Tuesday, 4 August 2015

कम्युनिस्ट आंदोलन की स्थिति व समाधान

मंगत राम पासला  
राजनीतिक क्षेत्रों में, पिछले लोक सभा चुनावों तथा इससे पहले पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में सीपीआई (एम) की हुई करारी हार के संदर्भ में, कम्युनिस्ट आंदोलन के कमजोर होने की चर्चा आम ही होती रहती है। यह एक कड़वी सच्चाई भी है। संसद व विधानसभाओं में वामपंथ का घटता प्रतिनिधित्व, प्राप्त मतों घटता का प्रतिशत इस कमी व जन लामबंदी के पक्ष से जन आधार का सिमटना इस तथ्य के सूचक हैं। पारंपरिक कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा अन्य राजनीतिक दलों से गठजोड़ व सांठ-गांठ करने, चुनावी सहयोग बनाने तथा कुछेक कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा सरकारें बनाने सबंधी सरगर्मी करने की ‘विशेषज्ञता’, जिसे वाम आंदोलन के राजनीति में बढ़े प्रभाव का सूचक माना जाता था, के अलोप हो जाने  को भी कई टिप्पणीकार कम्युनिस्ट आंदोलन का कमजोर हो जाना मान रहे हैं। जब कुछेक कम्युनिस्ट नेताओं की पूंजीपति-जागीरदार वर्गों की पार्टियों से राजनीति मेलजोल व सामाजिक सहयोग को मीडिया में भी खूब प्रचारा जाता था, तब यह सब कुछ मौजूदा व्यवस्था के चालकों के अनूकूल था। उनके लिए, वाम आंदोलन के ‘हाशिये पर सिमट जाने’ के बाद अब ऐसा करना निरर्थक व नुकसानदेह समझा जा रहा है। निर्णय तब भी कम्युनिस्ट विरोधियों के हाथों में था तथा अब भी। जबकि कुछ कम्युनिस्ट क्षेत्रों में भी इस बारे में भ्रम पाला जा रहा है।
कम्युनिस्टों की संसद व विधानसभाओं में बढ़े हुए प्रतिनिधित्व के पीछे, इसके द्वारा, जनहितों की रक्षा के लिए लड़े जाते संघर्षों, बलिदान तथा सरकारों के जन विरोधी कदमों के विरुद्ध लामबंद किए गए जनसंघर्षों का बड़ा हाथ होता है। परंतु कई अवसरों पर इन जीतों में अन्य दलों से किए गए समझौते व बनाए गए संयुक्त मंचों की भी अच्छी खासी भूमिका नजर आती है। कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में आंध्रप्रदेश, पंजाब, तामिलनाडू, बिहार, यूपी आदि प्रातों में इस तथ्य को आसानी से देखा व समझा जा सकता है। जहां क्षेत्रीय दलों से मिलकर वामपंथी पार्टियों ने कई बार अच्छी संसदीय जीतें हासिल की हैं। चाहे लंबे समय के तजुर्बे के आधार पर हम यह पूरे विश्वास से कह सकते हैं कि ऐसी जीतों के बावजूद यहां कम्युनिस्टों का आधार घटा ही है। इसलिए इस तथ्य को नजरअंदाज किए बिना की देश में वाम आंदोलन कमजोर हुआ है, सिर्फ प्राप्त मतों व संसद/विधानसभाओं के सदस्यों की घटी या बढ़ी संख्या से ही वास्तविक कम्युनिस्ट आधार को नहीं मापा जाना चाहिए। अन्य दलों से मिलकर जीती गई अधिक सीटें या हासिल किए गए मत न तो वामपंथी आंदोलन की वास्तविक शक्ति को रूपमान करते हैं तथा न ही इन आंदोलनों के भविष्य के प्रसार में सहायक होते हैं। कई बार सत्ताधारी पक्षों द्वारा गैर-जनवादी व अनैतिक हथकंडों द्वारा पैदा की गई जटिल परिस्थितियों में भी वामपंथीयों की कारगुजारी अपनी शक्ति के अनुसार नहीं होती। परंतु यह एक अटल सचाई है कि कम्युनिस्ट सिद्धांतों पर पहरा देते हुए अपनाया गया दरूस्त राजनीतिक स्टैंड वास्तविक रूप में कम्युनिस्ट आंदोलन का निर्माण करने व मजबूत करने में हमेशा ही अंतिम रूप में मददगार साबित होता है। अवसरवादी संसदीय भटकाव का शिकार होकर शोषक वर्गों की राजनीतिक पार्टियों व नेताओं से किये गए सहयोग के फलस्वरूप बाहरी रूप में दिख रहे झूठे जनआधार या छवि को वामपंथी जनआधार मानना सरासर गलत व अवैज्ञानिक है। ऐसी सावधानी इसलिए भी जरूरी है कि जब पूंजीवाद द्वारा कम्युनिस्ट विचारधारा को आप्रसंगिक सिद्धांत बताकर सिकुड़ते वामपंथी जनआधार के बारे में धुंआधार प्रचार किया जा रहा है तथा कम्युनिस्ट पार्टियां खुद भी इस बारे में आत्मचिंतन कर रही हैं, उस समय वाम आंदोलन का गलत मित्थाायओं के आधार पर मुल्यांकन करने से आंदोलन के प्रति लोगों में फैली निराशा व गलतफहमी बढ़ती है व भविष्य में इसके विकास से लिए हानीकारक सिद्ध होती है।
वाम आंदोलन की वर्तमान स्थिति के बारे में अंतरमुखता से बचते हुए तथ्यों पर आधारित ठीक निर्णय करने की आवश्यकता है, जिससे अतीत की गलतियों को सुधारक र आगे बढ़ा जा सकता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के स्वतंत्रता संग्राम में कम्युनिस्टों द्वारा निभाई गई बलिदान भरी शानदार भूमिका तथा कांग्रेसी सरकारों की जनविरोधी नीतियों के विरूद्ध तथा लोगों के हितों की रक्षा के लिए लड़े गए संघर्षों के कारण कम्युनिस्ट आंदोलन एक मजबूत व प्रभावशाली पक्ष के रूप में उभरा था। काफी समय तक, कांग्रेस के अतिरिक्त पूंजीवादी-जागीरदार वर्गों की अन्य राजनीतिक पार्टियां अस्तित्व में ही नहीं आईं थी या फिर काफी कमजोर थीं। आरएसएस व अन्य सांप्रदायिक संगठनों द्वारा स्वतंत्रता संग्राम के दौरान निभाए गए साम्राज्यवादपरस्त  तथा  विघटनकारी भूमिका के कारण फिरकू शक्तियों की जनता में पकड़ भी अभी काफी ढीली थी। कम्युनिस्ट आंदोलन का तेज विकास देखते हुए सत्ताधारी वर्गों ने अपने हितों की रक्षा के लिए कांग्रेसी सरकारों के प्रति पैदा हो रही बेचैनी को नई उभर रही अन्य धनी पार्टियों के पीछे लामबंद करने में बड़ी सहायता की। ऐसा करने की जरूरत एक तो सत्ताधारी पक्षों के समक्ष संभावित ‘लाल खतरे’ को टालने के लिए थी व दूसरा पूंजीवादी विकास माडल को बेरोकटोक आगे बढ़ाने के लिए।
कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा जबरदस्त जनसंघर्षोें के बूते जनमत प्राप्त करके पश्चिम बंगाल, केरल व त्रिपुरा में वामपंथी सरकारें कायम की गई जिन्होंने जनकल्याण के लिए अनेक प्रभावशाली कदम भी उठाए। जिनके फलस्वरूप इन प्रांतों में कम्युनिस्ट आंदोलनों का जन आधार भी बढ़ा व मजबूत हुआ। परंतु जब इन वामपंथी सरकारों ने ऐसी जनविरोधी नीतियां  लागू कीं जिनका यही वाम दल बाकी देश में डटकर विरोध करते आ रहे थे, उससे इस आदोलन को तगड़ा झटका लगा। केंद्रीय सरकार के साथ कम्युनिस्ट पार्टियों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष सहयोग ने भी कम्युनिस्टों की भिन्न स्वतंत्र जनहितैशी पहचान को ठेस पहुंचाई। पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार द्वारा सिंगूर व नंदीग्राम में किसानों की जमीनें हथियाकर जबरदस्ती विदेशी कंपनियों व भारतीय कारर्पोरेट घरानों को देने का अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मारने वाला फैसला इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
इसके अतिरिक्त विश्व स्तर पर सोवियत यूनियन व अन्य पूर्वी यूरोप के देशों में समाजवादी व्यवस्था को लगे झटकों ने भी बाकी दुनिया के कम्युनिस्ट आंदोलन की तरह भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के भीतर भी सैद्धांतिक भ्रम व निराशा पैदा की। इसके अतिरिक्त, सैद्धांतिक रूप में देश के वाम आंदोलन के कमजोर होने का एक प्रमुख कारण दक्षिणपंथी व वामपंथी भटकाव भी हैं, जिनके परिणामस्वरूप यह भिन्न-भिन्न भागों में बंट गई। कम्युनिस्टों का एक भाग संशोधनवादी भटकाव का शिकार होकर वर्ग संघर्ष के रास्ते पर भटक कर वर्गीय सहयोग की पटड़ी पर चढ़ गया, जबकि वामपंथी भटकाव का शिकार दूसरा भाग (माओवादी व अन्य वामपंथी गु्रप) दुसाहसवाद के रास्ते पर चलकर मेहनतकश लोगों के विशाल भागों से अलग-थलग पडक़र जनवादी आंदोलन के घेरे से बाहर निकल गए। इस भटकाव ने सत्ताधारी वर्गों को वाम आंदोलन पर दमन तेज करने का एक और बहाना प्रदान कर दिया, जो पहले ही अपनी सत्ता की रक्षा के लिए दमनकारी मशीनरी का खुला उपयोग निरंतर करता आ रहा था।
देश में पूंजीवादी आर्थिक विकास के फलस्वरूप जनसंख्या के गणनीय भाग को अच्छा आर्थिक लाभ भी पहुंचा है। बड़ी संख्या में मध्यवर्ग जो कि आर्थिक रूप में निम्न वर्ग के लोगों से अधिक संपन्न है, इस विकास माडल की उपज है। पूंजीवादी रास्ते पर हुए इस तेज आर्थिक विकास की संभावनाओं व इस ढांचे के अपने भीतरी संकटों पर काबू पाने के सामधय को कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा घटाकर आंका गया। इस समझदारी से प्रेरित होकर ही समाजवादी क्रांति की कामयाबी की फौरी संभावनाएं भी तय कर ली गई, जो अभी संभव नहीं था। इस अंतरमुखता ने कम्युनिस्ट काडर में गैर यर्थाथवादी व अवैज्ञानिक आशावाद को उत्पन किया। इसलिए पूंजीवादी आर्थिक विकास के लाभपात्री वे लोग, जो अपनी आर्थिक मुश्किलों के हल के लिए तथा जिंदगी की अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिए वाम आंदोलन से जुड़े थे (चाहे राजनीतिक व वैचारिक रूप में यह सांझ बहुत कमजोर थी), धीरे-धीरे अपने हितों की पूर्ति के लिए अन्य पूंजीवादी पार्टियों से जुडऩे लगे। मध्यवर्ग की इस टूटन से तथा मजदूरों, दलितों, आदिवासियों व अन्य पिछड़ी श्रेणियों से संबंधित जनसमूहों में वामपंथी आंदोलन की जड़ें कमजोर होने के कारण स्थिति मौजूदा त्रासदी तक पहुंच गई।
कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर आई वर्तमान अस्थिरता तथा कमी-कमजोरी को अंतरमुखता का शिकार हुए बिना ठीक संदर्भ व तथ्यों पर आधारित होकर जांचना होगा। मेहनतकश बुनियादी वर्गों में ठोस जन आधार स्थापित किए बिना अवसरवादी व्यवहारों द्वारा हासिल की गई हवा के गुब्बारे जैसी कोई ‘प्राप्ति’ पुख्ता नहीं रह सकती। अति शोषित लोगों के वर्ग आधारित जनसंघर्षों के बलबूते पर निर्मित जन आंदोलन ही आर्थिक, राजनीतिक व सैद्धांतिक संघर्षों की सीढिय़ां चढ़ता हुआ स्थाई बन सकता है तथा दुश्मन के समस्त हमलों का मुकाबला करते हुए सामाजिक परिवर्तन के तय निशाने को प्राप्त कर सकता है। कम्युनिस्टों को मध्य वर्ग के लोगों तक पहुंच करने के लिए भी नई विधियां व साधनों की तलाश करनी होगी, जिससे वाम आंदोलन के घेरे से दूर चले गए लोगों को पुन: जनवादी आंदोलन में शामिल किया जा सके। इस कार्य में कम्युनिस्टों का पिछला बलिदानों भरा शानदार इतिहास, कई गणनीय प्राप्तियां व वैज्ञानिक सोच बड़ा योगदान डाल सकती है। परंतु अवसरवादी राजनीति पर चलते हुए सत्ताधारी वर्गों के पिछलग्गू बनकर जो ‘कृत्रिम शक्ति’ प्राप्त की गई थी व झूठी प्रशंसा का शिकार होकर वर्गीय संघर्षों का रास्ता त्यागा गया था, उसे पुन: उसी ढंग से प्राप्त करने की लालसा को भी पूरी तरह त्यागना होगा। वर्गीय संघर्षों के रास्ते पर चलकर प्रफुल्लित होने वाले वाम आंदोलन को सत्ताधारी पक्ष के मीडिया व समर्थकों द्वारा बुरा भला भी कहा जाएगा व नजरअंदाज भी किया जाएगा। गैर संसदीय संघर्षों द्वारा प्राप्त जनसमर्थन से संसदीय जीतें हासिल करने में लंबा समय लग सकता है व कई बार लुटेरे सत्ताधारी वर्गों द्वारा गैर जनवादी हथकंडों से इसको असंभव भी बनाया जा सकता है। इन समस्त मुश्किलों के मद्देनजर थोड़े समय के लाभों को सामने रखकर अंतिम निशाने को कदाचित आँखों से ओझल नहीं करना चाहिए। क्रांतिकारी सामाजिक परिर्वतन का महान उद्देश्य प्राप्त करना लंबा कठिन व खतरों भरा रास्ता है। इसे हासिल करने के लिए सैद्धांतिक परिपक्वता, बलिदानों भरा व्यवहार, दृढ़ता, जुनून व प्रतिबद्धता की सख्त जरूरत है। इस रास्ते पर चलते हुए ही कम्युनिस्ट आंदोलन की मौजूदा कमजोरियों पर जीत प्राप्त करते हुए वास्तविक रूप में एक शक्तिशाली क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा किया जा सकता है।

On behalf of the CPM, I totally oppose the new declaration of Emergency

(Edited excerpts of former CPM, MP A.K. Gopalan’s speech in the Lok Sabha on July 21, 1975, clarifying the party’s stand on the Emergency)

I rise to speak in an extraordinary and most distressing situation in which 34 MPs are not here, not of their own volition, but because they have been detained without trial, and Parliament itself has been reduced to a farce and an object of contempt by Prime Minister Indira Gandhi and her party. I myself had been arrested and kept in jail for one week, and Jyotirmoy Bosu and Noorul Huda. I am an old man who cannot speak loudly now. I was released and both of them were kept inside the jail. The reasons are very clear. I am not afraid of jails because during the last 45 years, for 17 years, I have been in jail. But I am only sorry for the inhuman treatment meted out to me for two days inside the jail. I went on hunger strike. I sent a telegram to the speaker and then only the condition was changed.
I am sorry to say that as a Congressman who once fought for the freedom of this country and who courted arrest and suffered so much, I had been treated in this way. I was released only two days back. I know the reason. What about the 2,000 or 3,000 of my comrades who are inside jail today? Why were only [E.M.S.] Namboodiripad and I released? It is to show the world that no Marxist or leftist parties or opposition party members are arrested, but it is only the reactionaries who are arrested and who are responsible for all these things.
This is a session of Parliament to transact the government business, mainly, to ratify the fresh declaration of Emergency by the president on June 26 under the plea of internal security to the country, and the opposition is being prevented from playing its role: Why?
This sudden declaration is not because of a real threat to internal security but because of the judgment of the Allahabad High Court, the verdict against the Congress in the Gujarat elections, and the refusal by Gandhi to step down from the office of prime minister till the final verdict of the Supreme Court, in the context of rising disillusionment and discontent of the people with the ruling party under Gandhi’s leadership for turning the economy into a shambles, making the rich richer and the poor poorer in pursuit of the bankrupt path of capitalist development.
On  behalf of the CPM, I totally oppose the new declaration of Emergency and its ratification in this House. Many leaders of the opposition as well as 39 MPs, including some Congress leaders, are inside jail. We cannot betray the interests of the people and give our assent to the obliteration of all vestiges of democracy in India.
How is this butchery of democracy being sought to be justified? Indira Gandhi has claimed that it is to defeat the right reaction and also the so-called left extremists. All this manoeuvring is meant only to deceive the public opinion in the country and also abroad. This is the only purpose of the high-powered propaganda campaign about the so-called conspiracy and coup and much is being made of a call to the police and army not to obey illegal orders. Against this high-powered hoax of a campaign, what is the reality? It is too naive to expect the people to believe that these organisations with no mass base have suddenly become threats to internal security that can be met only by the imposition of the Emergency. The politics and ideology of these parties have to be fought and defeated politically and ideologically. If they are involved in criminal activities, they should be proceeded against under normal laws.
The measures taken by the government in the wake of the declaration of the Emergency unmistakably show that the thrust is against the people. Whatever democratic rights were available to the people have been completely obliterated. Chapter III of the Constitution enshrining the fundamental rights has become a dead letter. Articles 14 and 22 have been suspended. No criticism of the government or the Congress, however mild, is allowed to be published. No news of exploitation of the people by vested interests, of workers by the capitalists, of peasants and agricultural workers, etc, which may contain even a remote criticism of the government, is allowed. No movements of the workers, peasants, agricultural labourers, etc can take place under the plea of obstruction to production.
What the Emergency amounts to is suppression of the democratic forces. Who will believe that by suppressing the popular forces who are fighting against the monopolists and landlords, by suppressing their agitations and by denying them all democratic rights, Gandhi is fighting right reaction?
It is unfortunate that the Communist Party of the Soviet Union and some other communist parties have allowed themselves to be misled by the facade of attack against right reaction and do not see that the real thrust of these measures is against the people fighting for a better existence.
(Courtesy : The Indian Express)

ਸਮਾਜਕ-ਆਰਥਕ ਤੇ ਜਾਤੀ ਆਧਾਰਤ ਮਰਦਮਸ਼ੁਮਾਰੀ 2011 ਦੇ ਕੁੱਝ ਅੰਕੜੇ

ਭਾਰਤ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਸਾਲ 2011 ਵਿਚ ਸਮਾਜਕ ਆਰਥਕ ਤੇ ਜਾਤੀ ਅਧਾਰਤ ਮਰਦਮਸ਼ੁਮਾਰੀ ਕਰਵਾਈ ਗਈ। ਇਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਅਜਿਹੀ ਮਰਦਮਸ਼ੁਮਾਰੀ ਅੰਗਰੇਜੀ ਰਾਜ ਦੌਰਾਨ 1932 ਵਿਚ ਕਰਵਾਈ ਗਈ ਸੀ, ਜਦੋਂ ਅਜੇ ਭਾਰਤ ਆਜ਼ਾਦ ਨਹੀਂ ਹੋਇਆ ਸੀ। ਇਸ ਮਰਦਮਸ਼ੁਮਾਰੀ ਤੋਂ ਦੇਸ਼ ਅੰਦਰ ਪੇਂਡੂ ਖੇਤਰਾਂ ਵਿਚ ਵੱਧ ਰਹੀ ਆਰਥਕ ਤੇ ਸਮਾਜਕ ਅਸਮਾਨਤਾ ਬਾਰੇ ਪਤਾ ਚੱਲਦਾ ਹੈ। ਅਸੀਂ ਕੁਲ ਹਿੰਦ ਪੱਧਰ ਦੇ ਕੁੱਝ ਅੰਕੜੇ ਪਾਠਕਾਂ ਨਾਲ ਸਾਂਝੇ ਕਰ ਰਹੇ ਹਾਂ :
 
ਦੇਸ਼ ਅੰਦਰ ਵਸਦੇ ਕੁਲ 26 ਕਰੋੜ 39 ਲੱਖ ਟੱਬਰਾਂ 'ਚੋਂ ਪਿੰਡਾਂ ਵਿਚ ਰਹਿਣ ਵਾਲੇ ਟੱਬਰ 17 ਕਰੋੜ 91 ਲੱਖ ਹਨ।
 
ਆਦਿਵਾਸੀ ਤੇ ਅਨੁਸੂਚਿਤ ਜਾਤਾਂ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਟੱਬਰ 3 ਕਰੋੜ 86 ਲੱਖ
ਆਮਦਨ ਦੇ ਵਸੀਲੇ ਪੇਂਡੂ ਖੇਤਰਾਂ ਵਿਚ
9 ਕਰੋੜ 16 ਲੱਖ ਟੱਬਰ ਅਜਿਹੇ ਹਨ ਜਿਹੜੇ ਦਿਹਾੜੀ ਕਰਕੇ ਆਪਣਾ ਗੁਜ਼ਾਰਾ ਕਰਦੇ ਹਨ।
5 ਕਰੋੜ 39 ਲੱਖ ਟੱਬਰ ਖੇਤੀ ਕਰਦੇ ਹਨ।
ਹੋਰ ਜਮੀਨੀ ਤੱਥ :
 
ਪਿੰਡਾਂ ਦੇ 75% ਟੱਬਰ ਅਜਿਹੇ ਹਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸਭ ਤੋਂ ਵਧੇਰੇ ਕਮਾਉਣ ਵਾਲੇ ਮੈਂਬਰ ਦੀ ਮਾਸਕ ਆਮਦਨ 5000 ਰੁਪਏ ਤੋਂ ਘੱਟ ਹੈ।
 
ਸਿਰਫ 8.29% ਹੀ ਅਜਿਹੇ ਟੱਬਰ ਹਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਕੋਈ ਮੈਂਬਰ 10000 ਰੁਪਏ ਪ੍ਰਤੀ ਮਹੀਨੇ ਤੋਂ ਵੱਧ ਕਮਾ ਰਿਹਾ ਹੈ।
 
23.52% ਟੱਬਰ ਅਜਿਹੇ ਹਨ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚ 25 ਸਾਲ ਤੋਂ ਵੱਧ ਉਮਰ ਦਾ ਕੋਈ ਵੀ ਬਾਲਗ ਮੈਂਬਰ ਸਾਖਰ (ਪੜ੍ਹਿਆ ਲਿਖਿਆ) ਨਹੀਂ ਹੈ।
 
10.69% ਕਰੋੜ ਟੱਬਰ ਅਜਿਹੇ ਹਨ, ਜਿਹੜੇ ਅੱਤ ਦੀ ਗਰੀਬੀ ਵਿਚ ਦਿਨ ਕੱਟੀ ਕਰਦੇ ਹਨ।
 
ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਾਧਨਹੀਣ ਟੱਬਰਾਂ ਵਿਚੋਂ 21.5% ਅਨੁਸੂਚਿਤ ਜਾਤਾਂ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਹਨ। ਇਹਨਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਪੰਜਾਬ ਵਿਚ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਧ 36.74% ਹੈ।
 
40% ਟੱਬਰ ਭੂਮੀਹੀਣ ਹਨ ਅਤੇ ਦਿਹਾੜੀ ਕਰਕੇ ਆਪਣਾ ਗੁਜ਼ਾਰਾ ਕਰਦੇ ਹਨ।
 
ਖੇਤੀ ਕਰਦੇ ਟੱਬਰਾਂ 'ਚੋਂ 25% ਨੂੰ ਸਿੰਚਾਈ ਦੇ ਸਾਧਨ ਉਪਲੱਬਧ ਨਹੀਂ ਹਨ।
 
1 ਲੱਖ 80 ਹਜ਼ਾਰ ਲੋਕ ਅਜੇ ਵੀ ਸਿਰ 'ਤੇ ਮੈਲਾ ਢੋਂਦੇ ਹਨ।
 
4.6% ਟੱਬਰ ਹੀ ਟੈਕਸ ਅਦਾ ਕਰਦੇ ਹਨ।
 
17% ਪੇਂਡੂ ਟੱਬਰਾਂ ਕੋਲ ਦੋ ਪਹੀਆ ਵਾਹਨ, ਸਕੂਟਰ, ਮੋਟਰ ਸਾਈਕਲ ਆਦਿ ਹਨ।
 
2.46% ਕੋਲ ਚਾਰ ਪਹੀਆ ਵਾਹਨ, ਕਾਰ, ਟਰੱਕ ਆਦਿ ਹਨ।
 
11.04% ਲੋਕਾਂ ਕੋਲ ਫਰਿਜ ਹਨ, ਇਸ ਮਾਮਲੇ ਵਿਚ ਗੋਆ ਸਭ ਤੋਂ ਉਤੇ ਹੈ 69.37%, ਪੰਜਾਬ ਦੂਜੇ ਨੰਬਰ 'ਤੇ ਆਉਂਦਾ ਹੈ 66.43%।
 
(ਪੰਜਾਬ ਬਾਰੇ ਅੰਕੜੇ ਅਗਲੇ ਅੰਕ ਵਿਚ)

ਕੌਮਾਂਤਰੀ ਪਿੜ (ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ - ਅਗਸਤ 2015)

ਰਵੀ ਕੰਵਰ 
ਯੂਰਪੀਨ ਯੂਨੀਅਨ ਦੀ ਧੱਕੜਸ਼ਾਹੀ ਤੇ ਬਲੈਕਮੇਲ ਵਿਰੁੱਧ ਜਾਰੀ ਹੈ, ਗਰੀਸ ਦੇ ਮਿਹਨਤਕਸ਼ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਪ੍ਰਤੀਰੋਧ ਲਗਭਗ 2500 ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ ਦੁਨੀਆਂ ਵਿਚ ਜਮਹੂਰੀਅਤ ਨੂੰ ਜਨਮ ਦੇਣ ਵਾਲੇ, ਮਹਾਨ ਦਾਰਸ਼ਨਿਕਾਂ ਸੁਕਰਾਤ ਤੇ ਪਲੈਟੋ ਦੇ ਦੇਸ਼ ਗਰੀਸ (ਯੂਨਾਨ) ਦੇ ਲੋਕ ਅੱਜ ਮੁੜ ਸੰਘਰਸ਼ ਦੇ ਮੈਦਾਨ ਵਿਚ ਹਨ। ਸਾਮਰਾਜੀ ਸੰਸਾਰੀਕਰਨ ਦੇ ਸੰਕਟ ਤੋਂ ਪੈਦਾ ਹੋਏ ਮੰਦਵਾੜੇ ਤੋਂ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਅਰਥਚਾਰੇ ਨੂੰ ਕੱਢਣ ਦੇ ਨਾਂਅ ਉਤੇ ਯੂਰੋਪੀਅਨ ਕਮੀਸ਼ਨ, ਯੂਰੋਪੀਅਨ ਕੇਂਦਰੀ ਬੈਂਕ ਤੇ ਕੌਮਾਂਤਰੀ ਮੁਦਰਾ ਫੰਡ ਵਲੋਂ ਦੇਸ਼ ਦੀਆਂ ਪੂੰਜੀਵਾਦੀ ਸਰਕਾਰਾਂ ਨੂੰ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਰਾਹਤ ਪੈਕਜ਼ਾਂ, ਜਿਹੜੇ ਕਿ ਅਸਲ ਵਿਚ ਕਰਜ਼ੇ ਹੀ ਸਨ, ਦੇ ਨਾਲ ਜੁੜੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਅਧੀਨ ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕੀਤੀਆਂ ਗਈਆਂ ਕਟੌਤੀਆਂ ਅਤੇ ਨਵਉਦਾਰਵਾਦ ਅਧਾਰਤ ਸਮਾਜਕ ਤੇ ਆਰਥਕ ਨੀਤੀਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਲਗਭਗ ਇਕ ਦਹਾਕੇ ਤੋਂ ਗਰੀਸਵਾਸੀ ਨਿਰੰਤਰ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਇਸ ਸਾਲ ਜਨਵਰੀ ਵਿਚ ਹੋਈਆਂ ਚੋਣਾਂ ਵਿਚ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਸੱਤਾ ਵਿਚ ਆਈ ਖੱਬੇ ਪੱਖੀ ਸਾਈਰੀਜਾ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਆਉਣ ਨਾਲ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਆਸ ਹੀ ਨਹੀਂ ਬਲਕਿ ਪੂਰਾ ਭਰੋਸਾ ਸੀ ਕਿ ਨਿਰੰਤਰ ਲਾਗੂ ਹੋ ਰਹੀ ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕਟੌਤੀਆਂ ਦੀ ਲੜੀ ਨੂੰ ਪਿਛਲਖੁਰੀ ਮੋੜਾ ਪਵੇਗਾ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕੁੱਝ ਰਾਹਤ ਮਿਲੇਗੀ, ਪਰ ਯੂਰੋਜੋਨ ਦੀਆਂ ਆਗੂ ਯੂਰਪੀ ਸਾਮਰਾਜੀ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਨੇ ਇਸ ਖੱਬੇ ਪੱਖੀ ਸਰਕਾਰ ਦੀ ਬਾਂਹ ਮਰੋੜ ਕੇ ਉਸਨੂੰ ਬਲੈਕਮੇਲ ਕਰਕੇ ਨਵਾਂ ਰਾਹਤ ਪੈਕੇਜ਼ ਦੇਣ ਨਾਲ ਪਹਿਲਾਂ ਤੋਂ ਵੱਧ ਸਖਤ ਸ਼ਰਤਾਂ ਜੋੜ ਦਿੱਤੀਆਂ ਹਨ, ਜਿਹੜੀਆਂ ਕਿ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਜੀਣਾ ਮੁਹਾਲ ਕਰ ਦੇਣਗੀਆਂ। ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਗਰੀਸ ਵਾਸੀ 27% ਦੇ ਲਗਭਗ ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰੀ ਦੀ ਦਰ ਅਤੇ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਵਿਚ 52% ਬੇਰੁਜਗਾਰੀ ਦੀ ਦਰ ਨਾਲ ਜੂਝ ਰਹੇ ਹਨ। ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕਟੌਤੀਆਂ ਅਤੇ ਹੋਰ ਕਦਮਾਂ ਨਾਲ ਤਨਖਾਹਾਂ ਤਾਂ ਅੱਧੀਆਂ ਰਹਿ ਗਈਆਂ ਹਨ ਜਦੋਂਕਿ ਟੈਕਸ ਸੱਤ ਗੁਣਾ ਵੱਧ ਗਏ ਹਨ। ਲੋਕਾਂ ਵਲੋਂ ਖੁਦਕੁਸ਼ੀਆਂ ਕਰਨ ਦੀ ਦਰ ਵਿਚ 35% ਦਾ ਵਾਧਾ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ। ਇੱਥੇ ਇਹ ਵਰਣਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਲਗਭਗ ਦਹਾਕਾ ਭਰ ਚੱਲੇ ਨਿਰੰਤਰ ਤੇ ਬੇਕਿਰਕ ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ ਵਿਚੋਂ ਉਭਰਕੇ ਸਾਹਮਣੇ ਆਏ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਖੱਬੇ ਪੱਖੀ ਗਰੁੱਪਾਂ ਤੇ ਪਾਰਟੀਆਂ ਨੇ ਰਲਕੇ ਸਾਈਰੀਜ਼ਾ ਗਠਜੋੜ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ ਕੀਤਾ ਸੀ ਅਤੇ ਇਸਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿਚ ਪਿਛਲੇ ਕਈ ਵਰ੍ਹਿਆਂ ਤੋਂ ਇਹ ਸੰਘਰਸ਼ ਲੜੇ ਜਾ ਰਹੇ ਸਨ।
ਚੋਣਾਂ ਦੌਰਾਨ ਇਸ ਗਠਜੋੜ ਨੇ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨਾਲ ਸਪੱਸ਼ਟ ਅਤੇ ਠੋਸ ਰੂਪ ਵਿਚ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕਟੌਤੀਆਂ ਤੋਂ ਪੈਦਾ ਹੋਈਆਂ ਮੁਸ਼ਕਲਾਂ ਤੋਂ ਰਾਹਤ ਦੇਣ ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਹੌਲੀ ਹੌਲੀ ਖਤਮ ਕਰਨ ਦਾ ਵਾਅਦਾ ਕੀਤਾ ਸੀ। ਸੱਤਾ ਵਿਚ ਆਉਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਸਾਈਰੀਜਾ ਗਠਜੋੜ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਅਲੈਕਸਿਸ ਸਿਪਰਾਸ ਨੇ ਯੂਰੋਜੋਨ ਦੇ ਆਗੂਆਂ ਨਾਲ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਪੁਰਾਣੇ ਕਰਜ਼ੇ ਦੀ ਰਿਸਟਰਕਚਰਿੰਗ ਅਤੇ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਅਰਥਚਾਰੇ ਨੂੰ ਪੈਰਾਂ ਸਿਰ ਕਰਨ ਲਈ ਹੋਰ ਨਵੇਂ ਰਾਹਤ ਪੈਕੇਜ਼ ਲਈ ਗੱਲਬਾਤ ਦੇ ਕਈ ਦੌਰ ਚਲਾਏ, ਪ੍ਰੰਤੂ ਉਹ ਇਸ ਵਿਚ ਸਫਲ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕੇ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਲੋਂ ਯੂਰੋਜੋਨ ਦੇ ਦਬਾਅ ਥੱਲੇ ਆਪਣੇ ਵਲੋਂ ਚੋਣਾਂ ਦੌਰਾਨ ਕੀਤੇ ਗਏ ਲੋਕ ਪੱਖੀ ਵਾਅਦਿਆਂ ਨੂੰ ਉਲੰਘਕੇ ਵੀ ਨਵਾਂ ਰਾਹਤ ਪੈਕੇਜ਼ ਲੈਣ ਲਈ ਪੇਸ਼ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕਟੌਤੀਆਂ ਅਧਾਰਤ ਕਦਮਾਂ ਦੀ ਤਜਵੀਜ਼, ਜਿਸਨੂੰ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਨਾਂਅ ਦਿੱਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਨੂੰ ਯੂਰਪੀਨ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਪੂੰਜੀਵਾਦੀ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਪਰਵਾਨ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਵਲੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਸਾਹਮਣੇ ਇਕ ਕਟੌਤੀ ਤਜਵੀਜਾਂ ਅਧਾਰਤ ਨਵਾਂ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਰੱਖ ਦਿੱਤਾ। ਜਿਸ ਉਤੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਸਿਪਰਾਸ ਨੇ ਰਾਇਸ਼ੁਮਾਰੀ ਕਰਾਉਣ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਲੈ ਲਿਆ। ਇਸੇ ਦੌਰਾਨ 30 ਜੂਨ ਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਨੇ ਪਹਿਲਾਂ ਲਏ ਕਰਜ਼ੇ (ਰਾਹਤ ਪੈਕਜ਼ਾਂ) ਦੀ ਕਿਸ਼ਤ ਅਦਾ ਕਰਨੀ ਸੀ। ਜਿਸਨੂੰ ਗਰੀਸ ਨਹੀਂ ਅਦਾ ਕਰ ਸਕਿਆ। ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਇਹ ਖਦਸ਼ਾ ਫੈਲ ਗਿਆ ਸੀ ਕਿ ਡਿਫਾਲਟਰ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਉਸਨੂੰ ਯੂਰੋਜੋਨ ਵਿਚੋਂ ਬਾਹਰ ਕੱਢ ਦਿੱਤਾ ਜਾਵੇਗਾ। ਲੋਕਾਂ, ਖਾਸ ਕਰ ਧਨਾਢਾਂ ਵਲੋਂ ਬੈਂਕਾਂ ਤੋਂ ਪੈਸਾ ਕਢਵਾਉਣ ਵਿਚ ਕਾਫੀ ਤੇਜੀ ਆ ਗਈ ਸੀ ਅਤੇ ਪੈਸਾ ਦੇਸ਼ ਵਿਚੋਂ ਬਾਹਰ ਲਿਜਾਣ ਨੇ ਵੀ ਤੇਜ਼ ਰਫਤਾਰ ਫੜ ਲਈ। ਜਿਸ ਨਾਲ ਬੈਂਕਾਂ ਦੇ ਦਿਵਾਲੀਆ ਹੋਣ ਦਾ ਖਤਰਾ ਖੜਾ ਹੋ ਗਿਆ ਸੀ। ਜਿਸਦੇ ਮੱਦੇਨਜ਼ਰ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਬੈਂਕਾਂ ਨੂੰ 29 ਜੂਨ ਤੋਂ ਬੰਦ ਕਰਨ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਲੈਣ ਦੇ ਨਾਲ ਨਾਲ ਮੁਦਰਾ ਕੰਟਰੋਲ ਲਾਗੂ ਕਰਨ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਵੀ ਲੈਣਾ ਪਿਆ, ਜਿਸ ਅਨੁਸਾਰ ਇਕ ਵਿਅਕਤੀ ਇਕ ਦਿਨ ਵਿਚ ਬੈਂਕਾਂ ਤੋਂ ਸਿਰਫ 60 ਯੂਰੋ ਹੀ ਕਢਾਅ ਸਕਦਾ ਸੀ।
5 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਯੂਰੋ ਜ਼ੋਨ ਵਲੋਂ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਮੈਮੋਰੰਡਮ (ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕਟੌਤੀਆਂ ਅਤੇ ਨਵਉਦਾਰਵਾਦੀ ਆਰਥਕ ਅਧਾਰਤ ਤਜਵੀਜ਼) ਉਤੇ ਰਾਇਸ਼ੁਮਾਰੀ ਕਰਵਾਈ ਗਈ। ਜਿਸ ਦੌਰਾਨ ਸਾਈਰੀਜਾ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਬਿਲਕੁਲ ਦਰੁਸਤ ਪੈਂਤੜਾ ਲੈਂਦੇ ਹੋਏ ਇਸ ਨੂੰ ਰੱਦ ਕਰਨ ਭਾਵ 'ਨੋ' ਵੋਟ ਪਾਉਣ ਦਾ ਸੱਦਾ ਦਿੱਤਾ। ਜਿਸ ਨਾਲ ਯੂਰੋਜੋਨ ਦੇ ਆਗੂ ਬਹੁਤ ਤਰਲੋਮੱਛੀ ਹੋਏ। ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਪਿਛਲੇ ਕਈ ਦਹਾਕਿਆਂ ਤੋਂ ਸੱਤਾ ਵਿਚ ਰਹੇ ਸਿਆਸਤਦਾਨਾਂ ਅਤੇ ਹੋਰ ਹਾਕਮ ਜਮਾਤਾਂ ਦੀਆਂ ਪੂੰਜੀਵਾਦੀ ਪਾਰਟੀਆਂ ਨੇ ਇਸ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਦਾ ਸਮਰਥਨ ਕਰਦਿਆਂ 'ਹਾਂ' ਵੋਟ ਪਾਉਣ ਲਈ ਧੂੰਆਧਾਰ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕਰਦਿਆਂ, 'ਨੋ' ਵੋਟ ਪਾਉਣ ਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਲਈ ਆਤਮਹੱਤਿਆ ਤੱਕ ਕਰਾਰ ਦਿੱਤਾ। ਪ੍ਰੰਤੂ ਦੁੱਖ ਦੀ ਗੱਲ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਰਵਾਇਤੀ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਪਾਰਟੀ -ਕੇ.ਕੇ.ਈ. ਨੇ ਵੀ ਇਸ ਰਾਇਸ਼ੁਮਾਰੀ ਦੌਰਾਨ ਕਿਸੇ ਵੀ ਪੱਖ ਵਿਚ ਵੋਟ ਨਾ ਪਾਉਣ ਦਾ ਸੱਦਾ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਰਾਇਸ਼ੁਮਾਰੀ ਵਿਚ 'ਨੋ' ਵੋਟ, ਭਾਵ ਯੂਰੋਜੇਨ ਵਲੋਂ ਪੇਸ਼ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਨੂੰ ਰੱਦ ਕਰਨ ਵਾਲਿਆਂ ਦੀ ਭਾਰੀ ਜਿੱਤ ਹੋਈ। 'ਨੋ' ਵੋਟ 61.3% ਸੀ। ਇਥੇ ਇਹ ਵੀ ਨੋਟ ਕਰਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਕੇ.ਕੇ.ਈ. ਦੇ ਕਾਡਰ ਦੇ ਵੱਡੇ ਹਿੱਸੇ ਨੇ ਆਪਣੇ ਆਗੂਆਂ ਦੀ ਨੁਕਸਦਾਰ ਪਹੁੰਚ ਨੂੰ ਠੁਕਰਾ ਕੇ 'ਨੋ' ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਵੋਟ ਪਾਈ।
ਗਰੀਸ ਦੀ ਜਨਤਾ ਵਲੋਂ ਵੱਡੀ ਬਹੁਗਿਣਤੀ ਨਾਲ ਯੂਰੋਜੋਨ ਵਲੋਂ ਨਵੇਂ ਰਾਹਤ ਪੈਕੇਜ਼ ਨਾਲ ਜੋੜੀਆਂ ਸਮਾਜਿਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕਟੌਤੀਆਂ ਬਾਰੇ ਤਜਵੀਜਾਂ ਵਾਲੇ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਨੂੰ ਰੱਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ। ਇਸ ਤੋਂ ਅੱਗ ਬਬੂਲਾ ਹੋਏ ਯੂਰੋਜੋਨ ਦੇ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਸਿਪਰਾਸ ਅੱਗੇ ਇਕ ਹੋਰ ਨਵਾਂ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਰੱਖ ਦਿੱਤਾ। ਇਸ ਨਵੇਂ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਨੂੰ 15 ਜੁਲਾਈ ਤੱਕ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਸੰਸਦ ਵਿਚੋਂ ਪਾਸ ਕਰਵਾਉਣ ਦਾ ਅਲਟੀਮੇਟਮ ਦੇ ਦਿੱਤਾ। ਸਿਪਰਾਸ ਨੇ ਇਸ ਅਲਟੀਮੇਟਮ ਅੱਗੇ ਝੁਕਦਿਆਂ ਇਸ ਨਵੇਂ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਨੂੰ ਸੰਸਦ ਵਿਚੋਂ ਪਾਸ ਕਰਵਾਉਣ ਲਈ ਪੂਰੀ ਵਾਹ ਲਾਈ ਅਤੇ 16 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਤੜਕੇ ਸੰਸਦ ਵਿਚ ਇਹ ਪਾਸ ਹੋ ਗਿਆ। ਇਸਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ 229 ਅਤੇ ਵਿਰੋਧ ਵਿਚ 64 ਵੋਟਾਂ ਪਾਈਆਂ ਹਨ। ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਗਰੀਸ ਵਾਸੀਆਂ ਵਲੋਂ ਜਮਹੂਰੀ ਢੰਗ ਨਾਲ ਦਿੱਤੇ ਫਤਵੇ ਨੂੰ ਯੂਰਪੀ ਸਾਮਰਾਜੀ ਸ਼ਕਤੀਆਂ, ਜਿਹੜੀਆਂ ਕਿ ਜਮਹੂਰੀਅਤ ਦੀ ਰਾਖੀ ਦੇ ਬੁਲੰਦ ਬਾਂਗ ਦਾਅਵੇ ਕਰਦੀਆਂ ਨਹੀਂ ਥੱਕਦੀਆਂ ਹਨ, ਨੇ ਵਿਧਾਨਕਾਰਾਂ ਦੀ ਬਹੁਗਿਣਤੀ ਰਾਹੀਂ ਆਪਣੇ ਜਾਬਰ ਪੈਰਾਂ ਥੱਲੇ ਮਧੋਲ ਦਿੱਤਾ। ਸਾਈਰੀਜਾ ਗਠਜੋੜ ਦੀਆਂ ਦੋ ਵੱਡੀਆਂ ਧਿਰਾਂ 'ਲੈਫਟ ਕਰੰਟ' ਅਤੇ 'ਰੈਡ ਨੈਟਵਰਕ' ਨੇ ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕਟੌਤੀਆਂ ਅਧਾਰਤ ਇਸ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਦਾ ਡੱਟਕੇ ਵਿਰੋਧ ਕੀਤਾ। ਸਾਈਰੀਜਾ ਦੇ ਹੀ 39 ਸੰਸਦ ਮੈਂਬਰਾਂ ਨੇ ਇਸਦੇ ਵਿਰੋਧ ਵਿਚ ਵੋਟ ਪਾਈ। ਇਸ ਵਿਚ ਸੰਸਦ ਦੀ ਸਪੀਕਰ ਜੋਈ ਕੋਨਸਟਾਂਟੋਪੌਲੋੳ, ਊਰਜਾ ਮੰਤਰੀ, ਕਿਰਤ ਮੰਤਰੀ, ਉਪ ਕਿਰਤ ਮੰਤਰੀ ਅਤੇ ਸਾਬਕਾ ਵਿੱਤ ਮੰਤਰੀ ਯਾਨੀਸ ਵਾਰੌਫਾਕਿਸ, ਜਿਹੜੇ ਕਿ ਹਾਲੀਆ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਨਾਲ ਰਲਕੇ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਆਗੂਆਂ ਨਾਲ ਗੱਲਬਾਤ ਕਰਦਾ ਰਿਹਾ ਸੀ ਅਤੇ ਇਸ ਅਲਟੀਮੇਟਮ ਦਾ ਵਿਰੋਧ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਅਸਤੀਫਾ ਦੇ ਗਿਆ ਸੀ, ਵੀ ਸ਼ਾਮਲ ਸਨ। ਸਾਈਰੀਜਾ ਦੀ ਕੇਂਦਰੀ ਕਮੇਟੀ ਦੀ ਵੀ ਬਹੁਗਿਣਤੀ ਇਸ ਮੌਮੋਰੰਡਮ ਨੂੰ ਮੰਨਣ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਸੀ। 201 ਮੈਂਬਰੀ ਕੇਂਦਰੀ ਕਮੇਟੀ ਵਿਚੋਂ 109 ਮੈਂਬਰਾਂ ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਤਜਵੀਜਾਂ ਨੂੰ ਸੰਸਦ ਵਿਚ ਪੇਸ਼ ਕਰਨ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਕੇਂਦਰੀ ਕਮੇਟੀ ਵਿਚ ਇਨ੍ਹਾਂ 'ਤੇ ਵਿਚਾਰ ਵਟਾਂਦਰਾ ਕਰਨ ਅਤੇ ਇਸ ਬਾਰੇ ਫੈਸਲਾ ਲੈਣ ਦੀ ਮੰਗ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਇਕ ਪਟੀਸ਼ਨ ਵੀ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਸਿਪਰਾਸ ਨੂੰ ਦਿੱਤੀ ਸੀ, ਜਿਸਨੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਅਣਦੇਖਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ।
ਸੰਸਦ ਵਿਚ ਬਹਿਸ ਸਮੇਂ ਸਪੀਕਰ ਕੋਨਸਟਾਂਟੋਪੌਲੌਓ ਨੇ 25 ਜਨਵਰੀ ਨੂੰ ਹੋਈ ਜਿੱਤ ਲਈ ਆਧਾਰ ਬਣੇ ਸਾਲਾਂ ਬੱਧੀ ਚੱਲੇ ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕਟੌਤੀਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਸੰਘਰਸ਼ ਅਤੇ 5 ਜੁਲਾਈ ਦੀ ਰਾਇਸ਼ੁਮਾਰੀ ਵਿਚ 'ਨੋ' ਵੋਟ ਨੂੰ ਮਿਲੇ ਵੱਡੇ ਫਤਵੇ ਨੂੰ ਯਾਦ ਕਰਵਾਉਂਦਿਆਂ ਕਿਹਾ ''ਸਾਡੇ ਸਿਰ ਗਰੀਸ ਦੇ ਆਮ ਲੋਕਾਂ ਵਲੋਂ ਲਏ ਪੈਂਤੜੇ ਦੀ ਪੈਰਵੀ ਕਰਨ ਦਾ ਫਰਜ਼ ਬਣਦਾ ਹੈ, ਜੇਕਰ ਅਸੀਂ ਅਲਟੀਮੇਟਮਾਂ ਦੇ ਮੱਦੇਨਜ਼ਰ ਇਹ ਮੌਮੋਰੰਡਮ ਪਾਸ ਕਰਾਂਗੇ ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਧੋਖਾ ਕਰ ਰਹੇ ਹੋਵਾਂਗੇ।'' ਕੇਂਦਰੀ ਕਮੇਟੀ ਦੇ 109 ਮੈਂਬਰਾਂ ਨੇ ਇਕ ਬਿਆਨ ਜਾਰੀ ਕਰਦਿਆਂ ਕਿਹਾ ''ਇਹ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਖੱਬੀ ਧਿਰ ਦੇ ਸਿਧਾਂਤਾਂ ਤੇ ਅਸੂਲਾਂ ਦੇ ਅਨੁਕੂਲ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਪਰ ਇਸ ਤੋਂ ਵੀ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਮਿਹਨਤਕਸ਼ ਜਮਾਤ ਤੇ ਆਮ ਗ੍ਰੀਕ ਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਲੋੜਾਂ ਦੇ ਵੀ ਅਨੁਕੂਲ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਇਸਨੂੰ ਸਾਈਰੀਜਾ ਦੇ ਮੈਂਬਰ ਅਤੇ ਕਾਡਰ ਪਰਵਾਨ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦੇ। ''ਸਾਈਰੀਜਾ ਗਠਜੋੜ ਦੀ ਹੀ ਇਕ ਹੋਰ ਧਿਰ 'ਰੈਡ ਨੈਟਵਰਕ' ਨੇ ਇਕ ਬਿਆਨ ਵਿਚ ਕਿਹਾ- ''ਨਵੇਂ ਰਾਹਤ ਪੈਕੇਜ਼ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਇਸ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਵਿਚਲੀਆਂ ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕਟੌਤੀ ਤਜਵੀਜਾਂ ਦੇ ਸੰਸਦ ਵਿਚ ਪਾਸ ਹੋਣ ਨੇ ਅਮਲੀ ਰੂਪ ਵਿਚ ਸਾਈਰੀਜਾ ਸਰਕਾਰ ਦਾ ਤਖਤਾਪਲਟ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਪ੍ਰੋਗ੍ਰਾਮੈਟਿਕ ਰੂਪ ਵਿਚ ਹੀ ਨਹੀਂ ਰਾਜਨੀਤਕ ਰੂਪ ਵਿਚ ਵੀ ਸਾਈਰੀਜਾ ਸਰਕਾਰ, ਜਿਹੜੀ ਕਿ, ਸਮਾਜਕ ਕਟੌਤੀਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਸਰਕਾਰ ਸੀ ਦਾ ਕਟੌਤੀਆਂ ਦੇ ਪੱਖ ਵਿਚ ਵੱਧਦੀ ਹੋਈ ਸਰਕਾਰ ਵਿਚ ਰੂਪਾਂਤਰਣ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ।''
ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਸਿਪਰਾਸ ਨੇ ਸੰਸਦ ਵਿਚ ਬਹਿਸ ਦੇ ਅੰਤ ਵਿਚ ਬੋਲਦਿਆਂ ਇਸ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਆਪਣਾ ਪੱਖ ਪੇਸ਼ ਕਰਦਿਆਂ ਕਿਹਾ-''ਇਹ ਸਮਾਂ ਸੰਕਟ, ਫੈਸਲਾ ਲੈਣ ਅਤੇ ਜਿੰਮੇਵਾਰੀ ਲੈਣ ਦਾ ਹੈ।'' ਉਨ੍ਹਾਂ ਯੂਰਪੀਅਨ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਨਾਲ ਹੋਈ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਸਬੰਧੀ ਗੱਲਬਾਤ ਨੂੰ ਕਟੌਤੀਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਸੰਘਰਸ਼ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਸੱਜਰਾ ਕਦਮ ਗਰਦਾਨਿਆ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਉਸਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਤਿੰਨ ਬਦਲ ਸਨ, ਆਪਣੇ ਪੈਂਤੜੇ 'ਤੇ ਖੜਾ ਰਹਾਂ ਅਤੇ ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਦਿਵਾਲੀਆ ਹੋਣ ਦੇਵਾਂ, ਕਟੌਤੀਆਂ ਬਾਰੇ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਨੂੰ ਪਰਵਾਨ ਕਰ ਲਵਾਂ ਅਤੇ ਅਰਥਚਾਰੇ ਲਈ ਫੌਰੀ ਮਦਦ ਹਾਸਲ ਕਰ ਲਵਾਂ, ਜਾਂ ਫਿਰ ਸਹਿਮਤੀ ਨਾਲ ਯੂਰੋਜੋਨ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਹੋਣ ਨੂੰ ਮੰਨ ਲਵਾਂ, ਜਿਸਦੇ ਕਿ ਨਤੀਜੇ ਘਾਣ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਹੋਣੇ ਸਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਆਪਣੀ ਗਲ ਸਮਾਪਤ ਕਰਦਿਆਂ ਕਿਹਾ-''ਮੌਮੋਰੰਡਮ ਲਈ 'ਹਾਂ' ਵੋਟ ਹੀ ਇਕੋ ਇਕ ਰਸਤਾ ਸੀ ਸਾਈਰੀਜਾ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਾਲੀ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਸੱਤਾ ਵਿਚ ਰੱਖਣ ਦਾ ਤਾਕਿ ਬਾਅਦ ਵਿਚ ਪ੍ਰਤੀਰੋਧ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕੇ। ਅਸੀਂ ਖੱਬੀ ਧਿਰ ਦੀ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਡੇਗਣ ਦੀ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਇਜਾਜ਼ਤ ਦੇਣ ਨਹੀਂ ਜਾ ਰਹੇ।'' ਇਥੋਂ ਇਹ ਸਪੱਸ਼ਟ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਸਾਈਰੀਜਾ ਗਠਜੋੜ ਯੂਰਪੀਅਨ ਯੂਨੀਅਨ ਵਲੋਂ ਠੋਸੀਆਂ ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕਟੌਤੀਆਂ ਅਤੇ ਹੋਰ ਨਵਉਦਾਰਵਾਦੀ ਆਰਥਕ ਨੀਤੀਆਂ ਅਧਾਰਤ ਇਸ ਮੌਮੋਰੰਡਮ ਦੇ ਵਿਰੋਧ ਵਿਚ ਤੇ ਹੱਕ ਵਿਚ ਦੋ ਧੜਿਆਂ ਵਿਚ ਵੰਡਿਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਸਾਈਰੀਜਾ ਦੇ ਅਧਿਕਾਰਤ ਬੁਲਾਰੇ ਵਲੋਂ 16 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਤੜਕੇ ਕਟੌਤੀ ਤਜਵੀਜਾਂ ਦੇ ਸੰਸਦ ਵਿਚੋਂ ਪਾਸ ਹੋ ਜਾਣ ਤੋਂ ਫੌਰੀ ਬਾਅਦ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਬਿਆਨ ਤੋਂ ਸਿਤੰਬਰ ਤੱਕ ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਮੁੜ ਚੋਣਾਂ ਹੋਣ ਦੀ ਸੰਭਾਵਨਾ ਸਪੱਸ਼ਟ ਨਜ਼ਰ ਆਉਂਦੀ ਹੈ। ਇਥੇ ਇਹ ਵੀ ਵਰਣਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਸਾਈਰੀਜਾ ਦੀਆਂ ਸਮਰਥਕ ਧਿਰਾਂ, ਖਾਸਕਰ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਮਿਹਨਤਕਸ਼ ਲੋਕਾਂ ਵਲੋਂ ਦੇਸ਼ ਭਰ ਵਿਚ ਨਿਰੰਤਰ ਰੈਲੀਆਂ ਆਦਿ ਕਰਕੇ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਯੂਰਪੀਅਨ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਪੂੰਜੀਵਾਦੀ ਆਗੂਆਂ ਸਾਹਮਣੇ ਨਾ ਝੁਕਣ ਦਾ ਸੰਦੇਸ਼ ਦਿੰਦੇ ਹੋਏ ਵਿਆਪਕ ਲਾਮਬੰਦੀ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਰਹੀ ਸੀ। 15 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਵੀ ਜਿਸ ਦਿਨ ਸੰਸਦ ਸਾਹਮਣੇ ਇਹ ਤਜਵੀਜਾਂ ਵੋਟ ਲਈ ਪੇਸ਼ ਕੀਤੀਆਂ ਗਈਆਂ, ਉਸ ਦਿਨ ਵੀ ਸੰਸਦ ਸਾਹਮਣੇ ਮਿਹਨਤਕਸ਼ ਲੋਕਾਂ ਵਲੋਂ ਵਿਸ਼ਾਲ ਮੁਜ਼ਾਹਰਾ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਇਸ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਨੂੰ ਨਾ ਪਾਸ ਕਰਨ ਲਈ ਸੰਸਦ ਮੈਂਬਰਾਂ ਨੂੰ ਜ਼ੋਰਦਾਰ ਅਪੀਲ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸੀ।
ਗਰੀਸ ਦੀ ਸੰਸਦ ਵਲੋਂ 15 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਪਾਸ ਕੀਤੀਆਂ ਗਈਆਂ ਤਜਵੀਜਾਂ ਬਹੁਤ ਹੀ ਅਮਾਨਵੀ ਤੇ ਕਰੂਰ ਹਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕਟੌਤੀਆਂ ਦੇ ਘਾਤਕ ਪ੍ਰਭਾਵਾਂ ਹੇਠ ਤਰਾਹ ਤਰਾਹ ਕਰ ਰਹੇ ਗਰੀਸ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਜੀਵਨ ਹੀ ਨਰਕ ਬਣ ਜਾਵੇਗਾ। ਇਸ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਦੇ ਪਾਸ ਹੋਣ ਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਚੀਨੀ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਕਾਫੀ ਤੱਕ ਅਤੇ ਜਨਮ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਮਰਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਅੰਤਮ ਰਸਮਾਂ ਤੱਕ ਸਭ ਕੁੱਝ ਮਹਿੰਗਾ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ। ਪਾਸ ਕੀਤੀਆਂ ਗਈਆਂ ਤਜਵੀਜਾਂ ਅਨੁਸਾਰ ਵੈਟ ਦੀ ਦਰ 13% ਤੋਂ 23% ਤੱਕ ਹੋ ਜਾਵੇਗੀ। ਡੱਬਾ ਬੰਦ ਭੋਜਨ, ਰੈਸਟੋਰੈਂਟਾਂ ਆਦਿ 'ਤੇ 23%, ਤਾਜੇ ਭੋਜਨ ਪਦਾਰਥਾਂ 'ਤੇ 13%, ਪਾਣੀ, ਬਿਜਲੀ ਅਤੇ ਹੋਟਲਾਂ ਵਿਚ ਠਹਿਰਨ 'ਤੇ 13% ਅਤੇ ਕਿਤਾਬਾਂ ਤੇ ਦਵਾਈਆਂ 'ਤੇ 6% ਵੈਟ ਲੱਗੇਗਾ। ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਲਗਭਗ ਇਹ ਪਹਿਲਾਂ ਨਾਲੋਂ ਦੁਗਣਾ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ, ਕਈ ਵਸਤਾਂ 'ਤੇ ਪਹਿਲਾਂ ਇਹ ਟੈਕਸ ਸੀ ਹੀ ਨਹੀਂ। ਗਰੀਸ ਦੇ ਟਾਪੂਆਂ 'ਤੇ ਰਹਿਣ ਵਾਲੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਮਿਲਣ ਵਾਲੀ ਵੈਟ ਵਿਚ 30% ਦੀ ਛੋਟ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਖਤਮ ਹੋ ਜਾਵੇਗੀ। ਰੀਅਲ ਇਸਟੇਟ ਭਾਵ ਘਰਾਂ ਦਾ ਅਸਲ ਮੁੱਲ ਕਾਫੀ ਘੱਟ ਜਾਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਵੀ ਪਹਿਲੀਆਂ ਸਰਕਾਰਾਂ ਵਲੋਂ ਤਹਿ ਦਰਾਂ ਮੁਤਾਬਕ ਹੀ ਟੈਕਸ ਜਾਰੀ ਰਹੇਗਾ, ਹਰ ਸਾਲ 2.65 ਅਰਬ ਯੂਰੋ ਟੈਕਸ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿਚ ਇਕੱਠੇ ਕੀਤੇ ਜਾਣਗੇ। ਛੋਟੀਆਂ ਕੰਪਨੀਆਂ 'ਤੇ ਕਾਰਪੋਰੇਟ ਟੈਕਸ 26% ਤੋਂ ਵੱਧਕੇ 29% ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ। ਵੱਡੀਆਂ ਕਾਰਾਂ, ਕਿਸ਼ਤੀਆਂ, ਤੈਰਨ ਵਾਲੇ ਤਲਾਬਾਂ ਆਦਿ 'ਤੇ ਲੱਗਜਰੀ ਟੈਕਸ ਵੱਧ ਜਾਵੇਗਾ, ਜਿਸਦਾ ਸਿੱਧਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਗਰੀਸ ਦੇ ਆਮਦਣ ਦੇ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੇ ਵਸੀਲੇ ਸੈਰ ਸਪਾਟੇ 'ਤੇ ਪਵੇਗਾ। ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਮਾਰ, ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਪੈਨਸ਼ਨਾਂ ਦੇ ਘੱਟਣ ਕਾਰਨ ਦੁਸ਼ਵਾਰੀਆਂ ਨਾਲ ਜੂਝਦੇ ਜੀਵਨ ਬਤੀਤ ਕਰ ਰਹੇ ਬਜ਼ੁਰਗਾਂ 'ਤੇ ਪਏਗੀ। ਘੱਟੋ ਘੱਟ ਪੈਨਸ਼ਨ 2021 ਤੱਕ ਮੌਜੂਦਾ ਪੱਧਰ 'ਤੇ ਜਾਮ ਕਰ ਦਿੱਤੀਆਂ ਜਾਣਗੀਆਂ, 30 ਜੂਨ 2015 ਤੋਂ ਰਿਟਾਇਰ ਹੋ ਰਹੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ 67 ਸਾਲਾਂ ਦੀ ਉਮਰ ਪੂਰੀ ਕਰਨ ਤੱਕ ਸਿਰਫ ਬੇਸਿਕ ਪੈਨਸ਼ਨ ਹੀ ਮਿਲੇਗੀ। ਸਭ ਤੋਂ ਘੱਟ ਪੈਨਸ਼ਨਾਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਪੈਨਸ਼ਨਰਾਂ ਨੂੰ ਸਮਾਜਕ ਇਕਜੁਟਤਾ ਲਾਭ ਰਾਹੀਂ ਮਿਲਦੀ ਰਾਹਤ ਰਾਸ਼ੀ ਹੌਲੀ-ਹੌਲੀ ਘਟਾਈ ਜਾਵੇਗੀ ਅਤੇ 2019 ਤੱਕ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਖਤਮ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇਗੀ। ਪੈਨਸ਼ਨ ਫੰਡ ਨੂੰ ਜੀਰੋ ਘਾਟੇ 'ਤੇ ਰੱਖਣਾ ਯਕੀਨੀ ਬਣਾਇਆ ਜਾਵੇਗਾ, ਜਿਸ ਨਾਲ ਬੁਨਿਆਦੀ ਪੈਨਸ਼ਨਾਂ ਦੇ ਘਟਣ ਦੀ ਸੰਭਾਵਨਾ ਹਮੇਸ਼ਾ ਬਣੀ ਰਹੇਗੀ। ਪੈਨਸ਼ਨਾਂ ਵਲੋਂ ਸਿਹਤ ਫੰਡ ਵਿਚ ਪਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਯੋਗਦਾਨ 4% ਤੋਂ ਵਧਾਕੇ 6% ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਰਿਟਾਇਰਮੈਂਟ ਦੀ ਉਮਰ 2022 ਤੱਕ ਵਧਾਕੇ 67 ਸਾਲ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇਗੀ। ਨਿੱਜੀਕਰਨ ਦੀ ਪ੍ਰਕਿਰਿਆ ਨੂੰ ਤੇਜ ਕਰਦਿਆਂ ਬਿਜਲੀ ਦਾ ਉਤਪਾਦਨ, ਵਿਤਰਣ ਆਦਿ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਵੱਡੇ ਅਜਾਰੇਦਾਰਾਂ ਦੇ ਹੱਥ ਵਿਚ ਦੇਣਾ ਹੋਵੇਗਾ। ਬੈਂਕਾਂ ਵਿਚ ਸਰਕਾਰ ਦਾ ਕੋਈ ਦਖਲ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗਾ, ਭਾਵ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਮੁੜ ਪੂੰਜੀਕਰਨ ਕਰਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਨਿੱਜੀ ਖੇਤਰ ਹਵਾਲੇ ਕਰਨ ਦਾ ਰਾਹ ਸਾਫ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਕਿਰਤ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਮਾਮਲਿਆਂ ਵਿਚ ਸਾਮੂਹਿਕ ਸੌਦੇਬਾਜ਼ੀ 'ਤੇ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਪਾਬੰਦੀ ਹੋਵੇਗੀ। ਅੱਗੇ ਤੋਂ ਐਤਵਾਰ ਦੀ ਛੁੱਟੀ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗੀ ਬਲਕਿ ਸਪੱਸ਼ਟ ਰੂਪ ਵਿਚ ਕੰਮ ਵਾਲਾ ਦਿਨ ਹੋਵੇਗਾ।
ਇਸ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਦੀਆਂ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਪ੍ਰਭੂਸੱਤਾ ਨੂੰ ਖੋਰਾ ਲਾਉਣ ਵਾਲੀਆਂ ਮੱਦਾਂ ਹਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਗਰੀਸ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਮਾਣ ਸਨਮਾਨ ਨੂੰ ਵੀ ਡਾਢੀ ਸੱਟ ਮਾਰੀ ਹੈ। ਗਰੀਸ ਦੀ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਬਣਾਏ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਅਤੇ ਨੀਤੀਆਂ ਦੇ ਖਰੜਿਆਂ, ਜਿਹੜੇ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਰੂਪ ਵਿਚ ਸਮਾਜਕ ਤੇ ਆਰਥਕ ਨੀਤੀਆਂ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਹੋਣਗੇ, ਲਈ ਸੰਸਦ ਜਾਂ ਹੋਰ ਕਿਸੇ ਜਨਤਕ ਅਦਾਰੇ ਸਾਹਮਣੇ ਵਿਚਾਰ ਵਟਾਂਦਰੇ ਲਈ ਰੱਖਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਯੂਰਪੀਅਨ ਯੂਨੀਅਨ ਤੇ ਕਰਜ਼ਾ ਦੇਣ ਵਾਲੀ ਤ੍ਰਿਕੜੀ ਨਾਲ ਸਲਾਹ ਕਰਨੀ ਅਤੇ ਸਹਿਮਤੀ ਲੈਣੀ ਹੋਵੇਗੀ। ਦੂਜੀ ਅਜਿਹੀ ਹੀ ਇਕ ਹੋਰ ਮੱਦ ਅਨੁਸਾਰ ਗਰੀਸ ਦੀ 50 ਅਰਬ ਡਾਲਰ ਦੀ ਜਨਤਕ ਸੰਪਤੀ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਅਦਾਰੇ ਕੋਲ ਤਬਦੀਲ ਕਰਨੀ ਹੋਵੇਗੀ। ਇਸ ਵਿਚ ਗਰੀਸ ਸਰਕਾਰ ਦਾ ਕੋਈ ਦਖਲ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗਾ। ਇਹ ਸੰਪਤੀ ਕਰਜ਼ੇ ਨੂੰ ਵਾਪਸ ਕਰਨ 'ਤੇ ਬੈਂਕਾਂ ਦਾ ਮੁੜ ਪੂੰਜੀਕਰਨ ਕਰਨ ਲਈ ਵਰਤੀ ਜਾਵੇਗੀ। ਇਸਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਮਾੜਾ ਪੱਖ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਇਸ ਵਿਚ ਜਨਤਕ ਸੰਪਤੀ ਦਾ ਕੋਈ ਵਰਣਨ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ, ਬਲਕਿ ਸ਼ਬਦ ''ਗ੍ਰੀਕ ਅਸਾਸੇ'' ਵਰਤਿਆ ਗਿਆ ਹੈ, ਜਿਸਦਾ ਭਾਵ ਬੈਂਕਾਂ ਦੀ ਸੰਪਤੀ, ਜਿਸ ਵਿਚ ਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਬਚਤਾਂ ਵੀ ਸ਼ਾਮਲ ਹਨ ਅਤੇ ਵਾਹੀਯੋਗ ਭੂਮੀ ਵੀ ਇਸਦੇ ਘੇਰੇ ਵਿਚ ਆ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਇਸ ਮੌਮੋਰੰਡਮ ਵਿਚ ਅਗਲੇ 5 ਸਾਲਾਂ ਵਿਚ ਯੂਰਪੀਅਨ ਕਮਿਸ਼ਨ ਵਲੋਂ ਗਰੀਸ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਨਾਲ ਰਲਕੇ 35 ਅਰਬ ਦੇ ਨਿਵੇਸ਼ ਨੂੰ ਜੁਟਾਉਣ ਦੀ ਗੱਲ ਕੀਤੀ ਗਈ ਹੈ। ਪ੍ਰੰਤੂ ਇਸ ਵਿਚ ਵੀ ਗਰੰਟੀ ਸਿਰਫ 1 ਅਰਬ ਡਾਲਰ ਦੀ ਹੀ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਹੈ, ਜਿਹੜੀ ਕਿ 27% ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰੀ ਦਰ ਵਾਲੇ ਦੇਸ਼ ਲਈ ਊਠ ਦੇ ਮੂੰਹ ਵਿਚ ਜ਼ੀਰੇ ਦੇ ਬਰਾਬਰ ਅਤੇ ਹਤੱਕ ਯੋਗ ਹੈ। ਇਕ ਹੋਰ ਬਹੁਤ ਹੀ ਘਾਤਕ ਸ਼ਰਤ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਸਾਈਰੀਜ਼ਾ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਸੱਤਾ ਸੰਭਾਲਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਫੌਰੀ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕੀਤੀ ਗਈ ਰਾਹਤ ਲਈ ਚੁੱਕੇ ਗਏ ਸਾਰੇ ਕਦਮ ਵਾਪਸ ਲਏ ਜਾਣ। ਖਾਸ ਕਰਕੇ ਵਿੱਤ ਵਜਾਰਤ ਦੇ ਮੁੜ ਨੌਕਰੀਆਂ 'ਤੇ ਬਹਾਲ ਕੀਤੇ ਗਏ ਸਫਾਈ ਕਾਮੇ, ਪਿਛਲੀ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਬੰਦ ਕੀਤੇ ਪ੍ਰਸਾਰਣ ਅਦਾਰੇ ਜਨਤਕ ਖੇਤਰ ਦੇ ਟੀ.ਵੀ. ਦੇ ਮੁਲਾਜ਼ਮ, ਸਕੂਲ ਗਾਰਡ ਅਤੇ ਸਮੁੱਚੇ ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਮਿਊਨਿਸਪਲ ਅਦਾਰਿਆਂ ਦੇ ਬਹਾਲ ਕੀਤੇ ਗਏ ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ ਨੂੰ ਮੁੜ ਨੌਕਰੀਆਂ ਤੋਂ ਫਾਰਗ ਕਰਨਾ ਪਵੇਗਾ। ਇਸ ਵਿਚ ਇਹ ਵੀ ਦਰਜ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ ਕਿ ਜੇਕਰ ਇਹ ਸਮਝੌਤਾ ਕਿਆਸੀ ਗਈ ਇੱਛਾ ਮੁਤਾਬਕ ਲਾਗੂ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਇਸਦੀ ਪੂਰੀ ਜਿੰਮੇਵਾਰੀ ਗਰੀਸ ਸਿਰ ਹੋਵੇਗੀ।
ਇੱਥੇ ਇਹ ਵੀ ਵਰਣਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ 15 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਸੰਸਦ ਵਲੋਂ ਪਾਸ ਕੀਤੇ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਰਾਹੀਂ ਸਿਰਫ 7 ਅਰਬ ਡਾਲਰ ਦੀ ਮਦਦ ਹੀ ਮਿਲੇਗੀ, ਜਿਹੜੀ ਡੰਗ ਟਪਾਉਣ ਲਈ ਹੋਵੇਗੀ। ਇਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ 22 ਜੁਲਾਈ ਤੱਕ ਇਸ ਮੌਮੋਰੰਡਮ ਅਧਾਰਤ ਕਦਮਾਂ ਨੂੰ ਲਾਗੂ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਅੜਿਕਾ ਬਣਨ ਵਾਲੇ ਅਦਾਲਤੀ ਫੈਸਲਿਆਂ ਨੂੰ ਰੱਦ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਕਾਨੂੰਨ ਬਨਾਉਣ ਅਤੇ 50 ਅਰਬ ਡਾਲਰ ਦੀ ਜਨਤਕ ਸੰਪਤੀ ਨੂੰ ਤਬਦੀਲ ਕਰਨ ਬਾਰੇ ਰੂਪ ਰੇਖਾ ਦੇ ਖਰੜੇ ਨੂੰ ਸੰਸਦ ਵਲੋਂ ਪਾਸ ਕੀਤਾ ਜਾਣਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ ਤਾਂ ਹੀ ਅੱਗੇ ਹੋਰ ਰਾਹਤ ਰਾਸ਼ੀ ਭਾਵ ਕਰਜ਼ਾ ਮਿਲੇਗਾ। ਲੋੜੀਂਦੇ 87 ਅਰਬ ਡਾਲਰ ਦੇ ਤੀਜੇ ਰਾਹਤ ਪੈਕੇਜ਼ ਨੂੰ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕਰਨ ਲਈ ਤਾਂ ਲਗਭਗ ਇਕ ਮਹੀਨਾ ਚੱਲਣ ਵਾਲੀ ਗਲਬਾਤ ਅਤੇ ਵਿਸਤਾਰਤ ਮੌਮੋਰੰਡਮ ਉਤੇ ਸਹੀ ਪਾਉਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਹੀ ਅਮਲ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਵੇਗਾ।
ਯੂਰਪ ਭਰ ਵਿਚ ਨਿਆਂਪਸੰਦ ਬੁੱਧੀਜੀਵੀਆਂ ਤੇ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਨੇ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਇਸ ਕਦਮ ਵਿਰੁੱਧ ਆਵਾਜ਼ ਬੁਲੰਦ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਇਸ ਕਦਮ ਨੂੰ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਦਾ ਭੋਗ ਪਾਉਣ ਵੱਲ ਵੱਧਣਾ ਗਰਦਾਨਿਆ ਹੈ। ਯੂਰਪੀਅਨ ਇਕਜੁਟਤਾ ਪ੍ਰੋਜੈਕਟ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਜਰਮਨ ਫਿਲਾਸਫਰ ਜੁਏਗੇਨ ਹਾਬੇਰਮਾਸ ਨੇ 7 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ 'ਦੀ ਗਾਰਡੀਅਨ' ਅਖਬਾਰ ਨਾਲ ਗਲ ਕਰਦਿਆਂ ਕਿਹਾ ਇਸ ਸਮਝੌਤੇ ਦਾ ਅਰਥ ਹੈ ਕਿ ਯੂਰਪੀਅਨ ਕੌਂਸਲ ਜ਼ੋਰਦਾਰ ਢੰਗ ਨਾਲ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਰਾਜਨੀਤਕ ਰੂਪ ਵਿਚ ਦਿਵਾਲੀਆ ਐਲਾਨ ਰਹੀ ਹੈ। ਨੋਬਲ ਇਨਾਮ ਜੇਤੂ ਆਰਥ ਸ਼ਾਸ਼ਤਰੀ ਪਾਲ ਕਰੁਗਮੈਨ ਨੇ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ 'ਪਾਗਲਪਨ' ਕਰਾਰ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਕਿਹਾ-''ਅਸੀਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੋ ਹਫਤਿਆਂ ਵਿਚ ਦੇਖਿਆ ਹੈ ਕਿ ਯੂਰੋਜੋਨ ਦਾ ਮੈਂਬਰ ਹੋਣ ਦਾ ਮਤਲਬ ਹੈ ਜੇਕਰ ਤੁਸੀਂ ਜਰਾ ਵੀ ਲਾਈਨ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਪੈਰ ਰੱਖੋਗੇ ਤਾਂ ਕਰਜ਼ਦਾਤਾ ਤੁਹਾਡੇ ਅਰਥਚਾਰੇ ਨੂੰ ਤਬਾਹ ਕਰ ਦੇਣਗੇ। ਇਹ ਨਿਰਦਇਤਾ ਤੋਂ ਵੀ ਅਗਾਂਹ ਸਪੱਸ਼ਟ ਰੂਪ ਵਿਚ ਬਦਲੇ ਦੀ ਭਾਵਨਾ ਹੈ, ਕੌਮੀ ਪ੍ਰਭੂਸੱਤਾ ਦੀ ਸੰਪੂਰਨ ਤਬਾਹੀ ਅਤੇ ਰਾਹਤ ਦੀ ਕੋਈ ਆਸ ਨਹੀਂ.... ਇਹ ਉਸ ਸਭ ਕੁੱਝ ਪ੍ਰਤੀ ਬੇਤੁਕੀ ਗੱਦਾਰੀ ਹੈ ਜਿਸ ਲਈ ਯੂਰੋਪੀਅਨ ਪ੍ਰੋਜੈਕਟ ਖਲੋਂਦਾ ਹੈ।'' ਫਰਾਂਸ ਦੇ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਅਰਥਸ਼ਾਸ਼ਤਰੀ ਜੇਮਸ ਪਿਕਾਟੀ ਨੇ ਇਸ ਮਾਮਲੇ ਵਿਚ ਸਭ ਤੋਂ ਵਧੇਰੇ ਜਿੱਦੀ ਪੁਜੀਸ਼ਨ ਅਖਤਿਆਰ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਜਰਮਨੀ 'ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰਦਿਆਂ ਕਿਹਾ-''ਜਰਮਨੀ ਗਰੀਸ ਤੋਂ ਕਰਜ਼ੇ ਦੀ ਵਾਪਸੀ ਦੀ ਮੰਗ ਕਿਸ ਮੂੰਹ ਨਾਲ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਇਤਿਹਾਸ ਗਵਾਹ ਹੈ ਕਿ ਜਰਮਨੀ ਨੇ ਅੱਜ ਤੱਕ ਕਦੇ ਵੀ ਬਾਹਰਲੇ ਕਰਜ਼ੇ ਦੀ ਇਕ ਕੌਡੀ ਵੀ ਨਹੀਂ ਮੋੜੀ ਹੈ।'' ਗਰੀਸ ਦੇ ਸਾਬਕਾ ਖਜ਼ਾਨਾ ਮੰਤਰੀ ਯਾਨਿਸ ਵਾਰੌਫਕਿਸ ਨੇ ਇਸ ਨੂੰ ਦੂਜੀ ਵਰਸੈਲਜ਼ ਦੀ ਸੰਧੀ ਕਰਾਰ ਦਿੱਤਾ ਜਿਸ ਰਾਹੀਂ ਪਹਿਲੀ ਸੰਸਾਰ ਜੰਗ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਜਰਮਨ ਉਤੇ ਬਹੁਤ ਹੀ ਅਪਮਾਨਜਨਕ ਆਰਥਕ ਤੇ ਰਾਜਨੀਤਕ ਸ਼ਰਤਾਂ ਥੋਪੀਆਂ ਗਈਆਂ ਸਨ, ਜਿਸਦੇ ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਉਥੇ ਨਾਜੀਵਾਦ ਦਾ ਉਭਾਰ ਹੋਇਆ ਸੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਫਰਕ ਸਿਰਫ ਐਨਾ ਹੈ ਕਿ ਗਰੀਸ ਉਤੇ ਇਹ ਸ਼ਰਤਾਂ ਥੋਪਣ ਲੱਗਿਆਂ ਟੈਂਕਾਂ ਦੀ ਥਾਂ ਬੈਂਕਾਂ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ ਗਈ ਹੈ। ਇੱਥੇ ਇਹ ਵਰਨਣਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਇਸ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਨੂੰ ਲਾਗੂ ਕਰਨ ਲਈ ਜਰਮਨੀ ਨੇ ਬਹੁਤ ਹੀ ਧੱਕੜਸ਼ਾਾਹ ਤੇ ਗੈਰ ਬਾਜਵ ਰਵੱਈਆ ਅਪਣਾਇਆ ਹੈ। ਜਰਮਨ ਯੂਰਪ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੇ ਤੇ ਮਜ਼ਬੂਤ ਅਰਥਚਾਰੇ ਵਾਲਾ ਦੇਸ਼ ਹੈ ਅਤੇ ਉਸ ਨੂੰ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਦਾ ਸਭ ਵੱਧ ਲਾਭ ਪੁੱਜਾ ਹੈ ਅਤੇ ਗਰੀਸ ਦੇ ਕਰਜ਼ੇ ਵਿਚ ਉਸਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਹਿੱਸਾ 57 ਅਰਬ ਡਾਲਰ ਹਨ। ਜਰਮਨ ਦੀ ਸੰਸਦ ਵਿਚ ਵੀ ਖੱਬੇ ਪੱਖੀ ਪਾਰਟੀ ਡਾਈ ਲਿੰਕੇ ਦੇ 60 ਸੰਸਦ ਮੈਂਬਰਾਂ ਨੇ ਗਰੀਸ ਉਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਦੇ ਥੋਪੇ ਜਾਣ ਦਾ ਵਿਰੋਧ ਕੀਤਾ ਸੀ।
ਯੂਰਪ ਦੀਆਂ ਪੂੰਜੀਵਾਦੀ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਵਲੋਂ ਇਹ ਗੱਲ ਧੁਮਾਈ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ ਕਿ ਗਰੀਸ ਕੋਲ ਇਸ ਮਾਮਲੇ ਵਿਚ ਕੋਈ ਹੋਰ ਵਿਕਲਪ ਹੈ ਹੀ ਨਹੀਂ। ਜਦੋਂਕਿ ਇਸ ਸੰਦਰਭ ਵਿਚ ਭਾਰਤ ਦੀ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਅਰਥ ਸ਼ਾਸ਼ਤਰੀ ਜਯਤੀ ਘੋਸ਼ ਵਲੋਂ 'ਫਰੰਟ ਲਾਈਨ' ਵਿਚ ਲਿਖਿਆ ਇਕ ਲੇਖ ਇਹ ਦਰਸਾਉਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਕਰਜ਼ੇ ਦੀਆਂ ਨਵੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਪ੍ਰਵਾਨ ਨਾ ਕਰਨ ਦੀ ਸੂਰਤ ਵਿਚ ਸਮਾਂ ਪਾ ਕੇ ਗਰੀਸ ਆਪਣੀ ਆਰਥਕਤਾ ਨੂੰ ਮੁੜ ਪੈਰਾਂ 'ਤੇ ਲਿਆਉਣ ਦੇ ਸਮਰਥ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਉਸਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ : ''ਬਿਨਾਂ ਸ਼ੱਕ ਗਰੀਸ ਲਈ ਅਗਲਾ ਕੁਝ ਸਮਾਂ ਬਹੁਤ ਹੀ ਮਾੜਾ ਹੈ। ਬੈਂਕਾਂ ਦੇ ਫੇਲ੍ਹ ਹੋਣ ਦੀ ਆਸ਼ੰਕਾ ਹੈ ਇਸ ਕਰਕੇ ਕੁੱਝ ਗੜਬੜ ਹੋਣ ਅਤੇ ਇਸ ਨਾਲ ਜੁੜੀ ਅਸਥਿਰਤਾ ਪੈਦਾ ਹੋਵੇਗੀ ਅਤੇ ਆਰਥਕ ਸਰਗਰਮੀਆਂ ਵਿਚ ਵੱਡੇ ਪੱਧਰ 'ਤੇ ਅੜਿਕੇ ਖੜੇ ਹੋਣਗੇ, ਜਿਸ ਨਾਲ ਸਮਾਜਕ ਅਫਰਾ ਤੱਫਰੀ ਪੈਦਾ ਹੋਵੇਗੀ। ਪਰ ਜੇਕਰ ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਹੋਰ ਮੁਦਰਾ (ਦਰਾਮਚਾ, ਗਰੀਸ ਦੀ ਪੁਰਾਣੀ ਮੁਦਰਾ ਜਾਂ ਹੋਰ) ਅਪਨਾਉਣ ਲਈ ਮਜ਼ਬੂਰ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਇਸਦੀ ਤਿੱਖੀ ਕਦਰ ਘਟਾਈ ਸਮਾਂ ਪਾ ਕੇ ਅਰਥਚਾਰੇ ਨੂੰ ਪੈਰਾਂ ਸਿਰ ਕਰਨ ਵਿਚ ਸਹਾਈ ਹੋਵੇਗੀ। ਕਿਉਂਕਿ ਦੇਸ਼ ਮੌਜੂਦਾ ਸਮੇਂ ਵਿਚ ਬਜਟ ਸਰਪਲਸ ਤੇ ਚਾਲੂ ਖਾਤਾ ਸਰਪਲਸ ਵਿਚ ਚਲ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਇਹ ਕੁਝ ਸਮੇਂ ਤੱਕ ਅਰਥਚਾਰੇ ਨੂੰ ਚਲਦਾ ਹੀ ਨਹੀਂ ਰੱਖ ਲਵੇਗਾ ਬਲਕਿ ਅਜਿਹੀਆਂ ਨੀਤੀਆਂ ਲਾਗੂ ਕਰਦਾ ਹੋਇਆ ਜਿਸ ਨਾਲ ਵਸਤਾਂ ਦੀ ਮੰਗ ਵਧੇ ਅਤੇ ਰੋਜ਼ਗਾਰ ਪੈਦਾ ਹੋਣ, ਅਰਥਚਾਰੇ ਨੂੰ ਇਸ ਸੰਕਟ ਵਿਚੋਂ ਬਾਹਰ ਵੀ ਕੱਢ ਸਕਦਾ ਹੈ।''
ਇੱਥੇ ਇਹ ਵਰਣਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਨਵੀਂ ਮੁਦਰਾ ਅਪਨਾਉਣ ਲਈ ਇਕ ਵਾਰ ਤਾਂ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਸਖਤ ਮੁਸ਼ਕਲਾਂ ਦਾ ਸਾਹਮਣਾ ਕਰਨਾ ਪਵੇਗਾ, ਉਸਦੀ ਮੁਦਰਾ ਕੌਮਾਂਤਰੀ ਮੁਦਰਾ ਦੇ ਮੁਕਾਬਲੇ ਵਿਚ ਬਹੁਤ ਸਸਤੀ ਹੋਵੇਗੀ, ਜਿਸ ਨਾਲ ਗਰੀਸ ਦੇ ਮੁੱਖ ਵਸੀਲੇ ਸੈਰ ਸਪਾਟੇ ਵਿਚ ਚੋਖਾ ਵਾਧਾ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਉਸਦੀਆਂ ਬਰਾਮਦਾਂ ਵੀ ਕਾਫੀ ਵੱਧ ਸਕਦੀਆਂ ਹਨ। ਸਮਾਜਕ ਕਟੌਤੀਆਂ ਹੌਲੀ-ਹੌਲੀ ਘਟਾਉਣ ਨਾਲ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਖਰੀਦ ਸ਼ਕਤੀ ਵੱਧਣ ਨਾਲ ਮੰਗ ਵਧੇਗੀ ਜਿਸ ਨਾਲ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਵੀ ਪੈਦਾ ਹੋਵੇਗਾ। 
2010 ਅਤੇ 2011 ਵਿਚ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਰਾਹਤ ਪੈਕੇਜ਼, ਜਿਹੜੇ ਕਿ ਅਸਲ ਵਿਚ ਕਰਜ਼ੇ ਹਨ, ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕਟੌਤੀਆਂ ਅਤੇ ਟੈਕਸਾਂ ਦੇ ਵੱਧਣ ਨਾਲ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਖਰਚ ਸਮਰੱਥਾ ਵਿਚ ਆਈ ਤਿੱਖੀ ਗਿਰਾਵਟ ਕਰਕੇ ਅਤੇ ਰਾਹਤ ਪੈਕਜ਼ਾਂ ਦੇ 90 ਫੀਸਦੀ ਭਾਗ ਦੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਕਰਜ਼ਿਆਂ ਦੀਆਂ ਕਿਸ਼ਤਾਂ ਮੋੜਨ ਅਤੇ ਬੈਂਕਾਂ ਤੇ ਵੱਡੇ ਵਪਾਰਕ ਅਦਾਰਿਆਂ ਦਾ ਮੁੜ ਪੂੰਜੀਕਰਨ ਕਰਨ ਵੱਲ ਚਲੇ ਜਾਣ ਕਰਕੇ ਅਰਥਚਾਰੇ ਦੀ ਮਜ਼ਬੂਤੀ ਪ੍ਰਤੀ ਕੋਈ ਸਿੱਟੇ ਨਹੀਂ ਕੱਢ ਸਕੇ ਹਨ। ਯੂਰਪੀਅਨ ਯੂਨੀਅਨ, ਯੂਰਪੀਅਨ ਕੇਂਦਰੀ ਬੈਂਕ ਤੇ ਕੌਮਾਂਤਰੀ ਮੁਦਰਾ ਫੰਡ ਦੀ ਤ੍ਰਿਕੜੀ ਵਲੋਂ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਇਹ ਅਖੌਤੀ ਰਾਹਤ ਪੈਕੇਜਾਂ ਦਾ ਵੱਡਾ ਹਿੱਸਾ ਤਾਂ ਜਰਮਨੀ, ਅਸਟ੍ਰੇਲੀਆ, ਨੀਦਰਲੈਂਡ ਤੇ ਹੋਰ ਯੂਰਪੀ ਦੇਸ਼ਾਂ ਨੂੰ ਸਿੱਧੇ ਹੀ ਕਰਜ਼ੇ ਦੀਆਂ ਕਿਸ਼ਤਾਂ ਵਜੋਂ ਚਲਾ ਗਿਆ ਸੀ। ਗਰੀਸ ਦੀ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਚਾਲੂ ਖਰਚਿਆਂ ਲਈ ਸਿਰਫ 10% ਹੀ ਪੈਸਾ ਮਿਲਿਆ ਸੀ। 'ਜੁਬਲੀ ਡੈਟ ਕੰਮਪੇਨ' ਵਲੋਂ ਕੀਤੇ ਗਏ ਇਕ ਅਧਿਐਨ ਮੁਤਾਬਕ ਯੂਰਪੀਅਨ ਕੇਂਦਰੀ ਬੈਂਕ ਤੇ ਯੂਰਪੀ ਦੇਸ਼ਾਂ ਦੇ ਕੇਂਦਰੀ ਬੈਂਕਾਂ ਨੇ ਸਿਰਫ 2013 ਵਿਚ ਹੀ ਗਰੀਸ ਤੋਂ 6 ਅਰਬ ਡਾਲਰ ਦਾ ਮੁਨਾਫਾ ਕਮਾਇਆ ਹੈ। ਗਰੀਸ ਦੀ ਸੰਸਦ ਵਲੋਂ ਅਪ੍ਰੈਲ 2015 ਵਿਚ ਇਸ ਕਰਜ਼ੇ (ਰਾਹਤ ਪੈਕਜਾਂ) ਬਾਰੇ ਬਣਾਏ ਟਰੁਥ ਕਮੀਸ਼ਨ ਨੇ ਇਸ ਕਰਜ਼ੇ ਨੂੰ ਗੈਰ ਕਾਨੂੰਨੀ, ਗੈਰ ਮੁਨਾਸਬ ਤੇ ਘਿਨਾਉਣਾ ਕਰਾਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। 2010 ਵਿਚ ਮਿਲੇ ਰਾਹਤ ਪੈਕੇਜ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਅੱਜ ਤੱਕ ਦੇਸ਼ ਦਾ ਅਰਥਚਾਰਾ 25% ਤੋਂ ਵਧੇਰੇ ਸੁੰਗੜ ਚੁੱਕਾ ਹੈ। ਪੈਨਸ਼ਨਾਂ ਅੱਧੀਆਂ ਹੋ ਚੁੱਕੀਆਂ ਹਨ, ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰੀ 27 ਫੀਸਦੀ ਅਤੇ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਦੀ ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰੀ ਦਰ 52% ਦੇ ਲਗਭਗ ਹੋ ਗਈ ਹੈ। ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਮਨੁੱਖੀ ਸੰਕਟ ਖੜ੍ਹਾ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ। ਭੁੱਖੇ ਮਰਦੇ ਲੋਕ ਆਪਣੇ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਯਤੀਮਖਾਨਿਆਂ ਵਿਚ ਛੱਡਣ ਤੱਕ ਮਜ਼ਬੂਰ ਹੋ ਚੁੱਕੇ ਹਨ। ਜਿਵੇਂ ਪਹਿਲੇ 2 ਰਾਹਤ ਪੈਕਜਾਂ ਨਾਲ ਜੁੜੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੇ ਲੋਕਾਂ 'ਤੇ ਮੁਸੀਬਤਾਂ ਲੱਦੀਆਂ ਹਨ। ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇਹ ਤੀਸਰਾ ਰਾਹਤ ਪੈਕਜ ਵੀ ਕੁੱਝ ਨਹੀਂ ਸੁਆਰ ਸਕੇਗਾ। ਸਿਰਫ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਕਰਜ਼ੇ ਦੇ ਬੋਝ ਵਿਚ ਵਾਧਾ ਕਰੇਗਾ। ਦੇਸੀ ਤੇ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਧਨਾਢਾਂ ਨੂੰ ਗਰੀਸ ਦੀ ਜਨਤਕ ਸੰਪਤੀ ਨੂੰ ਲੁੱਟਣ ਨੂੰ ਹੋਰ ਸੁਖਾਲਾ ਬਣਾਏਗਾ ਅਤੇ ਇਸਦੀਆਂ ਪਹਿਲਾਂ ਨਾਲੋਂ ਹੋਰ ਵਧੇਰੇ ਕਰੂਰ ਤੇ ਨਿਰਦਈ ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕਟੌਤੀਆਂ ਵਾਲੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨਾਲ ਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਜਿੰਦਗੀਆਂ ਵਿਚ ਹੋਰ ਵਧੇਰੇ ਮੁਸੀਬਤਾਂ ਭਰ ਦੇਵੇਗਾ। ਜਰਮਨੀ ਦੇ ਫਰਾਂਸ ਗਰੀਸ ਉਤੇ ਇਸ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਨੂੰ ਥੋਪਣ ਲਈ ਆਰਥਕ ਮਜ਼ਬੂਰੀਆਂ ਦੀ ਦੁਹਾਈ ਦੇ ਰਹੇ ਹਨ ਅਤੇ ਕਹਿ ਰਹੇ ਹਨ ਕਿ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਨੂੰ ਆਰਥਕ ਰੂਪ ਵਿਚ ਮਜ਼ਬੂਤ ਰੱਖਣ ਲਈ ਇਹ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ। ਇਹ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਕੋਰਾ ਝੂਠ ਹੈ, ਇਕ ਪਾਸੇ ਤਾਂ ਗਰੀਸ ਦੇ ਕਰਜ਼ੇ ਦਾ ਇਕ ਪੈਸਾ ਵੀ ਮਾਫ ਕਰਨ ਜਾਂ ਕਰਜ਼ੇ ਦੀ ਮੁੜਵਿਊਂਤਬੰਦੀ ਕਰਨ ਤੋਂ ਸਾਫ ਇਨਕਾਰ ਕੀਤਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਜਦੋਂ ਕਿ ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਯੁਕਰੇਨ ਦੇ 13.5 ਅਰਬ ਅਤੇ 18 ਅਰਬ ਡਾਲਰ ਦੇ ਵੱਡੇ ਕਰਜ਼ੇ ਮਾਫ ਕੀਤੇ ਗਏ ਹਨ ਅਤੇ ਬਿਨਾਂ ਕਿਸੇ ਸਖਤ ਸ਼ਰਤ ਦੇ 36.1 ਅਰਬ ਡਾਲਰ ਦੀ ਮਦਦ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਹੈ। ਅਸਲ ਵਿਚ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੋਹਾਂ ਹੀ ਫੈਸਲਿਆਂ ਪਿੱਛੇ ਰਾਜਨੀਤਕ ਸਮੀਕਰਣ ਕੰਮ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਯੂਰਪੀ ਦੇਸ਼ਾਂ ਦੀਆਂ ਪੂੰਜੀਵਾਦੀ ਸ਼ਕਤੀਆਂ, ਮਹਾਂਦੀਪ ਵਿਚ ਸਮਾਜਕ ਕਟੌਤੀਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਉਠ ਰਹੇ ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ 'ਚੋਂ ਪੈਦਾ ਹੋ ਰਹੀਆਂ ਲੋਕ ਪੱਖੀ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਸਾਈਰੀਜ਼ਾ, ਸਪੇਨ ਦੀ ਪੋਡੇਮੋਸ, ਜਰਮਨੀ ਦੀ ਡਾਈ-ਲਿੰਕੇ, ਆਇਰਲੈਂਡ ਦੀ ਸਿੰਨ ਫੀੲੰਨ ਆਦਿ ਨੂੰ ਥੱਲੇ ਲਾਅ ਕੇ ਸਬਕ ਸਿਖਾਉਣਾ ਚਾਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ। ਜਦੋਂ ਕਿ ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਉਹ ਰੂਸ ਵਿਰੁੱਧ ਖੜੇ ਹੋ ਰਹੇ ਯੁਕਰੇਨ ਵਿਚ ਰਾਜ ਕਰ ਰਹੇ ਸੱਜ ਪਿਛਾਖੜੀਆਂ ਜਿਹੜੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਹਥਠੋਕੇ ਹਨ ਨੂੰ ਹੱਲਾਸ਼ੇਰੀ ਦੇ ਰਹੀਆਂ ਹਨ।
ਗਰੀਸ ਵਿਚ ਤਾਂ ਮਿਹਨਤਕਸ਼ ਲੋਕ ਇਸ ਤੀਸਰੇ ਮੈਮੋਰੰਡਮ ਭਾਵ ਸਮਾਜਕ ਖਰਚਿਆਂ ਵਿਚ ਕਟੌਤੀਆਂ ਅਤੇ ਨਵਉਦਾਰਵਾਦੀ ਨੀਤੀਆਂ ਅਧਾਰਤ ਆਰਥਕ ਤੇ ਸਮਾਜਕ ਕਦਮਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਮੁੜ ਸੰਘਰਸ਼ ਦੇ ਮੈਦਾਨ ਵਿਚ ਨਿੱਤਰ ਹੀ ਰਹੇ ਹਨ। 15 ਜੂਨ ਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਸੰਸਦ ਸਾਹਮਣੇ ਹੋਏ ਵਿਸ਼ਾਲ ਜੁਝਾਰੂ ਮੁਜ਼ਾਹਰੇ ਇਸਦੀ ਸ਼ਾਹਦੀ ਭਰਦੇ ਹਨ। ਨਾਲ ਹੀ ਸਾਈਰੀਜ਼ ਵਿਚਲੀਆਂ ਲੋਕ ਪੱਖੀ ਧਿਰਾਂ ਰੈਡ ਨੈਟਵਰਕ, ਲੈਫਟ ਕਰੰਟ ਅਤੇ ਅੰਤਰਾਸਿਆ ਵਰਗੇ ਗਠਜੋੜ ਵੀ ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਸੰਘਰਸ਼ ਨੂੰ ਤਿੱਖਾ ਕਰਨ ਦੀ ਯੋਜਨਾਬੰਦੀ ਵਿਚ ਜੁੱਟ ਗਏ ਹਨ। ਯੂਰਪ ਦੇ ਬਾਕੀ ਵੀ ਲਗਭਗ ਸਾਰੇ ਹੀ ਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿਚ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਵਲੋਂ ਗਰੀਸ ਨੂੰ ਬਲੈਕਮੇਲ ਕਰਨ ਵਿਰੁੱਧ ਜੂਨ ਦੇ ਅੰਤਲੇ ਹਫਤੇ ਵਿਚ ਹੋਏ ਮੁਜ਼ਾਹਰੇ ਇਹ ਗੱਲ ਨੂੰ ਦਰਸਾਉਂਦੇ ਹਨ ਕਿ ਯੂਰਪ ਦੇ ਲੋਕ ਇਕਜੁੱਟ ਹੋ ਕੇ ਯੂਰਪੀ ਯੂਨੀਅਨ ਦੀ ਇਸ ਧਕੜਸ਼ਾਹੀ ਵਿਰੁੱਧ ਆਵਾਜ਼ ਬੁਲੰਦ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਹਾਂ ਪੱਖੀ ਸਿੱਟੇ ਕੱਢਣ ਵਿਚ ਸਫਲ ਹੋਣਗੇ। 

ਸਹਾਇਤਾ (ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ - ਅਗਸਤ 2015)

ਮਰਹੂਮ ਕਾਮਰੇਡ ਮਾਨ ਸਿੰਘ ਵਾਸੀ ਜੰਮੂ ਬਸਤੀ, ਅਬੋਹਰ ਦੇ ਲੜਕਿਆਂ ਸ਼੍ਰੀ ਸੁਖਵਿੰਦਰਪਾਲ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਨਰਿੰਦਰ ਪਾਲ ਨੇ ਆਪਣੀ ਮਾਤਾ ਸ਼੍ਰੀਮਤੀ ਜੋਗਿੰਦਰ ਕੌਰ ਦੀਆਂ ਅੰਤਮ ਰਸਮਾਂ ਸਮੇਂ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਕਮੇਟੀ ਫਾਜ਼ਿਲਕਾ ਨੂੰ 1000 ਰੁਪਏ ਅਤੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਨੂੰ 100 ਰੁਪਏ ਸਹਾਇਤਾ ਵਜੋਂ ਦਿੱਤੇ।

ਸਾਥੀ ਰਾਮ ਸਿੰਘ ਸੰਘੇੜਾ ਪਿੰਡ ਫਰਵਾਲਾ, ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਜਲੰਧਰ ਨੇ ਯੂ.ਕੇ. (ਇੰਗਲੈਂਡ) ਤੋਂ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ 10,000 ਰੁਪਏ ਅਤੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਨੂੰ 500 ਰੁਪਏ ਸਹਾਇਤਾ ਵਜੋਂ ਭੇਜੇ।
 
ਡਾਕਟਰ ਭਗਵਾਨ ਵਲੋਂ ਆਪਣਾ ਨਵਾਂ ਹਸਪਤਾਲ ਭਗਵਾਨ ਹੈਲਥ ਕੇਅਰ ਸੈਂਟਰ, ਪਾਤੜਾਂ, ਪਟਿਆਲਾ ਵਿਖੇ ਖੋਲਣ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਵਿਚ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ 500 ਰੁਪਏ, ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਕਮੇਟੀ ਪਟਿਆਲਾ ਨੂੰ 500 ਰੁਪਏ ਅਤੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਨੂੰ 100 ਰੁਪਏ ਸਹਾਇਤਾ ਵਜੋਂ ਦਿੱਤੇ। 

ਪਿਛਲੇ ਦਿਨੀਂ ਰਣਜੀਤ ਕੌਰ ਪੁਤਰੀ ਮਾਸਟਰ ਕੁਲਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ, ਪਿੰਡ ਭੋਰਸ਼ੀ ਰਾਜਪੂਤਾਂ, ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦਾ ਸ਼ੁਭ ਵਿਆਹ ਕੰਵਲਜੀਤ ਸਿੰਘ ਪੁੱਤਰ ਸ਼੍ਰੀ ਮਨਜੀਤ ਸਿੰਘ, ਵਾਸੀ ਸੁਲਤਾਨਪੁਰ ਲੋਧੀ, ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਕਪੂਰਥਲਾ ਹਾਲ ਵਾਸੀ ਅਮਰੀਕਾ ਨਾਲ ਹੋਇਆ। ਵਿਆਹ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਸਮੇਂ ਮਾਸਟਰ ਕੁਲਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਨੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਨੂੰ 600 ਰੁਪਏ ਅਤੇ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ. ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ 1500 ਰੁਪਏ ਸਹਾਇਤਾ ਵਜੋਂ ਦਿੱਤੇ। 

ਸਾਥੀ ਪਿਆਰਾ ਸਿੰਘ ਸੂਬਾ ਕਮੇਟੀ ਮੈਂਬਰ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਸਪੁੱਤਰੀ ਸਤਿੰਦਰਜੀਤ ਕੌਰ (ਪਤਨੀ ਅਮਰਿਤਪਾਲ ਸਿੰਘ ਅਸਲਾਮਾਬਾਦ, ਹੁਸ਼ਿਆਰਪੁਰ) ਦੇ ਘਰ ਬੇਟੀ ਹੋਣ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਵਿਚ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ 2000 ਰੁਪਏ ਅਤੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਨੂੰ 100 ਰੁਪਏ ਸਹਾਇਤਾ ਵਜੋਂ ਦਿੱਤੇ।
 
ਉਘੇ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਆਗੂ ਸਾਥੀ ਤ੍ਰਿਲੋਚਨ ਸਿੰਘ ਰਾਣਾ ਦੇ ਵੱਡੇ ਭਰਾ ਸ਼੍ਰੀ ਮੇਵਾ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸ਼ੋਕ ਸਮਾਗਮ ਸਮੇਂ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ 1000 ਰੁਪਏ ਅਤੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਨੂੰ 100 ਰੁਪਏ ਸਹਾਇਤਾ ਵਜੋਂ ਦਿੱਤੇ ਗਏ।
 

ਸਾਥੀ ਅਮਰੀਕ ਸਿੰਘ ਸਮੀਰੋਵਾਲ, ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਰੂਪਨਗਰ ਨੇ ਆਪਣੀ ਪਤਨੀ ਬੀਬੀ ਸੁਖਬੀਰ ਕੌਰ ਦੀ ਪਹਿਲੀ ਬਰਸੀ ਸਮੇਂ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ 500 ਰੁਪਏ ਅਤੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਨੂੰ 100 ਰੁਪਏ ਸਹਾਇਤਾ ਵਜੋਂ ਦਿੱਤੇ।
 

ਕਾਮਰੇਡ ਕੁਲਵੰਤ ਬਿਲਗਾ, ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਜਲੰਧਰ ਨੇ ਆਪਣੀ ਪਤਨੀ ਸ਼੍ਰੀਮਤੀ ਜਸਵੰਤ ਕੌਰ ਦੇ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਸਮਾਗਮ ਸਮੇਂ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ 5000 ਰੁਪਏ ਅਤੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਨੂੰ 200 ਰੁਪਏ ਸਹਾਇਤਾ ਵਜੋਂ ਦਿੱਤੇ।
 

ਰਿਟਾਇਰਡ ਪ੍ਰਿੰਸੀਪਲ ਇਕਬਾਲ ਸਿੰਘ ਨਵਾਂਸ਼ਹਿਰ ਵਲੋਂ ਆਪਣੀ ਮਾਤਾ ਸ਼੍ਰੀਮਤੀ ਪ੍ਰੀਤਮ ਕੌਰ ਪਤਨੀ ਕਾਮਰੇਡ ਕਰਤਾਰ ਸਿੰਘ ਦੀ ਪਹਿਲੀ ਬਰਸੀ ਮੌਕੇ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ 10,000 ਰੁਪਏ ਅਤੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਨੂੰ 500 ਰੁਪਏ ਸਹਾਇਤਾ ਵਜੋਂ ਦਿੱਤੇ।
 

ਮਰਹੂਮ ਹੈਡਮਾਸਟਰ ਉਜਾਗਰ ਸਿੰਘ ਪਿੰਡ ਮੁਰਾਦਪੁਰ ਨਰਿਆਲਾਂ (ਹੁਸ਼ਿਆਰਪੁਰ) ਦੀ ਸੁਪਤਨੀ ਬੀਬੀ ਨਸੀਬ ਕੌਰ ਦੀਆਂ ਅੰਤਮ ਰਸਮਾਂ ਸਮੇਂ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਸਪੁੱਤਰ ਸਾਥੀ ਪਰਮਜੀਤ ਸਿੰਘ ਵਲੋਂ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ 9500 ਰੁਪਏ ਅਤੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਨੂੰ 500 ਰੁਪਏ ਸਹਾਇਤਾ ਵਜੋਂ ਦਿੱਤੇ ਗਏ। 

ਸ਼੍ਰੀ ਰਤਨਚੰਦ, ਡਰਾਈਵਰ ਗ੍ਰੇਡ ਸਪੈਸ਼ਲ 'ਏ' ਲੋਕੋ ਰਨਿੰਗ, ਸਾਬਕਾ ਲੀਡਰ (ਰੇਲਵੇ) ਜਲੰਧਰ ਨੇ ਆਪਣੀ ਸਵਰਗੀ ਪਤਨੀ ਸ਼੍ਰੀਮਤੀ ਸਰਲਾ ਦੇਵੀ ਦੀ 6ਵੀ ਬਰਸੀ 'ਤੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਨੂੰ 500 ਰੁਪਏ ਸਹਾਇਤਾ ਵਜੋਂ ਦਿੱਤੇ।
 

ਕਾਮਰੇਡ ਸਤਪਾਲ ਸ਼ਰਮਾ, ਆਗੂ ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ ਨੇ ਆਪਣੇ ਭਤੀਜੇ ਨਵਦੀਪ ਸ਼ਰਮਾ ਦੀ ਸ਼ਾਦੀ ਦੇ ਮੌਕੇ 'ਤੇ ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ 5000 ਰੁਪਏ, ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਕਮੇਟੀ ਤਰਨਤਾਰਨ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਡਿਜੀਟਲ ਕੈਮਰਾ ਅਤੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਨੂੰ 500 ਰੁਪਏ ਸਹਾਇਤਾ ਵਜੋਂ ਦਿੱਤੇ।
 
 ਕਾਮਰੇਡ ਸਾਧੂ ਰਾਮ (ਪਿੰਡ ਪਾਹਲੇਵਾਲ, ਗੜ੍ਹਸ਼ੰਕਰ) ਵਲੋਂ ਆਪਣੇ ਪੜਪੋਤਰੇ ਨਿਸ਼ਾਂਤ (ਸਪੁੱਤਰ ਸ਼੍ਰੀਮਤੀ ਰਜਨੀ ਅਤੇ ਨਵਦੀਪ ਕੰਵਰ) ਦੇ ਜਨਮ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਵਿਚ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ 1000 ਰੁਪਏ ਅਤੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਨੂੰ 100 ਰੁਪਏ ਸਹਾਇਤਾ ਵਜੋਂ ਦਿੱਤੇ ਗਏ।

ਸਾਹਿਤ ਤੇ ਸੱਭਿਆਚਾਰ ( ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ - ਅਗਸਤ 2015)

ਇਹ ਕਹਾਣੀ ਨਹੀਂ...! 
ਇਕ ਜੰਗੀ ਕੈਦੀ, ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ 
- ਅਰੁੰਧਤੀ ਰਾਏ
ਦਿੱਲੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਦੇ ਰਾਮ ਲਾਲ ਆਨੰਦ ਕਾਲਜ ਵਿਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਦੇ ਲੈਕਚਰਾਰ ਡਾ. ਜੀ.ਐੱਨ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਨੂੰ ਕੰਮ ਤੋਂ ਘਰ ਮੁੜਦੇ ਸਮੇਂ ਅਣਪਛਾਤੇ ਲੋਕਾਂ ਵੱਲੋਂ ਅਗਵਾ ਕਰ ਲਏ ਜਾਣ ਨੂੰ 9 ਮਈ 2015 ਨੂੰ ਇਕ ਵਰ੍ਹਾ ਹੋ ਗਿਆ। ਜਦੋਂ ਪਤੀ ਲਾਪਤਾ ਹੋ ਗਿਆ ਅਤੇ ਉਸ ਦਾ ਫ਼ੋਨ ਨਹੀਂ ਸੀ ਲੱਗ ਰਿਹਾ ਤਾਂ ਡਾ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਦੀ ਪਤਨੀ ਵਸੰਤਾ ਨੇ ਮੁਕਾਮੀ ਥਾਣੇ ਵਿਚ ਗੁੰਮਸ਼ੁਦਗੀ ਦੀ ਰਿਪੋਰਟ ਦਰਜ ਕਰਾਈ। ਅੱਗੇ ਚੱਲ ਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਅਣਪਛਾਤੇ ਅਗਵਾਕਾਰਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀ ਸ਼ਨਾਖ਼ਤ ਮਹਾਰਾਸ਼ਟਰ ਪੁਲਸ ਵਜੋਂ ਕਰਵਾਈ ਅਤੇ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਉਹ ਅਗਵਾ ਇਕ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰੀ ਸੀ।
ਆਖ਼ਿਰ ਉਸ ਨੂੰ ਇੰਞ ਅਗਵਾ ਕਿਉਂ ਕਰਨਾ ਪਿਆ, ਜਦਕਿ ਉਹ ਉਸ ਨੂੰ ਰਸਮੀ ਤੌਰ 'ਤੇ ਵੀ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰ ਸਕਦੇ ਸਨ? ਉਸ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਨੂੰ ਜੋ ਵੀਲ੍ਹ ਚੇਅਰ ਉਪਰ ਹੀ ਚਲਦਾ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਜਦੋਂ ਉਹ ਪੰਜ ਸਾਲ ਦਾ ਸੀ, ਓਦੋਂ ਤੋਂ ਹੀ ਉਸ ਦਾ ਲੱਕ ਤੋਂ ਹੇਠਲਾ ਹਿੱਸਾ ਨਕਾਰਾ ਹੈ। ਇਸ ਦੇ ਕਾਰਨ ਦੋ ਹਨ: ਪਹਿਲਾ ਉਹ ਆਪਣੀਆਂ ਪਹਿਲੀਆਂ ਫੇਰੀਆਂ ਤੋਂ ਜਾਣਦੇ ਸੀ ਕਿ ਜੇ ਉਹ ਦਿੱਲੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਵਿਚ ਉਸ ਦੇ ਘਰੋਂ ਉਸ ਨੂੰ ਚੁੱਕਣਗੇ ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਗੁੱਸੇ ਨਾਲ ਭਰੇ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਹਜ਼ੂਮ ਦਾ ਸਾਹਮਣਾ ਕਰਨਾ ਪਵੇਗਾ। ਉਹ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ, ਕਾਰਕੁੰਨ ਅਤੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਜੋ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਸਾਈਬਾਬਾ ਨਾਲ ਪਿਆਰ ਕਰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਉਸ ਨੂੰ ਪਸੰਦ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਸਿਰਫ਼ ਇਸ ਲਈ ਨਹੀਂ ਕਿ ਉਹ ਇਕ ਸਮਰਪਿਤ ਅਧਿਆਪਕ ਹੈ, ਸਗੋਂ ਇਕ ਦੀ ਇਕ ਵਜ੍ਹਾ ਦੁਨੀਆ ਦੇ ਬਾਰੇ ਵਿਚ ਉਸ ਦਾ ਬੇਖ਼ੌਫ਼ ਸਿਆਸੀ ਨਜ਼ਰੀਆ ਵੀ ਹੈ। ਦੂਜਾ, ਅਗਵਾ ਕਰਨ ਨਾਲ ਇਹ ਪ੍ਰਭਾਵ ਬਣੇਗਾ ਜਿਵੇਂ ਮਹਿਜ਼ ਆਪਣੀ ਮੁਸਤੈਦੀ ਅਤੇ ਦਲੇਰੀ ਨਾਲ ਹੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਇਕ ਖ਼ਤਰਨਾਕ ਦਹਿਸ਼ਤਗਰਦ ਦਾ ਸੁਰਾਗ਼ ਲਾ ਕੇ ਉਸ ਨੂੰ ਦਬੋਚ ਲਿਆ ਹੋਵੇ। ਹਾਲਾਂਕਿ ਸੱਚਾਈ ਕਿਤੇ ਜ਼ਿਆਦਾ ਨੀਰਸ ਹੈ। ਸਾਡੇ ਵਿੱਚੋਂ ਅਨੇਕ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਲੰਮੇ ਸਮੇਂ ਤੋਂ ਖ਼ਦਸ਼ਾ ਸੀ ਕਿ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਸਾਈਬਾਬਾ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰ ਲਿਆ ਜਾਵੇਗਾ। ਕਈ ਮਹੀਨਿਆਂ ਤੋਂ ਇਹ ਆਮ ਚਰਚਾ ਸੀ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਮਹੀਨਿਆਂ ਵਿਚ ਕਦੇ ਵੀ, ਅਗਵਾ ਕੀਤੇ ਜਾਣ ਦੇ ਦਿਨ ਤਕ ਵੀ ਉਸ ਦੇ ਜਾਂ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਦੇ ਇਹ ਖ਼ਿਆਲ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਆਇਆ ਕਿ ਇਸ ਦਾ ਸਾਹਮਣਾ ਕਰਨ ਦੀ ਬਜਾਏ ਉਹ ਕੁਛ ਹੋਰ ਕਰੇ। ਦਰਅਸਲ, ਇਸ ਦੌਰਾਨ ਉਸ ਨੇ ਜ਼ਿਆਦਾ ਮਿਹਨਤ ਕੀਤੀ ਅਤੇ ਪਾਲਿਟਿਕਸ ਆਫ ਦ ਡਿਸਪਲਿਨ ਆਫ ਇੰਡੀਅਨ ਇੰਗਲਿਸ਼ ਰਾਈਟਿੰਗ (ਹਿੰਦੁਸਤਾਨੀ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਲੇਖਣੀ ਵਿਚ ਅਨੁਸ਼ਾਸਨ ਦੀ ਸਿਆਸਤ) ਉਪਰ ਆਪਣਾ ਪੀ ਐੱਚ ਡੀ ਦਾ ਕੰਮ ਨੇਪਰੇ ਚਾੜ੍ਹਿਆ।
ਸਾਨੂੰ ਕਿਉਂ ਲੱਗਿਆ ਸੀ ਕਿ ਉਸ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰ ਲਿਆ ਜਾਵੇਗਾ? ਉਸ ਦਾ ਜੁਰਮ ਕੀ ਸੀ?
ਸਤੰਬਰ 2009 'ਚ, ਤੱਤਕਾਲੀ ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰੀ ਪੀ. ਚਿਦੰਬਰਮ ਨੇ ਲਾਲ ਲਾਂਘੇ (ਰੈੱਡ ਕਾਰੀਡੋਰ) ਵਜੋਂ ਜਾਣੇ ਜਾਂਦੇ ਇਲਾਕੇ ਵਿਚ, ਆਪਰੇਸ਼ਨ ਗ੍ਰੀਨ ਹੰਟ ਨਾਂਅ ਦੀ ਜੰਗ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕੀਤਾ ਸੀ। ਇਹ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਕਿ ਇਹ ਮੱਧ ਭਾਰਤ ਦੇ ਜੰਗਲਾਂ ਵਿਚ ਮਾਓਵਾਦੀ 'ਦਹਿਸ਼ਤਗਰਦਾਂ' ਦੇ ਖ਼ਿਲਾਫ਼ ਨੀਮ-ਫ਼ੌਜੀ ਬਲਾਂ ਦੀ ਸਫ਼ਾਇਆ ਮੁਹਿੰਮ ਹੈ। ਦਰਅਸਲ ਇਹ ਉਸ ਲੜਾਈ ਦਾ ਸਰਕਾਰੀ ਨਾਂਅ ਸੀ, ਜੋ ਰਾਜ ਦੇ ਬਣਾਏ ਕਾਤਲ ਗਰੋਹਾਂ (ਬਸਤਰ ਵਿਚ ਸਲਵਾ ਜੁਡੂਮ ਅਤੇ ਹੋਰ ਸੂਬਿਆਂ ਵਿਚ ਬੇਨਾਮ) ਵੱਲੋਂ ਦੁਸ਼ਮਣ ਦੇ ਕੰਮ ਆਉਣ ਵਾਲੀ ਹਰ ਚੀਜ਼ ਨੂੰ ਤਬਾਹ ਕਰਨ ਦੀ ਲੜਾਈ ਰਹੀ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਹੁਕਮ, ਜੰਗਲ ਨੂੰ ਇਸ ਦੇ ਖ਼ਰੂਦੀ ਬਾਸ਼ਿੰਦਿਆਂ ਤੋਂ ਖਾਲੀ ਕਰਾਉਣ ਦਾ ਸੀ, ਤਾਂ ਕਿ ਖਾਣਾਂ ਅਤੇ ਬੁਨਿਆਦੀ ਢਾਂਚੇ ਦੀ ਉਸਾਰੀ ਦੇ ਕੰਮਾਂ ਵਿਚ ਲੱਗੀਆਂ ਕਾਰਪੋਰੇਸ਼ਨ ਆਪਣੇ ਰੁਕੇ ਹੋਏ ਪ੍ਰੋਜੈਕਟਾਂ ਨੂੰ ਅੱਗੇ ਵਧਾ ਸਕਣ। ਇਸ ਤੱਥ ਨਾਲ ਓਦੋਂ ਦੀ ਯੂ.ਪੀ.ਏ. ਹਕੂਮਤ ਨੂੰ ਪ੍ਰੇਸ਼ਾਨੀ ਹੋਈ ਕਿ ਆਦਿਵਾਸੀ ਜ਼ਮੀਨ ਨੂੰ ਨਿੱਜੀ ਕੰਪਨੀਆਂ ਦੇ ਹੱਥ ਵੇਚਣਾ ਗ਼ੈਰਕਾਨੂੰਨੀ ਅਤੇ ਗ਼ੈਰਸੰਵਿਧਾਨਕ ਹੈ। (ਮੌਜੂਦਾ ਹਕੂਮਤ ਦਾ ਨਵਾਂ ਭੋਇੰ ਗ੍ਰਹਿਣ ਬਿੱਲ ਉਸ ਗ਼ੈਰ-ਕਾਨੂੰਨੀ ਨੂੰ ਕਾਨੂੰਨੀ ਵਿਚ ਬਦਲਣ ਦੀ ਤਜਵੀਜ਼ ਹੀ ਹੈ।) ਕਾਤਲ ਗਰੋਹਾਂ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਨੀਮ-ਫ਼ੌਜੀ ਤਾਕਤਾਂ ਨੇ ਹਮਲਾ ਕੀਤਾ, ਪਿੰਡ ਸਾੜੇ, ਪੇਂਡੂਆਂ ਦੇ ਕਤਲ ਕੀਤੇ ਅਤੇ ਔਰਤਾਂ ਨਾਲ ਜਬਰ-ਜ਼ਨਾਹ ਕੀਤੇ। ਦਹਿ-ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਆਦਿਵਾਸੀਆਂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਘਰ-ਬਾਰ ਛੱਡ ਕੇ ਜੰਗਲਾਂ ਵਿਚ ਖੁੱਲ੍ਹੇ ਆਸਮਾਨ ਹੇਠ ਪਨਾਹ ਲੈਣ ਲਈ ਮਜਬੂਰ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਇਸ ਬੇਰਹਿਮੀ ਦੇ ਖ਼ਿਲਾਫ਼ ਜਵਾਬੀ ਕਾਰਵਾਈ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਸੈਂਕੜੇ ਸਥਾਨਕ ਲੋਕ ਲੋਕ-ਮੁਕਤੀ ਛਾਪਾਮਾਰ ਫ਼ੌਜ ਵਿਚ ਜਾ ਰਲੇ, ਜੋ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ. (ਮਾਓਵਾਦੀ) ਨੇ ਬਣਾਈ ਹੈ। ਇਹ ਉਹ ਪਾਰਟੀ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਸਾਬਕਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਮਨਮੋਹਣ ਸਿੰਘ ਨੇ ਆਪਣੇ ਮਸ਼ਹੂਰ ਕਥਨ ਵਿਚ ਹਿੰਦੁਸਤਾਨ ਦੀ 'ਅੰਦਰੂਨੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਲਈ ਇੱਕੋ-ਇਕ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਖ਼ਤਰਾ' ਦੱਸਿਆ ਸੀ। ਹੁਣ ਵੀ ਇਸ ਸਮੁੱਚੇ ਇਲਾਕੇ ਵਿਚ ਜੋ ਉਥਲ-ਪੁਥਲ ਦੀ ਹਾਲਤ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਖ਼ਾਨਾਜੰਗੀ ਕਿਹਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ।
ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਕਿਸੇ ਵੀ ਲੰਮੇ ਲੋਕ-ਯੁੱਧ ਵਿਚ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਹਾਲਾਤ ਸਿੱਧੇ-ਸਰਲ ਹੋਣ ਤੋਂ ਕਿਤੇ ਦੂਰ ਹਨ। ਟਾਕਰੇ ਵਿਚ ਜਿੱਥੇ ਕੁਛ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਚੰਗੀ ਲੜਾਈ ਲੜਨੀ ਜਾਰੀ ਰੱਖੀ ਹੈ, ਕੁਛ ਹੋਰ ਲੋਕ ਮੌਕਾਪ੍ਰਸਤ, ਰੰਗਦਾਰੀ ਵਸੂਲਣ ਵਾਲੇ ਅਤੇ ਮਾਮੂਲੀ ਮੁਜਰਿਮ ਬਣ ਚੁੱਕੇ ਹਨ। ਦੋਵਾਂ ਸਮੂਹਾਂ ਵਿਚ ਫ਼ਰਕ ਕਰ ਸਕਣਾ ਹਮੇਸ਼ਾ ਆਸਾਨ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ ਅਤੇ ਇਹ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਇਕ ਹੀ ਰੰਗ ਵਿਚ ਪੇਸ਼ ਕੀਤੇ ਜਾਣ ਨੂੰ ਸੁਖਾਲਾ ਬਣਾ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਜਬਰ ਦੀਆਂ ਖ਼ੌਫ਼ਨਾਕ ਘਟਨਾਵਾਂ ਹੋਈਆਂ ਹਨ। ਇਕ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੇ ਜਬਰ ਨੂੰ ਦਹਿਸ਼ਤਗਰਦੀ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਦੂਜੇ ਨੂੰ ਤਰੱਕੀ।
2010 ਅਤੇ 2011 ਵਿਚ ਜਦੋਂ ਅਪਰੇਸ਼ਨ ਗ੍ਰੀਨ ਹੰਟ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਬੇਰਹਿਮ ਦੌਰ  ਸੀ, ਇਸ ਦੇ ਖ਼ਿਲਾਫ਼ ਮੁਹਿੰਮ ਵਿਚ ਤੇਜ਼ੀ ਆਈ। ਕਈ ਸ਼ਹਿਰਾਂ ਵਿਚ ਜਨਤਕ ਇਕੱਠ ਅਤੇ ਰੈਲੀਆਂ ਹੋਈਆਂ। ਜਿਉਂ ਜਿਉਂ ਜੰਗਲ ਵਿਚ ਹੋਣ ਵਾਲੀਆਂ ਘਟਨਾਵਾਂ ਦੀ ਖ਼ਬਰ ਫੈਲਣ ਲੱਗੀ, ਕੌਮਾਂਤਰੀ ਮੀਡੀਆ ਨੇ ਇਸ ਵੱਲ ਧਿਆਨ ਦੇਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ। ਡਾ. ਜੀ.ਐੱਨ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਉਨ੍ਹਾਂ ਮੁੱਖ ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇਕ ਸਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਅਪਰੇਸ਼ਨ ਗ੍ਰੀਨ ਹੰਟ ਦੇ ਖ਼ਿਲਾਫ਼ ਇਕ ਜਨਤਕ ਅਤੇ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਖੁੱਲ੍ਹੀ ਮੁਹਿੰਮ ਲਾਮਬੰਦ ਕੀਤੀ ਸੀ। ਘੱਟੋ-ਘੱਟ ਆਰਜ਼ੀ ਤੌਰ 'ਤੇ ਹੀ, ਉਹ ਮੁਹਿੰਮ ਕਾਮਯਾਬ ਹੋਈ। ਸ਼ਰਮਿੰਦਗੀ ਨਾਲ ਹਕੂਮਤ ਨੂੰ ਇਹ ਢੌਂਗ ਰਚਣਾ ਪਿਆ ਕਿ ਅਪਰੇਸ਼ਨ ਗ੍ਰੀਨ ਹੰਟ ਨਾਂਅ ਦੀ ਕੋਈ ਸ਼ੈਅ ਨਹੀਂ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਮਹਿਜ਼ ਮੀਡੀਆ ਦੀ ਬਣਾਈ ਹੋਈ ਗੱਲ ਹੈ। (ਬੇਸ਼ੱਕ ਆਦਿਵਾਸੀ ਜ਼ਮੀਨ ਉਪਰ ਹਮਲਾ ਜਾਰੀ ਹੈ, ਜਿਸ ਦੇ ਬਾਰੇ ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਕੋਈ ਖ਼ਬਰ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦੀ, ਕਿਉਂਕਿ ਹੁਣ ਇਹ ਇਕ ਬੇਨਾਮ ਅਪਰੇਸ਼ਨ ਹੈ। ਇਕ ਮਾਓਵਾਦੀ ਹਮਲੇ ਵਿਚ ਮਾਰੇ ਗਏ ਸਲਵਾ ਜੁਡੂਮ ਦੇ ਬਾਨੀ ਮਹਿੰਦਰ ਕਰਮਾ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਸ਼ਵਿੰਦਰ ਕਰਮਾ ਨੇ ਪੰਜ ਮਈ 2015 ਨੂੰ ਸਲਵਾ ਜੁਡੂਮ-2 ਦੀ ਸ਼ੁਰੂਆਤ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਇਹ ਸੁਪਰੀਮ ਕੋਰਟ ਦੇ ਉਸ ਫ਼ੈਸਲੇ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਕੀਤਾ ਗਿਆ, ਜਿਸ ਵਿਚ ਅਦਾਲਤ ਨੇ ਸਲਵਾ ਜੁਡੂਮ-1 ਨੂੰ ਗ਼ੈਰਕਾਨੂੰਨੀ ਤੇ ਗ਼ੈਰਸੰਵਿਧਾਨਕ ਐਲਾਨਿਆ ਸੀ ਅਤੇ ਇਸ ਨੂੰ ਬੰਦ ਕਰਨ ਦਾ ਆਦੇਸ਼ ਦਿੱਤਾ ਸੀ।)
ਅਪਰੇਸ਼ਨ ਬੇਨਾਮ ਵਿਚ, ਜਿਹੜਾ ਕੋਈ ਵੀ ਰਾਜ ਦੀ ਨੀਤੀ ਦੀ ਆਲੋਚਨਾ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਜਾਂ ਉਸ ਨੂੰ ਲਾਗੂ ਕਰਨ ਵਿਚ ਅੜਿੱਕਾ ਖੜ੍ਹਾ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਮਾਓਵਾਦੀ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮਾਓਵਾਦੀ ਕਰਾਰ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਦਲਿਤ ਅਤੇ ਆਦਿਵਾਸੀ, ਦੇਸ਼ਧ੍ਰੋਹ ਅਤੇ ਰਾਜ ਦੇ ਖ਼ਿਲਾਫ਼ ਜੰਗ ਛੇੜਨ ਵਰਗੇ ਜੁਰਮਾਂ ਦੇ ਬੇਸਿਰ-ਪੈਰ ਇਲਜ਼ਾਮਾਂ ਨਾਲ ਗ਼ੈਰਕਾਨੂੰਨੀ ਕਾਰਵਾਈਆਂ ਰੋਕੂ ਕਾਨੂੰਨ (ਯੂ.ਏ.ਪੀ.ਏ.) ਦੇ ਤਹਿਤ ਜੇਲ੍ਹ ਵਿਚ ਬੰਦ ਹਨ। ਯੂ.ਏ.ਪੀ.ਏ. ਇਕ ਐਸਾ ਕਾਨੂੰਨ ਹੈ ਕਿ ਜੇ ਮਹਿਜ਼ ਇਸ ਨੂੰ ਵਰਤੋਂ ਵਿਚ ਲਿਆਂਦਾ ਜਾਣਾ ਐਨਾ ਤ੍ਰਾਸਦਿਕ ਨਾ ਹੁੰਦਾ, ਤਾਂ ਇਸ ਨੂੰ ਦੇਖ ਕੇ ਕਿਸੇ ਵੀ ਸਮਝਦਾਰ ਇਨਸਾਨ ਦਾ ਹਾਸਾ ਬੰਦ ਨਹੀਂ ਸੀ ਹੋਣਾ। ਇਕ ਪਾਸੇ, ਜਦੋਂ ਪਿੰਡ ਵਾਲੇ ਕਾਨੂੰਨੀ ਮਦਦ ਅਤੇ ਇਨਸਾਫ਼ ਦੀ ਉਮੀਦ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਵਰ੍ਹਿਆਂ ਤੱਕ ਜੇਲ੍ਹ ਵਿਚ ਸੜਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ, ਅਕਸਰ ਹੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਇਹ ਵੀ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਉਪਰ ਕਿਸ ਜੁਰਮ ਦਾ ਇਲਜ਼ਾਮ ਹੈ, ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਹੁਣ ਹਕੂਮਤ ਨੇ ਆਪਣੀ ਨਜ਼ਰ ਸ਼ਹਿਰਾਂ ਵਿਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵੱਲ ਮੋੜ ਲਈ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਇਹ 'ਓ ਜੀ ਡਬਲਯੂ' ਭਾਵ ਖੁੱਲ੍ਹੇਆਮ ਕੰਮ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਕਾਰਕੁੰਨ (ਓਵਰ ਗਰਾਊਂਡ ਵਰਕਰ) ਕਹਿੰਦੀ ਹੈ।
ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰਾਲੇ ਨੇ 2013 ਵਿਚ ਸੁਪਰੀਮ ਕੋਰਟ ਵਿਚ ਦਾਖ਼ਲ ਆਪਣੇ ਹਲਫ਼ਨਾਮੇ ਵਿਚ ਆਪਣੇ ਇਰਾਦੇ ਸਾਫ਼-ਸਾਫ਼ ਜ਼ਾਹਰ ਕੀਤੇ ਸਨ। ਉਸ ਵਿਚ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਸੀ: 'ਕਸਬਿਆਂ ਤੇ ਸ਼ਹਿਰਾਂ ਵਿਚ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ. (ਮਾਓਵਾਦੀ) ਦੇ ਵਿਚਾਰਕਾਂ ਅਤੇ ਹਮਾਇਤੀਆਂ ਨੇ ਰਾਜ ਦਾ ਨਕਸ਼ਾ ਵਿਗਾੜ ਕੇ ਪੇਸ਼ ਕਰਨ ਲਈ ਜਥੇਬੰਦ ਅਤੇ ਸਿਲਸਿਲੇਵਾਰ ਪ੍ਰਚਾਰ ਵਿੱਢਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ.... ਇਹ ਉਹ ਵਿਚਾਰਕ ਹਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਮਾਓਵਾਦੀ ਲਹਿਰ ਨੂੰ ਜ਼ਿੰਦਾ ਰੱਖਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ ਅਤੇ ਕਈ ਪੱਖਾਂ ਤੋਂ ਤਾਂ ਇਹ ਪੀਪਲਜ਼ ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ ਗੁਰੀਲਾ ਆਰਮੀ ਦੇ ਕਾਡਰਾਂ ਤੋਂ ਵੀ ਜ਼ਿਆਦਾ ਖ਼ਤਰਨਾਕ ਹਨ।'
ਡਾ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਹਾਜ਼ਿਰ ਹੋ
ਜਦੋਂ ਉਸ ਦੇ ਬਾਰੇ ਵਿਚ ਸਾਫ਼ ਤੌਰ 'ਤੇ ਮਨਘੜਤ ਅਤੇ ਵਧਾ-ਚੜ੍ਹਾ ਕੇ ਅਨੇਕਾਂ ਖ਼ਬਰਾਂ ਛਪਣ ਲੱਗੀਆਂ, ਓਦੋਂ ਸਾਨੂੰ ਪਤਾ ਚਲ ਗਿਆ ਸੀ ਕਿ ਉਸ ਦੀ ਨਿਸ਼ਾਨਦੇਹੀ ਕੀਤੀ ਜਾ ਚੁੱਕੀ ਹੈ। (ਜਿਥੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਕੋਲ ਅਸਲੀ ਸਬੂਤ ਨਹੀਂ ਸਨ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਕੋਲ ਅਜ਼ਮਾਇਆ ਹੋਇਆ ਇਕ ਹੋਰ ਸਭ ਤੋਂ ਬਿਹਤਰ ਤਰੀਕਾ ਸੀ। ਉਹ ਇਹ ਕਿ ਆਪਣੇ ਸ਼ਿਕਾਰ ਦੇ ਬਾਰੇ ਸ਼ੱਕੀ ਮਾਹੌਲ ਬਣਾ ਦਿਓ।)
12 ਸਤੰਬਰ 2013 ਨੂੰ ਉਸ ਦੇ ਘਰ ਪੰਜਾਹ ਪੁਲਸੀਆਂ ਨੇ ਛਾਪਾ ਮਾਰਿਆ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਕੋਲ ਮਹਾਰਾਸ਼ਟਰ ਦੇ ਇਕ ਨਿੱਕੇ ਜਹੇ ਸ਼ਹਿਰ ਅਹੇਰੀ ਦੇ ਮੈਜਿਸਟਰੇਟ ਵੱਲੋਂ ਚੋਰੀ ਕੀਤਾ ਸਾਮਾਨ ਬਰਾਮਦ ਕਰਨ ਲਈ ਜਾਰੀ ਕੀਤੇ ਤਲਾਸ਼ੀ ਵਾਰੰਟ ਸਨ। ਚੋਰੀ ਦਾ ਕੋਈ ਸਾਮਾਨ ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਮਿਲਿਆ, ਸਗੋਂ ਉਹ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਸਾਮਾਨ ਚੁੱਕ ਕੇ (ਚੁਰਾ ਕੇ?) ਲੈ ਗਏ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਨਿੱਜੀ ਲੈਪਟਾਪ, ਹਾਰਡ ਡਿਸਕ ਅਤੇ ਪੈਨ ਡਰਾਈਵਜ਼। ਦੋ ਹਫ਼ਤੇ ਪਿੱਛੋਂ ਮਾਮਲੇ ਦੇ ਤਫ਼ਤੀਸ਼ੀ ਅਧਿਕਾਰੀ ਸੁਹਾਸ ਬਵਾਚੇ ਨੇ ਡਾ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਨੂੰ ਫ਼ੋਨ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਹਾਰਡ ਡਿਸਕ ਖੋਲ੍ਹਣ ਲਈ ਉਸ ਤੋਂ ਪਾਸਵਰਡ ਪੁੱਛੇ। ਡਾ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪਾਸਵਰਡ ਦੱਸ ਦਿੱਤੇ। 9 ਜਨਵਰੀ 2014 ਨੂੰ ਪੁਲਸ ਦੀ ਇਕ ਟੋਲੀ ਨੇ ਉਸ ਦੇ ਘਰ ਆ ਕੇ ਘੰਟਿਆਂਬੱਧੀ ਤਫ਼ਤੀਸ਼ ਕੀਤੀ। 9 ਮਈ ਨੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਉਸ ਨੂੰ ਅਗਵਾ ਕਰ ਲਿਆ। ਉਸੇ ਰਾਤ ਉਹ ਉਸ ਨੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਨਾਗਪੁਰ ਤੇ ਫਿਰ ਅਹੇਰੀ ਲੈ ਗਏ ਅਤੇ ਫਿਰ ਨਾਗਪੁਰ ਮੋੜ ਲਿਆਏ। ਸੈਂਕੜੇ ਪੁਲਸੀਆਂ, ਜੀਪਾਂ ਅਤੇ ਬਾਰੂਦੀ ਸੁਰੰਗ ਵਿਰੋਧੀ ਗੱਡੀਆਂ ਦੇ ਕਾਫ਼ਲੇ ਦੇ ਪਹਿਰੇ ਹੇਠ। ਉਸ ਨੂੰ ਨਾਗਪੁਰ ਕੇਂਦਰੀ ਜੇਲ੍ਹ ਵਿਚ, ਇਸ ਦੇ ਬਦਨਾਮ ਅੰਡਾ ਸੈੱਲ ਵਿਚ ਕੈਦ ਕੀਤਾ ਗਿਆ, ਜਿਥੇ ਉਸ ਦਾ ਨਾਂਅ ਸਾਡੇ ਮੁਲਕ ਦੇ ਜੇਲ੍ਹਾਂ ਵਿਚ ਡੱਕੇ, ਸੁਣਵਾਈ ਦੀ ਉਡੀਕ ਕਰ ਰਹੇ ਤਿੰਨ ਲੱਖ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਹਜ਼ੂਮ ਵਿਚ ਸ਼ੁਮਾਰ ਹੋ ਗਿਆ। ਹੰਗਾਮੇ ਭਰੇ ਇਸ ਪੂਰੇ ਨਾਟਕ ਦੌਰਾਨ ਉਸ ਦੀ ਵੀਲ੍ਹ ਚੇਅਰ ਟੁੱਟ ਗਈ। ਡਾ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਦੀ ਜਿਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੀ ਹਾਲਤ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ '90 ਫ਼ੀਸਦੀ ਅਪਾਹਜ' ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਸਿਹਤ ਹੋਰ ਨਾ ਵਿਗੜੇ ਇਸ ਤੋਂ ਬਚਾਓ ਲਈ ਉਸ ਨੂੰ ਲਗਾਤਾਰ ਦੇਖਰੇਖ, ਫਿਜ਼ਿਓਥੈਰੇਪੀ ਅਤੇ ਦਵਾਈਆਂ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ। ਇਸ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ, ਉਸ ਨੂੰ ਇਕੱਲਤਾ ਵਾਲੀ ਕੋਠੜੀ ਵਿਚ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਜਿਥੇ ਟੱਟੀ-ਪੇਸ਼ਾਬ ਜਾਣ ਵਿਚ ਉਸ ਨੂੰ ਸਹਾਰਾ ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਕੋਈ ਨਹੀਂ। ਉਸ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਹੱਥਾਂ ਤੇ ਪੈਰਾਂ ਦੇ ਸਹਾਰੇ ਰੀਂਘਣਾ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਵਿੱਚੋਂ ਕੁਛ ਵੀ ਤਸੀਹਿਆਂ ਦੇ ਘੇਰੇ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਆਵੇਗਾ। ਬਿਲਕੁਲ ਨਹੀਂ। ਆਪਣੇ ਇਸ ਖ਼ਾਸ ਕੈਦੀ ਦੇ ਬਾਰੇ ਸਟੇਟ ਨੂੰ ਇਕ ਵੱਡਾ ਲਾਹਾ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਬਾਕੀ ਕੈਦੀਆਂ ਵਰਗਾ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਉਸ ਨੂੰ ਬੇਰਹਿਮੀ ਨਾਲ ਤਸੀਹੇ ਦਿੱਤੇ ਜਾ ਸਕਦੇ ਹਨ, ਸ਼ਾਇਦ ਉਸ ਨੂੰ ਮਾਰਿਆ ਵੀ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਐਸਾ ਕਰਨ ਲਈ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਉਸ ਉਪਰ ਉਂਗਲ ਚੁੱਕਣ ਦੀ ਵੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ ਹੈ।
ਅਗਲੀ ਸਵੇਰ ਨਾਗਪੁਰ ਦੇ ਅਖ਼ਬਾਰਾਂ ਦੇ ਪਹਿਲੇ ਸਫ਼ੇ ਉਪਰ ਜੋ ਤਸਵੀਰਾਂ ਛਪੀਆਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚ ਮਹਾਰਾਸ਼ਟਰ ਪੁਲਸ ਦੀ ਭਾਰੀ ਹਥਿਆਰਬੰਦ ਪਾਰਟੀ ਨੇ ਆਪਣੀ ਜਿੱਤ ਦੀ ਨਿਸ਼ਾਨੀ ਦੇ ਨਾਲ ਪੂਰੀ ਸ਼ਾਨੋ-ਸ਼ੌਕਤ ਨਾਲ ਪੋਜ਼ ਦਿੱਤੇ ਹੋਏ ਸਨ-ਆਪਣੀ ਟੁੱਟੀ ਹੋਈ ਵੀਲ੍ਹ ਚੇਅਰ ਉਪਰ ਖ਼ਤਰਨਾਕ ਦਹਿਸ਼ਤਗਰਦ, ਜੰਗੀ ਕੈਦੀ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ।
ਉਸ ਉਪਰ ਯੂ.ਏ.ਪੀ.ਏ. ਦੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੈਕਸ਼ਨਾਂ ਤਹਿਤ ਇਲਜ਼ਾਮ ਲਗਾਏ ਗਏ: ਸੈਕਸ਼ਨ 13 (ਗ਼ੈਰਕਾਨੂੰਨੀ ਕਾਰਵਾਈਆਂ ਵਿਚ ਹਿੱਸਾ ਲੈਣਾ/ਉਸ ਦੀ ਹਮਾਇਤ ਕਰਨਾ/ਉਕਸਾਉਣਾ/ਉਸ ਨੂੰ ਅਮਲ ਵਿਚ ਲਿਆਉਣ ਲਈ ਭੜਕਾਉਣਾ), ਸੈਕਸ਼ਨ 18 (ਦਹਿਸ਼ਤਗਰਦ ਕਾਰਵਾਈ ਦੀ ਸਾਜ਼ਿਸ਼/ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਨਾ), ਸੈਕਸ਼ਨ 20 (ਇਕ ਦਹਿਸ਼ਤਗਰਦ ਗਰੋਹ ਜਾਂ ਜਥੇਬੰਦੀ ਦਾ ਮੈਂਬਰ ਹੋਣਾ), ਸੈਕਸ਼ਨ 38 (ਇਕ ਦਹਿਸ਼ਤਗਰਦ ਜਥੇਬੰਦੀ ਦੀਆਂ ਸਰਗਰਮੀਆਂ ਨੂੰ ਅੱਗੇ ਵਧਾਉਣ ਦੇ ਇਰਾਦੇ ਨਾਲ ਉਸ ਨਾਲ ਜੁੜਨਾ) ਅਤੇ ਸੈਕਸ਼ਨ 39 (ਇਕ ਦਹਿਸ਼ਤਗਰਦ ਜਥੇਬੰਦੀ ਦੀ ਹਮਾਇਤ ਵਧਾਉਣ ਦੇ ਮਕਸਦ ਨਾਲ ਮੀਟਿੰਗਾਂ ਕਰਨ 'ਚ ਮਦਦ ਕਰਨਾ ਜਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਨਾ)। ਉਸ ਉਪਰ ਇਲਜ਼ਾਮ ਲਗਾਇਆ ਗਿਆ ਕਿ ਉਸ ਨੇ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ. (ਮਾਓਵਾਦੀ) ਦੀ ਕਾ. ਨਰਮਦਾ ਨੂੰ ਦੇਣ ਲਈ, ਜੇ.ਐੱਨ.ਯੂ. ਦੇ ਇਕ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਹੇਮ ਮਿਸ਼ਰਾ ਨੂੰ ਇਕ ਕੰਪਿਊਟਰ ਚਿੱਪ ਦਿੱਤੀ ਸੀ। ਹੇਮ ਮਿਸ਼ਰਾ ਨੂੰ ਅਗਸਤ 2013 'ਚ ਬਲਾਰਸ਼ਾਹ ਰੇਲਵੇ ਸਟੇਸ਼ਨ ਤੋਂ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਅਤੇ ਉਹ ਡਾ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਦੇ ਨਾਲ ਨਾਗਪੁਰ ਜੇਲ੍ਹ ਵਿਚ ਬੰਦ ਹੈ। ਇਸ 'ਸਾਜ਼ਿਸ਼' ਵਿਚ ਉਸ ਦੇ ਨਾਲ ਦੇ ਹੋਰ ਤਿੰਨ ਮੁਲਜ਼ਮ ਜ਼ਮਾਨਤ ਉਪਰ ਰਿਹਾਅ ਹੋ ਚੁੱਕੇ ਹਨ।
ਦੋਸ਼-ਪੱਤਰ ਵਿਚ ਗਿਣਾਏ ਹੋਰ ਗੰਭੀਰ ਜੁਰਮ ਇਹ ਹਨ ਕਿ ਡਾ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਰੈਵੋਲੂਸ਼ਨਰੀ ਡੈਮੋਕਰੇਟਿਕ ਫਰੰਟ ਦੇ ਜਾਇੰਟ ਸਕੱਤਰ ਹਨ। ਆਰ.ਡੀ.ਐੱਫ. ਉੜੀਸਾ ਅਤੇ ਆਂਧਰਾ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਇਕ ਪਾਬੰਦੀਸ਼ੁਦਾ ਜਥੇਬੰਦੀ ਹੈ, ਉਥੇ ਇਸ ਉਪਰ ਮਾਓਵਾਦੀ 'ਫਰੰਟ' ਜਥੇਬੰਦੀ ਹੋਣ ਦਾ ਸ਼ੱਕ ਹੈ। ਨਾ ਇਹ ਦਿੱਲੀ ਵਿਚ ਪਾਬੰਦੀਸ਼ੁਦਾ ਹੈ, ਨਾ ਹੀ ਮਹਾਰਾਸ਼ਟਰ ਵਿਚ। ਇਸ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਜਾਣੇ-ਪਛਾਣੇ ਕਵੀ ਵਰਵਰਾ ਰਾਓ ਹਨ, ਜੋ ਹੈਦਰਾਬਾਦ ਵਿਚ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ।
ਡਾ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਦੇ ਮਾਮਲੇ ਦੀ ਸੁਣਵਾਈ ਅਜੇ ਸ਼ੁਰੂ ਨਹੀਂ ਹੋਈ। ਇਸ ਦੇ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਣ ਵਿਚ ਜੇ ਵਰ੍ਹੇ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਮਹੀਨੇ ਲੱਗਣ ਦੀ ਸੰਭਾਵਨਾ ਹੈ। ਸਵਾਲ ਇਹ ਹੈ ਕਿ 90 ਫ਼ੀਸਦੀ ਅਪਾਹਜ ਬੰਦਾ ਜੇਲ੍ਹ ਦੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਬਹੁਤ ਹੀ ਭੈੜੇ ਹਾਲਾਤ ਵਿਚ ਕਦੋਂ ਤੱਕ ਜਿਊਂਦਾ ਰਹਿ ਸਕੇਗਾ?
ਜੇਲ੍ਹ ਵਿਚ ਗੁਜ਼ਾਰੇ ਇਕ ਵਰ੍ਹੇ ਵਿਚ ਹੀ, ਉਸ ਦੀ ਸਿਹਤ ਖ਼ਤਰਨਾਕ ਰੂਪ 'ਚ ਵਿਗੜੀ ਹੈ। ਉਸ ਨੂੰ ਲਗਾਤਾਰ, ਤਕਲੀਫ਼ਦੇਹ ਦਰਦ ਹੁੰਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। (ਜੇਲ੍ਹ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਨੇ ਮਦਦਗਾਰ ਬਣਦੇ ਹੋਏ, ਇਸ ਨੂੰ ਪੋਲੀਓ ਪੀੜਤਾਂ ਲਈ 'ਬਹੁਤ ਹੀ ਮਾਮੂਲੀ' ਦੱਸਿਆ।) ਉਸ ਦੀ ਰੀੜ੍ਹ ਦੀ ਹੱਡੀ ਨਕਾਰਾ ਹੋ ਚੁੱਕੀ ਹੈ। ਇਹ ਟੇਢੀ ਹੋ ਕੇ ਫੇਫੜਿਆਂ ਵਿਚ ਧਸਦੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ। ਉਸ ਦੀ ਖੱਬੀ ਬਾਂਹ ਕੰਮ ਨਹੀਂ ਕਰ ਰਹੀ। ਜਿਸ ਮੁਕਾਮੀ ਹਸਪਤਾਲ ਵਿਚ ਅਧਿਕਾਰੀ ਉਸ ਨੂੰ ਮੁਆਇਨੇ ਲਈ ਲੈ ਕੇ ਗਏ ਸਨ, ਉਥੋਂ ਦੇ ਦਿਲ ਦੇ ਡਾਕਟਰ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਉਸ ਦੀ ਤੁਰੰਤ ਐਂਜੀਓਪਲਾਸਟੀ ਕਰਾਈ ਜਾਵੇ। ਜੇ ਉਸ ਦੀ ਐਂਜੀਓਪਲਾਸਟੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਤਾਂ ਉਸ ਦੀ ਅਜੋਕੀ ਹਾਲਤ ਤੇ ਜੇਲ੍ਹ ਦੇ ਹਾਲਾਤ ਨੂੰ ਦੇਖਦੇ ਹੋਏ ਇਹ ਇਲਾਜ ਜਾਨਲੇਵਾ ਹੀ ਸਾਬਤ ਹੋਵੇਗਾ। ਜੇਲ੍ਹ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਨੇ ਉਸ ਨੂੰ ਦਵਾਈਆਂ ਦੇਣ ਤੋਂ ਵਾਰ-ਵਾਰ ਇਨਕਾਰ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਜੋ ਨਾ ਸਿਰਫ਼ ਉਸ ਦੀ ਤੰਦਰੁਸਤੀ ਲਈ ਸਗੋਂ ਉਸ ਦੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਲਈ ਬੇਹੱਦ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹਨ। ਜਦੋਂ ਉਹ ਉਸ ਨੂੰ ਦਵਾਈਆਂ ਲੈਣ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਦਿੰਦੇ ਹਨ, ਓਦੋਂ ਵੀ ਉਹ ਉਸ ਨੂੰ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਖਾਣਾ ਲੈਣ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਨਹੀਂ ਦਿੰਦੇ, ਜੋ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਵਾਈਆਂ ਦੇ ਨਾਲ ਦੇਣਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।
ਹਿੰਦੁਸਤਾਨ ਅਪਾਹਜਾਂ ਦੇ ਹੱਕਾਂ ਬਾਰੇ ਕੌਮਾਂਤਰੀ ਸਮਝੌਤੇ ਦਾ ਹਿੱਸਾ ਹੈ ਅਤੇ ਹਿੰਦੁਸਤਾਨੀ ਕਾਨੂੰਨ ਇਕ ਐਸੇ ਇਨਸਾਨ ਨੂੰ ਵਿਚਾਰ-ਅਧੀਨ ਕੈਦੀ ਵਜੋਂ ਲੰਮੇ ਸਮੇਂ ਲਈ ਕੈਦ ਰੱਖਣ ਦੀ ਸਾਫ਼ ਤੌਰ 'ਤੇ ਮਨਾਹੀ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਅਪਾਹਜ ਹੈ, ਇਸ ਤੱਥ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਡਾ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਨੂੰ ਹੇਠਲੀ ਅਦਾਲਤ ਵੱਲੋਂ ਦੋ ਵਾਰ ਜ਼ਮਾਨਤ ਦੇਣ ਤੋਂ ਨਾਂਹ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਗਈ। ਦੂਜੇ ਮੌਕੇ ਉਪਰ ਜ਼ਮਾਨਤ ਦੀ ਅਰਜ਼ੀ ਇਸ ਅਧਾਰ 'ਤੇ ਖਾਰਜ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਕਿ ਜੇਲ੍ਹ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਨੇ ਅਦਾਲਤ ਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਇਹ ਦਿਖਾਇਆ ਸੀ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵੱਲੋਂ ਉਸ ਨੂੰ ਜ਼ਰੂਰੀ ਤੇ ਖ਼ਾਸ ਦੇਖਭਾਲ ਮੁਹੱਈਆ ਕਰਵਾਈ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ, ਜੋ ਉਸ ਵਰਗੀ ਹਾਲਤ ਵਾਲੇ ਬੰਦੇ ਲਈ ਜ਼ਰੂਰੀ ਮੰਨੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। (ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਉਸ ਦੇ ਪਰਵਾਰ ਨੂੰ ਇਹ ਇਜਾਜ਼ਤ ਦਿੱਤੀ ਕਿ ਉਸ ਦੀ ਵੀਲ੍ਹ ਚੇਅਰ ਬਦਲ ਦੇਣ)। ਡਾ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਨੇ ਜੇਲ੍ਹ ਵਿੱਚੋਂ ਲਿਖੇ ਇਕ ਖ਼ਤ ਵਿਚ ਕਿਹਾ ਕਿ ਜਿਸ ਦਿਨ ਜ਼ਮਾਨਤ ਦੇਣ ਤੋਂ ਨਾਂਹ ਕਰਨ ਦਾ ਫ਼ੈਸਲਾ ਆਇਆ, ਓਦੋਂ ਹੀ ਉਸ ਦੀ ਖ਼ਾਸ ਦੇਖਭਾਲ ਵਾਪਸ ਲੈ ਲਈ ਗਈ। ਨਿਰਾਸ਼ ਹੋ ਕੇ ਉਸ ਨੇ ਭੁੱਖ-ਹੜਤਾਲ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤੀ। ਕੁਛ ਦਿਨਾਂ 'ਚ ਹੀ ਉਸ ਨੂੰ ਬੇਹੋਸ਼ੀ ਦੀ ਹਾਲਤ ਵਿਚ ਹਸਪਤਾਲ ਲਿਜਾਇਆ ਗਿਆ।
ਉਸ ਉਪਰ ਲਗਾਏ ਇਲਜ਼ਾਮ ਕੁਛ ਵੀ ਹੋਣ, ਕੀ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਸਾਈਬਾਬਾ ਨੂੰ ਜ਼ਮਾਨਤ ਮਿਲਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ? ਇਥੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਮਸ਼ਹੂਰ ਜਨਤਕ ਸ਼ਖਸੀਅਤਾਂ ਅਤੇ ਸਰਕਾਰੀ ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ ਦੀ ਇਕ ਸੂਚੀ ਪੇਸ਼ ਹੈ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜ਼ਮਾਨਤ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਹੈ।
23 ਅਪ੍ਰੈਲ 2015 ਨੂੰ ਬਾਬੂ ਬਜਰੰਗੀ ਨੂੰ ਗੁਜਰਾਤ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਵਿਚ 'ਅੱਖ ਦੇ ਇਕ ਫੌਰੀ ਅਪਰੇਸ਼ਨ' ਦੇ ਲਈ ਜ਼ਮਾਨਤ ਉਪਰ ਰਿਹਾਅ ਕੀਤਾ ਗਿਆ, ਜੋ 2002 ਵਿਚ ਨਰੋਦਾ ਪਾਟਿਆ ਕਤਲੇਆਮ ਵਿਚ, ਆਪਣੀ ਭੂਮਿਕਾ ਕਾਰਨ ਕਸੂਰਵਾਰ ਸਾਬਤ ਹੋ ਚੁੱਕਾ ਹੈ, ਜਿਥੇ ਦਿਨ-ਦਿਹਾੜੇ 97 ਲੋਕ ਮਾਰ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਸਨ, ਅਤੇ ਜਿਸ ਨੂੰ ਉਮਰ ਕੈਦ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਸੁਣਾਈ ਜਾ ਚੁੱਕੀ ਹੈ। ਇਹ ਉਹੀ ਬਾਬੂ ਬਜਰੰਗੀ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੇ ਆਪਣੀ ਜ਼ਬਾਨੀ ਆਪਣੇ ਕੀਤੇ ਜੁਰਮ ਦੇ ਬਾਰੇ ਹੁੱਬ ਕੇ ਕਿਹਾ ਸੀ: 'ਅਸੀਂ ਮੁਸਲਮਾਨਾਂ ਦੀ ਇਕ ਵੀ ਦੁਕਾਨ ਨਹੀਂ ਛੱਡੀ। ਅਸੀਂ ਸਭ ਕਾਸੇ ਨੂੰ ਅੱਗ ਲਾ ਦਿੱਤੀ, ਅਸੀਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜਲਾਇਆ ਅਤੇ ਮਾਰ ਮੁਕਾਇਆ। ਟੁਕੜੇ-ਟੁਕੜੇ ਕੀਤੇ, ਸਾੜਿਆ, ਅੱਗ ਲਾਈ੩.... ਅਸੀਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਅੱਗ ਲਗਾਉਣ ਵਿਚ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਰੱਖਦੇ ਹਾਂ ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਹਰਾਮੀ ਚਿਤਾ ਉਪਰ ਸੜਨਾ ਨਹੀਂ ਚਾਹੁੰਦੇ। ਉਹ ਇਸ ਤੋਂ ਡਰਦੇ ਹਨ।' [ਆਫਟਰ ਕਿਲਿੰਗ ਦੈੱਮ ਆਈ ਫੈਲਟ ਲਾਈਕ ਮਹਾਰਾਣਾ ਪ੍ਰਤਾਪ', ਤਹਿਲਕਾ, 1 ਸਤੰਬਰ 2007]
ਅੱਖ ਦਾ ਅਪਰੇਸ਼ਨ, ਵਾਹ? ਸ਼ਾਇਦ ਜ਼ਰਾ ਸੋਚੋ, ਇਹ ਇਕ ਫੌਰੀ ਲੋੜ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਕਾਤਲ ਅੱਖਾਂ ਨਾਲ ਦੁਨੀਆ ਨੂੰ ਦੇਖਦਾ ਹੈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕੁਛ ਘੱਟ ਬੇਵਕੂਫ਼ ਅਤੇ ਕੁਛ ਘੱਟ ਖ਼ਤਰਨਾਕ ਅੱਖਾਂ ਵਿਚ ਬਦਲ ਦਿੱਤਾ ਜਾਵੇ।
30 ਜੁਲਾਈ 2014 ਨੂੰ ਗੁਜਰਾਤ ਵਿਚ ਮੋਦੀ ਸਰਕਾਰ ਦੀ ਇਕ ਸਾਬਕਾ ਮੰਤਰੀ ਮਾਯਾ ਕੋਡਨਾਨੀ ਨੂੰ ਗੁਜਰਾਤ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਜ਼ਮਾਨਤ ਦੇ ਦਿੱਤੀ। ਜੋ ਉਸੇ ਨਰੋਦਾ ਪਾਟਿਆ ਕਤਲੇਆਮ ਵਿਚ ਕਸੂਰਵਾਰ ਸਾਬਤ ਹੋ ਚੁੱਕੀ ਹੈ ਅਤੇ 28 ਸਾਲ ਦੀ ਕੈਦ ਭੁਗਤ ਰਹੀ ਹੈ। ਕੋਡਨਾਨੀ ਇਕ ਮੈਡੀਕਲ ਡਾਕਟਰ ਹੈ ਜੋ ਕਹਿੰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਉਸ ਨੂੰ ਅੰਤਾਂ ਦੀ ਤਪਦਿਕ ਹੈ, ਦਿਲ ਦਾ ਰੋਗ ਹੈ ਅਤੇ ਉਦਾਸੀ ਰੋਗ ਹੈ ਅਤੇ ਰੀੜ੍ਹ ਦੀ ਹੱਡੀ ਦੀ ਸਮੱਸਿਆ ਹੈ। ਉਸ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਵੀ ਮੁਲਤਵੀ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਹੈ।
22 ਮਈ 1987 ਨੂੰ ਹਾਸ਼ਿਮਪੁਰਾ ਤੋਂ ਪੁਲਸ ਆਰਮਡ ਕਾਂਸਟੈਬੂਲਰੀ (ਪੀ.ਏ.ਸੀ.) ਵੱਲੋਂ ਫੜ ਕੇ ਟਰੱਕ ਵਿਚ ਲਿਜਾਏ ਗਏ 42 ਮੁਸਲਮਾਨਾਂ ਨੂੰ ਗੋਲੀ ਮਾਰ ਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਲਾਸ਼ਾਂ ਥੋੜ੍ਹੀ ਦੂਰ ਇਕ ਨਹਿਰ ਵਿਚ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤੀਆਂ ਗਈਆਂ। ਇਸ ਮਾਮਲੇ ਵਿਚ ਪੀ.ਏ.ਸੀ. ਦੇ ਉੱਨੀ ਜਵਾਨ ਦੋਸ਼ੀ ਮੰਨੇ ਗਏ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਸਾਰਿਆਂ ਦੀ ਨੌਕਰੀ ਬਰਕਰਾਰ ਰਹੀ, ਦੂਜਿਆਂ ਵਾਂਗ ਉਹ ਤਰੱਕੀਆਂ ਅਤੇ ਬੋਨਸ ਲੈਂਦੇ ਰਹੇ। ਤੇਰਾਂ ਸਾਲ ਬਾਅਦ, ਸੰਨ 2000 ਵਿਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਸੋਲਾਂ ਨੇ ਆਤਮ-ਸਮਰਪਣ ਕਰ ਦਿੱਤਾ (ਤਿੰਨ ਮਰ ਚੁੱਕੇ ਸਨ)। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਫੌਰੀ ਜ਼ਮਾਨਤ ਦੇ ਦਿੱਤੀ ਗਈ। ਕੁਛ ਹੀ ਹਫ਼ਤੇ ਪਹਿਲਾਂ, ਮਾਰਚ 2015 'ਚ ਸਾਰੇ ਸੋਲਾਂ ਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਸਬੂਤਾਂ ਦੀ ਅਣਹੋਂਦ 'ਚ ਰਿਹਾਅ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ।
ਦਿੱਲੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਵਿਚ ਇਕ ਅਧਿਆਪਕ ਅਤੇ ਕਮੇਟੀ ਫਾਰ ਦ ਡਿਫੈਂਸ ਐਂਡ ਰਿਲੀਜ਼ ਆਫ ਸਾਈਬਾਬਾ ਦੇ ਇਕ ਮੈਂਬਰ ਹੈਨੀ ਬਾਬੂ ਹਾਲ ਹੀ ਵਿਚ ਕੁਛ ਮਿੰਟਾਂ ਲਈ ਹਸਪਤਾਲ ਵਿਚ ਡਾ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਨੂੰ ਮਿਲਣ ਵਿਚ ਕਾਮਯਾਬ ਹੋ ਗਏ। 23 ਅਪ੍ਰੈਲ 2015 ਨੂੰ ਇਕ ਪ੍ਰੈੱਸ ਸੰਮੇਲਨ ਵਿਚ, ਜਿਸ ਦੀ ਕੋਈ ਖ਼ਬਰ ਹੀ ਨਹੀਂ ਛਪੀ, ਹੈਨੀ ਬਾਬੂ ਨੇ ਮੁਲਾਕਾਤ ਦੇ ਹਾਲਾਤ ਇੰਞ ਬਿਆਨ ਕੀਤੇ: ਡਾ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਨੂੰ ਇਕ ਸੇਲਾਈਨ ਡ੍ਰਿਪ ਲਾਈ ਹੋਈ ਸੀ। ਉਹ ਬਿਸਤਰ ਤੋਂ ਉਠ ਕੇ ਬੈਠੇ ਅਤੇ ਉਸ ਨਾਲ ਗੱਲ ਕੀਤੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸਿਰ ਵੱਲ ਏਕੇ ਸੰਤਾਲੀ ਤਾਣੀ ਇਕ ਸੁਰੱਖਿਆ ਮੁਲਾਜ਼ਮ ਖੜ੍ਹਾ ਰਿਹਾ। ਇਹ ਉਸ ਦੀ ਡਿਊਟੀ ਸੀ ਕਿ ਉਹ ਯਕੀਨੀ ਬਣਾਵੇ ਕਿ ਉਸ ਦਾ ਕੈਦੀ ਆਪਣੀਆਂ ਲਕਵਾਗ੍ਰਸਤ ਲੱਤਾਂ ਨਾਲ ਭੱਜ ਨਾ ਜਾਵੇ।
ਕੀ ਡਾ. ਸਾਈਬਾਬਾ ਨਾਗਪੁਰ ਕੇਂਦਰੀ ਜੇਲ੍ਹ ਤੋਂ ਜ਼ਿੰਦਾ ਬਾਹਰ ਆ ਸਕੇਗਾ? ਕੀ ਉਹ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਸਾਈਬਾਬਾ ਬਾਹਰ ਆਵੇ? ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਕਾਰਨ ਹਨ, ਜੋ ਇਸ਼ਾਰਾ ਕਰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਉਹ ਐਸਾ ਨਹੀਂ ਚਾਹੁੰਦੇ।
ਇਹੀ ਸਭ ਤਾਂ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਅਸੀਂ ਬਰਦਾਸ਼ਤ ਕਰ ਰਹੇ ਹਾਂ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਅਸੀਂ ਵੋਟ ਪਾਉਂਦੇ ਹਾਂ, ਜਿਸ ਨਾਲ ਅਸੀਂ ਰਜ਼ਾਮੰਦ ਹਾਂ।
ਇਹੀ ਤਾਂ ਹਾਂ ਅਸੀਂ।        
ਅਨੁਵਾਦ : ਬੂਟਾ ਸਿੰਘ



व्यंग
- नीलम घुमाण
 

सच
सच कहना सच से सिवा कुछ न कहना
फिर सच तो यह है
कि युवा शक्ति खुद को ढो रही है
पता नहीं जैसे तैसे हंसते हुए रो रही है,
नशे में डूबी,
बेरोजगारी की मारी,
कहीं डाका कहीं आगजनी
कहीं मारा मारी
बेचारी युवा शक्ति।
सच कहना सच......
    फिर सच तो यह कि ‘‘औरत’’ बेचारी
    औरत होने का संताप भोग रही है।
    दिन रात कांटों पर सो रही है।
    छुपती छुपाती भागती है
    खुद को बचाने के लिए
    क्योंकि आस्मिता के साथ अब तो जान भी जाने लगी है।
    सच कहना सच.....
फिर सच तो यह है कि मंत्रीगण
रोज ही औरत के विरुद्ध ब्यान देकर चर्चा में रहते हैं।
वैसे तो चर्चा उनकी होती नहीं है।
औरत विरुद्ध  ब्यानबाजी उन्हें चर्चा में लाती है।
उनके खिलाफ ‘‘मुर्दाबाद’’
उन्हें ‘‘अल्प’’ राजनीतिक जीवन दे जाती है।
सच कहना सच......
    फिर सच तो यह है कि हाय ‘‘महंगाई’’
    तुझे मौत क्यों न आयी
    बाजार से रसोई तू सब में समाई।
    सरकार की तू सगी हमारी तू दुश्मन
    हमें तू रास न आयी।
    मुद्दा बनाकर तुझे सत्ता में आते हैं।
    और रोकने के लिए तुझे फिर सालों का अंदाजा लगाते हैं।
    तुझे काबू  में करना अब इनके बस की बात नहीं।
    चलो! लोगों को ‘‘अच्छे दिनों’’ की यह ‘‘सौगात’’ ही सही।
    सच कहना सच......
फिर सच तो यह है कि घोटाला है जी घोटाला है।
यहां घोटालों का बोलबाला है
कोयला, व्यापम, तरंगें ले लो
अब तो पानी में भी घोटाला है
बेशर्मी का बोलबाला है।
आम जनता के मुंह पे लगाना ताला है।
घोटाला है , घोटाला है।
सच कहना सच .....
 



ਕਵਿਤਾ
ਰਾਮ ਰੱਖਾ ਸਿੰਘ
- ਮਦਨ ਵੀਰਾ

 

ਇਹ ਰਾਮ ਰੱਖਾ ਹੈ
ਮੰਗਦਾ ਹੈ ਸੱਤੇ ਖੈਰਾਂ
ਰਾਮ ਕੋਲੋ-ਘਣਸ਼ਾਮ ਕੋਲੋ
    ਪਰ ਰਾਮ ਵਾਲਿਆਂ ਲਈ
    ਨਾ ਇਹ ਰਾਮ ਸੇਵਕ ਹੈ
    ਨਾ ਇਹ ਸ਼ਾਮ ਸੇਵਕ ਹੈ
    ਰਾਮ ਰੱਖਾ ਜਮਾਂਦਾਰ ਹੈ
ਝਾੜੂ ਬਰਦਾਰ ਹੈ
ਘਰਾਂ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਹੈ
ਦਰਾਂ ਤੋਂ ਪਾਰ ਹੈ
    ਇਹੀ ਰਾਮ....
    ਨਹੀਂ ਰਾਮ ਰੱਖਾ ਸਿੰਘ ਹੈ
    ਬਾਬੇ ਨਾਨਕ ਦੀ ਨਾਮ ਲੇਵਾ ਸੰਗਤ
    ਗੁਰੂ ਘਰ ਦੀ ਪੰਗਤ
    ਦਸ਼ਮੇਸ਼ ਦੇ ਇਸ ਬੇਟੇ ਨੂੰ
    ਸਿਦਕੀ ਰੰਘਰੇਟੇ ਨੂੰ
    ਗੁਰੂ ਘਰ ਦਾ ਸਿੱਖ ਨਹੀਂ
    ਮਜ਼੍ਹਬੀ ਸਿੱਖ ਦਾ ਨਾਂ ਦਿੰਦੀ ਹੈ
    ਤੇ ਅਖੌਤੀ ਮੁੱਖ ਧਾਰਾ 'ਤੋਂ
    ਵੱਖਰੀ ਥਾਂ ਦਿੰਦੀ ਹੈ।


ਗੱਲ ਸੁਣ ਚੱਪਣਾ
    - ਹਬੀਬ ਜਾਲਿਬ
ਗੱਲ ਸੁਣ ਚੱਪਣਾ
ਰਾਜ ਲਿਆ ਆਪਣਾ
ਵੱਡਿਆਂ ਵਡੇਰਿਆਂ ਦਾ
ਜ਼ਾਲਮਾਂ ਲੁਟੇਰਿਆਂ ਦਾ
ਛੱਡ ਨਾਂਅ ਜਪਣਾ
ਗੱਲ ਸੁਣ ਚੱਪਣਾ
ਰਾਜ ਲਿਆ ਆਪਣਾ।
    ਗੋਰੇ ਚਿੱਟੇ ਸਾਹਬਾਂ ਕੋਲੋਂ
    ਕਾਲਿਆਂ ਨਵਾਬਾਂ ਕੋਲੋਂ
    ਬੱਚ ਇਹਨਾਂ ਅਜ਼ਾਬਾਂ ਕੋਲੋਂ
    ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਮੈਨੂੰ ਮੁੱਦਤਾਂ
    ਪਵੇਗਾ ਕਲਪਣਾ
    ਗੱਲ ਸੁਣ ਚੱਪਣਾ
ਸ਼ਰ੍ਹਾ ਦਿਆਂ ਪੋਤਿਆਂ ਨੇ
ਪੋਤਿਆਂ ਪੜਪੋਤਿਆਂ ਨੇ
ਰੈਕਣਾਂ ਦੇ ਤੋਤਿਆਂ ਨੇ
ਕੁਝ ਤੈਨੂੰ ਦਿੱਤਾ ਵੇ
ਐਵੇਂ ਪਿਆ ਟੱਪ ਨਾ
ਗੱਲ ਸੁਣ ਚੱਪਣਾ
    ਬੰਦੇ ਨਹੀਂ ਇਹ ਪਿਆਰ ਦੇ
    ਐਵੇਂ ਤੈਨੂੰ ਚਾਰਦੇ
    ਝੂਠ ਪਏ ਮਾਰਦੇ
    ਹੋਸ਼ ਕਰ ਪਾਗਲਾ
    ਚੱਲ ਪਾ ਖੱਪ ਨਾ
    ਗੱਲ ਸੁਣ ਚੱਪਣਾ
    ਰਾਜ ਲਿਆ ਆਪਣਾ

 


ਆਜ਼ਾਦੀ ਜਸ਼ਨਾਂ ਦੇ ਨਾਂਅ
- ਮੰਗਤ ਰਾਮ ਪਾਸਲਾ
ਆਜ਼ਾਦੀ ਨਾਮ ਹੈ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸੁਪਨੇ ਦਾ
ਖੇਤਾਂ 'ਚ ਮਹਿਕਦੀ ਕਣਕ ਦਾ।
ਕਿਰਤੀ ਦੇ ਮੁੜ੍ਹਕੇ ਦੀ ਚਮਕ ਦਾ।
ਆਜ਼ਾਦੀ-
ਜਿੱਥੇ ਹਰ ਕੋਈ 'ਬੇਗਮਪੁਰੇ' ਦਾ ਵਾਸੀ ਹੋਏਗਾ।
    ਆਜ਼ਾਦੀ ਨੂੰ ਇਸਦੇ ਸਹੀ ਅਰਥ ਦੇਣ ਲਈ
    ਲਿਖਿਆ ਗਿਆ ਸਰਹਿੰਦ ਦੀ ਦੀਵਾਰ ਤੋਂ
    ਕਾਮਾਗਾਟੂ ਮਾਰੂ ਤੱਕ ਦਾ ਸਫਰਨਾਮਾ।
    ਤੇ ਜਲ੍ਹਿਆਂ ਵਾਲੇ ਬਾਗ ਤੋਂ
    ਸਤਲੁਜ ਕੰਢੇ ਤੱਕ ਦੀ ਲੜੀ ਗਈ
    ਰੱਤ ਭਿੱਜੀ ਜੰਗ ਦੀ ਦਾਸਤਾਂ।
    ਕਦੀ ਅੰਡੇਮਾਨ ਦੀਆਂ ਜੇਲ੍ਹਾਂ 'ਚ ਆਜ਼ਾਦੀ ਦੀ
    ਰੂਹ ਕੈਦ ਸੀ।
ਆਜ਼ਾਦੀ........
ਇਸਦੇ ਅਰਥ ਸਮੇਂ ਦੇ ਅਮਲਾਂ ਨਾਲ ਬਦਲੇ ਗਏ।
ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਮੁੱਠ ਵਿਚ ਆਜ਼ਾਦੀ ਦੀ ਦੇਵੀ ਹੈ,
ਆਜ਼ਾਦੀ ਦੇ ਅਰਥ ਬਦਲਣ ਵਿਚ
ਉਨ੍ਹਾਂ ਹੱਥਾਂ ਦੀ ਵੀ ਆਪਣੀ ਭੂਮਿਕਾ ਹੈ,
ਹੁਣ ਆਜ਼ਾਦੀ ਹੈ
ਲੇਬਰ ਚੌਕ 'ਚ ਵਿਕਦੇ ਕਾਮੇਂ ਲਈ
ਭੁਖੇ ਮਰਨ ਦੀ।
ਜਾਂ ਕਰਜ਼ੇ ਦੇ ਝੰਬੇ ਕਿਰਸਾਨ ਲਈ
ਆਤਮ ਹੱਤਿਆ ਦਾ ਚੋਲਾ ਪਾ ਕੇ
ਮੌਤ ਦੀ ਘੋੜੀ ਚੜ੍ਹਨ ਦੀ।
ਅੱਜ ਦਿੱਲੀ ਦੇ ਲਾਲ ਕਿਲੇ ਤੋਂ,
ਆਜ਼ਾਦੀ ਦਾ ਪੈਗ਼ਾਮ,
ਦਾਂਤੇਵਾੜਾ ਤੋਂ ਹੁੰਦਾ ਹੋਇਆ,
ਗੁਜਰਾਤ ਦਾ ਸਫਰ ਕਰਕੇ
ਪੰਜਾਬ ਆਣ ਪੁੱਜਾ ਹੈ।
ਜਿਥੇ ਰੋਜ਼ ਹੀ  ਗੁਰੂ ਦੇ ਸਿੰਘ
ਜਿਨ੍ਹਾ ਬੇਦਾਵਾ ਨਹੀਂ ਪਾੜਿਆ
ਸੜਕਾਂ ਤੇ ਆਜ਼ਾਦੀ ਦੇ ਮਰਸੀਏ ਪੜ੍ਹਦੇ
ਤੇ ਕਿਰਤ ਦੀ ਜਿੱਤ ਦੇ ਗੀਤ ਗਾਉਂਦੇ ਹਨ।
    ਸਾਡੇ ਖਿੱਤੇ ਵਿਚ
    ਆਜ਼ਾਦੀ
    ਹਾਕਮ ਦੇ ਕੁਫ਼ਰ ਤੋਲਣ ਦਾ ਕੰਡਾ ਹੈ।
    ਫਿਜ਼ਾ ਵਿਚ ਜ਼ਹਿਰ ਘੋਲਣ ਦਾ ਲਾਇਸੰਸ ਹੈ।
    ਉਹਨਾਂ ਲਈ ਆਜ਼ਾਦੀ,
    ਬਾਲੜੀ ਦੇ ਬਲਾਤਕਾਰ ਕਰਨ ਦੇ ਹੱਕ ਦਾ ਨਾਂ ਹੈ।
    ਰੋਟੀ ਦਿੰਦੀ ਭੋਇਂ ਖੋਹਣ ਦਾ ਅਧਿਕਾਰ ਹੈ।
    ਗੱਭਰੂ ਨੂੰ ਦਿੱਤੀ 'ਚਿੱਟੇ' ਦੀ ਪੁੜੀ ਹੈ।
    ਸਾਡੇ ਲਈ ਆਜ਼ਾਦੀ
    'ਮਜ਼ਦੂਰ ਦੇ ਚੁਲੇ 'ਚ ਧੁਖਦੀ ਪਾਥੀ ਦਾ ਧੂੰਆ ਹੈ।
    ਕਿਸੇ ਚਰਵਾਹੇ ਦਾ ਸਿਖਰ ਦੁਪਹਿਰੇ
    ਕਿੱਕਰ ਦੀ ਛਾਂ ਹੇਠਾਂ
    ਬੱਕਰੀ ਦੇ ਦੁੱਧ ਦੀ ਚਾਹ ਪੀਣ ਦੀ,
    ਲਾਲਸਾ ਦਾ ਨਾਂਅ ਹੈ।
ਲੋੜ ਹੈ
ਆਜ਼ਾਦੀ ਦੇ ਅਰਥ ਬਦਲਣ ਵਾਲੇ
ਹੁਲੜਬਾਜ਼ਾਂ ਤੋਂ ਇਸਨੂੰ ਬਚਾਉਣ ਦੀ।
ਇਸਦੀ ਬੇਹੁਰਮਤੀ ਕਰਨ ਵਾਲਿਆਂ ਨੂੰ
ਸੱਥਾਂ 'ਚ ਢਾਹੁਣ ਦੀ।
ਲਾਲ ਕਿਲ੍ਹੇ ਦੀ ਫਸੀਲ ਤੋਂ ਲਾਹ ਕੇ
ਆਜ਼ਾਦੀ ਦੇ ਝੰਡੇ ਨੂੰ
'ਲਾਲੋ' ਦੀ ਕੁਟੀਆ 'ਤੇ
ਝੁਲਾਉਣ ਦੀ।
ਆਜ਼ਾਦੀ ਦੇ ਅਰਥ ਸਮਝਣ ਲਈ
ਇਹ ਸਭ ਕੁਝ ਕਰਨ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ। 

ਜਨਤਕ ਲਾਮਬੰਦੀ (ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ - ਅਗਸਤ 2015)

ਸਾਮਰਾਜੀ ਦਾਬੇ ਤੇ ਐਨ.ਡੀ.ਏ. ਦੇ ਭ੍ਰਿਸ਼ਟਾਚਾਰ ਵਿਰੁੱਧ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੇ ਅੰਦੋਲਨ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ 'ਚ ਜਬਰਦਸਤ ਹੁੰਗਾਰਾ
ਭਾਜਪਾ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਾਲੇ ਗੱਠਜੋੜ ਐੱਨ ਡੀ ਏ ਦੀਆਂ ਕੇਂਦਰ ਤੇ ਸੂਬਾ ਸਰਕਾਰਾਂ ਦੇ ਮੰਤਰੀਆਂ ਤੇ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਕੀਤੇ ਜਾ ਰਹੇ ਭ੍ਰਿਸ਼ਟਾਚਾਰ ਵਿਰੁੱਧ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਉਠਾਈ ਜਾ ਰਹੀ ਆਵਾਜ਼ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ 'ਚ ਉਸ ਸਮੇਂ ਜ਼ਬਰਦਸਤ ਹੁੰਗਾਰਾ ਮਿਲਿਆ, ਜਦੋਂ ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ  ਸੀ ਪੀ ਆਈ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ), ਸੀ ਪੀ ਅੱੈਮ ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ ਐੱਲ) ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ ਦੇ ਸੱਦੇ 'ਤੇ 20 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਸਾਰੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਕੇਂਦਰਾਂ 'ਤੇ ਸੈਂਕੜਿਆਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ 'ਚ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਵਰਕਰਾਂ ਤੇ ਕਿਰਤੀ-ਕਿਸਾਨਾਂ ਨੇ ਰੋਹ ਭਰਪੂਰ ਧਰਨੇ ਮਾਰੇ ਤੇ ਮੁਜ਼ਾਹਰੇ ਕੀਤੇ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਧਰਨਿਆਂ ਨੂੰ ਡਾ. ਜੋਗਿੰਦਰ ਦਿਆਲ, ਹਰਦੇਵ ਸਿੰਘ ਅਰਸ਼ੀ, ਭੁਪਿੰਦਰ ਸਾਂਬਰ, ਬੰਤ ਸਿੰਘ ਬਰਾੜ, ਨਿਰਮਲ ਸਿੰਘ ਧਾਲੀਵਾਲ ਅਤੇ ਗੁਰਨਾਮ ਕੰਵਰ (ਸੀ ਪੀ ਆਈ), ਚਰਨ ਸਿੰਘ ਵਿਰਦੀ, ਵਿਜੈ ਮਿਸ਼ਰਾ, ਰਘੁਨਾਥ ਸਿੰਘ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ), ਮੰਗਤ ਰਾਮ ਪਾਸਲਾ, ਹਰਕੰਵਲ ਸਿੰਘ, ਇੰਦਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਗਰੇਵਾਲ, ਕੁਲਵੰਤ ਸਿੰਘ ਸੰਧੂ, ਰਘਬੀਰ ਸਿੰਘ ਪਕੀਵਾਂ, ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਦਾਊਦ ਸੀ ਪੀ ਐੱਮ (ਪੰਜਾਬ) ਅਤੇ ਗੁਰਮੀਤ ਸਿੰਘ ਬਖਤੂਪੁਰਾ, ਰਾਜਵਿੰਦਰ ਰਾਣਾ, ਭਗਵੰਤ ਸਮਾਓ, ਸੁਖਦਰਸ਼ਨ ਨੱਤ, ਗੁਰਪ੍ਰੀਤ ਰੂੜੇਕੇ, ਬਲਬੀਰ ਸਿੰਘ ਰੰਧਾਵਾ ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ ਐੱਲ) ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਸਥਾਨਕ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ। ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਕੇਂਦਰਾਂ 'ਤੇ ਧਰਨਿਆਂ 'ਚ ਜੁੜੇ ਇਕੱਠ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਬੁਲਾਰਿਆਂ ਨੇ ਮੰਗ ਕੀਤੀ ਕਿ ਵਿਆਪਮ ਵਰਗੇ ਲੂੰ-ਕੰਡੇ ਖੜੇ ਕਰ ਦੇਣ ਵਾਲੇ ਘੁਟਾਲੇ, ਜਿਸ ਵਿਚ ਅਰਬਾਂ ਰੁਪਏ ਦੀ ਰਿਸ਼ਵਤ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ 48 ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਸ਼ੱਕੀ ਹਾਲਤਾਂ ਵਿਚ ਮੌਤ ਵੀ ਹੋ ਚੁੱਕੀ ਹੈ ਅਤੇ ਲਲਿਤ ਮੋਦੀ ਘੁਟਾਲੇ ਵਿਚ ਸ਼ਾਮਲ ਮੰਤਰੀਆਂ ਤੇ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀਆਂ ਨੂੰ ਫੌਰੀ ਰੂਪ ਵਿਚ ਬਰਖਾਸਤ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ। ਸਾਮਰਾਜ ਦੀ ਧੱਕੜਸ਼ਾਹੀ ਦੀ ਗੱਲ ਕਰਦਿਆਂ ਉਹਨਾਂ ਗਰੀਸ ਦੀ ਮਿਸਾਲ ਦਿੰਦਿਆਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਗਰੀਸ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਸਾਮਰਾਜੀ ਨੀਤੀਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਡਟ ਕੇ ਵੋਟ ਪਾਈ ਹੈ, ਪਰ ਸਾਮਰਾਜੀ ਦੇਸ਼ਾਂ ਨੇ ਗਰੀਸ ਦੀ ਰਾਇਸ਼ੁਮਾਰੀ ਦੇ ਉਲਟ ਉਸ ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਘੇਰ ਕੇ ਉਥੋਂ ਦੀ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਆਪਣੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਮੰਨਣ ਲਈ ਮਜਬੂਰ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਇਹ ਤਾਂ ਉਸ ਦੇਸ਼ ਦਾ ਹਾਲ ਹੈ, ਜਿਥੇ ਇਕ ਲੋਕ-ਪੱਖੀ ਸਰਕਾਰ ਹੈ, ਪਰ ਸਾਡੇ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਮੋਦੀ ਸਰਕਾਰ ਤਾਂ ਖ਼ੁਦ ਸਾਮਰਾਜੀ ਸੰਸਾਰੀਕਰਨ, ਉਦਾਰੀਕਰਨ ਤੇ ਨਿੱਜੀਕਰਨ ਦੀਆਂ ਨੀਤੀਆਂ ਨੂੰ ਲਾਗੂ ਕਰਦਿਆਂ ਦੁੜੰਗੇ ਮਾਰਦੀ ਅੱਗੇ ਚਲੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ। ਕਿਰਤ ਕਾਨੂੰਨਾਂ 'ਚ ਤਰਮੀਮਾਂ, ਮਨਰੇਗਾ ਫੰਡਾਂ 'ਚ ਕਟੌਤੀ, ਐੱਫ ਸੀ ਆਈ ਦੇ ਖਾਤਮੇ ਦੀਆਂ ਵਿਊਂਤਾਂ ਇਸ ਦੀ ਮਿਸਾਲ ਹਨ।
ਇਹ ਧਰਨੇ ਭ੍ਰਿਸ਼ਟਾਚਾਰ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਰਾਜ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਭਖਦੀਆਂ ਮੰਗਾਂ 'ਤੇ ਆਧਾਰਤ 15 ਨੁਕਾਤੀ ਮੰਗ-ਪੱਤਰ ਵੱਲ ਧਿਆਨ ਖਿੱਚਣ ਲਈ, ਜਿਸ ਵਿਚ ਪ੍ਰਮੁੱਖ ਤੌਰ 'ਤੇ ਬੇਘਰਿਆਂ ਲਈ ਮਕਾਨ ਬਣਾਉਣ ਵਾਸਤੇ 10 ਮਰਲੇ ਦੇ ਪਲਾਟ ਤੇ ਗਰਾਂਟ ਦੇਣਾ, ਭੋਂ-ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਕਾਨੂੰਨ 2013 ਨਾਲ ਛੇੜਛਾੜ ਨਾ ਕਰਨਾ, ਘੱਟੋ-ਘਟ ਤਨਖਾਹ 15000 ਰੁਪਏ ਪ੍ਰਤੀ ਮਹੀਨਾ ਕਰਨਾ, ਕਿਰਤ ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਵਿਚ ਤਰਮੀਮਾਂ ਨਾ ਕਰਨਾ, ਬੁਢਾਪਾ ਤੇ ਵਿਧਵਾ ਪੈਨਸ਼ਨ 3000 ਰੁਪਏ ਕਰਨਾ ਅਤੇ ਮਿਲਣ ਦੀ ਗਰੰਟੀ ਕਰਨਾ, ਮਨਰੇਗਾ ਉਤੇ ਦਿਆਨਤਦਾਰੀ ਨਾਲ ਅਮਲ ਤੇ ਦਿਹਾੜੀ 500 ਰੁਪਏ ਕਰਨਾ, ਖੇਤੀ ਉਪਜਾਂ ਦੇ ਭਾਅ ਸਵਾਮੀਨਾਥਨ ਕਮਿਸ਼ਨ ਦੀਆਂ ਸਿਫਾਰਸ਼ਾਂ ਮੁਤਾਬਕ ਤੈਅ ਕਰਨਾ, ਐੱਫ ਸੀ ਆਈ ਨੂੰ ਟੁੱਟਣ ਨਾ ਦੇਣਾ, ਰਾਜ ਵਿਚ ਨਸ਼ਿਆਂ  ਦੇ ਵਗ ਰਹੇ ਦਰਿਆ ਨੂੰ ਰੋਕਣਾ ਅਤੇ ਪੁਸ਼ਤਪਨਾਹੀ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਸਿਆਸੀ ਆਗੂਆਂ ਨੂੰ ਸਜ਼ਾਵਾਂ ਦੇਣੀਆਂ, ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰਾਂ ਨੂੰ ਯੋਗਤਾ ਮੁਤਾਬਕ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਜਾਂ ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰੀ ਭੱਤਾ ਦੇਣਾ, ਆਮ ਲੋਕਾਂ ਅਤੇ ਔਰਤਾਂ 'ਤੇ ਕੀਤੇ ਜਾਂਦੇ ਸਮਾਜਕ ਤੇ ਪੁਲਸ ਜਬਰ ਨੂੰ ਰੋਕਣਾ, ਰਾਜ ਵਿਚ ਚੱਲ ਰਹੇ ਹਰ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੇ ਮਾਫੀਆ ਰਾਜ ਨੂੰ ਨੱਥ ਪਾਉਣੀ ਅਤੇ ਪੁਸ਼ਤਪਨਾਹੀ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਸਿਆਸੀ ਆਗੂਆਂ ਨੂੰ ਸਜ਼ਾਵਾਂ ਦੇਣੀਆਂ ਆਦਿ ਮੰਗਾਂ ਸ਼ਾਮਲ ਹਨ, ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਦਿੱਤੇ ਗਏ। ਵਰਣਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਇਨ੍ਹਾਂ ਮੰਗਾਂ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੇ ਸੂਬਾਈ ਆਗੂਆਂ ਵੱਲੋਂ 8 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਦੀ ਚੰਡੀਗੜ੍ਹ ਸਥਿਤ ਰਿਹਾਇਸ਼ ਅੱਗੇ ਧਰਨਾ ਵੀ ਮਾਰਿਆ ਗਿਆ ਸੀ। ਇਸ ਸਫਲ ਐਕਸ਼ਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਚੌਹਾਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਮੁੱਦਿਆਂ 'ਤੇ ਲਾਮਬੰਦੀ ਨੂੰ ਤੇਜ਼ ਕਰਨ ਲਈ 10 ਅਗਸਤ ਨੂੰ ਬਰਨਾਲਾ, 17 ਅਗਸਤ ਨੂੰ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਅਤੇ 20 ਅਗਸਤ ਨੂੰ ਜਲੰਧਰ ਵਿਖੇ ਕ੍ਰਮਵਾਰ ਮਾਲਵਾ, ਮਾਝਾ ਅਤੇ ਦੋਆਬਾ ਖੇਤਰਾਂ ਦੀਆਂ ਕਨਵੈਨਸ਼ਨਾਂ ਕੀਤੀਆਂ ਜਾ ਰਹੀਆਂ ਹਨ।
ਇਨ੍ਹਾਂ ਮੁਜ਼ਾਹਰਿਆਂ ਬਾਰੇ 'ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ' ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਰਿਪੋਰਟਾਂ ਸੰਖੇਪ ਰੂਪ 'ਚ ਹੇਠਾਂ ਦਿੱਤੀਆਂ ਜਾ ਰਹੀਆਂ ਹਨ :
 

ਮੋਗਾ : ਸਥਾਨਕ ਬੱਸ ਅੱਡੇ 'ਤੇ ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੇ ਸੱਦੇ 'ਤੇ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ, ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ. (ਐੱਮ) ਵਰਕਰਾਂ ਵੱਲੋਂ ਵਿਸ਼ਾਲ ਰੋਸ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਤੇ ਬਜ਼ਾਰਾਂ ਅੰਦਰ ਮਾਰਚ ਕਰਨ ਉਪਰੰਤ ਡੀ.ਸੀ. ਦਫ਼ਤਰ ਪੁੱਜ ਕੇ ਆਮ ਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਬੁਨਿਆਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤਾਂ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਪੰਦਰਾਂ ਸੂਤਰੀ ਯਾਦ ਪੱਤਰ ਡਿਪਟੀ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਮੋਗਾ ਨੂੰ ਸੌਂਪਿਆ ਗਿਆ। ਇਸ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਸੀ.ਪੀ. ਆਈ. ਦੇ ਆਗੂ ਕਾਮਰੇਡ ਜਗਦੀਸ਼ ਚਾਹਲ, ਸੁਖਜਿੰਦਰ ਮਹੇਸ਼ਰੀ, ਨਰਿੰਦਰ ਕੌਰ, ਜਗਜੀਤ ਸਿੰਘ, ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਸਰਪੰਚ, ਬਲਕਰਨ ਮੋਗਾ, ਗਿਆਨ ਚੰਦ, ਕਰਮਵੀਰ ਕੌਰ ਬੱਧਨੀ ਤੇ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ. ਐੱਮ. ਦੇ ਆਗੂ  ਸੁਖਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਸੇਖੋਂ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰੇਤ ਮੈਂਬਰ,  ਸੁਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਗਗੜਾ, ਦਿਆਲ ਸਿੰਘ ਕੈਲਾ, ਅਮਰਜੀਤ ਧਰਮਕੋਟ, ਅਮਰਜੀਤ ਸਿੰਘ, ਊਦੇ ਸਿੰਘ, ਪਿਆਰਾ ਸਿੰਘ ਢਿੱਲੋਂ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 

ਫਾਜ਼ਿਲਕਾ : ਖੱਬੇਪੱਖੀ ਪਾਰਟੀਆਂ ਸੀ ਪੀ ਆਈ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ) ਅਤੇ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ.ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਸੈਂਕੜੇ ਵਰਕਰ ਪ੍ਰਤਾਪ ਬਾਗ ਫਾਜਿਲਕਾ ਵਿਖੇ ਇਕੱਠੇ ਹੋਏ, ਜਿਸ ਦੇ ਬਾਅਦ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਬਜ਼ਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਜੱਥਾ ਮਾਰਚ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਝੰਡੇ, ਬੈਨਰ ਤੇ ਤਖਤੀਆਂ ਫੜ ਕੇ ਵਰਕਰ ਜੋਸ਼ੀਲੇ ਨਾਅਰੇ ਲੱਗਾ ਕੇ ਡਿਪਟੀ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਦਫਤਰ ਸਾਹਮਣੇ ਪੁੱਜੇ। ਇੱਥੇ ਡਿਪਟੀ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਦਫਤਰ ਸਾਹਮਣੇ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਰੋਸ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਸੀ ਪੀ ਆਈ ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਸਕੱਤਰ ਕਾਮਰੇਡ ਹੰਸ ਰਾਜ ਗੋਲਡਨ, ਸੀਪੀਆਈ (ਐੱਮ) ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਸਕੱਤਰ ਕਾਮਰੇਡ ਗੁਰਚਰਨ ਅਰੋੜਾ ਅਤੇ ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ. ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਜਿਲ੍ਹਾ ਸਕੱਤਰ ਕਾਮਰੇਡ ਗੁਰਮੇਜ ਗੇਜੀ, ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ. ਦੇ ਸਟੇਟ ਕੌਂਸਲ ਮੈਂਬਰ ਕਾਮਰੇਡ ਸੁਰਿੰਦਰ ਢੰਡੀਆਂ, ਕਾਮਰੇਡ ਮਾਹਗਾ ਰਾਮ ਕਟੇਹੜਾ,ਕਾਮਰੇਡ ਕੁਲਵੰਤ ਸਿੰਘ ਕਿਰਤੀ, ਜੈਮਲ ਰਾਮ, ਕਾਮਰੇਡ ਸ਼ਕਤੀ, ਕਾਮਰੇਡ ਅਵਤਾਰ ਸਿੰਘ, ਕਾਮਰੇਡ ਜੱਗਾ ਸਿੰਘ, ਰਿਸ਼ੀਪਾਲ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ। ਇਸ ਧਰਨੇ ਦੇ ਦੌਰਾਨ ਏ ਡੀ ਸੀ ਚਰਨਦੇਵ ਸਿੰਘ ਮਾਨ ਨੂੰ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਸੌਂਪ ਕੇ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਨੂੰ ਭੇਜਿਆ ਗਿਆ।
 

ਬਠਿੰਡਾ : ਪੰਜਾਬ ਦੀਆਂ ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਰੇਤਾ ਬੱਜਰੀ, ਕੇਬਲ, ਟਰਾਂਸਪੋਰਟ ਮਾਫੀਆ, ਨਸ਼ਾ ਤਸਕਰਾਂ ਅਤੇ ਹਰ ਕਿਸਮ ਦੇ ਕਬਜਾਕਰੂ ਤੇ ਗੁੰਡਾ ਗਰੋਹਾਂ ਤੋਂ ਪੰਜਾਬੀਆਂ ਦੀ ਰਾਖੀ ਲਈ ਅਤੇ ਮਿਹਨਤੀ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਮਜ਼ਬੂਤ ਜਮਾਤੀ ਏਕਤਾ ਦੀ ਉਸਾਰੀ ਲਈ, ਮੁੱਠੀ ਪਰ ਅਜਾਰੇਦਾਰਾਂ ਵੱਲੋਂ ਭਾਰਤੀ ਮੰਡੀ ਤੇ ਕੁਦਰਤੀ ਵਸੀਲਿਆਂ, ਕਿਰਤ ਸ਼ਕਤੀ ਦੀ ਅੰਨ੍ਹੀ ਤੇ ਖੁੱਲੀ ਲੁੱਟ ਯਕੀਨੀ ਕਰਨ ਲਈ ਬਣੀਆਂ ਨਵ-ਉਦਾਰਵਾਦੀ ਨੀਤੀਆਂ ਨੰ ਰੱਦ ਕਰਦਿਆਂ ਬਦਲਵੀਆਂ ਲੋਕ ਪੱਖੀ ਨੀਤੀਆਂ ਲਾਗੂ ਕੀਤੇ ਜਾਣ ਲਈ ਸਥਾਨਕ ਅਮਰੀਕ ਸਿੰਘ ਰੋਡ 'ਤੇ ਰੋਸ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ।
ਸੀ ਪੀ ਆਈ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐਮ), ਸੀ ਪੀ ਐਮ ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐਮ ਐਲ) ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ ਵੱਲੋਂ ਕੀਤੇ ਰੋਸ ਪ੍ਰਦਰਸਨ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਦੱਸਿਆ ਕਿ 10 ਅਗਸਤ ਨੂੰ ਬਰਨਾਲਾ, 17 ਅਗਸਤ ਨੂੰ ਅਮ੍ਰਿਤਸਰ, 20 ਅਗਸਤ ਨੂੰ ਜਲੰਧਰ ਵਿਖੇ ਜ਼ੋਨ ਪੱਧਰੀ ਸਾਂਝੇ ਵਿਸ਼ਾਲ ਪ੍ਰਤੀਨਿੱਧ ਸੰਮੇਲਨ ਕੀਤੇ ਜਾਣਗੇ, ਜਿਹਨਾਂ ਵਿੱਚ ਭਵਿੱਖ ਦੇ ਐਕਸਨਾਂ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇਗਾ। ਸਮਾਗਮ ਨੂੰ ਸਾਥੀ ਮਹੀਂਪਾਲ, ਸੁਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਸੋਹੀ, ਹਰਬਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਸੇਮਾ, ਬਲਕਰਣ ਸਿੰਘ ਬਲਾਹੜ ਮਹਿਮਾ, ਗੁਰਚਰਨ ਸਿੰਘ ਭਗਤਾ, ਮਿੱਠੂ ਸਿੰਘ ਘੁੱਦਾ,  ਸੰਪੂਰਨ ਸਿੰਘ, ਕਮਲੇਸ਼ ਰਾਣੀ, ਜਸਵੀਰ ਕੌਰ ਆਦਿ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 

ਤਰਨ ਤਾਰਨ : ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਸੀ ਪੀ ਆਈ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ), ਸੀ ਪੀ ਐੱਮ ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ-ਐੱਲ) ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ ਵੱਲੋਂ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿੱਚ ਮਾਰਚ ਕਰਕੇ ਡੀ ਸੀ ਦਫਤਰ ਅੱਗੇ ਵਿਸ਼ਾਲ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ। ਇਸ ਧਰਨੇ ਦੀ ਪ੍ਰਧਾਨਗੀ ਸੀ ਪੀ ਆਈ ਆਗੂ ਕਾਮਰੇਡ ਰਜਿੰਦਰਪਾਲ ਕੌਰ, ਸੀ ਪੀ ਐੱਮ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਆਗੂ ਕਾਮਰੇਡ ਬਲਬੀਰ ਸੂਦ ਅਤੇ ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ) ਦੇ ਆਗੂ ਸਾਥੀ ਕੁਲਵੰਤ ਸਿੰਘ ਗੋਹਲਵੜ ਨੇ ਕੀਤੀ।
ਇਸ ਮੌਕੇ ਧਰਨਾਕਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਸਰਵਸਾਥੀ ਤਾਰਾ ਸਿੰਘ ਖਹਿਰਾ, ਮੇਜਰ ਸਿੰਘ ਭਿੱਖੀਵਿੰਡ ਅਤੇ ਪਰਗਟ ਸਿੰਘ ਜਾਮਾਰਾਏ, ਹਰਭਜਨ ਸਿੰਘ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਮਾਸਟਰ ਜਸਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ, ਚਰਨਜੀਤ ਸਿੰਘ ਪੂਹਲਾ, ਹੀਰਾ ਸਿੰਘ ਕੰਡਿਆਂਵਾਲੇ, ਮਾਸਟਰ ਅਰਜਨ ਸਿੰਘ, ਚਮਨ ਲਾਲ ਦਰਾਜਕੇ, ਮਾਸਟਰ ਦਲਜੀਤ ਸਿੰਘ, ਜਗੀਰੀ ਰਾਮ, ਜੈਮਲ ਸਿੰਘ ਬਾਠ ਅਤੇ ਦਵਿੰਦਰ ਸੋਹਲ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 

ਗੁਰਦਾਸਪੁਰ : ਪੰਜਾਬ ਦੀਆਂ ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਸੀ ਪੀ ਆਈ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ), ਸੀ ਪੀ ਐੱਮ ਪੰਜਾਬ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ-ਐੱਲ) ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ ਦੇ ਸੱਦੇ 'ਤੇ ਮਜ਼ਦੂਰ, ਕਿਸਾਨ ਔਰਤਾਂ ਅਤੇ ਨੌਜਵਾਨ ਬੱਸ ਸਟੈਂਡ ਗੁਰਦਾਸਪੁਰ ਵਿਖੇ ਇਕੱਤਰ ਹੋਏ। ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿੱਚ ਪੁੱਜੇ ਵਰਕਰਾਂ ਵਲੋਂ ਕੀਤੀ ਰੈਲੀ ਦੀ ਪ੍ਰਧਾਨਗੀ ਠਾਕੁਰ ਧਿਆਨ ਸਿੰਘ, ਲਖਬੀਰ ਸਿੰਘ ਹਾਰਨੀਆਂ, ਸੰਤੋਖ ਸਿੰਘ ਔਲਖ ਅਤੇ ਅਸ਼ਵਨੀ ਕੁਮਾਰ ਲੱਖਣ ਕਲਾਂ ਨੇ ਸਾਂਝੇ ਤੌਰ 'ਤੇ ਕੀਤੀ। ਬੱਸ ਸਟੈਂਡ ਤੋਂ ਰੋਸ ਮਾਰਚ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਵਰਕਰ ਡਿਪਟੀ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਦਫਤਰ ਵਿਖੇ ਪੁੱਜੇ ਅਤੇ ਰੈਲੀ ਕੀਤੀ। ਰੈਲੀ ਨੂੰ ਕਾਮਰੇਡ ਗੁਲਜਾਰ ਸਿੰਘ ਬਸੰਤਕੋਟ, ਰਣਬੀਰ ਸਿੰਘ ਵਿਰਕ, ਕਾਮਰੇਡ ਰਘਬੀਰ ਸਿੰਘ ਪਕੀਵਾ ਅਤੇ ਕਾਮਰੇਡ ਗੁਰਮੀਤ ਸਿੰਘ ਬਖਤਪੁਰਾ, ਠਾਕੁਰ ਧਿਆਨ ਸਿੰਘ, ਕਾਮਰੇਡ ਜਸਬੀਰ ਸਿੰਘ ਕਤੋਵਾਲ, ਮੱਖਣ ਸਿੰਘ ਕੋਹਾੜ, ਸੁਖਦੇਵ ਸਿੰਘ ਭਾਗੋਕਾਵਾਂ, ਸੁਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਘੁੰਮਣ, ਬਲਬੀਰ ਸਿੰਘ ਰੰਧਾਵਾ, ਦਲਜੀਤ ਸਿੰਘ, ਗੁਰਦਿਆਲ ਸਿੰਘ, ਨੀਲਮ ਘੁੰਮਾਣ, ਨਿਰਮਲ ਸਿੰਘ ਬੋਪਾਰਾਏ, ਜਸਵੰਤ ਸਿੰਘ ਬੁੱਟਰ ਆਦਿ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 

ਮਾਨਸਾ : ਪੰਜਾਬ ਦੀਆਂ ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੇ ਸੱਦੇ 'ਤੇ 15 ਨੁਕਾਤੀ ਲੋਕਪੱਖੀ ਮੰਗਾਂ ਨੂੰ ਲਾਗੂ ਕਰਵਾਉਣ ਅਤੇ ਭ੍ਰਿਸ਼ਟਾਚਾਰ, ਨਸ਼ਾਖੋਰੀ ਅਤੇ ਸਰਕਾਰ ਦੀ ਗੁੰਡਾਗਰਦੀ ਖਿਲਾਫ ਸਥਾਨਕ ਡੀ.ਸੀ. ਦਫ਼ਤਰ ਅੱਗੇ ਰੋਸ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਰੋਸ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਨੂੰ ਸਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ ਦੇ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰ ਅਤੇ ਸਾਬਕਾ ਵਿਧਾਇਕ ਕਾਮਰੇਡ ਹਰਦੇਵ ਸਿੰਘ ਅਰਸ਼ੀ, ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਸਕੱਤਰ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ ਚੌਹਾਨ, ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ ਐੱਮ ਦੇ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰੇਤ ਮੈਂਬਰ ਰਘੂਨਾਥ ਸਿੰਘ, ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਸਕੱਤਰ ਕੁਲਵਿੰਦਰ ਉਡਤ, ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ ਐੱਮ.ਐੱਲ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰੇਤ ਮੈਂਬਰ ਭਗਵੰਤ ਸਿੰਘ ਸਮਾਓਂ, ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਭੀਖੀ, ਸੀ.ਪੀ.ਐੱਮ. ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਸੂਬਾ ਕਮੇਟੀ ਮੈਂਬਰ ਛੱਜੂਰਾਮ ਰਿਸ਼ੀ, ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਸਕੱਤਰ ਲਾਲ ਚੰਦ ਸਰਦੂਲਗੜ੍ਹ ਆਦਿ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ। ਸਟੇਜ਼ ਸਕੱਤਰ ਦੀ ਕਾਰਵਾਈ ਅਮਰੀਕ ਸਮਾਓ ਨੇ ਬਾਖੂਬੀ ਨਿਭਾਈ ਅਤੇ ਅੰਤ ਵਿੱਚ ਸਾਬਕਾ ਵਿਧਾਇਕ ਅਤੇ ਬਜ਼ੁਰਗ ਆਗੂ ਬੂਟਾ ਸਿੰਘ ਨੇ ਆਏ ਹੋਏ ਸਾਥੀਆਂ ਦਾ ਧੰਨਵਾਦ ਕੀਤਾ।
 

ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ : ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਭਖਦੀਆਂ ਮੰਗਾਂ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਦੇਸ਼ ਵਿਆਪੀ ਰੋਸ ਦਿਵਸ ਵਜੋਂ ਇਥੇ ਡਿਪਟੀ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦੇ ਦਫ਼ਤਰ ਅੱਗੇ ਵਿਸ਼ਾਲ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ, ਜਿਸ ਦੀ ਪ੍ਰਧਾਨਗੀ ਅਮਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਆਸਲ, ਡਾ. ਸਤਨਾਮ ਸਿੰਘ ਅਜਨਾਲਾ, ਬਲਕਾਰ ਸਿੰਘ ਦੁਧਾਲਾ, ਅਮਰੀਕ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਮੰਗਲ ਸਿੰਘ ਆਦਿ ਨੇ ਕੀਤੀ। ਸਰਵਸਾਥੀ ਡਾ. ਜੁਗਿੰਦਰ ਦਿਆਲ, ਕਾਮਰੇਡ ਹਰਭਜਨ ਸਿੰਘ, ਰਤਨ ਸਿੰਘ ਰੰਧਾਵਾ, ਬਲਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਦੁਧਾਲਾ, ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਦਾਊਦ, ਜਗਤਾਰ ਸਿੰਘ ਕਰਮਪੁਰਾ, ਦਸਵਿੰਦਰ ਕੌਰ ਨੇ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
ਮੁਕਤਸਰ : ਪੰਜਾਬ ਦੀਆਂ ਚਾਰ ਖੱਬੇਪੱਖੀ ਪਾਰਟੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਡੀ.ਸੀ ਦਫ਼ਤਰਾਂ ਅੱਗੇ ਦਿੱਤੇ ਜਾ ਰਹੇ ਧਰਨਿਆਂ ਤਹਿਤ ਸੀ ਪੀ ਆਈ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ) ਅਤੇ ਸੀ ਪੀ ਐੱਮ ਪੰਜਾਬ ਵੱਲੋਂ ਡੀ ਸੀ ਦਫ਼ਤਰ ਮੁਕਤਸਰ ਅੱਗੇ ਵਿਸ਼ਾਲ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ। ਧਰਨੇ ਦੀ ਪ੍ਰਧਾਨਗੀ ਸੀ ਪੀ ਆਈ ਦੇ ਬੋਹੜ ਸਿੰਘ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ) ਦੇ ਸਾਥੀ ਹਰੀ ਰਾਮ ਚੱਕ ਸ਼ੇਰੇਵਾਲਾ ਅਤੇ ਸੀ ਪੀ ਐੱਮ ਪੰਜਾਬ ਵੱਲੋਂ ਹਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਮਦਰੱਸਾ ਨੇ ਕੀਤੀ। ਵੱਡੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿਚ ਜੁੜੇ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਇਕੱਠ ਨੂੰ ਸੀ ਪੀ ਆਈ ਦੇ ਕੌਮੀ ਕੌਂਸਲ ਮੈਂਬਰ ਜਗਰੂਪ ਸਿੰਘ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ) ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਸਕੱਤਰੇਤ ਮੈਂਬਰ ਇੰਦਰਜੀਤ ਅਤੇ ਸੀ ਪੀ ਐੱਮ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਸਕੱਤਰ ਜਗਜੀਤ ਸਿੰਘ ਜੱਸੇਆਣਾ, ਕਾਮਰੇਡ ਗਿਆਨ ਸਿੰਘ, ਮੋਹਨ ਸਿੰਘ, ਸੁਖਜੀਤ ਸਿੰਘ, ਹਰਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਕੁੱਤਿਆਂਵਾਲੀ, ਤਰਸੇਮ ਲਾਲ, ਹਰਜੀਤ ਸਿਘ ਮਦਰੱਸਾ ਅਤੇ ਮਾਸਟਰ ਹਿੰਮਤ ਸਿੰਘ ਮਲੋਟ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 

ਜਲੰਧਰ : ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਸੀ ਪੀ ਆਈ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐਮ), ਸੀ ਪੀ ਐਮ ਪੰਜਾਬ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐਮ.ਐਲ.) ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ ਵੱਲੋਂ ਦੇਸ਼ ਭਗਤ ਯਾਦਗਾਰ ਵਿਖੇ ਰੈਲੀ, ਰੋਸ ਮੁਜ਼ਾਹਰਾ ਤੇ ਡੀ ਸੀ ਦਫ਼ਤਰ ਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ। ਇਸ ਧਰਨੇ ਦੀ ਪ੍ਰਧਾਨਗੀ ਸਵਰਨ ਸਿੰਘ ਅਕਲਪੁਰੀ, ਗੁਰਮੀਤ ਸਿੰਘ ਢੱਡਾ, ਮੇਲਾ ਸਿੰਘ ਰੁੜਕਾ ਨੇ ਸਾਂਝੇ ਤੌਰ 'ਤੇ ਕੀਤੀ। ਇਸ ਰੈਲੀ 'ਤੇ ਰੋਸ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਸੀ ਪੀ ਆਈ ਦੇ ਸੂਬਾਈ ਸਾਬਕਾ ਸਕੱਤਰ ਬੰਤ ਸਿੰਘ ਬਰਾੜ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐਮ) ਦੇ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰ ਚਰਨ ਸਿੰਘ ਵਿਰਦੀ, ਸੀ ਪੀ ਐਮ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰ ਮੰਗਤ ਰਾਮ ਪਾਸਲਾ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ ਦੇ ਆਗੂ ਦਿਲਬਾਗ ਸਿੰਘ ਅਟਵਾਲ, ਚਰਨਜੀਤ ਥੰਮੂਵਾਲ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ) ਦੇ ਆਗੂ ਗੁਰਚੇਤਨ ਸਿੰਘ ਬਾਸੀ, ਲਹਿੰਬਰ ਸਿੰਘ ਤੱਗੜ, ਸੀ ਪੀ ਐਮ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਆਗੂ ਕੁਲਵੰਤ ਸਿੰਘ ਸੰਧੂ, ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਸੰਘੇੜਾ, ਦਰਸ਼ਨ ਨਾਹਰ, ਜਸਵਿੰਦਰ ਢੇਸੀ ਆਦਿ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 

ਚੰਡੀਗੜ੍ਹ : ਕੌਮੀ ਪੱਧਰ 'ਤੇ 6 ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਕੇਂਦਰ ਦੀ ਮੋਦੀ ਸਰਕਾਰ ਤੇ ਕਈ ਰਾਜਾਂ 'ਚ ਵੱਡੇ ਪੱਧਰ 'ਤੇ ਫੈਲੇ ਭ੍ਰਿਸ਼ਟਾਚਾਰ ਨੂੰ ਨੰਗਿਆਂ ਕਰਨ ਲਈ 20 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਰੋਸ ਧਰਨੇ ਅਤੇ ਮੁਜ਼ਾਹਰੇ ਕਰਨ ਦੇ ਸੱਦੇ ਮੁਤਾਬਕ ਚੰਡੀਗੜ੍ਹ-ਮੋਹਾਲੀ ਦੀਆਂ ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੀਆਂ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਕਮੇਟੀਆਂ ਨੇ ਸਾਂਝੇ ਤੌਰ 'ਤੇ ਓਵਰ ਬ੍ਰਿਜ ਸੈਕਟਰ-17 ਚੰਡੀਗੜ੍ਹ ਵਿਖੇ ਰੋਸ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਮੁਜ਼ਾਹਰਾ ਕੀਤਾ, ਜਿਸ ਦੀ ਪ੍ਰਧਾਨਗੀ ਰਾਜ ਕੁਮਾਰ, ਕੁਲਦੀਪ ਸਿੰਘ, ਮੁਹੰਮਦ ਸ਼ਹਿਨਾਜ ਗੋਰਸੀ, ਜੋਗਿੰਦਰ ਸਿੰਘ, ਈਸ਼ਾ ਅਰੋੜਾ ਨੇ ਕੀਤੀ। 
ਇਸ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ ਦੇ ਸਾਥੀ ਦੇਵੀਦਿਆਲ ਸ਼ਰਮਾ, ਪ੍ਰੀਤਮ ਸਿੰਘ ਹੁੰਦਲ, ਰਾਜ ਕੁਮਾਰ, ਜੋਗਿਦਰ ਸ਼ਰਮਾ, ਮੋਹਿੰਦਰਪਾਲ ਸਿੰਘ, ਦਿਲਦਾਰ ਸਿੰਘ, ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ (ਐੱਮ) ਦੇ ਸਾਥੀ ਵਿਜੈ ਮਿਸ਼ਰਾ, ਕੁਲਦੀਪ ਸਿੰਘ, ਡਾ. ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ, ਮੁਹੰਮਦ ਸ਼ਹਿਨਾਜ਼ ਗੋਰਸ਼ੀ, ਸ਼ਾਮ ਲਾਲ, ਬਲਬੀਰ ਸਿੰਘ ਮੁਸਾਫਿਰ, ਸੀ.ਪੀ.ਐੱਮ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਇੰਦਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਗਰੇਵਾਲ, ਜੋਗਿੰਦਰ ਸਿੰਘ, ਪੀ.ਡੀ.ਐੱਸ ਉੱਪਲ, ਸੱਜਣ ਸਿੰਘ, ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ (ਐੱਮ-ਐੱਲ) ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ ਦੇ ਕਮਲਜੀਤ ਸਿੰਘ, ਹਸ਼ਮੀਤ ਸਿੰਘ, ਡਾ. ਨਵਕਿਰਨ, ਈਸ਼ਾ ਅਰੋੜਾ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 

ਲੁਧਿਆਣਾ : ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੇ ਸੱਦੇ 'ਤੇ ਲੁਧਿਆਣੇ 'ਚ ਕੀਤੀ ਗਈ ਰੈਲੀ ਨੂੰ ਕਾਮਰੇਡ ਕਰਤਾਰ ਸਿੰਘ ਬੁਆਣੀ, ਅਮਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਮੱਟੂ, ਪਰਮਜੀਤ ਸਿੰਘ, ਡਾ. ਅਰੁਣ ਮਿੱਤਰਾ, ਜਗਦੀਸ਼ ਚੰਦ, ਮਹਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਅਚਰਵਾਲ, ਡੀ.ਪੀ. ਮੌੜ, ਜਗਤਾਰ ਸਿੰਘ ਚਕੋਹੀ, ਸੁਖਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਲੋਟੇ, ਰਮੇਸ਼ ਰਤਨ, ਸਤਨਾਮ ਸਿੰਘ ਬੜੈਚ, ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਸਿੱਧੂ, ਸੁਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਜਲਾਲਦੀਵਾਲ, ਰੂਪ ਬਸੰਤ ਬੜੈਚ, ਬਲਦੇਵ ਸਿੰਘ ਲਤਾਲਾ, ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਗਿੱਲ, ਗੁਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਕਲਸੀ, ਓਮ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਮਹਿਤਾ, ਰਾਜਾ ਰਾਮ ਵਰਮਾ, ਦੇਵ ਰਾਜ, ਫਿਰੋਜ ਮਾਸਟਰ, ਤੇਜਾ ਸਿੰਘ ਬੜੈਚ, ਅਵਤਾਰ ਸਿੰਘ ਗਿੱਲ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 

ਰੂਪਨਗਰ : ਪੰਜਾਬ ਦੀਆਂ ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਵੱਲੋਂ  ਬਣਾਏ ਸਾਂਝੇ ਮੋਰਚੇ ਵੱਲੋਂ ਦਿੱਤੇ ਗਏ 15 ਨੁਕਾਤੀ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਵਿਚ ਦਰਜ ਮੰਗਾਂ ਦੀ ਪੂਰਤੀ ਲਈ ਰੂਪਨਗਰ ਜ਼ਿਲ੍ਹੇ ਦੀਆਂ ਤਿੰਨ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ, ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ.(ਐੱਮ) ਅਤੇ ਸੀ.ਪੀ.ਐੱਮ ਪੰਜਾਬ ਵੱਲੋਂ ਕੇਂਦਰ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਦੀਆਂ ਲੋਕ-ਵਿਰੋਧੀ ਨੀਤੀਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਬਾਗ ਵਿਖੇ ਰੋਸ਼ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ।
ਇਸ ਧਰਨੇ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਦਵਿੰਦਰ ਨਗਲੀ, ਕਾਮਰੇਡ ਤਰਸੇਮ ਸਿੰਘ ਭੱਲੜੀ, ਕਾਮਰੇਡ ਮੋਹਣ ਸਿੰਘ ਧਮਾਣਾ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਹਿੰਮਤ ਸਿੰਘ ਨੰਗਲ, ਮਹਿੰਦਰ ਕੌਰ ਭੁੱਲਰ, ਰਣਜੀਤ ਕੌਰ, ਸੁਰਜਿੰਦਰ ਕੌਰ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 

ਹੁਸ਼ਿਆਰਪੁਰ : ਪ੍ਰਾਂਤ ਦੀਆਂ ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੇ ਸਾਂਝੇ ਸੱਦੇ 'ਤੇ ਇੱਥੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹੇ ਭਰ 'ਚੋਂ ਆਏ ਸੈਂਕੜੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ, ਕਿਸਾਨਾਂ ਤੇ ਹੋਰ ਮਿਹਨਤਕਸ਼ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਡੀ.ਸੀ ਦਫਤਰ ਸਾਹਮਣੇ ਧਰਨਾ ਲਾਇਆ। ਇਸ ਧਰਨੇ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਅਮਰਜੀਤ ਸਿੰਘ, ਦਰਸ਼ਨ ਸਿੰਘ ਮੱਟੂ ਅਤੇ ਮਹਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਖੈਰੜ ਵੱਲੋਂ ਸਾਂਝੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਕੀਤੀ ਗਈ। ਇਸ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਉਪਰੋਕਤ ਤਿੰਨਾਂ ਆਗੂਆਂ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਕੁਲਦੀਪ ਸਿੰਘ, ਪ੍ਰਿੰਸੀਪਲ ਜੋਗਿੰਦਰ ਸਿੰਘ, ਦਵਿੰਦਰ ਗਿੱਲ, ਬਲਦੇਵ ਰਾਮਗੜ੍ਹ, ਚਰਨਜੀਤ ਸਿੰਘ ਚਡਿਆਲ, ਸਤੀਸ਼ ਚੰਦਰ, ਪ੍ਰਿੰਸੀਪਲ ਪਿਆਰਾ ਸਿੰਘ, ਹਰਕੰਵਲ ਸਿੰਘ, ਯੋਧ ਸਿੰਘ, ਗੰਗਾ ਪ੍ਰਸ਼ਾਦ ਅਤੇ ਮਹਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਜੋਸ਼ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ। ਉਪਰੋਕਤ ਮੰਗਾਂ 'ਤੇ ਆਧਾਰਿਤ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਵੀ ਡੀ ਸੀ ਹੁਸ਼ਿਆਰਪੁਰ ਰਾਹੀਂ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਭੇਜਿਆ ਗਿਆ।
 

ਪਟਿਆਲਾ :  ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਸੀ ਪੀ ਆਈ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐਮ), ਸੀ ਪੀ ਐੱਮ ਪੰਜਾਬ ਤੇ ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ ਐੱਲ) ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ ਦੇ ਵਰਕਰਾਂ ਨੇ ਸਿਵਲ ਸਕੱਤਰੇਤ ਪਟਿਆਲਾ ਵਿਖੇ ਡਿਪਟੀ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਦਫ਼ਤਰ ਸਾਹਮਣੇ ਆਪਣੀਆਂ 15 ਨੁਕਾਤੀ  ਮੰਗਾਂ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਇੱਕ ਵਿਸ਼ਾਲ ਰੋਹ ਭਰਪੂਰ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ। ਉਪਰੰਤ ਚਾਰਾਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੇ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਦੇ ਨਾਂਅ ਇੱਕ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਡਿਪਟੀ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਪਟਿਆਲਾ ਨੂੰ  ਦਿੱਤਾ। ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਸਰਵਸਾਥੀ ਨਿਰਮਲ ਸਿੰਘ ਧਾਲੀਵਾਲ, ਵਿਜੈ ਮਿਸ਼ਰਾ, ਕੁਲਵੰਤ ਸਿੰਘ ਮੌਲ਼ਵੀਵਾਲਾ, ਗੁਰਦਰਸ਼ਨ ਖਾਸਪੁਰ ਤੇ ਪੂਰਨ ਚੰਦ ਨਨਹੇੜਾ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਕਰਮ ਚੰਦ ਭਾਰਦਵਾਜ, ਕਸ਼ਮੀਰ ਸਿੰਘ ਗਦਾਈਆ, ਬ੍ਰਿਜ ਲਾਲ, ਸੁਖਦੇਵ ਸੁੱਖੀ, ਧਰਮਪਾਲ ਸੀਲ, ਮੁਹੰਮਦ ਸਦੀਕ, ਅਮਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਐਡਵੋਕੇਟ, ਕੁਲਵੰਤ ਬਹਿਣੀਵਾਲ, ਸੰਤੋਖ ਸਿੰਘ, ਰਾਮ ਚੰਦ ਚੁਨਾਗਰਾ, ਗੁਰਬਖਸ਼ ਸਿੰਘ ਧਨੇਠਾ, ਹਰਦੇਵ ਸਿੰਘ ਘੜਾਮ, ਅਜੈਬ ਸਿੰਘ ਸ਼ਾਹਪੁਰ, ਮਹਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਪਟਿਆਲਾ ਤੇ ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਸਿੱਧੂ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 

ਫਤਿਹਗੜ੍ਹ ਸਾਹਿਬ : ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਸੀ ਪੀ ਆਈ, ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ), ਸੀ ਪੀ ਐੱਮ ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਐੱਮ ਐੱਲ) ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ ਦੇ ਸੱਦੇ 'ਤੇ ਕਾਮਰੇਡ ਅਮਰ ਨਾਥ,  ਕਾਮਰੇਡ ਗੁਰਦਰਸ਼ਨ ਸਿੰਘ, ਸਾਥੀ ਗੁਰਬਚਨ ਸਿੰਘ ਵਿਰਦੀ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਹੇਠ ਸੈਂਕੜੇ ਸਾਥੀਆਂ ਨੇ ਰੋਸ ਮੁਜ਼ਾਹਰਾ ਕੀਤਾ। ਮੁਜਾਹਰੇ ਨੂੰ ਸਰਵਸਾਥੀ ਵਿਨੋਦ ਕੁਮਾਰ ਪੱਪੂ, ਹਰਦੇਵ ਸਿੰਘ, ਮਨਜੀਤ ਸਿੰਘ, ਧਰਮਪਾਲ, ਮੁਹੰਮਦ ਸਦੀਕ, ਸੁਖਦੇਵ ਸਿੰਘ ਟਿੱਬੀ, ਲਛਮਣ ਸਿੰਘ ਮੰਡੇਰ, ਬਾਬਾ ਬੰਤਾ ਸਿੰਘ, ਠਾਕਰ ਸਿੰਘ ਆਦਿ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।


ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਵਲੋਂ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਦੀ ਰਿਹਾਇਸ਼ ਅੱਗੇ ਧਰਨਾਪੰਜਾਬ ਦੀਆਂ ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ, ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ.(ਐਮ,) ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ. (ਐਮ.ਐਲ) ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ ਦੇ ਸੱਦੇ ਉੱਤੇ ਚੋਹਾਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੇ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰਾਂ ਸਰਵ ਸਾਥੀ ਹਰਦੇਵ ਅਰਸ਼ੀ, ਚਰਨ ਸਿੰਘ ਵਿਰਦੀ, ਮੰਗਤ ਰਾਮ ਪਾਸਲਾ ਅਤੇ ਗੁਰਮੀਤ ਸਿੰਘ ਬਖਤਪੁਰ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿੱਚ ਸੈਂਕੜੇ ਸੂਬਾਈ ਆਗੂਆਂ ਨੇ 8 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਕੜਕਦੀ  ਧੁੱਪ ਵਿੱਚ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸਿੰਘ ਬਾਦਲ ਦੀ ਸਰਕਾਰੀ ਰਿਹਾਇਸ਼ ਵੱਲ ਜ਼ਬਰਦਸਤ ਰੋਸ ਮਾਰਚ ਕੀਤਾ ਤੇ ਧਰਨਾ ਮਾਰਿਆ। ਧਾਰਾ 144 ਅਤੇ ਭਾਰੀ ਪੁਲਸ ਫੋਰਸ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਮੁਜ਼ਾਹਰਾਕਾਰੀ ਜਦੋਂ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਦੀ ਰਿਹਾਇਸ਼ ਵੱਲ  ਵਧ ਰਹੇ ਸਨ ਤਾਂ ਰਸਤੇ ਵਿੱਚ ਚੰਡੀਗੜ੍ਹ ਪੁਲਸ ਵਲੋਂ ਬੈਰੀਕੇਡ ਲਗਾ ਕੇ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨਕਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਇਹ ਕਹਿ ਕੇ ਰੋਕ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਨਾਲ ਚੋਹਾਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੇ ਆਗੂਆਂ ਦੀ ਮੀਟਿੰਗ ਕਰਵਾ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇਗੀ, ਪ੍ਰੰਤੂ ਪੁਲਸ ਵਲੋਂ ਵਾਰ-ਵਾਰ ਗ੍ਰਿਫਤਾਰ ਕਰਨ ਦੀਆਂ ਧਮਕੀਆਂ ਦੀ ਕੋਈ ਪਰਵਾਹ ਕੀਤੇ ਬਗੈਰ ਚੋਹਾਂ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੇ ਆਗੂ ਭਾਰੀ ਗਰਮੀ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਧੁੱਪ ਵਿੱਚ ਹੀ 12-30 ਵਜੇ ਸੜਕ ਉਤੇ ਧਰਨਾ ਲਗਾ ਕੇ ਬੈਠ ਗਏ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਮੰਗਾਂ ਸੰਬੰਧੀ 15 ਨੁਕਾਤੀ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਵਿੱਚ ਦਰਜ ਮੰਗਾਂ ਦੇ ਸਮੱਰਥਨ ਵਿੱਚ ਅਤੇ ਬਾਦਲ ਸਰਕਾਰ ਦੀਆਂ ਲੋਕ ਮਾਰੂ, ਮਜ਼ਦੂਰ ਵਿਰੋਧੀ, ਕਿਸਾਨ ਵਿਰੋਧੀ ਅਤੇ ਰਾਸ਼ਟਰ ਵਿਰੋਧੀ ਨੀਤੀਆਂ, ਅਕਾਲੀ-ਭਾਜਪਾ ਸਰਕਾਰ ਵਿੱਚ ਬਿਰਾਜਮਾਨ ਨਸ਼ਿਆਂ ਦੇ ਤਸਕਰ ਵਜ਼ੀਰਾਂ ਅਤੇ ਅਕਾਲੀ-ਭਾਜਪਾ ਆਗੂਆਂ, ਰੇਤ ਬਜ਼ਰੀ ਮਾਫੀਆ, ਭੋਂ-ਮਾਫੀਆ ਅਤੇ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਪੁਰ-ਅਮਨ ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ ਅਤੇ ਬੁਨਿਆਦੀ ਜਮਹੂਰੀ ਅਧਿਕਾਰਾਂ ਨੂੰ ਕੁਚਲਣ ਲਈ ਧਾਰਾ 144 ਅਤੇ ਪੁਲਸ ਦੀ ਦੁਰਵਰਤੋਂ ਵਿਰੁਧ ਜ਼ੋਰਦਾਰ ਅਕਾਸ਼ ਗੁੰਜਾਊਂ ਨਾਅਰੇ ਲਗਾਉਂਦੇ ਰਹੇ।
ਇਸ ਮੌਕੇ ਧਰਨਾਕਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ ਦੇ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰ ਕਾ: ਹਰਦੇਵ ਅਰਸ਼ੀ, ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ (ਐਮ) ਦੇ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰ ਕਾ: ਚਰਨ ਸਿੰਘ ਵਿਰਦੀ, ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰ ਕਾ: ਮੰਗਤ ਰਾਮ ਪਾਸਲਾ ਅਤੇ ਸੀ.ਪੀ. ਆਈ. (ਐਮ.ਐਲ) ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ ਦੇ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰ ਕਾ: ਗੁਰਮੀਤ ਸਿੰਘ ਬਖਤਪੁਰ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਅਕਾਲੀ-ਭਾਜਪਾ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਵਾਰ-ਵਾਰ ਭਰੋਸਾ ਦੇਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ, ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ, ਕਿਸਾਨਾਂ ਅਤੇ ਆਮ ਮਿਹਨਤਕਸ਼ ਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਹੱਕੀ ਤੇ ਜਾਇਜ਼ ਮੰਗਾਂ ਸਵੀਕਾਰ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀਆਂ ਜਾ ਰਹੀਆਂ, ਭਰੋਸੇ ਦੇ ਕੇ ਸਮਝੌਤੇ ਕਰਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਭਰੋਸਿਆਂ ਅਤੇ ਸਮਝੌਤਿਆਂ ਨੂੰ ਤੋੜਨਾ ਬਾਦਲ ਸਰਕਾਰ ਦਾ ਖਾਸਾ ਬਣ ਗਿਆ ਹੈ। ਚੋਹਾਂ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਚਿਤਾਵਨੀ ਦਿਤੀ ਕਿ ਲਾਠੀਆਂ ਗੋਲੀਆਂ ਨਾਲ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਪੁਰਅਮਨ ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ ਨੂੰ ਕੁਚਲਣ ਵਾਲੀਆਂ ਸਰਕਾਰਾਂ ਬਹੁਤਾ ਚਿਰ ਨਹੀਂ ਚੱਲ ਸਕਦੀਆਂ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਕਿ 20 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਸਾਰੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਿਆਂ ਵਿੱਚ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਅਕਾਲ਼ੀ-ਭਾਜਪਾ ਸਰਕਾਰ ਦੀਆਂ ਲੋਕ ਮਾਰੂ ਨੀਤੀਆਂ ਅਤੇ ਭ੍ਰਿਸ਼ਟਾਚਾਰ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਸ਼ਾਲ ਜਨਤਕ ਰੋਸ ਮੁਜ਼ਾਹਰੇ ਕੀਤੇ ਜਾਣਗੇ।
ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਉਪਰੋਕਤ ਆਗੂਆਂ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ ਦੇ ਸੂਬਾਈ ਆਗੂਆਂ ਸਾਥੀ ਜਗਰੂਪ ਸਿੰਘ, ਡਾ ਜੁਗਿੰਦਰ ਦਿਆਲ, ਬੰਤ ਬਰਾੜ, ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ (ਐਮ) ਦੇ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰੇਤ ਮੈਂਬਰਾਂ ਸਾਥੀ ਵਿਜੇ ਮਿਸਰਾ, ਰਘੁਨਾਥ ਸਿੰਘ, ਰਣਬੀਰ ਸਿੰਘ ਵਿਰਕ, ਸੀ.ਪੀ.ਐਮ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਸੂਬਾਈ ਆਗੂਆਂ ਸਾਥੀ  ਹਰਕੰਵਲ ਸਿੰਘ, ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਦਾਊਦ ਅਤੇ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ.(ਐਮ.ਐਲ) ਲਿਬਰੇਸ਼ਨ ਦੇ ਸੁਬਾਈ ਆਗੂਆਂ ਸਾਥੀ ਰਾਜਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਰਾਣਾ ਤੇ ਰੁਲਦੂ ਸਿੰਘ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਿਹਨਤਕਸ਼ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਕੇਂਦਰ ਦੀ ਮੋਦੀ ਸਰਕਾਰ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਬਾਦਲ ਸਰਕਾਰ ਵਿਰੁੱਧ ਸੰਘਰਸ਼ ਹੋਰ ਤਿੱਖਾ ਅਤੇ ਵਿਸ਼ਾਲ ਕਰਨ ਦਾ ਸੱਦਾ ਦਿੱਤਾ।

ਸੱਤ ਪੇਂਡੂ ਤੇ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦਾ ਸਾਂਝਾ ਸੰਘਰਸ਼ ਪੰਜਾਬ ਵਿਚ ਨਿਤ ਦਿਨ ਦਲਿਤਾਂ/ਬੇਜ਼ਮੀਨਿਆਂ ਨਾਲ ਵਾਪਰ ਰਹੀਆਂ ਸਮਾਜਕ ਅਤੇ ਜਾਤੀਪਾਤੀ ਵਿਤਕਰੇ ਦੀਆਂ ਘਟਨਾਵਾਂ; ਸਾਂਝੀਆਂ-ਪੰਚਾਇਤੀ-ਸ਼ਾਮਲਾਤ ਜ਼ਮੀਨਾਂ 'ਚੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਉਜਾੜੇ; ਪੁਲਸ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨ ਵਲੋਂ ਅਜਿਹੀਆਂ ਘਟਨਾਵਾਂ ਸਮੇਂ ਜਾਬਰ ਦੋਸ਼ੀਆਂ ਦੀ ਥਾਂ ਉਲਟਾ ਪੀੜਤ ਦਲਿਤਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਹੀ ਕਾਰਵਾਈ ਕੀਤੇ ਜਾਣ ਜਾਂ ਮੂਕ ਦਰਸ਼ਕ ਬਣੇ ਰਹਿਣ ਦੇ ਸਮੁੱਚੇ ਵਰਤਾਰੇ ਦੇ ਟਾਕਰੇ ਲਈ ਇਕ ਸ਼ਕਤੀਸ਼ਾਲੀ ਸਾਂਝਾ ਮਜ਼ਦੂਰ ਅੰਦੋਲਨ ਉਸਾਰੇ ਜਾਣ ਦੀ ਲੋੜ ਨੂੰ ਮੁੱਖ ਰੱਖਦਿਆਂ ਪੰਜਾਬ 'ਚ ਕੰਮ ਕਰਦੀਆਂ 7 ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਨੇ ਪਹਿਲਕਦਮੀ ਕਰਦਿਆਂ ਪੇਂਡੂ ਤੇ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦਾ ਸਾਂਝਾ ਮੋਰਚਾ ਉਸਾਰਦੇ ਹੋਏ ਆਉਣ ਵਾਲੀ 27 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਸੰਘਰਸ਼ਸ਼ੀਲ ਧਿਰਾਂ ਦੇ ਪ੍ਰੇਰਣਾ ਸਥਲ ਦੇਸ਼ ਭਗਤ ਯਾਦਗਾਰ ਹਾਲ ਜਲੰਧਰ ਵਿਖੇ ਸਾਂਝੀ ਸੂਬਾਈ ਕਨਵੈਨਸ਼ਨ ਕਰਕੇ ਅਗਲੇ ਪੜਾਅਵਾਰ ਸੰਘਰਸ਼ ਦਾ ਹੋਕਾ ਦੇਣ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕੀਤਾ ਹੈ।
ਉਕਤ ਮੰਤਵ ਲਈ ਇਕ ਸਾਂਝੀ ਮੀਟਿੰਗ 24 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਸ਼ਹੀਦ ਕਾਮਰੇਡ ਨਛੱਤਰ ਸਿੰਘ ਯਾਦਗਾਰ ਭਵਨ ਮੋਗਾ ਵਿਖੇ ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਸਾਥੀ ਦਰਸ਼ਨ ਨਾਹਰ ਦੀ ਪ੍ਰਧਾਨਗੀ ਹੇਠ ਹੋਈ। ਮੀਟਿੰਗ ਵਿਚ ਸਾਥੀ ਨਾਹਰ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਸਾਥੀ ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਦਾਊਦ, ਨਿਰਮਲ ਸਿੰਘ ਆਧੀ, (ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ), ਜ਼ੋਰਾ ਸਿੰਘ ਨਸਰਾਲੀ ਅਤੇ ਲਛਮਣ ਸਿੰਘ ਸੇਵੇਵਾਲਾ (ਪੰਜਾਬ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ), ਸਾਥੀ ਗੁਰਮੇਸ਼ ਸਿੰਘ (ਕੁਲ ਹਿੰਦ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ), ਸਾਥੀ ਭਗਵੰਤ ਸਮਾਓਂ (ਮਜ਼ਦੂਰ ਮੁਕਤੀ ਮੋਰਚਾ), ਰੂੜਾ ਰਾਮ ਪਰਜੀਆ (ਪੰਜਾਬ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ), ਸੰਜੀਵ ਮਿੰਟੂ (ਕ੍ਰਾਂਤੀਕਾਰੀ ਪੇਂਡੂ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ) ਅਤੇ ਪੇਂਡੂ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਨਮਾਇੰਦੇ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋਏ।
ਸ਼ਾਮਲ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਜਿਥੇ ਉਪਰੋਕਤ ਸਾਰਾ ਵਰਤਾਰਾ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਦੀ ਸਹਿਮਤੀ ਨਾਲ ਸੱਤਾਧਰ ਧਿਰ ਦੇ ਸਥਾਨਕ ਆਗੂਆਂ ਦੀ ਸਰਗਰਮ ਸ਼ਮੂਲੀਅਤ ਰਾਹੀਂ ਵਰਤਾਇਆ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ; ਉਥੇ ਉਚ ਅਧਿਕਾਰੀ ਵੀ ਇਸ ਮੱਧਯੁਗੀਨ ਜਬਰ ਦੀਆਂ ਘਟਨਾਵਾਂ 'ਚ ਬਰਾਬਰ ਦੇ ਭਾਈਵਾਲ ਹਨ। ਆਗੂ ਇਸ ਰਾਇ ਦੇ ਵੀ ਹਨ ਕਿ ਉਪਰੋਕਤ ਅਣਮਨੁੱਖੀ ਵਰਤਾਰੇ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਸੂਬਾ ਸਰਕਾਰ ਬੇਜ਼ਮੀਨੇ/ਦਲਿਤਾਂ ਨੂੰ ਮਿਲਦੀਆਂ ਨਾ ਮਾਤਰ ਰਿਆਇਤਾਂ ਜਿਵੇਂ ਆਟਾ ਦਾਲ, ਬੁਢਾਪਾ ਵਿਧਵਾ, ਅੰਗਹੀਣ, ਆਸ਼ਤਿਰਤ ਪੈਨਸ਼ਨਾਂ, ਸ਼ਗਨ ਸਕੀਮ , ਅਨੁਸੂਚਿਤ ਜਾਤੀ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨੂੰ ਮਿਲਦੇ ਵਜੀਫਿਆਂ ਆਦਿ ਤੋਂ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਮੁਨਕਰ ਹੋ ਚੁੱਕੀ ਹੈ। ਦਹਾਕਿਆਂ ਤੋਂ ਅਲਾਟ ਹੋਏ ਪਲਾਟਾਂ ਦਾ ਕਬਜ਼ਾ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਅਤੇ ਵਾਰ ਵਾਰ ਦੇ ਵਾਅਦਿਆਂ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਰਿਹਾਇਸ਼ੀ/ਰੂੜੀਆਂ ਲਈ ਥਾਵਾਂ/ਮਕਾਨ ਬਨਾਉਣ ਲਈ ਗ੍ਰਾਂਟਾਂ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੀਆਂ ਜਾ ਰਹੀਆਂ। ਸੰਵਿਧਾਨ ਅਤੇ ਪੰਚਾਇਤੀ ਰਾਜ ਐਕਟ ਦੀ ਅਣਦੇਖੀ ਕਰਦਿਆਂ ਦਲਿਤਾਂ ਨੂੰ ਤੀਜਾ ਹਿੱਸਾ ਪੰਚਾਇਤੀ ਜ਼ਮੀਨ ਵਾਜਬ ਰੇਟਾਂ ਤੇ ਖੇਤੀ ਲਈ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੀ ਜਾ ਰਹੀ। ਉਪਰੋਕਤ ਸਾਰੇ ਮੰਗਾਂ ਮਸਲਿਆਂ 'ਤੇ ਅਧਾਰਤ ਇਕ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਭੇਜਣ ਅਤੇ ਲਾਗੂ ਕਰਾਉਣ ਲਈ ਸੰਘਰਸ਼ ਦੀ ਰੂਪ ਰੇਖਾ ਵਿਚਾਰ ਕੇ ਕਨਵੈਨਸ਼ਨ ਵਲੋਂ ਪਾਸ ਕਰ ਕੇ ਅਗਲੇ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਦਾ ਸੱਦਾ ਦੇਣ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਉਕਤ ਮੀਟਿੰਗ ਵਿਚ ਹੋਇਆ।

ਲਾਲ ਝੰਡਾ ਪੰਜਾਬ ਭੱਠਾ ਲੇਬਰ ਯੂਨੀਅਨ ਵਲੋਂ ਵਿਧਾਇਕ ਧੁੱਗਾ ਖਿਲਾਫ ਰੋਸ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨਸ੍ਰੀ ਹਰਗੋਬਿੰਦਪੁਰ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿਖੇ ਹਲਕਾ ਵਿਧਾਇਕ ਦੇਸ ਰਾਜ ਧੁੱਗਾ ਖਿਲਾਫ ਲਾਲ ਝੰਡਾ ਪੰਜਾਬ ਭੱਠਾ ਲੇਬਰ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਜਿਲਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਜਸਵੰਤ ਸਿੰਘ ਬੁੱਟਰ ਅਤੇ ਕਾਮਰੇਡ ਕਰਮ ਸਿੰਘ ਵਰਸਾਲਚੱਕ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਹੇਠ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿਚ ਥਾਣਾ ਸ੍ਰੀ ਹਰਗੋਬਿੰਦਪੁਰ ਅੱਗੇ ਧਰਨਾ ਦੇ ਕੇ ਰੋਸ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਇਸ ਉਪਰੰਤ ਸ਼ਹਿਰ ਦੇ ਕ੍ਰਿਪਾ ਚੌਕ ਵਿਖੇ ਪਿਟ ਸਿਆਪਾ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਰੋਸ ਮਾਰਚ 'ਚ ਜੁੜੇ ਸੈਂਕੜੇ ਮਜਦੂਰਾਂ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਦੋਹਾਂ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਪਿੰਡ ਮਾੜੀ ਬੂਚੀਆਂ ਦੀ ਸੜਕ ਜੋ ਕਈ ਘਰਾਂ ਨੂੰ ਜੋੜਨ ਵਾਲਾ ਲਾਂਘਾ ਹੈ ਅਤੇ ਜੋ ਲਿੰਕ ਸੜਕ ਨਾਲ ਜੁੜਦੀ ਹੈ ਨੂੰ ਮਾੜੀ ਬੂਚੀਆਂ ਦੀ ਸਰਪੰਚ ਮਨਜੀਤ ਕੌਰ ਦੇ ਪਤੀ ਸੁਰਜੀਤ ਮੋਲਾ ਵਲੋਂ ਇਕ ਪ੍ਰਾਈਵੇਟ ਜੇ ਸੀ ਬੀ ਮਸੀਨ ਨਾਲ ਹਲਕਾ ਵਿਧਾਇਕ ਦੇ ਇਸ਼ਾਰੇ 'ਤੇ ਪੁੱਟਵਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਹੈ ਜਿਸ ਕਾਰਨ ਪਿੰਡ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਲਾਂਘਾ ਬੰਦ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ। ਆਗੂਆਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਜਿਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਹਲਕਾ ਵਿਧਾਇਕ ਦੇਸ ਰਾਜ ਧੁੱਗਾ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਤੰਗ ਪ੍ਰੇਸ਼ਾਨ ਕਰ ਵਿਚ ਲੱਗਾ ਹੋਇਆ ਹੈ, ਉਹ ਜ਼ਿਆਦਾ ਦੇਰ ਨਹੀ ਚੱਲੇਗਾ ਅਤੇ ਲੋਕ ਹੁਣ ਧੱਕੇਸ਼ਾਹੀਆਂ ਨੂੰ ਬਰਦਾਸ਼ਤ ਕਰਨ ਦੇ ਮੂਡ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਹਨ। ਆਗੂਆਂ ਅੱਗੇ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਇਸ ਸਬੰਧੀ ਅਸੀਂ ਥਾਣਾ ਸ੍ਰੀ ਹਰਗੋਬਿੰਦਪੁਰ ਵਿਖੇ ਐਸ ਐਚ ਓ ਸ੍ਰੀ ਹਰਗੋਬਿੰਦਪੁਰ ਨੂੰ ਲਿਖਤੀ ਦਰਖਾਸਤ ਵੀ ਦਿੱਤੀ ਹੋਈ ਹੈ ਪਰ ਅਜੇ ਤੱਕ ਸੜਕ ਪੁੱਟਣ ਵਾਲੇ ਦੋਸ਼ੀਆਂ ਖਿਲਾਫ ਕਾਰਵਾਈ ਨਹੀ ਕੀਤੀ ਗਈ। ਆਗੁਆਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਸੜਕ ਪੁੱਟਣ ਵਾਲਿਆਂ ਖਿਲਾਫ ਜਲਦ ਕਾਰਵਾਈ ਨਾ ਹੋਈ ਤਾਂ ਅਸੀ ਚਾਰ ਖੱਬੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਨਾਲ ਸਲਾਹ ਕਰਕੇ ਵੱਡੇ ਪੱਧਰ ਤੇ ਰੋਸ ਪ੍ਰਦਰਸਨ ਕਰਾਂਗੇ ਜਿਸਦੀ ਜਿੰਮੇਵਾਰੀ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨ ਦੀ ਹੋਵੇਗੀ। ਰੋਸ ਮਾਰਚ ਉਪਰੰਤ ਲਾਲ ਝੰਡਾ ਪੰਜਾਬ ਭੱਠਾ ਲੇਬਰ ਯੂਨੀਅਨ ਵਲੋਂ ਮਾਰਕੀਟ ਕਮੇਟੀ ਦਫਤਰ ਵਿਖੇ ਚੇਅਰਮੈਨ ਕੁਲਵੰਤ ਸਿੰਘ ਚੀਮਾ ਨੂੰ ਇਸ ਸਬੰਧੀ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਵੀ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਸ੍ਰੀ ਚੀਮਾ ਨੇ ਵੀ ਭਰੋਸਾ ਦਿੱਤਾ ਕਿ ਜਿਸਨੇ ਵੀ ਇਸ ਦੀ ਹਰਕਤ ਕੀਤੀ ਹੇ ਉਸ ਖਿਲਾਫ ਕਾਰਵਾਈ ਹੋਵੇਗੀ।  ਇਸ ਰੋਸ ਮੁਜ਼ਾਹਰੇ ਨੂੰ ਉਪਰੋਕਤ ਆਗੂਆਂ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਸ਼ਾਮ ਮਸੀਹ, ਮੁਸ਼ਤਾਕ ਸਿੰਘ, ਰੋਬਨ ਮਸੀਹ, ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ, ਭਗਤ ਰਾਮ, ਸੋਨਲ ਮਸੀਹ, ਵਿਲੀਅਮ ਮਡਿਆਲਾ, ਬੂਟਾ ਸਿੰਘ ਜਮਾਂਦਾਰ, ਮੱਖਣ ਸਿੰਘ, ਬਲਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਮਡਿਆਲੀ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।

ਕਿਸਾਨਾਂ ਵਲੋਂ ਨਹਿਰੀ ਤੇ ਬਿਜਲੀ ਸਬੰਧੀ ਮੁਸ਼ਕਲਾਂ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਧਰਨੇ ਤੇ ਮੁਜ਼ਾਹਰੇਚੋਗਾਵਾਂ : ਬਿਜਲੀ ਦੇ ਕੱਟਾਂ ਤੋਂ ਸਤਾਏ ਅਤੇ  ਚੋਰੀ ਦੇ ਨਾਮ ਤੇ ਪਾਏ ਜਾ ਰਹੇ ਘਰੇਲੂ ਤੇ ਟਿਊਬਵੈਲਾਂ ਦੇ ਭਾਰੀ ਬਿਜਲੀ ਦੇ ਜੁਰਮਾਨਿਆ ਤੋਂ ਖਫਾ ਇਲਾਕੇ ਦੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਤੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੇ ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ ਤੇ ਦਿਹਾਤੀ ਮਜਦੂਰ ਸਭਾ ਦੀ ਅਗਵਾਈ 'ਚ ਪੰਜਾਬ ਰਾਜ ਪਾਵਰਕਾਮ ਦੇ ਉਪ ਮੰਡਲ ਅਫਸਰ ਦੇ ਦਫਤਰ ਮੂਹਰੇ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ। ਧਰਨੇ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਜੱਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦੇ ਆਗੂਆਂ ਅਜੈਬ ਸਿੰਘ ਚੋਗਾਵਾ, ਕੁਲਦੀਪ ਸਿੰਘ ਮੋਹਲੇਕੇ, ਬਲਬੀਰ ਸਿੰਘ ਕੱਕੜ, ਅਮਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਭੀਲੋਵਾਲ,ਜਸਪਾਲ ਸਿੰਘ ਮੋਹਲਕੇ ਤੇ ਲਖਬੀਰ ਸਿੰਘ ਤੱਲੇ ਨੇ ਕੀਤੀ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਸੂਬਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਡਾ. ਸਤਨਾਮ ਸਿੰਘ ਅਜਨਾਲਾ ਤੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਇਕਾਈ ਦੇ ਮੀਤ ਪ੍ਰਧਾਨ ਵਿਰਸਾ ਸਿੰਘ ਟਪਿਆਲਾ ਅਤੇ ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਗੁਰਨਾਮ ਸਿੰਘ ਉਮਰਪੁਰਾ ਤੇ ਸ਼ਿਵ ਕੁਮਾਰ ਚੋਗਾਵਾਂ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਕਿਹਾ ਕਿ  ਜਨਤਕ ਜੱਥੇਬੰਦੀਆਂ ਬਿਜਲੀ ਕਾਰਪੋਰੇਸ਼ਨ ਨੂੰ ਜਵਾਬਦੇਹ ਬਣਾਉਣ ਲਈ ਸਭ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਇਹ ਮੰਗ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ ਕਿ ਕਾਰਪੋਰੇਸ਼ਨ ਵਿੱਚ ਸਮੂਹ ਖਾਲੀ ਪਈਆਂ ਅਸਾਮੀਆਂ ਲਈ ਜੰਗੀ ਪੱਧਰ 'ਤੇ ਰੈਗੂਲਰ ਕਰਮਚਾਰੀ ਤੇ ਅਧਿਕਾਰੀ ਭਰਤੀ ਕੀਤੇ ਜਾਣ ਉਕਤ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਜ਼ੋਰ ਦਿੱਤਾ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਤੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦਾ ਤਾਂ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਮਹਿੰਗਾਈ, ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰੀ ਤੇ ਭ੍ਰਿਸ਼ਟਾਚਾਰ ਨੇ ਲੱਕ ਤੋੜ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ਅਤੇ ਨਿੱਤ ਦਿਨ ਬਿਜਲੀ ਦੇ ਰੇਟ ਵਧਾ ਕੇ ਉਹਨਾ ਦੇ ਜਖਮਾਂ 'ਤੇ ਲੂਣ ਛਿੜਕਿਆ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਧਰਨੇ ਦੌਰਾਨ ਐੱਸ.ਡੀ.ਓ ਚੋਗਾਵਾਂ ਨੇ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਲੈ ਕੇ ਜੱਥੇਬੰਦੀ ਦੇ ਆਗੂਆਂ ਨੂੰ ਯਕੀਨ ਦੁਆਇਆ ਕਿ ਸਥਾਨਕ ਪੱਧਰ ਦੀਆਂ ਮੰਗਾਂ ਤੇ ਬਿਜਲੀ ਸਬੰਧੀ ਮੁਸਕਲਾਂ ਨੂੰ ਜਲਦੀ ਤੋਂ ਜਲਦੀ ਹੱਲ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇਗਾ।  ਇਸ ਉਪਰੰਤ ਧਰਨਾ ਸਮਾਪਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। 
 

ਤਰਨ ਤਾਰਨ : ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਤਰਨ ਤਾਰਨ ਇਕਾਈ ਵੱਲੋਂ ਨਹਿਰੀ ਪਾਣੀ ਦੀ ਨਾਕਸ ਸਪਲਾਈ ਸੰਬੰਧੀ ਅਤੇ ਢਹਿ-ਢੇਰੀ ਹੋਏ ਅੱਪਰਬਾਰੀ ਦੁਆਬ ਨਹਿਰ ਸਿਸਟਮ ਵਿਰੁੱਧ ਗੁਰਦੇਵ ਸਿੰਘ, ਹਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਰਸੂਲਪੁਰ ਅਤੇ ਅਜੀਤ ਸਿੰਘ ਢੋਟਾ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਹੇਠ ਡੀ ਸੀ ਦਫਤਰ ਤਰਨ ਤਾਰਨ ਸਾਹਮਣੇ 2 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ 24 ਘੰਟੇ ਦਾ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ। ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਅਰਸਾਲ ਸਿੰਘ ਆਸਲ, ਮੁਖਤਾਰ ਸਿੰਘ ਮੱਲ੍ਹਾ ਅਤੇ ਦਲਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦਿਆਲਪੁਰ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਨਹਿਰੀ ਸਿਸਟਮ ਦਾ ਭੱਠਾ ਬਿਠਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਨਹਿਰਾਂ ਵਿੱਚ ਪਾਣੀ 8200 ਕਿਊਸਿਕ ਛੱਡਣਾ ਬਣਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਇਸ ਵੇਲੇ ਪਾਣੀ ਦੀ ਸਪਲਾਈ ਲੱਗਭੱਗ 6500 ਕਿਊਸਿਕ ਚੱਲ ਰਹੀ ਹੈ।  ਨਹਿਰਾਂ, ਰਜਵਾਹਿਆਂ ਅਤੇ ਮਾਈਨਰਾਂ ਦੀ ਸਫਾਈ ਨਾ ਹੋਣ ਕਾਰਨ ਨਹਿਰਾਂ ਵਿੱਚ ਛੱਡਿਆ ਪਾਣੀ ਟੇਲਾਂ ਤੱਕ ਤਾਂ ਕੀ ਪੁੱਜਣਾ, ਇਹ ਨਹਿਰਾਂ ਦੇ ਅਧਵਾਟੇ ਵੀ ਨਹੀਂ ਪੁੱਜ ਰਿਹਾ।
ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਦੀਆਂ ਕਿਸਾਨ-ਵਿਰੋਧੀ ਨੀਤੀਆਂ ਕਾਰਨ ਸਿੰਚਾਈ ਜਿਸ ਨੂੰ ਖੇਤੀ ਦਾ ਮੁੱਖ ਸੋਮਾ ਮੰਨਿਆ ਗਿਆ ਹੈ, ਇਸ ਤੋਂ ਹਾਕਮਾਂ ਨੇ ਮੁੱਖ ਮੋੜ ਲਿਆ ਹੈ।
 

ਤਰਨ ਤਾਰਨ : ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ ਵੱਲੋਂ 5 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਨਹਿਰੀ ਪਾਣੀ ਅਤੇ ਬਿਜਲੀ ਨਾ ਮਿਲਣ ਵਿਰੁੱਧ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਦਾ ਜੰਡਿਆਲਾ ਰੋਡ ਬੱਸ ਅੱਡਾ ਚੌਕ ਵਿਖੇ ਅਰਥੀ-ਫੂਕ ਮੁਜ਼ਾਹਰਾ ਕੀਤਾ ਗਿਆ, ਜਿਸ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਦਲਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦਿਆਲਪੁਰਾ, ਹਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਰਸੂਲਪੁਰ, ਮਨਜੀਤ ਸਿੰਘ ਬੜਾ ਕੋਟ ਆਦਿ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਕੀਤੀ।
ਇਸ ਮੌਕੇ ਇਕੱਠ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਕਿਸਾਨ ਆਗੂ ਮੁਖਤਾਰ ਸਿੰਘ ਮੱਲ੍ਹ, ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਅਰਸਾਲ ਸਿੰਘ ਸੰਧੂ ਅਤੇ ਸੂਬਾਈ ਪ੍ਰੈੱਸ ਸਕੱਤਰ ਪ੍ਰਗਟ ਸਿੰਘ ਜਾਮਾਰਾਏ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਮਾਝੇ ਦੀ ਸਿੰਚਾਈ ਦਾ ਧੁਰਾ ਅਪਰਬਾਰੀ ਦੁਆਬ ਨਹਿਰ ਆਪਣੀ ਸਮਰੱਥਾ ਗੁਆ ਬੈਠੀ ਹੈ। ਅੱਗੋਂ ਨਿਕਲਦੀਆਂ ਨਹਿਰਾਂ ਅਤੇ ਸੂਏ, ਰਾਜਵਾਹੇ ਵੀ ਢਹਿ ਚੁੱਕੇ ਹਨ, ਜਿਸ ਕਾਰਨ ਕਿਸਾਨਾਂ ਨੂੰ ਫਸਲਾਂ ਪਾਲਣ ਲਾਈ ਪਾਣੀ ਨਹੀਂ ਮਿਲ ਰਿਹਾ। ਉਪਰੋਂ ਬਾਦਲ ਸਰਕਾਰ ਕਿਸਾਨਾਂ 'ਤੇ ਜਲ ਟੈਕਸ ਵਜੋਂ ਉਗਰਾਹੀ ਕਰ ਰਹੀ ਹੈ। ਕਿਸਾਨ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਕਿਸਾਨਾਂ ਨੂੰ ਬਿਜਲੀ ਵੀ ਪੂਰੀ ਨਹੀਂ ਮਿਲ ਰਹੀ, ਸੜੇ ਅਤੇ ਚੋਰੀ ਹੋਏ ਟਰਾਂਸਫਾਰਮਰ ਸਮੇਂ ਸਿਰ ਕਿਸਾਨਾਂ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਮਿਲ ਰਹੇ। ਕਿਸਾਨ ਮੰਗ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ ਕਿ ਟੇਲਾਂ ਤੱਕ ਪੂਰਾ ਪਾਣੀ ਪੁੱਜਦਾ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ, ਢਾਹੇ ਖਾਲ ਮੁੜ ਉਸਾਰੇ ਜਾਣ, ਨਹਿਰੀ ਪ੍ਰਬੰਧ ਦੇ ਸੁਧਾਰ ਲਈ ਸਾਰੇ ਨਹਿਰੀ ਢਾਂਚੇ ਦੀ ਮੁੜ ਉਸਾਰੀ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇ, ਕਿਸਾਨਾਂ ਸਿਰ ਠੋਸਿਆ ਜਲ ਟੈਕਸ ਵਾਪਸ ਲਿਆ ਜਾਵੇ, ਬਿਜਲੀ ਮੋਟਰਾਂ ਲਈ 16 ਘੰਟੇ ਅਤੇ ਘਰੇਲੂ ਸਪਲਾਈ ਲਈ 24 ਘੰਟੇ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇ, ਨਜਾਇਜ਼ ਜੁਰਮਾਨੇ ਪਾਉਣੇ ਬੰਦ ਕੀਤੇ ਜਾਣ, ਲੋੜਵੰਦ ਕਿਸਾਨਾਂ ਨੂੰ ਨਵੇਂ ਟਿਊਬਵੈੱਲ ਕੁਨੈਕਸ਼ਨ ਤੁਰੰਤ ਜਾਰੀ ਕੀਤੇ ਜਾਣ।
 

ਨੌਸ਼ਹਿਰਾ ਪਨੂੰਆਂ : ਸਬ-ਡਵੀਜ਼ਨ ਨੌਸ਼ਹਿਰਾ ਪਨੂੰਆ ਵਿਖੇ ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਝੰਡੇ ਹੇਠ ਸੈਂਕੜੇ ਕਿਸਾਨਾਂ-ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਵਿਰੁੱਧ ਨਾਅਰੇਬਾਜ਼ੀ ਕਰ ਕੇ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ। ਧਰਨੇ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ ਦੇ ਆਗੂ ਬਲਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਫੈਲੋਕੇ, ਮਨਜੀਤ ਸਿੰਘ, ਸੁਲੱਖਣ ਸਿੰਘ ਤੁੜ, ਬਾਬਾ ਫਤਹਿ ਸਿੰਘ ਤੁੜ, ਰੇਸ਼ਮ ਸਿੰਘ ਫੈਲੋਕੇ ਆਦਿ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਕੀਤੀ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਬਿਜਲੀ ਨਾਲ ਸੰਬੰਧਤ ਮਸਲਿਆਂ ਬਾਰੇ ਇੱਕ ਮੰਗ-ਪੱਤਰ ਐੱਸ ਡੀ ਓ ਨੌਸ਼ਹਿਰਾ ਪਨੂੰਆਂ ਰਾਹੀਂ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਭੇਜਿਆ ਗਿਆ।
ਧਰਨਾਕਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੌਜਵਾਨ ਸਭਾ ਦੇ ਆਗੂ ਬਲਦੇਵ ਸਿੰਘ ਪੰਡੋਰੀ ਅਤੇ ਸੁਲੱਖਣ ਸਿੰਘ ਤੁੜ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਪ੍ਰੇਮ ਸਿੰਘ, ਬਲਦੇਵ ਸਿੰਘ, ਗੁਰਭੇਜ ਸਿੰਘ, ਬਲਕਾਰ ਸਿੰਘ, ਲਖਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਆਦਿ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।

ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਤੇ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਵਲੋਂ ਸੂਬੇ ਭਰ ਵਿਚ ਧਰਨੇ ਤੇ ਮੁਜ਼ਾਹਰੇਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੌਜਵਾਨ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ-ਹਰਿਆਣਾ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਸਟੂਡੈਂਟਸ ਫੈਡਰੇਸ਼ਨ (ਪੀ.ਐਸ.ਐਫ.) ਵਲੋਂ ''ਹਾਕਮੋਂ ਨਸ਼ਾ ਬੰਦ ਕਰੋ, ਵਿਦਿਆ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਕਰੋ'' ਦੇ ਨਾਅਰੇ ਹੇਠ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਦੇ ਸਾਂਝੇ ਮਸਲਿਆਂ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਹੈਡਕੁਆਰਟਰਾਂ ਉਪਰ 13 ਜੁਲਾਈ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ 31 ਜੁਲਾਈ ਤੱਕ ਧਰਨੇ ਦਿੱਤੇ ਗਏ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਥਾਵਾਂ 'ਤੇ ਹੋਏ ਧਰਨਿਆਂ ਨੂੰ ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੌਜਵਾਨ ਸਭਾ ਦੇ ਸੂਬਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਜਸਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਢੇਸੀ, ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਮਨਦੀਪ ਰਤੀਆ, ਪੰਜਾਬ ਸਟੂਡੈਂਟਸ ਫੈਡਰੇਸ਼ਨ ਦੇ ਸੂਬਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਰੋਜਦੀਪ ਕੌਰ, ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਅਜੈ ਫਿਲੌਰ, ਪ੍ਰੈਸ ਸਕੱਤਰ ਬਲਦੇਵ ਪੰਡੋਰੀ, ਕਾਬਲ ਸਿੰਘ, ਗੁਰਦਿਆਲ ਘੁਮਾਣ, ਸੁਲੱਖਣ ਤੁੜ, ਸ਼ਮਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ, ਗੁਰਜਿੰਦਰ ਰੰਧਾਵਾ, ਗੁਰਚਰਨ ਮੱਲ੍ਹੀ, ਸੰਜੀਵ ਅਰੋੜਾ, ਰਵੀ ਪਠਾਨਕੋਟ, ਜਤਿੰਦਰ ਫਰੀਦਕੋਟ, ਮੱਖਣ ਫਿਲੌਰ, ਸੁਖਬੀਰ ਸਿੰਘ, ਵਤਨਦੀਪ ਕੌਰ, ਸੰਨੀ ਫਿਲੌਰ, ਨਵਦੀਪ ਸਿੰਘ ਕੋਟਕਪੁਰਾ, ਹਰਪ੍ਰੀਤ ਫਰੀਦਕੋਟ, ਗੁਰਜੰਟ ਸਿੰਘ ਘੁੱਦਾ ਆਦਿ ਨੌਜਵਾਨ-ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
ਇਨ੍ਹਾਂ ਧਰਨਿਆਂ ਦੀ ਕੜੀ ਦੀ ਸ਼ੁਰੂਆਤ 13 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਜਲੰਧਰ ਦੇ ਡੀ.ਸੀ. ਦਫਤਰ ਅੱਗੇ ਰੋਹ ਭਰਪੂਰ ਧਰਨਾ ਦੇ ਕੇ ਕੀਤੀ ਗਈ। ਉਸਤੋਂ ਬਾਅਦ ਗੁਰਦਾਸਪੁਰ, ਤਰਨਤਾਰਨ, ਪਠਾਨਕੋਟ, ਫਰੀਦਕੋਟ, ਬਠਿੰਡਾ, ਫਾਜ਼ਿਲਕਾ, ਮਾਨਸਾ, ਪਟਿਆਲਾ, ਨਵਾਂ ਸ਼ਹਿਰ, ਸੰਗਰੂਰ, ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ, ਫਗਵਾੜਾ ਆਦਿ ਸਥਾਨਾਂ ਉਪਰ ਕ੍ਰਮਵਾਰ ਧਰਨੇ ਦਿੱਤੇ ਗਏ।
ਇਸ ਮੌਕੇ ਧਰਨਿਆਂ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਕੇਂਦਰ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਦੀਆਂ ਲੋਕ ਮਾਰੂ ਨੀਤੀਆਂ ਕਾਰਨ ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰਾਂ ਦੀ ਕਤਾਰ ਵਿਚ ਲਗਾਤਾਰ ਵਾਧਾ ਹੁੰਦਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ ਅਤੇ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਦੀ ਮੰਗ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਨੌਜਵਾਨ ਮੁੰਡੇ ਕੁੜੀਆਂ ਨੂੰ ਡਾਂਗਾਂ ਮਾਰ ਕੇ ਕੁਟਿਆ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਹਾਲਾਤ ਹੁਣ ਇਥੋਂ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚ ਗਏ ਹਨ ਕਿ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਲਈ ਨੌਜਵਾਨ ਮੁੰਡੇ/ਕੁੜੀਆਂ ਨੂੰ ਟੈਂਕੀਆਂ ਉਪਰ ਚੜ੍ਹਨ ਲਈ ਮਜ਼ਬੂਰ ਹੋਣਾ ਪੈ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਜਦਕਿ ਸਰਕਾਰੀ ਅਤੇ ਅਰਧ ਸਰਕਾਰੀ ਮਹਿਕਮਿਆਂ ਅਦਾਰਿਆਂ ਅੰਦਰ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਹੀ ਅਸਾਮੀਆਂ ਖਾਲੀ ਪਈਆਂ ਹਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਧਰਤੀ ਉਪਰ 65 ਲੱਖ ਤੋਂ ਵੀ ਵੱਧ ਨੌਜਵਾਨ ਮੁੰਡੇ ਕੁੜੀਆਂ ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰ ਫਿਰ ਰਹੇ ਹਨ ਪ੍ਰੰਤੂ ਸੂਬੇ ਦੇ ਹਾਕਮਾਂ ਨੂੰ ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰਾਂ ਦੀ ਇੰਨੀ ਵੱਡੀ ਫੌਜ ਦਿਖਾਈ ਨਹੀਂ ਦੇ ਰਹੀ ਅਤੇ ਸਰਕਾਰੀ ਅੰਕੜਿਆਂ ਮੁਤਾਬਿਕ ਸਿਰਫ 444 ਨੌਜਵਾਨ ਹੀ ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰ ਹਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਅਸਲੀਅਤ ਵਿਚ ਬੇਰੁਜਗਾਰਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਲੱਖਾਂ ਨੂੰ ਛੋਹ ਰਹੀ ਹੈ ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਸਰਕਾਰ ਦੁਆਰਾ ਖੋਲ੍ਹੇ ਗਏ 'ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਦਫਤਰ' ਬੰਦ ਪਏ ਹਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਹਾਕਮਾਂ ਦੁਆਰਾ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਪਾਏ ਨਸ਼ੇ ਦੇ ਮੱਕੜ ਜਾਲ ਨੇ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜਕੜ ਲਿਆ ਹੈ। ਲੜਕੀਆਂ ਉਪਰ ਤਸ਼ੱਦਦ ਇਥੋਂ ਤੱਕ ਵੱਧ ਗਿਆ ਹੈ ਕਿ ਬੱਸਾਂ ਵਿਚ ਧੱਕੇਮੁੱਕੀ ਆਮ ਗੱਲ ਹੋ ਗਈ ਹੈ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਜ਼ਿਲ੍ਹਿਆਂ ਅੰਦਰ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਦੀ ਮੰਗ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਦੇ 20 ਹਜ਼ਾਰ ਫਾਰਮ ਵੀ ਭਰੇ ਗਏ ਜੋ ਕਿ ਮੰਗ ਪੱਤਰਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਪੁੱਜਦੇ ਕੀਤੇ ਗਏ ਹਨ।
ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਅੱਗੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਸਿੱਖਿਆ ਦਾ ਵਪਾਰੀਕਰਨ ਕੀਤੇ ਜਾਣ ਕਾਰਨ ਪ੍ਰਾਈਵੇਟ ਸਿੱਖਿਆ ਅਦਾਰਿਆਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿਚ ਲਗਾਤਾਰ ਵਾਧਾ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਜਦਕਿ ਸਰਕਾਰੀ ਸਿੱਖਿਆ ਅਦਾਰਿਆਂ ਦੀ ਹਾਲਤ ਨਾਜ਼ੁਕ ਹੁੰਦੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ। ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਦੀ ਲੁੱਟ ਵੀ ਲਗਾਤਾਰ ਵੱਧ ਰਹੀ ਹੈ। ਚੋਣਾਂ ਦੌਰਾਨ ਸਰਕਾਰ ਦੁਆਰਾ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨਾਲ ਲੈਪਟਾਪ ਦੇਣ ਅਤੇ ਸਪੈਸ਼ਲ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਬੱਸਾਂ ਚਲਾਉਣ ਦੇ ਵਾਅਦੇ ਕੀਤੇ ਤਾਂ ਜ਼ਰੂਰ ਗਏ ਸਨ ਪ੍ਰੰਤੂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਾਅਦਿਆਂ ਉਪਰ ਅਮਲ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਜਦਕਿ ਇਸ ਦੇ ਉਲਟ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨੂੰ ਮਿਲ ਰਹੀ ਬਸ ਪਾਸ ਸਹੂਲਤ ਨੂੇੰ ਵੀ ਤਾਰਪੀਡੋ ਕੀਤਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ ਅਤੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨੂੰ ਮਿਲ ਰਹੀਆਂ ਨਿਗੂਣੀਆਂ ਸਹੂਲਤਾਂ ਨੂੰ ਵੀ ਬੰਦ ਕੀਤਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਇਸੇ ਮੰਤਵ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਹੀ ਪੋਸਟ ਮੈਟ੍ਰਿਕ ਸਕਾਲਰਸ਼ਿਪ ਸਕੀਮ ਨੂੰ ਵੀ ਬੰਦ ਕਰਨ ਦੀਆਂ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ਾਂ ਕੀਤੀਆਂ ਜਾ ਰਹੀਆਂ ਹਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਧਰਨਿਆਂ ਵਿਚ ਨੌਜਵਾਨ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਵਲੋਂ ਸੰਘਰਸ਼ ਨੂੰ ਹੋਰ ਤੇਜ਼ ਕਰਨ ਲਈ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਕਮਰਕੱਸੇ ਕਰਨ ਦਾ ਸੁਨੇਹਾ ਵੀ ਦਿੱਤਾ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਧਰਨਿਆਂ ਦੀ ਰਿਪੋਰਟ ਇਸ ਪ੍ਰਕਾਰ ਹੈ:
 

ਜਲੰਧਰ : ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੌਜਵਾਨ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ-ਹਰਿਆਣਾ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਸਟੂਡੈਂਟਸ ਫੈਡਰੇਸ਼ਨ (ਪੀ ਐੱਸ ਐੱਫ) ਦੇ ਸੱਦੇ ਉਪਰ ਸੈਂਕੜੇ ਨੌਜਵਾਨ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨੇ 13 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਡੀ ਸੀ ਦਫਤਰ ਜਲੰਧਰ ਅੱਗੇ ਧਰਨਾ ਦੇ ਕੇ ਮੰਗਾਂ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਲਈ ਧਰਨਿਆਂ ਦੀ ਲੜੀ ਨੂੰ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਧਰਨਿਆਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਗੁਰਦੀਪ ਗੋਗੀ, ਸਰਬਜੀਤ ਸੰਗੋਵਾਲ ਤੇ ਸੰਜੀਵ ਅਰੋੜਾ ਨੇ ਕੀਤੀ। ਨੌਜਵਾਨ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਰੋਸ ਮਾਰਚ ਵੀ  ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਪੰਜਾਬ ਸੁਬਾਰਡੀਨੇਟ ਸਰਵਿਸਿਜ਼ ਫੈਡਰੇਸ਼ਨ ਦੇ ਸੂਬਾ ਪ੍ਰੈੱਸ ਸਕੱਤਰ ਤੀਰਥ ਸਿੰਘ ਬਾਸੀ ਨੇ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਤੌਰ 'ਤੇ ਭਰਾਤਰੀ ਸੰਦੇਸ਼ ਦਿੱਤਾ।
ਇਸ ਮੌਕੇ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਸੂਬਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਜਸਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਢੇਸੀ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਸੂਬੇ ਦੀ ਅਕਾਲੀ-ਭਾਜਪਾ ਸਰਕਾਰ ਜਦੋਂ ਦੁਬਾਰਾ ਸੱਤਾ ਵਿੱਚ ਆਈ ਸੀ ਤਾਂ ਉਦੋਂ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਜਾਂ ਇਕ ਹਜ਼ਾਰ ਰੁਪਇਆ ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰੀ ਭੱਤਾ ਅਤੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨੂੰ ਲੈਪਟਾਪ, ਸਪੈਸ਼ਲ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਬੱਸਾਂ ਅਤੇ ਮੁਫ਼ਤ ਵਿਦਿਆ ਆਦਿ ਦੇਣ ਦੇ ਵਾਅਦੇ ਵੀ ਕੀਤੇ ਸਨ, ਪ੍ਰੰਤੂ ਸਾਮਰਾਜੀ ਸੰਸਾਰੀਕਰਨ ਦੀਆਂ ਨੀਤੀਆਂ 'ਤੇ ਚੱਲ ਰਹੀ ਸੂਬਾ ਸਰਕਾਰ ਆਪਣੇ ਕੀਤੇ ਗਏ ਵਾਅਦਿਆਂ ਤੋਂ ਪੂਰੀ ਤਰਾਂ ਭੱਜ ਗਈ ਹੈ। ਸਭਾ ਦੇ ਸੂਬਾ ਪ੍ਰੈੱਸ ਸਕੱਤਰ ਗੁਰਜਿੰਦਰ ਰੰਧਾਵਾ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਅਕਾਲੀ-ਭਾਜਪਾ ਦੀ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਰਾਜ ਅੰਦਰ ਧੀਆਂ-ਭੈਣਾਂ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਮਹਿਸੂਸ ਨਹੀਂ ਕਰ ਰਹੀਆਂ।
ਉਨ੍ਹਾ ਮੰਗ ਕੀਤੀ ਕਿ ਮੋਗਾ ਕਾਂਡ ਦੇ ਦੋਸ਼ੀ ਬੱਸ ਮਾਲਕ ਸੁਖਬੀਰ ਬਾਦਲ ਉਪਰ ਮੁਕੱਦਮਾ ਦਰਜ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ ਅਤੇ ਬਾਦਲ ਪਰਵਾਰ ਦੀ ਜਾਇਦਾਦ ਦੀ ਸੀ ਬੀ ਆਈ ਕੋਲੋਂ ਜਾਂਚ ਕਰਵਾਈ ਜਾਵੇ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਪੰਜਾਬ ਸਟੂਡੈਂਟਸ ਫੈਡਰੇਸ਼ਨ ਦੇ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰ ਅਜੇ ਫਿਲੌਰ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਮੌਜੂਦਾ ਨਵ-ਉਦਾਰਵਾਦੀ ਨੀਤੀਆਂ ਨੂੰ ਤੇਜ਼ੀ ਨਾਲ ਲਾਗੂ ਕਰਨ ਦੇ ਕਾਰਨ ਵਿਦਿਆ ਲਗਾਤਾਰ ਮਹਿੰਗੀ ਹੁੰਦੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ। ਇੱਕ ਪਾਸੇ ਧੜਾਧੜ ਖੁੱਲ੍ਹ ਰਹੇ ਪ੍ਰਾਈਵੇਟ ਕਾਲਜਾਂ, ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀਆਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿੱਚ ਤਾਂ ਵਾਧਾ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਪ੍ਰੰਤੂ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਕੁੱਲ ਵਸੋਂ ਦੇ 80% ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਬੱਚਿਆਂ ਦੇ ਕੋਲੋਂ ਪੜ੍ਹਾਈ ਕਰਨ ਦਾ ਅਧਿਕਾਰ ਖੋਹਿਆ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਉਹਨਾਂ ਕੇਂਦਰ ਸਰਕਾਰ ਦੁਆਰਾ ਸਿੱਖਿਆ ਦੇ ਭਗਵਾਂਕਰਨ ਦੀ ਸਖ਼ਤ ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਨਿਖੇਧੀ ਕੀਤੀ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਗੁਰਚਰਨ ਮੱਲ੍ਹੀ, ਮੱਖਣ ਫਿਲੌਰ, ਸਨੀ ਫਿਲੌਰ, ਮਨਜਿੰਦਰ ਢੇਸੀ, ਜਸ਼ਨਪ੍ਰੀਤ, ਹਰਮਨਦੀਪ, ਗੁਰਦਿਆਲ ਨੂਰਪੁਰ, ਤਰਸੇਮ ਸ਼ਾਹਕੋਟ ਤੇ ਮਨੋਜ ਕੁਮਾਰ ਆਦਿ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 

ਗੁਰਦਾਸਪੁਰ : ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੌਜਵਾਨ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਸਟੂਡੈਂਟਸ ਫੈਡਰੇਸ਼ਨ ਵੱਲੋਂ 'ਨਸ਼ਾ ਬੰਦ ਕਰੋ, ਵਿੱਦਿਆ ਤੇ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਕਰੋ' ਦੇ ਨਾਹਰੇ ਤਹਿਤ ਡੀ ਸੀ ਦਫ਼ਤਰ ਅੱਗੇ ਜ਼ੋਰਦਾਰ ਧਰਨਾ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਧਰਨੇ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਗੁਰਦਿਆਲ ਸਿੰਘ ਘੁਮਾਣ, ਨਿਰਮਲ ਸਿੰਘ ਕਲਾਨੌਰ, ਲਖਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਧੰਦੋਈ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨਗੀ ਮੰਡਲ ਨੇ ਕੀਤੀ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਜੁੜੇ ਵਿਸ਼ਾਲ ਇਕੱਠ ਨੂੰ ਸਭਾ ਦੇ ਸੂਬਾਈ ਆਗੂ ਗੁਰਜਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਰੰਧਾਵਾ, ਸੂਬਾ ਕਮੇਟੀ ਮੈਂਬਰ ਸ਼ਮਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨਵਾਂ ਪਿੰਡ,  ਇਸਤਰੀ ਸਭਾ ਦੀ ਆਗੂ ਨੀਲਮ ਘੁਮਾਣ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 

ਤਰਨ ਤਾਰਨ : ਸੈਂਕੜੇ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਤੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੌਜਵਾਨ ਸਭਾ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਸਟੂਡੈਂਟਸ ਫੈਡਰੇਸ਼ਨ ਦੀ ਸੂਬਾ ਕਮੇਟੀ ਦੇ ਸੱਦੇ 'ਤੇ 'ਨਸ਼ਾ ਬੰਦ ਕਰੋ, ਵਿੱਦਿਆ ਤੇ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਕਰੋ' ਦੇ ਨਾਹਰੇ ਤਹਿਤ 15 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਤਰਨ ਤਾਰਨ ਦੇ ਬਜ਼ਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਰੋਸ ਮਾਰਚ ਕਰਕੇ ਡਿਪਟੀ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਤਰਨ ਤਾਰਨ ਦੇ ਦਫ਼ਤਰ ਅੱਗੇ ਵਿਸ਼ਾਲ ਧਰਨਾ ਦੇ ਕੇ ਭੱਖਦੇ ਮਸਲਿਆ ਸੰਬੰਧੀ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਜ਼ਿਲ੍ਹੇ ਦੇ ਡਿਪਟੀ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਰਾਹੀਂ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਨੂੰ ਭੇਜਿਆ, ਜਿਸ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਸੁਲੱਖਣ ਸਿੰਘ ਤੁੜ, ਸ਼ਮਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਸੁਰ ਸਿੰਘ, ਰਛਪਾਲ ਸਿੰਘ ਬਾਠ ਅਤੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਆਗੂ ਰੋਜ਼ਦੀਪ ਕੌਰ ਝਬਾਲ ਨੇ ਕੀਤੀ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਵਿਸ਼ਾਲ ਧਰਨੇ ਨੂੰ ਸਭਾ ਦੇ ਸੂਬਾਈ ਪ੍ਰੈਸ ਸਕੱਤਰ ਬਲਦੇਵ ਸਿੰਘ ਪੰਡੋਰੀ, ਕਾਬਲ ਸਿੰਘ ਪਹਿਲਵਾਨਕੇ ਅਤੇ ਗੁਰਜਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਰੰਧਾਵਾ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ। ਸਭਾ ਦੇ ਸਾਬਕਾ ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਪਰਗਟ ਸਿੰਘ ਜਾਮਾਰਾਏ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਕੇਂਦਰ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਦੀਆਂ ਨਵ-ਉਦਾਰਵਾਦੀ ਨੀਤੀਆਂ ਕਾਰਨ ਵਿੱਦਿਆ, ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਤੇ ਸਿਹਤ ਸਹੂਲਤਾਂ ਦਾ ਨਿੱਜੀਕਰਨ ਕਰਕੇ ਪਬਲਿਕ ਅਦਾਰਿਆਂ ਨੂੰ ਵੇਚਿਆ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ।  ਧਰਨੇ ਵਿੱਚ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਮਤਿਆਂ ਰਾਹੀਂ ਸਰਕਾਰ ਤੋਂ ਜ਼ੋਰਦਾਰ ਮੰਗ ਕੀਤੀ ਕਿ ਚੋਣ ਵਾਅਦੇ ਮੁਤਾਬਕ 1000 ਰੁਪਏ ਪ੍ਰਤੀ  ਮਹੀਨਾ ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰੀ ਭੱਤਾ ਫ਼ੌਰੀ ਤੌਰ 'ਤੇ ਦਿੱਤਾ ਜਾਵੇ, ਹਰੇਕ ਮਹਿਕਮੇ 'ਚ ਖਾਲੀ ਪਈਆਂ ਪੋਸਟਾਂ ਰੈਗੂਲਰ ਭਰੀਆਂ ਜਾਣ ਅਤੇ ਠੇਕੇ 'ਤੇ ਭਰਤੀ ਹੋਏ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਰੈਗੂਲਰ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ।
 

ਪਠਾਨਕੋਟ : ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੌਜਵਾਨ ਸਭਾ ਪੰਜਾਬ-ਹਰਿਆਣਾ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਸਟੂਡੈਂਟਸ ਫੈਡਰੇਸ਼ਨ (ਪੀ ਐੱਸ ਐੱਫ) ਵੱਲੋਂ ਸਭਾ ਦੇ ਫੈਸਲੇ ਮੁਤਾਬਕ ਪਵਨ ਕੁਮਾਰ ਸਿੰਬਲੀ ਅਤੇ ਰਜਿੰਦਰ ਕੁਮਾਰ ਕਟਾਰੂਚੱਕ ਦੀ ਪ੍ਰਧਾਨਗੀ ਹੇਠ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ। ਇਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿੱਚ ਰੋਸ ਮਾਰਚ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਨੌਜਵਾਨ ਨਾਅਰੇ ਮਾਰ ਰਹੇ ਸਨ : 'ਨਸ਼ਾ ਬੰਦ ਕਰੋ, ਵਿਦਿਆ ਤੇ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਕਰੋ', 'ਬਰਾਬਰ ਵਿੱਦਿਆ, ਸਿਹਤ ਤੇ ਰੁਜ਼ਗਾਰ, ਸਭ ਦਾ ਹੋਵੇ ਇਹ ਅਧਿਕਾਰ'।
ਡੀ ਸੀ ਦਫਤਰ ਅੱਗੇ ਹੋਏ ਇਕੱਠ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਸਟੂਡੈਂਟਸ ਫੈਡਰੇਸ਼ਨ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਸੂਬਾ ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਅਜੈ ਫਿਲੌਰ, ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੌਜਵਾਨ ਸਭਾ ਦੇ ਸੂਬਾਈ ਮੀਤ ਪ੍ਰਧਾਨ ਗੁਰਦਿਆਲ ਸਿੰਘ ਘੁਮਾਣ ਨੇ ਕੇਂਦਰ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਅਕਾਲੀ-ਭਾਜਪਾ ਸਰਕਾਰ ਦੀਆਂ ਲੋਕ-ਮਾਰੂ ਅਤੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀ-ਮਾਰੂ ਨੀਤੀਆਂ ਦਾ ਵਿਰੋਧ ਕੀਤਾ।
ਫਰੀਦਕੋਟ : ਇਸ ਜ਼ਿਲ੍ਹੇ ਅੰਦਰ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਧਰਨੇ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਹਰਪ੍ਰੀਤ ਸਿੰਘ, ਰੌਸ਼ਨ ਸਿੰਘ, ਰਾਜਕੁਮਾਰ ਨੇ ਕੀਤੀ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਅਜੈ ਫਿਲੌਰ, ਜਤਿੰਦਰ ਫਰੀਦਕੋਟ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਨਵਦੀਪ ਕੋਟਕਪੂਰਾ, ਏਕਮ ਸਿੰਘ ਆਦਿ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ। ਇਸ ਮੌਕੇ 500 ਫਾਰਮ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਅਧਿਕਾਰੀ ਨੂੰ ਸੌਂਪੇ ਗਏ।
 

ਮਾਨਸਾ : ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ 22 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਮਾਨਸਾ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਹੈਡਕੁਆਰਟਰ ਉਪਰ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਜਿਸ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਬਨਸੀ ਰਾਮ ਅਤੇ ਮਨਦੀਪ ਸਿੰਘ ਸਰਦੂਲਗੜ੍ਹ ਨੇ ਕੀਤੀ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰ ਮਨਦੀਪ ਸਿੰਘ ਰਤੀਆ ਅਤੇ ਪੀ.ਐਸ.ਐਫ. ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਸਕੱਤਰ ਮਨਪ੍ਰੀਤ ਸਿੰਘ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ।
 

ਪਟਿਆਲਾ : 23 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੌਜਵਾਨ ਸਭਾ ਅਤੇ ਪੀ.ਐਸ.ਐਫ. ਦੇ ਵਰਕਰਾਂ ਵਲੋਂ ਡੀ.ਸੀ. ਦਫਤਰ ਪਟਿਆਲਾ ਅੱਗੇ ਰੋਸ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ। ਇਸ ਉਪਰੰਤ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਵਲੋਂ ਸ਼ਹਿਰ ਅੰਦਰ ਮਾਰਚ ਵੀ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਧਰਨੇ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਸੁਰੇਸ਼ ਸਮਾਣਾ ਆਦਿ ਨੇ ਕੀਤੀ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਸਾਥੀ ਮਨਦੀਪ ਰਤੀਆ ਅਤੇ ਸੁਰੇਸ਼ ਸਮਾਣਾ ਨੇ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ। ਅੰਤ ਵਿਚ ਡੀ.ਸੀ. ਪਟਿਆਲਾ ਰਾਹੀਂ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਨੌਜਵਾਨ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਮਸਲਿਆਂ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਮੰਗ ਪੱਤਰ ਵੀ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ।
 

ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨਗਰ : ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨਗਰ ਵਿਖੇ ਪੰਜਾਬ ਸਟੂਡੈਂਟਸ ਫੈਡਰੇਸ਼ਨ ਅਤੇ ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੌਜਵਾਨ ਸਭਾ ਵਲੋਂ ਰੋਸ ਧਰਨਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ। ਜਿਸ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਬਹਾਦਰ ਸਿੰਘ ਮੁਕੰਦਪੁਰ ਅਤੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਆਗੂ ਗੁਰਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਜਗਤਪੁਰ ਨੇ ਕੀਤੀ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਪੀ.ਐਸ.ਐਫ. ਦੇ ਸੂਬਾ ਸਕੱਤਰ ਅਜੈ ਫਿਲੌਰ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਸਾਬਕਾ ਨੌਜਵਾਨ ਆਗੂ ਸਰੂਪ ਸਿੰਘ ਰਾਹੋਂ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ। 


हरियाणा में  तीन वामपंथी दलों द्वारा संयुक्त सम्मेलन 
हरियाणा के वामपंथी आंदोलन में उस समय एक नया आयाम जुड़ गया जब राज्य की तीन वामपंथी पार्टियों-सी.पी.आई., सी.पी.आई.(एम) तथा सी.पी.एम. हरियाणा की राज्य इकाईयों द्वारा फतेहाबाद की जाट धर्मशाला में एक संयुक्त प्रतिनिधि सम्मेलन कर एक प्रस्ताव पारित करते हुए प्रांतवासी मेहनतकशों की फौरी मांगों की प्राप्ति के लिए सांझा आंदोलन चलाने का निर्णय लिया गया। विगत 4 जुलाई को हुए इस सम्मेलन की अध्यक्षता सर्व साथी तेजिन्द्र सिंह थिंद, साथी हरपाल सिंह पूर्व विधायक तथा साथी संपूर्ण सिंह सूरी पर आधारित अध्यक्षमंडल ने की।
प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए साथी मंगत राम पासला  सचिव सी.पी.एम. पंजाब, साथी इन्द्रजीत सिंह राज्य सचिव सी.पी.आई.(एम) तथा स्वर्ण सिंह विर्क राज्य सचिव सी.पी.आई ने आह्वान किया कि साम्राज्यवादी नीतियां लागू करने पर आमादा केंद्र की मोदी सरकार को जहां राजनैतिक फ्रंट पर अलग थलग करना अति आवश्यक है वहीं मेहनतकशों के सभी वर्गों की फौरी मांगों जैसे स्थायी रोजगार, रोजगार ना मिलने की सूरत में बेरोजगारी भत्ता, सब के लिये समान, वैज्ञानिक व रोजगारमुखी निशुल्क शिक्षा, सभी को बिना भेदभाव सरकार प्रायोजित निशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं, प्रदूषण मुक्त वातावरण, पीने वाला स्वच्छ व साफ निशुल्क जल, रहने के लिए मकान, बीमा, कम से कम 3 हजार रुपए प्रतिमाह वृद्धावस्था व विधवा पेंशन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, जाति व सामाजिक उत्पीडऩ के खातमें, फसलों के उचित भाव, कामगारों को 15 हजार रुपए प्रति माह न्यूनतम वेतन, मनरेगा  अधीन पूरे परिवार को पूरा साल 400 रुपए प्रतिदिन के वेतन पर काम, औरतों को हर क्षेत्र में समान अवसर आदि मांगों पर एक विशाल जन भागीदारी पर अधारित जनआंदोलन का निर्माण किया जाए।
वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि ऐसा करते हुए ही हम राज्य की खट्टूर सरकार व केंद्र की मोदी सरकार द्वारा अपने जनविरोधी कार्यक्रम के र्निविघ्न निर्वहन के लिये फैलाए जा रहे धार्मिक उन्माद को करारी शिकस्त दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि केंद्रीय व राज्य सरकारें अपने कुकृत्यों को सफल बनाने हेतु जहां एक ओर धार्मिक कट्टरता के आधार पर लोगों को बांटने में लगी हुई है वहीं दूसरी ओर घोषित आघोषित कानूनों/कदमों द्वारा जनवादी आंदोलन को कुचलने के जघन्य अपराध व जनविरोधी कार्यों में लिप्त हैं। वामपंथियों को प्राथमिकता के आधार पर  इस के खिलाफ आंदोलन विकसित करना होगा जिसमें वामपंथ से इतर इंसाफपसंद संगठनों/व्यक्तियों को शामिल करना होगा। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि उक्त सभी उद्देश्यों के पूर्ति के लिये वामपंथ की सुदृढ़ एकता पर आधारित सांझा आंदोलन ही लोगों की आकाक्षाओं की पूर्ति कर सकता है।
साथी मंदीप सिंह रतिया व साथी राम कुमार ने भी प्रतिनिधि सम्मेलन में अपने विचार रखे। 
रिपोर्ट : तेजिंदर सिंह थिंद
 

हरियाणा में शहीद भगत सिंह नौजवान सभा के बढ़ते कदमशहीद भगत सिंह नौजवान सभा पंजाब हरियाणा का हरियाणा प्रांत में समग्र विकास व संगठन में वृद्धि हो रही है। विगत दिनों सभा के महासचिव मंदीप रतिया, फतेहाबाद जिलाध्यक्ष व सचिव क्रमश: अजय सिघाणी व निर्भय रतिया तथा राज्य वर्किंग कमेटी सदस्य सुखविंदर सिघाणी के प्रयत्नों द्वारा यमुनानगर जिले की छिछरौली तहसील में सभा की 11 सदस्यीय तदर्थ समिति का गठन किया गया जो आने वाले दिनों में संपूर्ण जिले में सदस्यता अभियान चलाने के पश्चात ग्राम इकाईयां गठित करते हुए विधिवत तहसील सम्मेलन का आयोजन करेगी। सम्मेलन का स्थान व तिथियां भी तदर्थ समिति द्वारा निश्चित की जाएंगी। जैसे कि इन्हीं पृष्ठों पर पहले जिक्र किया जा चुका है हरियाणा के युवक आंदोलन में लड़कियों की भागीदारी बहुत सम्मान योग्य है, इस परंपरा का निर्वाह करते हुए इस तदर्थ समिति के गठन एवं इस में शामिल होकर युवक आंदोलन का निर्माण एवं विस्तार करने के उद्देश्य से यहां भी लड़कियों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई।
रिपोर्ट : अमन रतिया