦਿੱਤਾ, ਬਲਕਿ ਵਿਧਾਨ ਸਭਾ ਹਲਕਾ ਬੁਢਲਾਡਾ ਦੇ ਦਲਿਤ ਵਿਧਾਇਕ ਚਤਿੰਨ ਸਿੰਘ ਸਮਾਉਂ, ਜੋ ਭਗਵੰਤ ਦੇ ਹੀ ਪਿੰਡ ਦੇ ਰਹਿਣ ਵਾਲੇ ਹਨ, ਨੂੰ ਮੂਹਰੇ ਲਾ ਕੇ ਕੂੜ ਪ੍ਰਚਾਰ ਦੀ ਵਿਆਪਕ ਮੁਹਿੰਮ ਛੇੜ ਦਿੱਤੀ। ਅਕਾਲੀ ਪੱਖੀ ਪੰਚਾਇਤਾਂ, ਵੱਖੋ ਵੱਖ ਖੇਤਰਾਂ ਦੇ ਬਾਰਸੂਖ ਬੰਦਿਆਂ ਅਤੇ ਹੋਰ ਨਾਵਾਜ਼ਿਬ ਢੰਗਾਂ ਰਾਹੀਂ ਹੰਕਾਰ ਤੋੜੋ ਰੈਲੀ ਵਿਚ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਜਾਣੋਂ ਰੋਕਣ ਲਈ ਹਾਕਮਾਂ ਦੇ ਹੱਥਠੋਕਿਆਂ ਵਲੋਂ ਪੂਰੇ ''ਤੋਪੇ ਤੁੜਾਏ'' ਗਏ। ਸਰਕਾਰੀ ਦਬਾਅ ਦੀਆਂ ਭੱਦੀਆਂ ਤੋਂ ਭੱਦੀਆਂ ਵੰਨਗੀਆਂ ਨੂੰ ਟਿੱਚ ਜਾਣਦਿਆਂ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਮਰਦ ਔਰਤਾਂ ਨੇ ਇਸ ਰੈਲੀ ਵਿਚ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਖਿਲਾਫ ਤਿੱਖਾ ਰੋਸ ਜਾਹਿਰ ਕਰਦਿਆਂ ਪਰਵਾਰਾਂ ਸਮੇਤ ਸ਼ਮੂਲੀਅਤ ਕੀਤੀ। ਇਹ ਹਮਲਾ ਮਨਰੇਗਾ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੂੰ ਲਾਮਬੰਦ ਹੋਣ ਤੋਂ ਰੋਕਣ ਦੇ ਮਕਸਦ ਨਾਲ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਪਰ ਉਸ ਤੋਂ ਉਲਟ ਇਹ ਹਮਲਾ ਕਿਤੇ ਵਧੇਰੇ ਵੱਡੀ ਲਾਮਬੰਦੀ ਦਾ ਸਬੱਬ ਹੋ ਨਿਬੜਿਆ। ਇਹ ਰੈਲੀ ਸਾਬਤ ਕਰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਜਮਾਤੀ ਮੁੱਦਿਆਂ 'ਤੇ ਲੜਾਈ ਲੜਨ ਵੇਲੇ ਭਾਵੇਂ ਜਮਹੂਰੀ ਲਹਿਰ ਦੇ ਕਾਰਕੁੰਨਾਂ ਨੂੰ ਅਨੇਕਾਂ ਖਤਰਿਆਂ 'ਚੋਂ ਲੰਘਣਾ ਪੈ ਸਕਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇੱਥੋਂ ਤੱਕ ਕਿ ਜਾਨ ਵੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਅਤੀਤ 'ਚ ਇਹ ਕੁੱਝ ਬੜੀ ਵਾਰ ਜਾਂਬਾਜ ਜੁਝਾਰੂਆਂ ਨੇ ਝੱਲਿਆ ਵੀ ਹੈ। ਪਰ ਜਦੋਂ ਲੋਕ ਆਪਣੇ ਲਈ ਜਾਨ ਦਾਅ 'ਤੇ ਲਾਉਣ ਵਾਲੇ ਦੀ ਨਿਸ਼ਾਨਦੇਹੀ ਕਰ ਲੈਣ ਤਾਂ ਫਿਰ ਉਸ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਨਿੱਤਰਦੇ ਵੀ ਨਿਸੰਗ ਹੋ ਕੇ ਹਨ। ''ਹੰਕਾਰ ਤੋੜੋ ਰੈਲੀ'' ਵਿਚ ਸਭ ਤੋਂ ਗਰੀਬ ਵਰਗਾਂ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਆਪਣੇ ਖ਼ੁਦ ਦੇ ਸਾਧਨਾਂ ਰਾਹੀਂ ਇੰਨੀ ਵੱਡੀ ਤਾਦਾਦ ਵਿਚ ਪੁੱਜਣਾ, ਪਾਣੀ ਦੀ ਘਾਟ, ਪੱਖਿਆਂ ਦੀ ਅਣਹੋਂਦ ਅਤੇ ਜਾਨਲੇਵਾ ਗਰਮੀ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਘੰਟਿਆ ਬੱਧੀ ਆਗੂਆਂ ਦੇ ਵਿਚਾਰ ਸੁਨਣਾ ਅਤੇ ਲਗਭਗ ਸਾਰਾ ਸਮਾਂ ਸਰਕਾਰੀ ਹੱਲੇ ਵਿਰੁੱਧ ਰੋਹ ਭਰਪੂਰ ਨਾਅਰੇ ਲਾਉਣਾ ਉਪਰੋਕਤ ਕਥਨ ਦੀ ਪੁਸ਼ਟੀ ਕਰਦਾ ਹੈ।
ਹੰਕਾਰ ਤੋੜੋ ਰੈਲੀ, ਨਿਰਪੱਖ ਦਰਸ਼ਕ ਜਿਸ ਬਾਰੇ ਇਹ ਟਿੱਪਣੀ ਕਰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਇਸ ਇਲਾਕੇ ਵਿਚ ਹਾਲੀਆ ਸਮੇਂ 'ਚ ਖੱਬੇ ਪੱਖੀਆਂ ਦੀ ਇੰਨੀ ਵੱਡੀ ਇਕਤਰਤਾ ਨਹੀਂ ਦੇਖੀ, ਦੀ ਬਣਤਰ ਦੂਜਾ ਉਤਸ਼ਾਹ ਵਧਾਊ ਪੱਖ ਹੈ। ਨੱਬੇ ਫੀਸਦੀ (90%) ਤੋਂ ਵਧੇਰੇ ਸ਼ਮੂਲੀਅਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਵਰਗ ਖਾਸ ਕਰ ਬੇਜ਼ਮੀਨੇ ਪੇਂਡੂ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀ ਸੀ ਅਤੇ ਬਿਨਾਂ ਸ਼ੱਕ ਸਮਾਜਿਕ ਤਬਦੀਲੀ ਦੇ ਨਜ਼ਰੀਏ ਤੋਂ ਭਵਿੱਖ 'ਚ ਹਾਂ ਪੱਖੀ ਸਿੱਟਾ ਇਸ ਰੁਝਾਣ ਨੂੰ ਹੋਰ-ਹੋਰ ਮਜ਼ਬੂਤ ਕੀਤੇ ਜਾਣ ਨਾਲ ਹੀ ਨਿਕਲਣਾ ਹੈ।
ਕੁੱਝ ਸੁਹਿਰਦ ਬੁੱਧੀਜੀਵੀ ਵੀ ਪਰ ਵਧੇਰੇ ਕਰਕੇ ਹਾਕਮ ਜਮਾਤੀ ਵਿਚਾਰਵਾਨ, ਖੱਬੇ ਪੱਖ ਦੇ ਹਾਸ਼ੀਏ 'ਤੇ ਚਲੇ ਜਾਣ ਦੀ ਗੱਲ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਕਈਆਂ ਪੱਖਾਂ ਤੋਂ ਵੱਜੀਆਂ ਪਛਾੜਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਤੌਖਲਿਆਂ 'ਤੇ ਮੁਹਰ ਵੀ ਲਾਉਂਦੀਆਂ ਹਨ। ਪਰ ਦਰੁਸਤ ਜਮਾਤੀ ਪੈਂਤੜੇ ਅਧੀਨ ਕੀਤੀ ਗਈ ਜਮਾਤੀ ਕਤਾਰਬੰਦੀ ਅਤੇ ਜਮਾਤੀ ਘੋਲ ਅੱਜ ਵੀ ਖੱਬੇ ਪੱਖ ਦੇ ਅਗਾਂਹ ਵੱਲ ਵਿਕਾਸ ਦੀ ਜਾਮਨੀ ਹਨ ਅਤੇ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਰਹਿਣਗੇ, ਇਹ ਇਸ ਰੈਲੀ ਦਾ ਹੋਰ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਸਬਕ ਹੈ। ਹਰ ਕਿਸਮ ਦੇ ਲੋਭ-ਲਾਲਚਾਂ-ਦਬਕਿਆਂ ਨੂੰ ਦਰਕਿਨਾਰ ਕਰਕੇ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ''ਹੰਕਾਰੀ ਤੋੜੋ ਰੈਲੀ'' ਵਿਚ ਪੁੱਜਣਾ ਇਸ ਦੀ ਪੁਸ਼ਟੀ ਕਰਦਾ ਹੈ।
ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਸਕੱਤਰ ਸਾਥੀ ਮੰਗਤ ਰਾਮ ਪਾਸਲਾ, ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ. ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਸਕੱਤਰ ਸਾਥੀ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ ਚੌਹਾਨ, ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ.(ਐਮ) ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਸਕੱਤਰ ਸਾਥੀ ਕੁਲਵਿੰਦਰ ਉਡਤ ਵਲੋਂ ਰੈਲੀ 'ਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋ ਕੇ ਸਮਰਥਨ ਦੇਣਾ ਖੱਬੀ ਸਾਂਝ ਅਤੇ ਭਵਿੱਖੀ ਸੰਗਰਾਮਾਂ ਲਈ ਚੰਗਾ ਸ਼ਗਨ ਹੈ। ਭਾਵੇਂ ਕੁੱਝ ਜ਼ਮੀਨੀ ਕਾਰਕੁੰਨ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ. ਅਤੇ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ.(ਐਮ) ਦੇ ਸੂਬਾਈ ਆਗੂਆਂ ਦੇ ਨਾ ਪੁੱਜਣ 'ਤੇ ਗੁੱਝੀ ਨਾਖੁਸ਼ੀ ਵੀ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਦੇ ਦੇਖੇ ਗਏ ਪਰ ਕੁੱਲ ਮਿਲਾ ਕੇ ਖੱਬੇ ਪੱਖੀਆਂ ਦੀ ਸਮੂਹਿਕ ਸ਼ਮੂਲੀਅਤ ਹੌਂਸਲਾ ਵਧਾਊ ਹੈ। ਮਸਲੇ ਦੀ ਤੀਬਰਤਾ ਨੂੰ ਦੇਖਦੇ ਹੋਏ ਘੋਰ ਵਿਚਾਰਧਾਰਕ ਵਿਰੋਧੀ ਸ਼੍ਰੋਮਣੀ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਮਾਨ ਅਤੇ ਬਾਮਸੇਫ ਦੇ ਆਗੂ ਵੀ ਸਮਰਥਨ ਲਈ ਪੁੱਜੇ। ਐਨ ਆਸ ਦੇ ਮੁਤਾਬਕ ਕਾਂਗਰਸ ਪਾਰਟੀ,ਆਪ ਆਦਿ ਵਰਗਿਆਂ ਨੇ ਹਾਅ ਦਾ ਨਾਅਰਾ ਵੀ ਨਹੀਂ ਮਾਰਿਆ।
ਇਸ ਰੈਲੀ ਦਾ ਇਕ ਹੋਰ ਹਾਂਪੱਖੀ ਤੱਥ ਵੀ ਸਾਂਝਾ ਕਰਨਾ ਅਤੀ  ਜਰੂਰੀ ਹੈ। ਹਾਕਮ ਦਲ ਵਲੋਂ ਇਸ ਮਸਲੇ ਨੂੰ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ-ਕਿਸਾਨਾਂ ਦਾ ਟਕਰਾਅ ਸਾਬਤ ਕਰਨ ਦੇ ਲੱਖ ਯਤਨਾਂ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਵੀ ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ, ਭਾਰਤੀ ਕਿਸਾਨ ਯੂਨੀਅਨ ਡਕੌਂਦਾ ਅਤੇ ਹੋਰ ਕਿਸਾਨ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦੇ ਸੈਂਕੜੇ ਕਾਰਕੁੰਨ ਸਥਾਨਕ ਬਿਜਲੀ ਘਰ ਤੋਂ ਇਕ ਜਲੂਸ ਦੀ ਸ਼ਕਲ ਵਿਚ ਰੈਲੀ ਵਾਲੀ ਥਾਂ ਸਥਾਨਕ ਅਨਾਜ ਮੰਡੀ ਵਿਖੇ ਪਹੁੰਚੇ ਅਤੇ ਸੰਗਰਾਮੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਕਿਸਾਨ ਏਕੇ ਦਾ ਸਬੂਤ ਦਿੱਤਾ।
ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਸਰਕਾਰੀ ਤੰਤਰ ਦੀ ਮਦਦ ਨਾਲ ਹੋਈ ਰੈਲੀ ਵਿਚ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਉਚ ਅਕਾਲੀ ਆਗੂਆਂ ਦੀ ਹਾਜ਼ਰੀ ਵਿਚ ਹਮਲਾਵਰਾਂ 'ਤੇ ਦਰਜ ਪਰਚਾ ਇਕ ਮੁੱਢੋਂ ਰੱਦ ਕਰਨ ਦੀ ਮੰਗ ਕਰਦਾ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਅਤੇ ਇਹ ਸਰਕਾਰੀ ਤਮਾਸ਼ਾ ਡੇਢ ਕੁ ਵਜੇ ਹੀ ਸਮਾਪਤ ਹੋ ਗਿਆ।
ਇਸ ਘਟਨਾਕ੍ਰਮ ਦੇ ਸੰਦਰਭ 'ਚ ਸੂਬੇ ਦੇ ਰਾਜਸੀ ਆਰਥਕ ਹਾਲਾਤ ਦੇ ਕੁੱਝ ਪੱਖਾਂ 'ਤੇ ਝਾਤ ਮਾਰਨੀ ਅਤੀ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ। ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਬੇਜ਼ਮੀਨੇ ਪੇਂਡੂ ਮਜ਼ਦੂਰ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ 'ਚੋਂ ਭਾਰੀ ਗਿਣਤੀ ਦਲਿਤ ਅਤੇ ਪੱਛੜੇ ਵਰਗਾਂ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਹਨ, ਘੋਰ ਆਰਥਕ ਨਾਬਰਾਬਰੀ ਅਤੇ ਅਣਮਨੁੱਖੀ ਜਾਤੀਪਾਤੀ ਵਿਤਕਰੇ ਦੀ ਮਾਰ ਹੇਠ ਹਨ। ਹਾਕਮ ਜਮਾਤੀ ਖਾਸੇ ਵਾਲੀਆਂ ਸੱਭੇ ਰਾਜਸੀ ਪਾਰਟੀਆਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪੇਸ਼ ਆ ਰਹੀਆਂ ਬਹੁਪਰਤੀ ਦਿੱਕਤਾਂ ਦੇ ਠੋਸ ਹੱਲ ਲਈ ਸਾਰਥਕ ਯਤਨ ਕਰਨ ਦੀ ਥਾਂ ਭੀਖ ਵਰਗੀਆਂ ਮਾਲੀ ਇਮਦਾਦਾਂ, ਲਾਰਿਆਂ ਅਤੇ ਫੋਕੇ ਨਾਅਰਿਆਂ ਨਾਲ ਹੀ ਵਰਚਾ ਰਹੀਆਂ ਹਨ।
ਜਦਕਿ ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਰਗਾਂ ਅੰਦਰ ਕਾਰਜਸ਼ੀਲ ਖੱਬੀ, ਜਮਹੂਰੀ, ਜਨਤਕ ਪਹੁੰਚ ਵਾਲੀਆਂ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਸੂਬੇ ਦੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਭਾਗਾਂ 'ਚ ਲਗਭਗ ਹਰ ਰੋਜ਼ ਹੀ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਦਰਪੇਸ਼ ਫੌਰੀ ਮੰਗਾਂ ਦੇ ਠੋਸ ਹੱਲ ਲਈ, ਜਾਤੀਪਾਤੀ ਅਤੇ ਸਮਾਜਿਕ-ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨਿਕ ਜ਼ਿਆਦਤੀਆਂ ਖਿਲਾਫ, ਜਿਉਂਦੇ ਰਹਿਣ ਅਤੇ ਅਗਾਂਹ ਵਿਕਾਸ ਕਰਨ ਲਈ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸਹੂਲਤਾਂ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਲਈ, ਸਮਾਜਿਕ ਸੁਰੱਖਿਆ ਦੀ ਜਾਮਨੀ ਆਦਿ ਲਈ ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ ਦੇ ਮੈਦਾਨ ਭਖਾਉਂਦੀਆਂ ਹਨ। ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਰਗਾਂ ਨੂੰ ਚੋਣਾਂ ਸਮੇਂ ਕੀਤੇ ਵਾਅਦਿਆਂ 'ਤੇ ਉਕਾ ਹੀ ਅਮਲ ਨਾ ਕਰਨ ਬਾਰੇ ਵੀ ਇਹ ਉਪਲੱਬਧ ਮੰਚਾਂ 'ਤੇ ਸਰਕਾਰ ਦੀ ਨਿਖੇਧੀ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ। ਇਹ ਧਿਰਾਂ ਹੋਰਨਾਂ ਮਿਹਨਤੀ ਵਰਗਾਂ ਨਾਲ ਹੋ ਰਹੇ ਧੱਕਿਆਂ ਖਿਲਾਫ ਸੰਘਰਸਾਂ 'ਚ ਵੀ ਯਥਾ ਸ਼ਕਤੀ ਭਰਵਾਂ ਯੋਗਦਾਨ ਪਾਉਂਦੀਆਂ ਹਨ। ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਜਮਹੂਰੀ ਘੋਲਾਂ ਨੂੰ ਫੇਲ੍ਹ ਕਰਨ ਦੇ ਮਕਸਦ ਲਈ ਕੀਤੇ ਗਏ ਜਾਬਰ ਹੱਲਿਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਸੰਗਰਾਮਾਂ ਵਿਚ ਵੀ ਭਰਵਾਂ ਯੋਗਦਾਨ ਪਾਇਆ ਹੈ। ਸਰਕਾਰੀ ਸਕੀਮਾਂ/ਗਰਾਟਾਂ ਨੂੰ ਮਨਮਾਨੇ ਢੰਗ ਨਾਲ ਲਾਗੂ ਕਰਨ ਅਤੇ ਖਰਚਣ ਵਿਰੁੱਧ ਇਹ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਮੈਦਾਨ 'ਚ ਨਿੱਤਰ ਕੇ ਦਸਤਪੰਜਾ ਲੈਂਦੀਆਂ ਹਨ। ਹੁਣ ਇਸ ਸੰਗਰਾਮੀ ਸਰਗਰਮੀ ਨੂੰ ਹੋਰ ਸਿੱਟਾਦਾਈ ਅਤੇ ਸੰਗਠਿਤ ਬਨਾਉਣ ਲਈ ਇਨ੍ਹਾਂ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸੰਗਠਨਾਂ ਨੇ ''ਪੇਂਡੂ ਤੇ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦਾ ਸਾਂਝਾ ਮੋਰਚਾ'' ਉਸਾਰ ਕੇ ਸਾਂਝਾ ਸੰਗਰਾਮ ਅਰੰਭਿਆ ਹੈ। ਇਸ ਸਾਰੀ ਸਰਗਰਮੀ ਦੇ ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਇਸ ਅਤੀ ਗਰੀਬ ਅਤੇ ਪੱਛੜੀ ਵਸੋਂ ਵਿਚ ਨਿੱਤ ਤਿੱਖੀ ਹੋ ਰਹੀ ਜਮਾਤੀ ਅਤੇ ਜਮਹੂਰੀ ਚੇਤਨਾ ਤੋਂ ਔਖੀਆਂ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਉਂਝ ਤਾਂ ਸਾਰੀਆਂ ਹਾਕਮ ਜਮਾਤਾਂ ਪਰ ਖਾਸ ਕਰਕੇ ਮੌਜੂਦਾ ਸੂਬਾ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਕਰਤੇ ਧਰਤੇ ਡਾਢੇ ਔਖੇ ਹਨ।
ਭਗਵੰਤ ਸਮਾਓਂ ਨੇ ਹਮਲਾ ਅਤੇ ਹੋਰਨੀ ਥਾਈਂ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ 'ਤੇ ਜਬਰ ਇਸੇ ਹੁਕਮਰਾਨਾਂ ਦੀ ਔਖ ਦਾ ਸਿੱਟਾ ਹੈ। ਪਰ ਜਿਸ ਚੇਤਨਾ ਨੂੰ ''ਕਰੰਡ'' ਕਰਨ ਦੇ ਕੋਝੇ ਉਦੇਸ਼ ਅਧੀਨ ਇਹ  ਹਮਲਾ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ, ਹਮਲੇ ਦੇ ਵਿਰੋਧ 'ਚ ਹੋਈ ਲਾਮਬੰਦੀ ਨੇ ਸਗੋਂ ਉਸ ਚੇਤਨਾ ਦੀ ਮਿਕਦਾਰ ਵਿਚ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਗੁਣਾਂ ਦਾ ਵਾਧਾ ਹੀ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਸਾਡੇ ਜਾਚੇ ''ਹੰਕਾਰ ਤੋੜੋ ਰੈਲੀ'' ਦੀ ਇਹ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਹੈ। 22 ਜੂਨ ਦੀਆਂ ਅਖਬਾਰਾਂ ਅਨੁਸਾਰ ਪੁਲਸ ਨੇ ਦੋਸ਼ੀਆਂ 'ਤੇ ਲਾਈਆਂ ਧਾਰਾਵਾਂ ਨੂੰ ਖੋਰਦੇ ਹੋਏ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਛੱਡ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਸੰਘਰਸ਼ਸ਼ੀਲ ਧਿਰਾਂ ਨੇ ਵੀ ਇਸ ਮੁੱਦੇ ਉਤੇ ਮੁੜ ਸੰਘਰਸ਼ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਨ ਦਾ ਅਹਿਦ ਪ੍ਰਗਟਾਇਆ ਹੈ।


ਪੇਂਡੂ ਤੇ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਵਲੋਂ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਕੇਂਦਰਾਂ 'ਤੇ ਧਰਨੇ  
ਪੇਂਡੂ ਤੇ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦੇ ਸਾਂਝੇ ਮੋਰਚੇ ਦੇ ਸੱਦੇ 'ਤੇ 9 ਜੂਨ ਨੂੰ ਸੂਬੇ ਦੇ ਬਹੁਗਿਣਤੀ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਸਦਰ ਮੁਕਾਮਾਂ 'ਤੇ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਬੇਜ਼ਮੀਨੇ ਪੇਂਡੂ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੇ ਪਰਵਾਰਾਂ ਸਮੇਤ ਰੋਹ ਭਰਪੂਰ ਧਰਨੇ ਮਾਰਦਿਆਂ ਸੂਬਾ ਹਕੂਮਤ ਵਿਰੁੱਧ ਰੋਸ ਪ੍ਰਗਟਾਇਆ। ਮੋਰਚੇ ਦੇ ਸੱਦੇ 'ਤੇ ਇਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ 26 ਮਈ ਨੂੰ 250 ਦੇ ਕਰੀਬ ਥਾਵਾਂ 'ਤੇ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਦੀਆਂ ਅਰਥੀਆਂ ਵੀ ਸਾੜੀਆਂ ਗਈਆਂ ਸਨ।
ਲੰਘੀ ਇਕ ਅਪ੍ਰੈਲ ਨੂੰ ਮੋਰਚੇ ਦੇ ਸੂਬਾਈ ਆਗੂਆਂ ਦੀ ਸੂਬਾਈ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ, ਕੈਬਨਿਟ ਮੰਤਰੀਆਂ ਅਤੇ ਰਾਜਧਾਨੀ ਵਿਚਲੇ ਉਚ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਦੀ ਵੱਡ ਅਕਾਰੀ ਟੀਮ ਨਾਲ ਹੋਈ ਇਕ ਮੀਟਿੰਗ ਵਿਚ ਕੁੱਝ ਫੌਰੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਮਸਲੇ ਹੱਲ ਕਰਨ ਲਈ ਸਹਿਮਤੀ ਬਣੀ ਸੀ। ਸਹਿਮਤੀ ਵਾਲੇ ਮੁੱਦੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ'' ਦੇ ਮਈ ਅੰਕ ਵਿਚ ਛਪੇ ਹਨ। ਪਰ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਅਤੇ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸ਼ਨਿਕ ਮਸ਼ੀਨਰੀ ਦੇ ਗੁੱਝੇ ਹੁਕਮਾਂ 'ਤੇ ਅਮਲ ਕਰਦਿਆਂ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਅਤੇ ਹੇਠ ਪੱਧਰ ਦੇ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਵਲੋਂ ਬਣੀ ਸਹਿਮਤੀ ਵਾਲੇ ਮੁੱਦਿਆਂ 'ਤੇ ਅਮਲ ਟਾਲਣ ਲਈ ਅਨੇਕਾਂ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੇ ਬੇਲੋੜੇ ਅਡਿਕੇ ਡਾਹੇ ਜਾ ਰਹੇ ਹਨ। ਸੂਬਾ ਹਕੂਮਤ ਦੀ ਇਹ ਪਹੁੰਚ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਲਈ  ਐਲਾਨੀਆਂ ਸਹੂਲਤਾਂ ਲਾਗੂ ਨਾ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਲਗਾਤਾਰ ਜਾਰੀ ਵਾਅਦਾ ਖਿਲਾਫੀ ਦਾ ਅਗਲਾ ਵਾਧਾ ਹੈ।
ਇਸੇ ਲਈ ਮੋਰਚੇ ਨੇ 9 ਜੂਨ ਦੇ ਧਰਨਾ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਦਾ ਸੱਦਾ ਦਿੱਤਾ ਸੀ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਠੱਗੇ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰ ਰਹੇ ਬੇਜ਼ਮੀਨੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੇ ਇਸ ਸੱਦੇ ਪ੍ਰਤੀ ਭਰਪੂਰ ਹੁੰਗਾਰਾ ਭਰਿਆ। ਵੱਖੋ ਵੱਖ ਥਾਂਈ ਹੋਏ ਰੋਸ ਐਕਸ਼ਨਾਂ ਨੂੰ ਸਰਵ ਸਾਥੀ ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਦਾਊਦ, ਦਰਸ਼ਨ ਨਾਹਰ, ਜ਼ੋਰਾ ਸਿੰਘ ਨਸਰਾਲੀ, ਲਛਮਣ ਸਿੰਘ ਸੇਵੇਵਾਲਾ, ਤਰਸੇਮ ਪੀਟਰ, ਬਲਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਭੁੱਲਰ, ਸੰਜੀਵ ਕੁਮਾਰ ਮਿੰਟੂ, ਗੁਲਜਾਰ ਸਿੰਘ ਗੋਰੀਆ, ਸਵਰਣ ਸਿੰਘ ਨਾਗੋਕੇ, ਹਰਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਸੇਮਾ, ਰਾਮ ਸਿੰਘ ਨੂਰਪੁਰੀ, ਗੁਰਮੇਸ਼ ਸਿੰਘ ਆਦਿ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਮਜ਼ਦੂਰ ਮੰਗਾਂ ਮੰਨਣ, ਸਹਿਮਤੀ ਵਾਲੇ ਮੁੱਦਿਆਂ 'ਤੇ ਅਮਲ ਕਰਨ ਅਤੇ ਮਜ਼ਦੂਰ ਅੰਦੋਲਨਾਂ 'ਤੇ ਜਬਰ ਬੰਦ ਕਰਨ ਜਾਂ ਇਸ ਹਕੂਮਤੀ ਹੰਕਾਰ ਵਿਰੁੱੱਧ ਛੇੜੇ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸੰਗਰਾਮ ਦੇ ਸਿੱਟੇ ਭੁਗਤਨ ਲਈ ਤਿਆਰ ਰਹਿਣ ਦੀ ਚਿਤਾਵਨੀ ਦਿੱਤੀ।
ਮਜ਼ਦੂਰ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਐਲਾਨ ਕੀਤਾ ਕਿ 18 ਜੂਨ ਨੂੰ ਮਜ਼ਦੂਰ ਮੋਰਚੇ ਦੀ ਨਕੋਦਰ ਵਿਖੇ ਮੀਟਿੰਗ ਹੋਵੇਗੀ ਜਿਸ ਵਿਚ ਅਗਲੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਦੀ ਰੂਪ ਰੇਖਾ ਉਲੀਕੀ ਜਾਵੇਗੀ।
ਇਹ ਸਾਂਝਾ ਮੋਰਚਾ ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ, ਮਜ਼ਦੂਰ ਮੁਕਤੀ ਮੋਰਚਾ, ਪੰਜਾਬ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ, ਕੁਲ ਹਿੰਦ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ, ਪੇਂਡੂ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ, ਪੰਜਾਬ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ ਅਤੇ ਕ੍ਰਾਂਤੀਕਾਰੀ ਪੇਂਡੂ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ 'ਤੇ ਅਧਾਰਤ ਹੈ।
 
ਬਠਿੰਡਾ: ਇੱਥੇ ਪੰਜਾਬ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ, ਦਿਹਾਤੀ ਮਜਦੂਰ ਸਭਾ, ਮਜ਼ਦੂਰ ਮੁਕਤੀ ਮੋਰਚਾ, ਪੇਂਡੂ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ, ਕੁਲ ਹਿੰਦ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਕਾਰਕੁੰਨਾਂ ਨੇ ਡੀ.ਸੀ. ਦਫਤਰ ਸਾਹਮਣੇ ਰੋਹ ਭਰਪੂਰ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ। ਅਨੇਕਾਂ ਪਿੰਡਾਂ 'ਚੋਂ ਔਰਤਾਂ ਮਨਰੇਗਾ ਜਾਬ ਕਾਰਡ ਨਾਲ ਲੈ ਕੇ ਆਈਆਂ ਜਿਨ੍ਹਾਂ 'ਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਲੋਂ ਕੀਤੇ ਕੰਮ ਦੀਆਂ ਹਾਜ਼ਰੀਆਂ ਨਹੀਂ ਸੀ ਲੱਗੀਆਂ ਹੋਈਆਂ ਸਨ। ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਲੋਕ ਵਰ੍ਹਿਆਂ ਪਹਿਲਾਂ ਅਲਾਟ ਕੀਤੇ ਗਏ ਪਲਾਟਾਂ ਦੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸਿੰਘ ਬਾਦਲ ਦੀ  ਫੋਟੋ ਵਾਲੇ ਸਰਟੀਫਿਕੇਟ ਲੈ ਕੇ ਆਏ ਪਰ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਪਲਾਟਾਂ ਦੇ ਕਬਜ਼ੇ ਅੱਜ ਤੱਕ ਨਹੀਂ ਮਿਲੇ। ਮਜ਼ਦੂਰ ਧਰਨੇ 'ਚ ਸ਼ਾਮਲ ਸਭਨਾਂ ਨੇ ਲਗਾਤਾਰ ਚੱਲ ਰਹੇ ਕਿਸਾਨ ਧਰਨੇ ਵਿਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋ ਕੇ ਸਾਂਝ ਦਾ ਪ੍ਰਗਟਾਵਾ ਕੀਤਾ। ਮਹੀਪਾਲ, ਹਰਵਿੰਦਰ ਸੇਮਾ, ਅਮਰਜੀਤ ਹਨੀ, ਗੁਰਚਰਨ ਭਗਤਾ, ਮਿੱਠੂ ਸਿੰਘ ਘੁੱਦਾ, ਮੱਖਣ ਸਿੰਘ ਤਲਵੰਡੀ, ਗੁਰਮੀਤ ਸਿੰਘ ਨਾਟੀ, ਦਰਸ਼ਨ ਸਿੰਘ ਬਾਜਕ, ਕੂਕਾ ਸਿੰਘ ਰੁਪਾਣਾ, ਮੇਜਰ ਸਿੰਘ ਤੁੰਗਵਾਲੀ ਆਦਿ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 
ਮੁਕਤਸਰ : ਇੱਥੇ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਸਰਵ ਸਾਥੀ ਜਗਜੀਤ ਸਿੰਘ ਜੱਸੇਆਣਾ, ਹਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਮੱਦਰੱਸਾ, ਤਰਸੇਮ ਸਿੰਘ ਖੂੰਡੇਹਲਾਲ, ਹਰੀ ਰਾਮ ਚੱਕ ਸ਼ੇਰੇਵਾਲਾ, ਜਗਤਾਰ ਸਿਘ ਬਾਸ ਆਦਿ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ। ਪਿੰਡ ਦਬੁੜਾ ਵਿਖੇ 1974 ਵਿਚ ਕੱਟੇ ਗਏ ਪਲਾਟਾਂ ਦੀ ਮਹਿਕਮਾ ਪੰਚਾਇਤ ਵੱਲੋਂ ਇਕ ਪਾਸੇ ਛੇਤੀ ਤੋਂ ਛੇਤੀ ਨਿਸ਼ਾਨਦੇਹੀ ਕਰਕੇ ਕਬਜ਼ੇ ਦੇਣ ਦੇ ਭਰੋਸੇ ਅਤੇ ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਉਨ੍ਹਾ ਹੀ 41 ਪਲਾਟਾਂ ਵਾਲੀ ਥਾਂ ਪੰਚਾਇਤ ਵਲੋਂ ਠੇਕੇ 'ਤੇ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣ ਦੇ ਮੁੱਦੇ 'ਤੇ ਇਕੱਤਰ ਹੋ ਕੇ ਬੋਲੀ ਅੱਗੇ ਪਾਉਣ ਜਾਂ 41 ਪਲਾਟਾਂ ਦਾ ਰਕਬਾ ਛੱਡ ਕੇ ਬੋਲੀ ਦੀ ਅਪੀਲ ਕਰਨ ਗਏ ਪਿੰਡ ਵਾਸੀ ਦਲਿਤਾਂ ਨਾਲ ਕੀਤੀ ਗਈ ਖਿੱਚ ਧੂਹ, ਕੁੱਟਮਾਰ, ਜਾਤੀ ਸੂਚਕ ਅਪਮਾਨ ਅਤੇ ਔਰਤਾਂ ਦੇ ਕੱਪੜੇ ਪਾੜਨ ਅਤੇ ਉਲਟਾ ਪੀੜਤਾਂ 'ਤੇ ਹੀ ਕੇਸ ਦਰਜ ਕਰਨ ਦੀ ਵੀ ਨਿੰਦਾ ਕੀਤੀ ਗਈ।
 
ਸੰਗਰੂਰ : ਇੱਥੇ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਬੁਲਾਰਿਆਂ ਨੇ ਸੰਵਿਧਾਨ ਅਨੁਸਾਰ ਪਿੰਡਾਂ ਦੀ ਸਾਂਝੀ ਮਾਲਕੀ ਵਾਲੀ ਜ਼ਮੀਨ 'ਚੋਂ ਤੀਜਾ ਹਿੱਸਾ ਦਲਿਤਾਂ ਲਈ ਰਾਖਵੀਂ ਜ਼ਮੀਨ ਖੇਤੀ ਲਈ ਵਾਜਬ ਰੇਟਾਂ 'ਤੇ ਦੇਣ, ਫਰਜ਼ੀ ਬੋਲੀਆਂ ਦਾ ਅਮਲ ਬੰਦ ਕਰਨ ਲਈ ਚੱਲ ਰਹੇ ਸੰਘਰਸ਼ 'ਤੇ ਸਰਕਾਰੀ ਜਬਰ ਅਤੇ ਪੁਲਸ ਕਾਰਵਾਈ ਦੀ ਨਿਖੇਧੀ ਕੀਤੀ ਗਈ।
 
ਬਰਨਾਲਾ : ਵਿਖੇ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਭੋਲਾ ਸਿੰਘ ਕਲਾਲ ਮਾਜਰਾ, ਗੁਰਪ੍ਰੀਤ ਸਿੰਘ ਰੂੜੇਕੇ, ਲਾਲ ਸਿੰਘ ਧਨੌਲਾ, ਭਾਨ ਸਿੰਘ ਸੰਘੇੜਾ, ਬਘੇਲ ਸਿੰਘ, ਗੁਰਦੇਵ ਸਿੰਘ ਸਹਿਜੜਾ ਨੇ ਦੋਸ਼ ਲਾਇਆ ਕਿ ਮਨਰੇਗਾ ਮਜ਼ਦੂਰ ਕੰਮ ਨਾ ਮਿਲਣ ਦੀ ਸੂਰਤ ਵਿਚ ਭੁਖਮਰੀ ਦਾ ਸ਼ਿਕਾਰ ਹੋ ਰਹੇ ਹਨ ਜਦਕਿ ਵਿਭਾਗ ਕੰਮ ਠੇਕੇ 'ਤੇ ਦੇ ਕੇ ਭਾਰੀ ਭਰਕਮ ਮਸ਼ੀਨਾਂ ਰਾਹੀਂ ਕਰਵਾਇਆ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਇਹ ਵੀ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਵਾਅਦਿਆਂ-ਦਾਅਵਿਆਂ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਮਨਰੇਗਾ ਦੇ ਕੀਤੇ ਕੰਮਾਂ ਦੇ ਪੈਸੇ ਆਦਿ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੇ ਜਾ ਰਹੇ।
 
ਮਾਨਸਾ : ਇੱਥੇ ਧਰਨਾਕਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਨਰਿੰਦਰ ਕੁਮਾਰ ਸੋਮਾ, ਨਰਿੰਦਰ ਕੌਰ ਆਹਲੂਪੁਰ, ਸੁਖਦੇਵ ਸਿੰਘ ਅਤਲਾ ਨੇ ਪਿੰਡਾਂ 'ਚ ਲਾਮਬੰਦੀ ਕਰਨ ਜਾਂਦੇ ਮਜ਼ਦੂਰ ਆਗੂਆਂ 'ਤੇ ਸਰਕਾਰੀ ਸ਼ਹਿ ਪ੍ਰਾਪਤ ਗੈਰ ਸਮਾਜੀ ਤੱਤਾਂ ਵਲੋਂ ਕੀਤੇ ਜਾਂਦੇ ਹਮਲਿਆਂ ਦੀ ਜ਼ੋਰਦਾਰ ਨਿਖੇਧੀ ਕੀਤੀ ਗਈ।
 
ਜਲੰਧਰ : ਇੱਥੇ ਜਬਰਦਸਤ ਰੋਸ ਧਰਨਾ ਮਾਰਿਆ ਗਿਆ। ਪਰਮਜੀਤ ਸਿੰਘ ਰੰਧਾਵਾ, ਨਿਰਮਲ ਮਲਸੀਆਂ, ਨਿਰਮਲ ਆਧੀ, ਜਰਨੈਲ ਫਿਲੌਰ, ਮੱਖਣ ਨੂਰਪੁਰ, ਬਲਦੇਵ ਸਿੰਘ ਨੂਰਪਰੀ, ਕਸ਼ਮੀਰ ਸਿੰਘ ਘੁੱਗਸ਼ੋਰ, ਹਰਮੇਸ਼ ਮਾਲੜੀ, ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਕਲੇਰ ਆਦਿ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਸਰਕਾਰਾਂ ਦੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਵਿਰੋਧੀ ਪਹੁੰਚ ਦੀ ਜ਼ੋਰਦਾਰ ਨਿਖੇਧੀ ਕੀਤੀ।
ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ : ਇੱਥੇ ਸਰਵਸਾਥੀ ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਉਮਰਪੁਰਾ, ਅਮਰੀਕ ਸਿੰਘ ਦਾਊਦ, ਬਚਨ ਸਿੰਘ ਜਸਪਾਲ, ਨਿਰਮਲ ਛੱਜਲਵੱਡੀ, ਨਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਵਡਾਲਾ, ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਭਿੰਡਰ ਅਦਿ ਸਾਥੀਆਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿਚ ਰੋਹ ਭਰਪੂਰ ਧਰਨਾ ਮਾਰਿਆ ਗਿਆ। ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੂੰ ਬੇਦਖਲ ਕਰਨ ਲਈ ਕੀਤੀਆਂ ਜਾ ਰਹੀਆਂ ਗੁੰਡਾ ਕਾਰਵਾਈਆਂ ਦੀ ਨਿਖੇਧੀ ਕਰਦਿਆਂ ਇਸ ਦਾ ਯੋਗ ਜਥੇਬੰਦਕ ਜਵਾਬ ਦੇਣ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ।
 
ਫਾਜ਼ਿਲਕਾ : ਇੱਥੇ ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ, ਕੁਲ ਹਿੰਦ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਖੇਤ ਮਜਦੂਰ ਸਭਾ ਵਲੋਂ ਜ਼ੋਰਦਾਰ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਗੁਰਮੇਜ ਸਿੰਘ ਗੇਜੀ, ਰਾਮ ਕੁਮਾਰ, ਜੱਗਾ ਸਿੰਘ ਖੂਹੀਆਂ ਸਰਵਰ, ਨੱਥਾ ਸਿੰਘ, ਗੁਰਚਰਨ ਸਿੰਘ ਅਰੋੜਾ ਆਦਿ ਸਾਥੀਆਂ ਨੇ ਇਸ ਜ਼ਿਲ੍ਹੇ ਅੰਦਰ ਜਗੀਰੂ ਧੱਕਿਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਲਾਮਬੰਦ ਹੋਣ ਦਾ ਸੱਦਾ ਦਿੱਤਾ।
 
ਤਰਨ ਤਾਰਨ : ਡੀ.ਸੀ. ਦਫਤਰ ਮੋਹਰੇ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਚਮਨ ਲਾਲ ਦਰਾਜਕੇ, ਸਤਪਾਲ ਪੱਟੀ, ਸਾਥੀ ਦੇਵੀ ਕੁਮਾਰੀ ਆਦਿ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
ਪਠਾਨਕੋਟ : ਲਾਲ ਚੰਦ ਕਟਾਰੂਚੱਕ, ਹਜਾਰੀ ਲਾਲ, ਅਜੀਤ ਰਾਜ, ਜਨਕ ਰਾਜ ਸਰਨਾ ਅਤੇ ਅਨੇਕਾਂ ਹੋਰਨਾਂ ਆਗੂਆਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿਚ ਪ੍ਰਭਾਵਸ਼ਾਲੀ ਰੋਸ ਐਕਸ਼ਨ ਹੋਇਆ।
 
ਪਟਿਆਲਾ : ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ, ਕੁਲ ਹਿੰਦ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ, ਪੰਜਾਬ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ ਵਲੋਂ ਪਰਵਾਂ ਧਰਨਾ ਮਾਰਿਆ ਗਿਆ।
ਗੁਰਦਾਸਪੁਰ : ਸਰਵਸਾਥੀ ਸ਼ਿੰਦਾ ਛਿੱਥ, ਜਸਵੰਤ ਬੁਟਰ ਅਤੇ ਮਜ਼ਦੂਰ ਮੁਕਤੀ ਮੋਰਚਾ ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਆਗੂਆਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿਚ ਰੋਸ ਧਰਨਾ ਮਾਰਿਆ ਗਿਆ।
ਫਰੀਦਕੋਟ : ਇੱਥੇ ਪੰਜਾਬ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ, ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ, ਕੁਲ ਹਿੰਦ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ ਵਲੋਂ ਮਲਕੀਤ ਸਿੰਘ, ਗੁਰਤੇਜ ਸਿੰਘ ਹਰੀਨੌ, ਮਾਸਟਰ ਬੂਟਾ ਸਿੰਘ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਹੇਠ ਰੋਸ ਧਰਨਾ ਮਾਰਿਆ ਗਿਆ। ਇਸ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਨਵਾਂ ਸ਼ਹਿਰ, ਮੋਗਾ, ਫਿਰੋਜ਼ਪੁਰ, ਲੁਧਿਆਣਾ, ਫਤਿਹਗੜ੍ਹ ਸਾਹਿਬ, ਹੁਸ਼ਿਆਰਪੁਰ, ਰੋਪੜ ਵਿਖੇ ਵੀ ਜਨਤਕ ਰੋਸ ਐਕਸ਼ਨ ਕੀਤੇ ਗਏ।


ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਵੱਲੋਂ ਕਿਸਾਨ ਮੰਗਾਂ ਲਈ ਸੂਬੇ ਭਰ ਵਿਚ ਧਰਨੇ 

ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਦੇ ਸੱਦੇ 'ਤੇ ਰਾਜ ਭਰ 'ਚ ਤਹਿਸੀਲ ਕੇਂਦਰਾਂ 'ਤੇ ਧਰਨੇ ਦਿੱਤੇ ਗਏ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਧਰਨਿਆਂ ਦੌਰਾਨ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੀਆਂ ਮੁਸ਼ਕਲਾਂ ਦੇ ਹੱਲ ਲਈ ਜੋਰਦਾਰ ਅਵਾਜ਼ ਬੁਲੰਦ ਕੀਤੀ ਗਈ। 13 ਜੂਨ ਨੂੰ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਇਨ੍ਹਾਂ ਧਰਨਿਆਂ ਦੌਰਾਨ ਕੰਮ ਦਾ ਸੀਜ਼ਨ ਹੋਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਕਾਫੀ ਉਤਸ਼ਾਹ ਦੇਖਣ ਨੂੰ ਮਿਲਿਆ। ਇਨ੍ਹਾਂ 'ਚ ਕਿਸਾਨਾਂ ਵਲੋਂ ਕਿਸਾਨ ਖੁਦਕੁਸ਼ੀਆਂ ਨੂੰ ਰੋਕਣ ਲਈ ਅਤੇ 10 ਏਕੜ ਜ਼ਮੀਨ ਦੇ ਮਾਲਕ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੇ ਸਾਰੇ ਕਰਜ਼ਿਆਂ 'ਤੇ ਲੀਕ ਫੇਰਨ ਦੀ ਜੋਰਦਾਰ ਮੰਗ ਕੀਤੀ ਗਈ। ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਜੋਰਦਾਰ ਅਵਾਜ਼ 'ਚ ਕਿਹਾ ਕਿ ਜਿਸ ਢੰਗ ਨਾਲ ਕਰਜੇ ਤੋਂ ਦੁਖੀ ਕਿਸਾਨ ਖੁਦਕਸ਼ੀਆਂ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ, ਇਹ ਬਹੁਤ ਹੀ ਚਿੰਤਾਂ ਵਾਲਾ ਵਿਸ਼ਾ ਹੈ। ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਮੰਗ ਕੀਤੀ ਕਿ ਖੁਦਕੁਸ਼ੀ ਕਰ ਚੁੱਕੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੇ ਪਰਵਾਰਾਂ ਨੂੰ 5 ਲੱਖ ਦਾ ਮੁਆਵਜ਼ਾ ਦਿੱਤਾ ਜਾਵੇ ਅਤੇ ਪਰਵਾਰ ਦੇ ਇੱਕ ਜੀਅ ਨੂੰ ਸਰਕਾਰੀ ਨੌਕਰੀ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇ। ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਝੋਨੇ ਦੇ ਚਲੰਤ ਸੀਜ਼ਨ 'ਚ 8 ਘੰਟੇ ਨਿਰਵਿਘਨ ਬਿਜਲੀ ਦੀ ਸਪਲਾਈ ਨੂੰ ਯਕੀਨੀ ਬਣਾਉਣ ਦੀ ਮੰਗ ਵੀ ਕੀਤੀ। ਨਹਿਰੀ ਪਾਣੀ ਦੀ ਸਪਲਾਈ ਹਰ ਖੇਤ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਾਉਣ ਅਤੇ ਮੀਂਹ ਦੇ ਪਾਣੀ ਦੀ ਸਾਂਭ-ਸੰਭਾਲ ਲਈ ਜੰਗੀ ਪੱਧਰ 'ਤੇ ਯਤਨ ਕੀਤੇ ਜਾਣ, ਬੰਜਰ ਜ਼ਮੀਨਾਂ ਦੇ ਅਬਾਦਕਾਰਾਂ ਨੂੰ ਮਾਲਕੀ ਦੇ ਹੱਕ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣ, ਗੰਨੇ ਤੇ ਕਣਕ ਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਬਕਾਏ ਤੁਰੰਤ ਕਿਸਾਨਾਂ ਨੂੰ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣ ਅਤੇ ਆਉਣ ਵਾਲੇ ਸੀਜ਼ਨ 'ਚ 15 ਅਕਤੂਬਰ ਤੋਂ ਖੰਡ ਮਿੱਲਾਂ ਚਲਾਈਆਂ ਜਾਣ। ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਧਰਨਿਆਂ ਦੌਰਾਨ ਕਿਹਾ ਕਿ ਸਰਕਾਰ ਦੀਆਂ ਕਿਸਾਨ ਮਾਰੂ ਨੀਤੀਆਂ ਕਾਰਨ ਕਿਸਾਨ ਸੰਕਟ ਦਾ ਸ਼ਿਕਾਰ ਹੈ, ਕਰਜ਼ੇ ਦੇ ਬੋਝ ਥੱਲੇ ਦੱਬਿਆ ਅੰਨਦਾਤਾ ਅਖਵਾਉਣ ਵਾਲਾ ਕਿਸਾਨ ਅੱਜ ਖੁਦਕੁਸ਼ੀਆਂ ਦੇ ਰਾਹ ਪੈ ਗਿਆ ਹੈ, ਇਸ ਦਾ ਕਾਰਨ ਸਬਸਿਡੀਆਂ 'ਚ ਕਟੌਤੀ ਅਤੇ ਲਾਹੇਵੰਦ ਭਾਅ ਨਾ ਮਿਲਣਾ ਹੈ। ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਮੰਗ ਕੀਤੀ ਕਿ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੀਆਂ ਫਸਲਾਂ ਦਾ ਬੀਮਾਂ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ ਅਤੇ 10 ਏਕੜ ਦੇ ਮਾਲਕ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੇ ਬੀਮੇ ਦੀ ਕਿਸ਼ਤ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇ। ਸਰਹੱਦੀ, ਕੰਢੀ, ਮੰਡ-ਬੇਟ ਏਰੀਆ ਅਤੇ ਨਰਮਾ ਪੱਟੀ ਦੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੀਆਂ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਸਮੱਸਿਆਵਾਂ ਹੱਲ ਕੀਤੀਆਂ ਜਾਣ। ਹਰ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੀ ਜ਼ਮੀਨ 'ਤੇ ਖੇਤੀ ਕਰ ਰਹੇ ਆਬਾਦਕਾਰ ਕਿਸਾਨਾਂ ਨੂੰ ਮਾਲਕੀ ਦੇ ਹੱਕ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣ ਅਤੇ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਕਿਸਾਨਾਂ ਨੂੰ ਮਾਲਕੀ ਹੱਕ ਦਿੱਤੇ ਜਾ ਚੁੱਕੇ ਹਨ, ਦੇ ਹੱਕ ਬਹਾਲ ਰੱਖੇ ਜਾਣ। ਸਾਰੀਆਂ ਕਿਸਾਨੀ ਜਿਣਸਾਂ ਸਮੇਤ ਲੱਕੜ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਖਰੀਦੀਆਂ ਜਾਣ ਅਤੇ ਲਾਗਤ ਕੀਮਤ ਘੱਟ ਕਰਕੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਨੂੰ ਸਵਾਮੀਨਾਥਨ ਕਮਿਸ਼ਨ ਮੁਤਾਬਿਕ ਭਾਅ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣ। ਬੇਲਗਾਮ ਖੁੱਲੀ ਮੰਡੀ ਅਤੇ ਈ-ਮਾਰਕੀਟਿੰਗ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਬੰਦ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇ।
ਸੂਬਾ ਕੇਂਦਰ 'ਤੇ ਪੁੱਜੀਆਂ ਰਿਪੋਰਟਾਂ ਮੁਤਾਬਿਕ ਹੇਠ ਅਨੁਸਾਰ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਥਾਵਾਂ 'ਤੇ ਧਰਨੇ ਦਿੱਤੇ ਗਏ :
 
ਹੁਸ਼ਿਆਰਪੁਰ : ਇਸ ਜ਼ਿਲ੍ਹੇ ਅੰਦਰ ਮੁਕੇਰੀਆਂ ਅਤੇ ਹੁਸ਼ਿਆਰਪੁਰ ਵਿਖੇ ਐਸ.ਡੀ.ਐਮ. ਦਫਤਰਾਂ ਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਰੋਸ ਧਰਨੇ ਮਾਰੇ ਗਏ ਅਤੇ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਦਿੱਤੇ ਗਏ। ਮੁਕੇਰੀਆਂ ਵਿਖੇ ਸਭਾ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਸਾਥੀ ਸਵਰਨ ਸਿੰਘ, ਸੂਬਾ ਕਮੇਟੀ ਮੈਂਬਰ ਸਾਥੀ ਅਮਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਨੇ ਅਤੇ ਹੁਸ਼ਿਆਰਪੁਰ ਵਿਖੇ ਸਭਾ ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਸਕੱਤਰ ਸਾਥੀ ਦਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਕੱਕੋਂ ਨੇ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਦੇ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਕੀਤੀ।
 
ਮਾਨਸਾ :  ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਜਿਲ੍ਹਾ ਕਮੇਟੀ ਮਾਨਸਾ ਵੱਲੋਂ ਐਸ.ਡੀ.ਐਮ. ਮਾਨਸਾ ਦੇ ਦਫਤਰ ਸਾਹਮਣੇ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ, ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਭਾਰੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿੱਚ ਕਿਸਾਨ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋਏ। ਧਰਨੇ ਦੀ ਪ੍ਰਧਾਨਗੀ ਜਿਲ੍ਹਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਸੁਖਦੇਵ ਸਿੰਘ ਅਤਲਾ ਕਲਾਂ ਨੇ ਕੀਤੀ। ਧਰਨਾਕਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਸੂਬਾ ਮੀਤ ਪ੍ਰਧਾਨ ਛੱਜੂ ਰਾਮ ਰਿਸ਼ੀ ਨੇ ਵਿਸਥਾਰ ਨਾਲ ਕਿਸਾਨੀ ਮੰਗਾਂ 'ਤੇ ਚਾਨਣਾ ਪਾਇਆ। ਇਸ ਨੂੰ ਮੇਜਰ ਸਿੰਘ ਦੂਲੋਵਾਲ, ਦਸੌਂਧਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰਪੁਰ, ਗੁਰਜੰਟ ਸਿੰਘ ਅਲੀਸ਼ੇਰ, ਨਾਤਾ ਸਿੰਘ ਫਫੜੇ, ਗੁਰਿੰਦਰ ਜੋਸ਼ੀ, ਤੇਜ ਸਿੰਘ ਮੌਜੋ ਖੁਰਦ, ਹਰਚਰਨ ਸਿੰਘ ਮੌੜ ਆਦਿ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ। 15 ਸੂਤਰੀ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਵੀ ਐਸ.ਡੀ.ਐਮ., ਮਾਨਸਾ ਨੂੰ ੱਿਦੱਤਾ ਗਿਆ । ਸਟੇਜ ਸਕੱਤਰ ਦੀ ਡਿਊਟੀ ਅਮਰੀਕ ਸਿੰਘ ਫਫੜੇ ਨੇ ਨਿਭਾਈ।
 
ਬਠਿੰਡਾ :  ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਦੀ ਬਠਿੰਡਾ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਇਕਾਈ ਦੇ ਇੱਕ ਵਫਦ ਨੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਉੱਚ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਰਾਹੀਂ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਇੱਕ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਭੇਜਦਿਆਂ ਕਿਸਾਨ ਸਮੱਸਿਆਵਾਂ ਦੇ ਸਾਰਥਕ ਨਿਪਟਾਰੇ ਦੀ ਮੰਗ ਕੀਤੀ। ਵਫਦ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਸੁਖਦੇਵ ਸਿੰਘ ਨਥਾਣਾ ਅਤੇ ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਦਰਸ਼ਨ ਸਿੰਘ ਫੁੱਲੋਮਿੱਠੀ ਨੇ ਕੀਤੀ। 
ਵਫਦ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਉਪਰੋਕਤ ਮੰਗਾਂ ਦੇ ਯੋਗ ਹੱਲ ਸਸਤੇ ਝੋਨਾ ਲੁਆਈ ਦੇ ਸੀਜਨ ਪਿੱਛੋਂ ਪੜਾਅਵਾਰ ਸੰਘਰਸ਼ ਆਰੰਭਿਆ ਜਾਵੇਗਾ।
 
ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ : ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ ਵੱਲੋਂ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਅਨੁਸਾਰ ਸੋਮਵਾਰ ਨੂੰ ਜਥੇਬੰਦੀ ਦੇ ਆਗੂਆਂ ਬਾਬਾ ਅਰਜਨ ਸਿੰਘ, ਬੂਟਾ ਸਿੰਘ, ਰਾਜ ਬਲਵੀਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਸੂਬਾ ਮੀਤ ਪ੍ਰਧਾਨ ਰਤਨ ਸਿੰਘ ਰੰਧਾਵਾ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ 'ਚ ਰੋਸ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ।
ਮਜੀਠਾ : ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਦੇ ਸੱਦੇ 'ਤੇ ਮਜੀਠਾ ਵਿਖੇ ਵੀ ਵਿਸ਼ਾਲ ਰੋਸ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਜਥੇਬੰਦੀ ਦੇ ਸਟੇਟ ਕਮੇਟੀ ਮੈਂਬਰ ਹਰਭਜਨ ਸਿੰਘ, ਕਾਰਜ ਸਿੰਘ ਮਜੀਠਾ ਅਤੇ ਕਰਮ ਸਿੰਘ ਝੰਡੇ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 
ਬਾਬਾ ਬਕਾਲਾ : ਬਾਬਾ ਬਕਾਲਾ ਵਿੱਚ ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ ਵੱਲੋਂ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਰੋਸ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਬਲਦੇਵ ਸਿੰਘ ਸੈਦਪੁਰ, ਗੁਰਮੇਜ ਸਿੰਘ ਤਿੰਮੋਵਾਲ, ਹਰਪ੍ਰੀਤ ਸਿੰਘ ਸਰਪੰਚ ਬੁਟਾਰੀ, ਨਿਸ਼ਾਨ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਧਰਮ ਸਿੰਘ ਧਿਆਨਪੁਰ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 
ਅਜਨਾਲਾ : ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ ਵੱਲੋਂ ਅਜਨਾਲਾ ਕਸਬੇ ਵਿੱਚ ਦਿਤੇ ਗਏ ਰੋਸ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਜਥੇਬੰਦੀ ਦੇ ਸੂਬਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਡਾ. ਸਤਨਾਮ ਸਿੰਘ ਅਜਨਾਲਾ, ਸੀਤਲ ਸਿੰਘ ਤਲਵੰਡੀ, ਅਜੀਤ ਕੌਰ, ਸਾਬਕਾ ਸਰਪੰਚ ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਉਮਰਪੁਰਾ ਤੇ ਕੁਲਵੰਤ ਸਿੰਘ ਮੋਲੋਨੰਗਲ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 
ਲਹਿਰਾਗਾਗਾ : ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਦੇ ਸੱਦੇ ਉੱਤੇ ਤਹਿਸੀਲ ਕਮੇਟੀ ਲਹਿਰਾਗਾਗਾ ਵੱਲੋਂ ਇੱਕ ਜਥਾ ਮਾਰਚ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਨਵੀਂ ਅਨਾਜ ਮੰਡੀ ਤੋਂ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਕੇ ਐੱਸ. ਡੀ. ਐੱਮ. ਦਫ਼ਤਰ ਤੱਕ ਮਾਰਚ ਕਰਨ ਉਪਰੰਤ ਇਕ ਰੈਲੀ ਕੀਤੀ ਗਈ। ਇਸ ਮਾਰਚ ਵਿੱਚ ਜ਼ਮੀਨ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਮੇਟੀ ਦੀ ਜਲੂਰ ਇਕਾਈ ਦੇ ਮਰਦ ਅਤੇ ਔਰਤਾਂ ਨੇ ਵੀ ਭਰਵੀਂ ਸ਼ਮੂਲੀਅਤ ਕੀਤੀ।
ਰੈਲੀ ਵਿਚ ਪੁੱਜੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਦੇ ਸੂਬਾਈ ਮੀਤ ਪ੍ਰਧਾਨ ਕਾਮਰੇਡ ਭੀਮ ਸਿੰਘ ਆਲਮਪੁਰ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
ਇਸ ਮੌਕੇ ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਵੱਲੋਂ ਕਿਸਾਨਾਂ-ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀਆਂ 15 ਮੰਗਾਂ ਵਾਲਾ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਦੇ ਨਾਂਅ ਲਿਖਿਆ ਇੱਕ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਸੌਂਪਿਆ ਗਿਆ।


ਜਨਤਕ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਐੱਸ ਐੱਸ ਪੀ ਦਫਤਰ ਅੱਗੇ ਧਰਨਾ 

ਬਟਾਲਾ : ਜਨਤਕ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦੇ ਸਾਂਝੇ ਮੋਰਚੇ ਤਹਿਸੀਲ ਬਟਾਲਾ (ਜੇ ਪੀ ਐੱਮ ਓ) ਵੱਲੋਂ ਸਥਾਨਕ ਪੁਲਸ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨ ਖਿਲਾਫ ਦਲਿਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਬੀਬੀ ਪ੍ਰਵੀਨ ਕੌਰ ਕੋਟਲਾ ਸ਼ਰਫ ਦੀ ਕੁੱਟਮਾਰ ਕਰਨ ਅਤੇ ਜਾਤੀ ਸੂਚਕ ਸ਼ਬਦ ਬੋਲਣ ਵਾਲੇ ਦੋਸ਼ੀਆਂ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫਤਾਰ ਨਾ ਕਰਨ ਸੰਬੰਧੀ ਅਤੇ ਕੁਲਜੀਤ ਸਿੰਘ ਮਿਸ਼ਰਪੁਰਾ ਦੇ ਪਰਵਾਰ 'ਤੇ ਝੂਠਾ ਪਰਚਾ ਕਰਨ ਵਿਰੁੱਧ ਵੀਰ ਹਕੀਕਤ ਰਾਏ ਸਮਾਧ 'ਤੇ ਰੈਲੀ ਕੀਤੀ ਗਈ। ਜਿਸਦੀ ਪ੍ਰਧਾਨਗੀ ਸਰਵਸਾਥੀ ਸ਼ਿੰਦਾ ਛਿੱਥ, ਗੁਰਦਿਆਲ ਘੁਮਾਣ, ਜਗੀਰ ਸਿੰਘ ਕਿਲ੍ਹਾ ਲਾਲ ਸਿੰਘ, ਬੀਬੀ ਰਜਵੰਤ ਕੌਰ ਨੇ ਕੀਤੀ। ਜਿਸ ਵਿੱਚ  ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ, ਪੰਜਾਬ ਨਿਰਮਾਣ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ, ਲਾਲ ਝੰਡਾ ਪੰਜਾਬ ਭੱਠਾ ਲੇਬਰ ਯੂਨੀਅਨ, ਜਨਵਾਦੀ ਇਸਤਰੀ ਸਭਾ, ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ, ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੌਜਵਾਨ ਸਭਾ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਸੁਬਾਰਡੀਨੇਟ ਸਰਵਸਿਜ ਫੈਡਰੇਸ਼ਨ ਆਦਿ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦੇ ਆਗੂ ਅਤੇ ਵਰਕਰ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋਏ। ਰੈਲੀ ਕਰਨ ਉਪਰੰਤ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿੱਚ ਰੋਸ ਮੁਜ਼ਾਹਰਾ ਕਰਕੇ ਐੱਸ ਐੱਸ ਪੀ ਦਫਤਰ ਬਟਾਲਾ ਅੱਗੇ ਵਿਸ਼ਾਲ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਜੇ ਪੀ ਐੱਮ ਓ ਅਤੇ ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਦੇ ਸੂਬਾ ਜਾਇੰਟ ਸਕੱਤਰ ਕਾਮਰੇਡ ਰਘਬੀਰ ਸਿੰਘ ਪਕੀਵਾ ਨੇ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਅਸੀਂ ਇਹਨਾਂ ਦੋਵਾਂ ਕੇਸਾਂ ਵਿੱਚ ਇਨਸਾਫ ਲੈਣ ਲਈ 10 ਮਹੀਨਿਆਂ ਤੋਂ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ, ਪਰ ਪੁਲਸ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨ ਵੱਲੋਂ ਕੋਈ ਵੀ ਇਨਸਾਫ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ, ਉਲਟਾ ਇਨਕੁਆਰੀ ਵਿੱਚ ਦੋਵੇਂ ਕੇਸ ਲਟਕਾਏ ਗਏ।
ਇਸ ਮੌਕੇ ਨੌਜਵਾਨ ਆਗੂ ਸ਼ਮਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨਵਾਂ ਪਿੰਡ, ਕਾਮਰੇਡ ਜਸਵੰਤ ਸਿੰਘ ਬੁੱਟਰ, ਮਾਨਾ ਮਸੀਹ ਬਾਲੇਵਾਲ, ਪਰਮਜੀਤ ਘਟੀਸਪੁਰ, ਬੀਬੀ ਸ਼ਿੰਦਰ ਕੌਰ ਮਨੇਸ਼, ਖੁਸ਼ਵੰਤ ਸਿੰਘ ਸੰਦਲਪੁਰ, ਰਿੰਕੂ ਰਾਜਾ, ਮੁਖਤਾਰ ਸਿੰਘ ਭਾਗੋਵਾਲ ਅਤੇ ਕਲਿਆਣ ਸਿੰਘ ਰਿਖਿਆ ਆਦਿ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।



ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਨੂੰ ਕੁੱਟ-ਕੁੱਟ ਕੇ ਮਾਰਨ ਵਿਰੁੱਧ ਜਨਤਕ ਦਬਾਅ ਨਾਲ ਦਰਜ ਕਰਵਾਇਆ ਕੇਸ 

ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਨੇ ਤਰਨ ਤਾਰਨ ਦੇ ਪਿੰਡ ਪੱਖੋਕੇ ਦੇ ਇਕ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਹਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਕੁੱਟ-ਕੁੱਟ ਮਾਰ ਦੇਣ ਵਾਲੇ ਜਿਮੀਦਾਰ ਪਿਓ-ਪੁੱਤ ਵਿਰੁਧ ਮੁਕੱਦਮਾ ਦਰਜ ਕਰਨ ਲਈ ਪੁਲਸ ਨੂੰ ਮਜ਼ਬੂਰ ਕਰ ਦਿੱਤਾ।
ਜ਼ਿਕਰਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਹਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਵਾਸੀ ਪੱਖੋਕੇ, ਬਲਕਾਰ ਸਿੰਘ ਪੁੱਤਰ ਸਵਰਨ ਸਿਘ ਵਾਸੀ ਪੱਖੋਕੇ ਨਾਲ ਕਰੀਬ ਤਿੰਨ ਸਾਲਾਂ ਤੋਂ ਸੀਰੀ ਚਲਿਆ ਆ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਉਸ ਵਲੋਂ ਘਰੋਂ ਲੇਟ ਹੋਣ ਦੇ ਕਾਰਨ ਉਸ ਨੂੰ ਬਲਕਾਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਉਸ ਦੇ ਲੜਕੇ ਸੁਖਚੈਨ ਸਿੰਘ ਨੇ ਕੁੱਟ-ਕੁੱਟ ਕੇ ਅਧਮੋਇਆ ਕਰ ਦਿੱਤਾ। ਜਦ ਉਹ ਜਖਮਾਂ ਦੀ ਤਾਬ ਨਾ ਝੱਲਦਾ ਹੋਇਆ ਦਮ ਤੋੜ ਗਿਆ ਤਾਂ ਦੋਸ਼ੀਆਂ ਨੇ ਹਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਪਰਿਵਾਰ ਨੂੰ ਇਹ ਕਹਿ ਕੇ ਗੁੰਮਰਾਹ ਕਰਨ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕੀਤੀ ਕਿ ਬਿਜਲੀ ਦਾ ਕਰੰਟ ਲੱਗਣ ਕਾਰਨ ਹਰਜੀਤ ਦੀ ਮੌਤ ਹੋਈ ਹੈ। ਬਾਅਦ 'ਚ ਉਹ ਲਾਸ਼ ਘਰ ਦੇ ਬਾਹਰ ਸੁੱਟ ਕੇ ਚਲੇ ਗਏ। ਪਰਿਵਾਰ ਨੇ ਸਰੀਰ 'ਤੇ ਪਏ ਕੁੱਟ ਦੇ ਨਿਸ਼ਾਨ ਦੇਖ ਕੇ ਸਥਾਨਕ ਪੁਲਿਸ ਨੂੰ ਸੂਚਿਤ ਕੀਤਾ ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ 'ਤੇ ਕੋਈ ਅਸਰ ਨਾ ਹੋਇਆ। ਬਾਅਦ 'ਚ 181 ਨੰ. 'ਤੇ ਫੋਨ ਕਰਨ 'ਤੇ ਪੁਲਸ ਮੁਲਾਜ਼ਮ ਆਏ ਅਤੇ ਲਾਸ਼ ਪੋਸਟਮਾਰਟਮ ਲਈ ਲੈ ਗਏ। ਪਰਿਵਾਰ ਦੇ ਬਿਆਨ ਵੀ ਦਰਜ ਕੀਤੇ ਗਏ ਪਰ ਅੱਗੋਂ ਕੋਈ ਕਾਰਵਾਈ ਨਾ ਹੋਈ।  ਇਹ ਪਤਾ ਲੱਗਣ 'ਤੇ ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੌਜਵਾਨ ਸਭਾ ਦੇ ਆਗੂ ਬਲਦੇਵ ਸਿੰਘ ਪੰਡੋਰੀ, ਸੀ ਪੀ ਐੱਮ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਆਗੂ ਕਾਮਰੇਡ ਬਲਬੀਰ ਸੂਦ, ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਦੇ ਆਗੂ ਚਰਨਜੀਤ ਸਿੰਘ ਬਾਠ, ਮੁਖਤਾਰ ਸਿੰਘ ਮੱਲ੍ਹਾ, ਮਨਜੀਤ ਸਿੰਘ ਸੱਗੂ, ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ ਦੇ ਆਗੂ ਚਮਨ ਲਾਲ ਦਰਾਜਕੇ, ਜਸਬੀਰ ਸਿੰਘ ਵੈਰੋਵਾਲ, ਕਰਮ ਸਿੰਘ ਫਤਿਆਬਾਦ, ਗੁਰਮੁਖ ਸਿੰਘ, ਅਜੀਤ ਸਿੰਘ, ਦਾਰਾ ਸਿੰਘ ਮੁੰਡਾਪਿੰਡ ਆਦਿ ਆਗੂਆਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿਚ ਸਿਵਲ ਹਸਪਤਾਲ ਦੇ ਬਾਹਰ ਧਰਨਾ ਮਾਰਿਆ ਗਿਆ। ਉਕਤ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਮੰਗ ਕੀਤੀ ਕਿ ਹਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਕਾਤਲਾਂ 'ਤੇ 302 ਦੀ ਧਾਰਾ ਤਹਿਤ ਪਰਚਾ ਦਰਜ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ ਅਤੇ ਦੋਸ਼ੀਆਂ ਨੂੰ ਫੌਰੀ ਗ੍ਰਿਫਤਾਰ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ। ਮੌਕੇ 'ਤੇ ਪਹੁੰਚੇ ਡੀ ਐੱਸ ਪੀ ਸਿਟੀ ਸ੍ਰੀ ਹਰਪਾਲ ਸਿੰਘ ਨੇ ਧਰਨਾਕਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਦਿਵਾਇਆ ਕਿ ਦੋਸ਼ੀਆਂ ਖਿਲਾਫ ਬਣਦੀਆਂ ਧਾਰਾਵਾਂ ਤਹਿਤ ਪਰਚਾ ਦਰਜ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇਗਾ ਪਰ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦਿਲਾਸਿਆਂ ਦਾ ਮੁਜਾਹਰਾਕਾਰੀਆਂ 'ਤੇ ਕੋਈ ਅਸਰ ਨਾ ਹੋਇਆ। ਸਾਥੀ ਬਲਦੇਵ ਸਿੰਘ ਪੰਡੋਰੀ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਪੁਲਸ ਦੋਸ਼ੀਆਂ ਨੂੰ ਸ਼ਹਿ ਦੇ ਰਹੀ ਹੈ ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਅਕਾਲੀ ਆਗੂ ਅਲਵਿੰਦਰਪਾਲ ਸਿੰਘ ਪੱਖੋਕੇ ਦੇ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਹਨ।  ਇਸ ਮੌਕੇ ਬੁੱਧ ਸਿੰਘ, ਪੱਖੋਕੇ, ਹਰਜਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਪੱਖੋਕੇ, ਪੰਜਾਬ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ ਦੇ ਆਗੂ ਗੁਰਦੇਵ ਸਿੰਘ, ਦੇਵੀ ਕੁਮਾਰੀ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਸਮਾਜ ਸੇਵਕ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦੇ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ। ਪੁਲਸ ਨੂੰ ਆਖਰਕਾਰ ਮਜ਼ਬੂਰ ਹੋ ਕੇ ਪਿਓ-ਪੁੱਤ ਵਿਰੁੱਧ ਧਾਰਾ 302/34 ਅਧੀਨ ਪਰਚਾ ਦਰਜ ਕਰਨਾ ਪਿਆ। ਐੱਫ ਆਈ ਆਰ ਦੀ ਕਾਪੀ ਮਿਲਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਲਾਸ਼ ਦਾ ਪੋਸਟ ਮਾਰਟਮ ਕਰਵਾ ਕੇ ਵਾਰਸਾਂ ਹਵਾਲੇ ਕੀਤੀ ਗਈ। ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਪੁਲਸ ਦੇ ਉੱਚ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਚਿਤਾਵਨੀ ਦਿੰਦਿਆਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਜੇਕਰ ਮੁਲਜ਼ਮਾਂ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫਤਾਰ ਨਾ ਕੀਤਾ ਤਾਂ ਐਕਸ਼ਨ ਕਮੇਟੀ ਬਣਾ ਕੇ ਤਿੱਖਾ ਸੰਘਰਸ਼ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇਗਾ।


ਅਜਨਾਲਾ ਵਿਖੇ ਪੁਲਸ ਵਧੀਕੀਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਧਰਨਾ

 ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ, ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ, ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੌਜਵਾਨ ਸਭਾ, ਅਤੇ ਹੋਰ ਲੋਕ ਹਿਤੂ ਜਨ ਸੰਗਠਨਾਂ ਵਲੋਂ ਥਾਣਾ ਭਿੰਡੀ ਸੈਦਾਂ ਅਤੇ ਐਸ.ਡੀ.ਐਮ. ਦਫਤਰ ਮੂਹਰੇ ਜ਼ੋਰਦਾਰ ਧਰਨਾ ਮਾਰਿਆ ਗਿਆ। ਪੁਲਸ ਵਿਰੁੱਧ ਧਰਨਾ ਐਸ.ਐਚ.ਓ. ਭਿੰਡੀ ਸੈਦਾਂ ਦੇ ਹੈਂਕੜਬਾਜਾਂ 'ਤੇ ਪੱਖਪਾਤੀ ਵਤੀਰੇ ਵਿਰੁੱਧ ਅਤੇ ਐਸ.ਡੀ.ਐਮ. ਅਜਨਾਲਾ ਦੇ ਦਫਤਰ ਮੂਹਰੇ ਹਰੇਕ ਨਾਗਰਿਕ ਵਿਭਾਗ ਦੇ ਰੋਜਾਨਾ ਕੰਮਾਂ ਵਿਚ ਸੱਤਾਧਾਰੀਆਂ ਦੇ ਸਿਆਸੀ ਦਖਲ ਵਿਰੁੱਧ ਮਾਰਿਆ ਗਿਆ। ਸੱਤਾਧਾਰੀਆਂ ਦੇ ਹੁਕਮ ਦੇ ਬੱਧੇ ਸਿਵਲ ਅਤੇ ਪੁਲਸ ਅਧਿਕਾਰੀ ਸ਼ਰ੍ਹੇਆਮ ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਅਤੇ ਸਥਾਪਤ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨਿਕ ਮਾਪਦੰਡਾਂ ਦੀਆਂ ਧੱਜੀਆਂ ਉਡਾ ਰਹੇ ਹਨ। ਇੱਥੋਂ ਤੱਕ ਕਿ ਵਿਰੋਧੀ ਪੰਚਾਇਤਾਂ ਅਤੇ ਚੁਣੇ ਜਨਤਕ ਅਹੁਦੇਦਾਰਾਂ ਦੀਆਂ ਬੇਇੱਜ਼ਤੀਆਂ ਕੀਤੀਆਂ ਜਾ ਰਹੀਆਂ ਹਨ। ਦੋਹਾਂ ਧਰਨਿਆਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਡਾਕਟਰ ਸਤਨਾਮ ਸਿੰਘ ਅਜਨਾਲਾ, ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਉਮਰਪੁਰਾ, ਬੀਬੀ ਅਮਰਜੀਤ ਕੌਰ ਕੋਟ ਰਜਾਦਾ, ਸ਼ੀਤਲ ਸਿੰਘ ਤਲਵੰਡੀ, ਅਮਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਭੀਲੋਵਾਲ, ਜਸਬੀਰ ਸਿੰਘ ਜਸਰਾਊਰ, ਸੁਖਦੇਵ ਸਿੰਘ ਬਰੀਕੀ, ਕੁਲਵੰਤ ਸਿੰਘ ਮੱਲੂਨੰਗਲ ਨੇ ਕੀਤੀ। ਦੋਹਾਂ ਧਰਨਿਆਂ 'ਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋਏ ਜਨਤਕ ਕਾਰਕੁੰਨਾਂ ਅਤੇ ਆਮ ਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਸੰਗਰਾਮੀ ਭਾਵਨਾਵਾਂ ਇੰਨੀਆਂ ਪ੍ਰਬਲ ਸਨ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਘੰਟਿਆਂ ਬੱਧੀ ਕੜਕਦੀ ਧੁੱਪ ਦੀ ਪ੍ਰਵਾਹ ਨਾ ਕਰਦਿਆਂ ਸਰਕਾਰ ਦੀ ਨਾਂਹ ਪੱਖੀ ਨਖਿੱਧ ਕਾਰਗੁਜਾਰੀ ਦਾ ਡੱਟਵਾਂ ਵਿਰੋਧ ਕੀਤਾ।
 

देहाती मजदूर सभा द्वारा फतेहाबाद डी.सी. दफ्तर समक्ष धरना 
देहाती मजदूर सभा जिला कमेटी फतेहाबाद की तरफ से 2 जून को डिप्टी कमिश्नर दफ्तर के सामने धरना दिया गया। धरने की अध्यक्षता साथी नत्थु राम चौबारा ने की व धरने का संचालन साथी सुखचैन सिंह जिला सचिव पूर्व सरपंच ने किया। इस धरने में पूरे जिले से सैंकड़ों मजदूरों व महिलाओं ने हिस्सेदारी की। इस धरने की मुख्य मांगें थीं नरेगा का काम जिले के सभी गांवों में जल्दी शुरू किया जाये व बकाया राशि का जल्दी भुगतान किया जाये, मनरेगा के काम वाले कानून को 365 दिन में परिवर्तन करके पूरा साल काम दिया जाये। शहरों के मजदूरों को मनरेगा के कानून से जोड़ कर काम दिया जाऐ, गांवों व शहरों में सर्वे करके बिना शर्त पीले व गुलाबी राशन कार्ड भी बनाए जाएं। डिपुओं पर 14 वस्तुएं सब्सीडी पर दी जाये। सभी भूमिहीन मजदूरों को पंजाब की तर्ज पर 200 यूनिट बिजली प्रतिमाह मुफ्त दी जाये। बिजली के 23 सब स्टेशनों का निजीकरण करना बंद करे, शहर भूना की गरीब बस्तियों में पीने के पानी के कनेक्शन मुफ्त दिये जाएं व साफ पानी का प्रबंध किया जाए, भूमिहीन मजदूरों को फालतू सरकारी व बंजर शामलात जमीन बांटी जाए।
मुख्य वक्ता राज्य कनवीनर साथी तेजिंदर सिंह रतिया, राज्य कमेटी सदस्य पंजाब नरेंद्र कुमार सोमा ने अपने विचार रखे। साथी तेजिंदर सिंह ने कहा मनरेगा काम 100 दिन देने की बजाए पूरे साल दिया जाए व मनरेगा का जो बजट है वो 2 लाख 35 हजार करोड़ किया जाए, सभी सरकारी व अद्र्धसरकारी महकमों में ठेकेदारी प्रथा को रोककर मजदूरों को काम दिया जाए। इसके साथ साथ सरकार सभी गावों में दोबारा सर्वे करके सभी लोगों को बिना शर्त पीले व गुलाबी राशन कार्ड बनाए जाएं ताकि मजदूर हरियाणा सरकार की योजनाओं का लाभ ले सकें। मोदी सरकार के शासनो में महंगाई दोगुनी हो गई है । सभी वस्तुओं के दाम आसमान को छू रहे हैं और सरकार 23 सब डिविजनों में बिजली निगम को प्राईवेट हाथों में सौंप रही है वह सरासर गलत है। इस पर रोक लगाई जाए। इस धरने को साथी जीत सिंह, सुरजीत सिंह, भोला सिंह नक्टा, राजाराम, जसविंद कौर, देवराज सहनाल, नौजवान सभा के साथी मनदीप सिंह नथवान, अमन रतिया ने भी संबोधित किया।
रिपोर्ट सुखचैन सिंह, जिला सचिव
 
रतिया में शिक्षा शिविर का आयोजन
 रतिया (हरियाणा) में विगत 8 एवं 9 जून को पार्टी शिक्षा शिविर का आयोजन किया गया। इस दो दिवसीय शिविर में क्रांतिकारी दर्शन (माकर््सवादी फलसफा), क्रांतिकारी युद्धनीति (भारत में मजदूर किसान शासन स्थापित करने का प्रोग्राम) एवं कांतिकारी संगठन विषयों पर व्याख्यान दिये गये। समाजिक क्रांतिकारी संगठन विषयों पर व्याख्यान दिये गए। सामाजिक क्रांति के इच्छुक अनेकों नये पुराने कार्यकत्र्ताओं ने जहां विषयों के अंर्तगत व्याख्यानों को गंभीरतापूर्वक सुना वहीं अनेकों प्रश्न भी पूछे। कुल मिला कर यह शिविर गहन विचार विमर्श पर आधारित ज्ञान वितरण माहौल में ढल गया। सी.पी.एम. पंजाब के सचिव साथी मंगत राम पासला एवं राज्य सचिव मंडल सदस्य साथी महीपाल ने चयनित विषयों पर प्रारंभिक जानकारी पूर्ण व्याषयान दिये। उपरंत तीनों विषयों पर गहन प्रश्नावली एवं विचार विर्मश हुआ।
रिपोर्टो : निर्भय रतिया  


हरियाणा स्टूडैंटस यूनियन द्वारा कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में सहायता शिविर
हरियाणा स्टडैंटस यूनियन द्वारा विगत दिनों कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में पहली बार दाखिला लेने पहुंचे शिक्षार्थियों के लिये एक सहायता शिविर लगाया गया। शिविर में विभिन्न पाठयक्रम विभागों, दाखिले के लिये अनिवार्य दस्तावेजों, फीसों तथा अन्य शुल्कों, आवागमन के साधनों, विभागीय प्रमुखों आदि संबंधी नवांगुतकों को जानकारी दी गई। इस अवसर पर छपा कर बांटे गये हाथपर्चे द्वारा शिक्षार्थियों को हरियाणा स्टूडैंटस यूनियन के उद्देश्यों से अवगत कराया गया तथा संगठन का सदस्य बनने का आग्रह किया गया।                                   
रिर्पोट : अमन रतिया

ਬਾਬਾ ਬਕਾਲਾ ਵਿਖੇ ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ ਵੱਲੋਂ ਡੀ ਐੱਸ ਪੀ ਦਫਤਰ ਅੱਗੇ ਧਰਨਾ 

ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ ਅਤੇ ਸੀ ਪੀ ਐੱਮ ਪੰਜਾਬ ਵੱਲੋਂ ਡੀ ਐੱਸ ਪੀ ਦਫਤਰ ਬਾਬਾ ਬਕਾਲਾ ਸਾਹਿਬ ਅੱਗੇ ਰੋਸ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਇਕੱਠ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਸੂਬਾਈ ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਕਾਮਰੇਡ ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਦਾਊਦ, ਸੂਬਾਈ ਮੀਤ ਪ੍ਰਧਾਨ ਅਮਰੀਕ ਸਿੰਘ ਦਾਊਦ, ਗੁਰਮੇਜ ਸਿੰਘ ਤਿੱਮੋਵਾਲ ਅਤੇ ਬਲਦੇਵ ਸਿੰਘ ਸੈਦਪੁਰ ਨੇ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਪਿੰਡ ਦਾਊਦ ਦਾ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਪੁੱਤਰ ਗੱਜਣ ਸਿੰਘ, ਗੱਜਣ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਪਰਮਜੀਤ ਕੌਰ ਦੀ ਮਦਦ ਨਾਲ ਪਿੰਡ ਦੀ ਹੀ ਇਕ ਗਰੀਬ ਪਰਵਾਰ ਦੀ ਲੜਕੀ ਨਾਲ ਵਿਆਹ ਕਰਨ ਦਾ ਝਾਂਸਾ ਦੇ ਕੇ ਉਸਦਾ ਜਿਸਮਾਨੀ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਕਰਦਾ ਰਿਹਾ। ਇਸ ਸੰਬੰਧੀ ਥਾਣਾ ਬਿਆਸ ਵਿਖੇ 28 ਮਈ ਨੂੰ ਪਰਚਾ ਦਰਜ ਹੋ ਚੁੱਕਾ ਹੈ, ਪਰ ਕਈ ਦਿਨ ਬੀਤ ਜਾਣ ਪਿੱਛੋਂ ਵੀ ਪੁਲਸ ਨੇ ਦੋਸ਼ੀਆਂ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫਤਾਰ ਕਰਨ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ। ਉਕਤ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਚਿਤਾਵਨੀ ਦਿੱਤੀ ਕਿ ਜੇਕਰ ਪਰਵਾਰ ਨੂੰ  ਇਨਸਾਫ ਨਾ ਮਿਲਿਆ ਤਾਂ ਇਨਸਾਫ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਤੱਕ ਤਿੱਖਾ ਘੋਲ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇਗਾ। ਇਸ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਸਰਵਸਾਥੀ ਬਚਨ ਸਿੰਘ ਜਸਪਾਲ, ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਭਿੰਡਰ, ਸੁਖਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਦਾਊਦ, ਬਲਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਖਿਲਚੀਆਂ, ਕਮਲ ਸ਼ਰਮਾ ਮੱਦ, ਜਸਵੰਤ ਸਿੰਘ ਬਾਬਾ ਬਕਾਲਾ, ਪ੍ਰੇਮ ਸਿੰਘ ਤਲਾਵਾਂ, ਗੁਰਮੇਜ ਸਿੰਘ ਤਲਵੰਡੀ, ਪਾਲ ਸਿੰਘ ਪੱਡੇ, ਬੀਰ ਸਿੰਘ, ਸੂਰਤਾ ਸਿੰਘ ਬੁੱਟਰ, ਨਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ, ਵਡਾਲਾ, ਨਿਸ਼ਾਨ ਸਿੰਘ ਧਿਆਨਪੁਰ, ਦਲਬੀਰ ਸਿੰਘ ਮਹਿਤਾ, ਦਲਬੀਰ ਸਿੰਘ ਟਕਾਪੁਰ ਆਦਿ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ। 


ਜਨਵਾਦੀ ਇਸਤਰੀ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ ਦੀਆਂ ਸਰਗਰਮੀਆਂ ਜਨਵਾਦੀ ਇਸਤਰੀ ਸਭਾ ਦੀ ਜੁਝਾਰੂ ਬੀਬੀ ਗੁਰਮੀਤ ਕੌਰ ਸੂਫੀਆਂ ਦੀ ਯਾਦ ਨੂੰ ਸਮਰਪਤ ''ਔਰਤਾਂ ਦੀ ਬਰਾਬਰਤਾ ਅਤੇ ਸਮਾਜਕ ਜਬਰ ਵਿਰੁੱਧ ਕਾਨਫਰੰਸ'' ਬੀਤੇ ਦਿਨੀਂ ਅਜਨਾਲਾ ਵਿਖੇ ਕੀਤੀ ਗਈ ਜਿਸਨੂੰ ਸਭਾ ਦੀ ਸੂਬਾਈ ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਬੀਬੀ ਨੀਲਮ ਘੁਮਾਣ, ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਆਗੂਆਂ ਬੀਬੀ ਅਜੀਤ ਕੌਰ ਕੋਟ ਰਜ਼ਾਦਾ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਭਰਾਤਰੀ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦੇ ਸੂਬਾਈ ਤੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
ਸ਼ਹੀਦ ਗੰਜ ਕਾਲਜ਼ ਲੜਕੀਆਂ ਮੁੱਦਕੀ (ਫਿਰੋਜ਼ਪੁਰ) ਦੀ ਪ੍ਰਿੰਸੀਪਲ ਦਵਿੰਦਰ ਕੌਰ ਨੇ ਤੱਥਾਂ ਅਤੇ ਅੰਕੜਿਆਂ ਸਹਿਤ ਔਰਤਾਂ ਨੂੰ ਦਰਪੇਸ਼ ਆਰਥਕ-ਸਮਾਜਕ-ਸੱਭਿਆਚਾਰਕ ਦੁਸ਼ਵਾਰੀਆਂ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਸਮੁੱਚੇ ਕਿਰਤੀ ਵਰਗਾਂ ਦੀਆਂ ਦਿੱਕਤਾਂ ਜਿਵੇਂ ਬੇਰੋਜ਼ਗਾਰੀ, ਮਹਿੰਗਾਈ, ਜਿਣਸੀ ਅਪਰਾਧ, ਬਾਲ ਮਜ਼ਦੂਰੀ, ਪੀਣ ਵਾਲੇ ਸਵੱਛ ਪਾਣੀ ਅਤੇ ਰੋਗ ਰਹਿਤ ਆਲਾ ਦੁਆਲਾ, ਅਨਪੜ੍ਹਤਾ, ਆਮ ਅਪਰਾਧਾਂ ਆਦਿ ਬਾਰੇ ਭਰਪੂਰ ਜਾਣਕਾਰੀ ਦਿੱਤੀ। ਬੀਬੀ ਗੁਰਮੀਤ ਕੌਰ ਦੇ ਯੁੱਧ ਸਾਥੀ ਹੱਥਾਂ 'ਚ ਝੰਡੇ ਮਾਟੋ ਫੜੀ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸੁਪਨਿਆਂ ਦਾ ਬਰਾਬਰਤਾ ਅਧਾਰਤ ਸਮਾਜ ਸਿਰਜਣ ਦੇ ਦ੍ਰਿੜ ਨਿਸ਼ਚੇ ਸਮੇਤ ਬਰਸੀ ਕਾਨਫਰੰਸ ਵਿਚ ਪੁੱਜੇ।
 

ਗੁਰਦਾਸਪੁਰ : ਜਨਵਾਦੀ ਇਸਤਰੀ ਸਭਾ ਦੀ ਗੁਰਦਾਸਪੁਰ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਇਕਾਈ ਵਲੋਂ ਪੰਡੋਰੀ, ਮਿਸ਼ਰਪੁਰਾ, ਚੋਣੇ, ਬੋਲਵਾਲ, ਵੀਲਾ ਬੱਜੂ, ਧੰਦੋਈ, ਹਰਗੋਬਿੰਦਪੁਰ, ਮੰਡ, ਮਨੇਛ, ਚੀਮਾ ਖੁੱਡੀ, ਰੋੜੀ, ਲੰਗਿਆਂਵਾਲੀ ਆਦਿ ਵਿਖੇ ਭਰਵੀਆਂ ਮੀਟਿੰਗਾਂ ਕੀਤੀਆਂ ਗਈਆਂ। ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਆਗੂਆਂ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਸੂਬਾਈ ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਬੀਬੀ ਨੀਲਮ ਘੁਮਾਣ ਨੇ ਮੀਟਿੰਗਾਂ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ। ਵਧੇਰੇ ਥਾਂਈਂ ਤੁਰੰਤ ਦਖਲ ਦੇ ਕੇ ਮਨਰੇਗਾ ਜਾਬ ਕਾਰਡ, ਜਨਮ ਸਰਟੀਫਿਕੇਟ ਆਦੀ ਬਣਵਾਏ ਗਏ। ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਅਨੁਸਾਰ ਯੂਨਿਟ ਚੋਣਾਂ ਹੋਈਆਂ ਅਤੇ ਮੈਂਬਰਸ਼ਿਪ ਕੀਤੀ ਗਈ।
 

ਪੰਡੋਰੀ : ਪ੍ਰਧਾਨ ਭੈਣ ਕੁਲਵਿੰਦਰ ਕੌਰ ਅਤੇ ਸਕੱਤਰ ਬੀਬੀ ਹਰਜਿੰਦਰ ਕੌਰ ਚੁਣੀਆਂ ਗਈਆਂ।
 

ਮਿਸ਼ਰਪੁਰਾ : ਬੀਬੀ ਲਾਡੋ ਪ੍ਰਧਾਨ, ਬੀਬੀ ਜੋਤੀ ਕੌਰ ਸਕੱਤਰ ਅਤੇ 7 ਮੈਂਬਰੀ ਕਮੇਟੀ ਚੁਣੀ ਗਈ।
 

ਚੋਣੇ : ਅਮਰਜੀਤ ਕੌਰ ਪ੍ਰਧਾਨ, ਲਖਵਿੰਦਰ ਕੌਰ ਸਕੱਤਰ ਅਤੇ 7 ਮੈਂਬਰੀ ਕਮੇਟੀ ਚੁਣੀ ਗਈ।
 

ਬੋਲੇਵਾਲ : ਵਿਖੇ 13 ਮੈਂਬਰੀ ਕਮੇਟੀ ਚੁਣਦਿਆਂ ਪ੍ਰਧਾਨ ਬੀਬੀ ਸਰਵਣ ਕੌਰ ਅਤੇ ਸਕੱਤਰ ਸਰਬਜੀਤ ਕੌਰ ਚੁਣੀਆਂ ਗਈਆਂ।
 

ਵੀਲਾ ਬੱਜੂ : ਪ੍ਰਧਾਨ ਬਲਵਿੰਦਰ ਕੌਰ, ਅਜੀਤ ਕੌਰ ਸਕੱਤਰ ਅਤੇ 13 ਮੈਂਬਰੀ ਕਮੇਟੀ ਚੁਣੀ ਗਈ।
 

ਸੰਦੋਈ : ਸੰਦੋਈ ਵਿਖੇ ਬੀਬੀ ਪਰਮਜੀਤ ਕੌਰ ਪ੍ਰਧਾਨ ਅਤੇ ਮਹਿੰਦਰ ਕੌਰ ਸਕੱਤਰ ਚੁਣੀ ਗਈ।
 

ਰਿਪੋਰਟ : ਬੀਬੀ ਅਮਰਜੀਤ ਕੌਰ ਕੋਟ ਰਜਾਦਾ, ਸ਼ਿੰਦਰ ਕੌਰ ਮਨੇਸ਼ ਅਤੇ ਮਨਜੀਤ ਕੌਰ ਵੀਲਾ ਬੱਜੂ 


ਪੰਜਾਬ ਘਰੇਲੂ ਕਾਮਗਾਰ ਯੂਨੀਅਨ ਦੀ ਸਥਾਪਨਾਸੀ.ਟੀ.ਯੂ. ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿਚ ''ਪੰਜਾਬ ਘਰੇਲੂ ਕਾਮਗਾਰ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ'' ਦਾ ਗਠਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਉਕਤ ਉਦੇਸ਼  ਲਈ ਯੂਨੀਅਨ ਦੀ ਪਲੇਠੀ ਇਕੱਤਰਤਾ ਸ਼ਿਮਲਾ ਪਹਾੜੀ ਪਠਾਨਕੋਟ ਵਿਖੇ ਹੋਈ। ਸੀ.ਟੀ.ਯੂ. ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਸਾਥੀ ਨੱਥਾ ਸਿੰਘ, ਲਾਲ ਝੰਡਾ ਪੰਜਾਬ ਭੱਠਾ ਲੇਬਰ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਸਾਥੀ ਸ਼ਿਵ ਕੁਮਾਰ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਨਿਰਮਾਣ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਸੂਬਾਈ ਆਗੂ ਸਾਥੀ ਸੁਭਾਸ਼ ਸ਼ਰਮਾ ਨੇ ਇਕੱਤਰਤਾ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਸੰਗਠਤ ਹੋ ਕੇ ਹੱਕਾਂ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਦੇ ਰਾਹ ਤੁਰੀਆਂ ਬੀਬੀਆਂ ਅਤੇ ਕਾਮਿਆਂ ਨੂੰ ਸੰਗਰਾਮੀ ਮੁਬਾਰਕਾਂ ਦਿੱਤੀਆਂ। ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਇਸ ਮੌਕੇ ਮੰਗ ਕੀਤੀ ਕਿ ਉਸਾਰੀ ਕਿਰਤੀਆਂ ਲਈ ਬਣੇ ਭਲਾਈ ਬੋਰਡ ਦੀ ਤਰਜ਼ 'ਤੇ ਘਰੇਲੂ ਕਾਮਗਾਰ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀਆਂ ਜੀਵਨ ਹਾਲਤਾਂ ਸੁਧਾਰਨ ਲਈ ਬੋਰਡ ਦਾ ਗਠਨ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੇ ਹੱਕਾਂ ਦੀ ਰਾਖੀ ਕਰਦੇ ਸਾਰੇ ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਦੀ ਘਰੋਗੀ ਕਾਮਿਆਂ ਲਈ ਪਾਲਣਾ ਯਕੀਨੀ ਬਣਾਏ ਜਾਣ ਦੀ ਵੀ ਮੰਗ ਕੀਤੀ। ਕੰਮ ਵੇਲੇ ਹੁੰਦੇ ਦੁਰਵਿਹਾਰ, ਜਿਣਸੀ ਛੇੜਛਾੜ, ਉਜਰਤਾਂ ਦੇ ਪੈਸੇ ਸਮੇਂ ਸਿਰ ਨਾ ਦੇਣ ਜਾਂ ਉਕਾ ਹੀ ਮਾਰ ਲਏ ਜਾਣ, ਬਿਨਾਂ ਕਾਰਨ ਕੰਮ ਤੋਂ ਹਟਾ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣ ਆਦਿ ਘਟਨਾਵਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਤੁਰਤ-ਫੁਰਤ  ਜਥੇਬੰਦਕ ਦਖਲ ਸਬੰਧੀ ਠੋਸ ਫੈਸਲੇ ਲਏ ਗਏ।
ਇਸ ਮੌਕੇ ਭਵਿੱਖੀ ਕਾਰਜਾਂ ਦੀ ਸਫਲਤਾ ਹਿੱਤ ਇਕ ਕਮੇਟੀ ਦਾ ਗਠਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਜਿਸ ਵਿਚ ਅੰਜੂ ਬਾਲਾ, ਸੁਮਨ ਦੇਵੀ, ਕਮਲਾ ਦੇਵੀ, ਕਾਂਤਾ ਦੇਵੀ, ਦਰਸ਼ਨਾਂ ਦੇਵੀ, ਮਹਿੰਦਰੋ, ਅਨੀਤਾ, ਅਮਨਜੋਤੀ, ਰਜਨੀ ਦੇਵੀ, ਅਲਕਾ, ਆਸ਼ਾ ਰਾਣੀ, ਸੰਤੋਸ਼ ਕੁਮਾਰੀ, ਰਿਤੂ ਬਾਲਾ, ਦਰਸ਼ਨਾਂ, ਪਰਮਜੀਤ ਕੌਰ, ਜਿਊਤੀ, ਪਿੰਕੀ, ਕਿਰਨਾ, ਪੂਜਾ, ਪੂਨਮ, ਰਮਾ ਦੇਵੀ, ਰਜਨੀ ਦੇਵੀ, ਸੰਯੋਗਤਾ, ਨਿਧੀ, ਰੂਪ ਰਾਣੀ, ਸ਼ਾਲਿਨੀ ਸ਼ਰਮਾ, ਸ਼ਸ਼ੀ ਬਾਲਾ, ਰਾਜ ਦੁਲਾਰੀ ਆਦਿ ਨੂੰ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਦਿੱਤੀ ਗਈ।         
ਰਿਪੋਰਟ : ਸੁਭਾਸ਼ ਸ਼ਰਮਾ  




ਭੱਠਾ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਦੀ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਜਿੱਤ
ਗੁਰਦਾਸਪੁਰ : ਜ਼ਿਲ੍ਹੇ ਦੇ ਭੱਠਾ ਮਜ਼ਦੂਰ ਕਈ ਦਿਨਾਂ ਤੋਂ ਆਪਣੀ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਵਿਚ ਵਾਧੇ ਲਈ ਸੰਘਰਸ਼ ਦੇ ਰਾਹ 'ਤੇ ਸਨ। ਇਸਦੇ ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਲੇਬਰ ਅਫਸਰ ਗੁਰਦਾਸਪੁਰ ਦੇ ਦਫਤਰ ਵਿਖੇ ਲੇਬਰ ਅਫਸਰ ਸ੍ਰੀ ਕਰਨੈਲ ਸਿੰਘ ਸਿੱਧੂ ਅਤੇ ਲੇਬਰ ਇੰਸਪੈਕਟਰ ਸ੍ਰੀਮਤੀ ਪਰਮਜੀਤ ਕੌਰ ਦੀ ਹਾਜ਼ਰੀ ਵਿੱਚ ਲਾਲ ਝੰਡਾ ਪੰਜਾਬ ਭੱਠਾ ਲੇਬਰ ਯੂਨੀਅਨ ਸੰਬੰਧਤ ਸੀ ਟੀ ਯੂ ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਭੱਠਾ ਮਾਲਕ ਐਸੋਸੀਏਸ਼ਨ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਗੁਰਦਾਸਪੁਰ ਵਿਚਕਾਰ ਭੱਠਾ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਦੇ ਪਿਛਲੇ ਮਿਲਦੇ ਰੇਟਾਂ ਵਿੱਚ ਹੋਏ ਵਾਧੇ ਨਾਲ ਨਵੇਂ ਰੇਟਾਂ ਦਾ ਸਮਝੌਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਹੁਣ ਭੱਠਿਆਂ 'ਤੇ ਕੰਮ ਕਰਦੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੂੰ ਗਰਮੀ ਦੇ ਸੀਜ਼ਨ ਵਿੱਚ ਕੀਤੇ ਕੰਮ ਦੀ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਤੈਅ ਕੀਤੇ ਰੇਟ ਅਨੁਸਾਰ ਮਿਲੇਗੀ, ਜਿਵੇਂ ਕੱਚੀਆਂ ਇੱਟਾਂ ਪੱਥਣ ਵਾਲੇ ਪਥੇਰ ਕਿਰਤੀਆਂ ਨੂੰ ਮੋਟੀ ਇੱਟ ਪ੍ਰਤੀ ਹਜ਼ਾਰ 712 ਰੁਪਏ, ਟਾਇਲ ਇੱਟ 737 ਰੁਪਏ, ਪੱਕੀਆਂ ਇੱਟਾਂ ਦੀ ਨਿਕਾਸੀ ਅਤੇ ਕੇਰੀ 240 ਰੁਪਏ, ਪੱਕੀਆਂ ਇੱਟਾਂ ਦੀ ਲੋਡਿੰਗ- ਅਨਲੋਡਿੰਗ ਦਾ ਪਿਛਲੇ ਮਿਲਦੇ ਰੇਟ ਵਿੱਚ 3 ਰੁਪਏ ਦਾ ਵਾਧਾ, ਪਥੇਰ, ਮਜ਼ਦੂਰ ਨੂੰ ਰੇਹੜੀ, ਕਹੀਆਂ ਅਤੇ ਪਿੜ ਬਣਾਈ 4 ਰੁਪਏ ਪ੍ਰਤੀ ਹਜ਼ਾਰ ਪਥੇਰ ਰੇਟ ਨਾਲੋਂ ਅਲੱਗ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣਗੇ। ਸਰਦੀਆਂ ਦੇ ਸੀਜ਼ਨ ਵਿੱਚ ਘੱਟੋ-ਘੱਟ ਉਜਰਤਾਂ ਵਿੱਚ ਜੋ ਵਾਧਾ 1-9-2016 ਤੋਂ ਹੋਵੇਗਾ, ਉਹ ਵਾਧਾ ਇਨ੍ਹਾਂ ਰੇਟਾਂ ਵਿੱਚ ਜੋੜਿਆ ਜਾਵੇਗਾ। ਸਮਝੌਤੇ ਵੇਲੇ ਕਿਰਤੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਲਾਲ ਝੰਡਾ ਪੰਜਾਬ ਭੱਠਾ ਲੇਬਰ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਕਾਮਰੇਡ ਜਸਵੰਤ ਸਿੰਘ ਬੁੱਟਰ, ਮੀਤ ਪ੍ਰਧਾਨ ਕਾਮਰੇਡ ਕਰਮ ਸਿੰਘ ਵਰਸਾਲਚੱਕ, ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਕਾਮਰੇਡ ਸ਼ਿਵ ਕੁਮਾਰ ਅਤੇ ਕਮੇਟੀ ਮੈਂਬਰ ਸਾਥੀ ਮਨਹਰਨ ਹਾਜ਼ਰ ਸਨ।